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उपन्यास - रात के ग्यारह बजे - भाग 8 - राजेश माहेश्वरी

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उपन्यास

रात के ग्यारह बजे

- राजेश माहेश्वरी

भाग 1  ||  भाग 2 ||  भाग 3 || भाग 4 || भाग 5 || भाग 6 || भाग 7 ||


भाग 8

चेन्नई हवाई अड्डे पर जब जहाज उतरता है और सब लोग उससे बाहर आते हैं तो पल्लवी और उसकी माँ वहां का दृश्य, साज-सज्जा एवं वातावरण देखकर अभीभूत हो जाते हैं। उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे किसी और ही दुनियां में आ गए हों। इसके पूर्व तक उन दोनों ने रेल के वातानुकूलित श्रेणी में भी यात्रा नहीं की थी। अचानक इस वैभव पूर्ण वातावरण को देखकर उनकी आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। आनन्द का उन सब को हवाई जहाज में लाने का मकसद राकेश को नीचा दिखाना भी था। दूसरा वह अपने धन का प्रदर्शन करके पल्लवी और उसकी मां को प्रभावित भी करना चाहता था।

ट्रेवल ऐजेन्सी के द्वारा पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार दो टैक्सी उपलब्ध करा दी गई थीं। एक टैक्सी पर पल्लवी की मां और गौरव शंकर नेत्रालय के कैम्पस में उनके गेस्ट हाउस में चले जाते हैं, दूसरी टैक्सी में आनन्द और पल्लवी ताज होटल निकल जाते हैं।

गौरव, आनन्द, पल्लवी और उनकी माता जी के स्वभाव में भिन्नता थी। परन्तु उनमें एक सामन्जस्य था। एक-दूसरे को समझने की परिपक्वता थी। आनन्द ने सभी चिकित्सकों से तीन दिन बाद का समय लिया था। ये तीन दिन वह पल्लवी के साथ एकान्त में बिताकर उसके दिल में अपने लिये प्यार पैदा कर देना चाहता था। वह पल्लवी के साथ जीवन का मजा भी लेना चाहता था। वह यह भी जानना चाहता था कि पल्लवी का साथ उसके जीवन में कहां तक रहेगा। गौरव एक धार्मिक प्रवृत्ति का गम्भीर एवं प्रभु के प्रति आस्थावान व्यक्तित्व था। इसके विपरीत आनन्द धर्म और ईश्वर में कम आस्था रखता था। उसका विश्वास कर्म पर था। पल्लवी और उसकी माँ ने जीवन में इतने कष्ट भोगे थे और उनका जीवन इतनी यातनाओं से गुजरा था कि उन्होंने एक प्रकार से सोचना ही छोड़ दिया था। उनके लिये पैसा ही भगवान था।

वे चारों शाम के समय समुद्र के किनारे भ्रमण के लिये पहुँचते हैं और वहां का विहंगम दृश्य देखकर प्रफुल्लित हो जाते हैं। पल्लवी की मां और गौरव आगे-आगे चल रहे थे और आनन्द पल्लवी के साथ उनसे कुछ दूरी बनाकर चल रहा था। आनन्द पल्लवी का हाथ थामकर कहता है पल्लवी मैं और तुम समुद्र का यह किनारा लहरों में जैसे जीवन की कल्पना हो रही हो। हमारे मन में नये-नये विचार आ रहे हैं। प्रतिदिन क्षितिज में ऊगता हुआ सूर्य देखकर हम उसको नमस्कार करते हैं और कोलाहलपूर्ण जीवन की शुरूआत करते हैं।

जीवन का यह क्रम अनवरत चल रहा है और जब तक संसार है ऐसे ही चलता रहेगा। यह सुनकर पल्लवी उसके और भी निकट आ जाती है। फिर पूछती है तुम मुझसे क्या चाहते हो। आनन्द कहता है सागर की गहराई सी गम्भीरता तुम में हो आकाश के विस्तार के समान र्धर्य और धरती से आसमान की ऊंचाई के समान हृदय में उदारता हो। ऐसे स्वभाव की अपेक्षा तुमसे है। जीवन में कठोर श्रम, लगन में हो सच्चाई, कर्म से हो सृजन तभी यह सुख समृद्धि मान-सम्मान का आधार बनता है। यह जितना मजबूत होगा उतना ही जीवन का यथार्थ सुदृढ़ होकर सफल होगा। जीवन का सत्य है कि आत्म निर्भरता की राह पर बढ़ते चलो और अपनी मदद स्वयं करो। अपनी कल्पनाओं को हकीकत में बदलकर सृजन से आत्मनिर्भर बनो। जीवन में सफलता पाकर समाज में अपना विशिष्ट स्थान बनाओ। एक ओर आनन्द बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था और दूसरी ओर उसके हाथ पल्लवी का कन्धा सहला रहे थे।

तुमने शहनाज हर्बल का ब्यूटीशियन का पूरा कोर्स किया है। तुम्हारे पास डिग्री भी है। तुमने इसके बाद यदि इस दिशा में काम किया होता तो आज तुम एक अच्छी ब्यूटीशियन के रुप में जानी जाती। आज कम से कम चालीस पचास हजार रूपया महिना तुम कमा रही होतीं। सरकार की स्वरोजगार योजना का लाभ लेकर आज तुम अपने पैरों पर खड़ी होतीं।

पल्लवी कहती है- यह सब वक्त-वक्त की बातें होती हैं यदि समय साथ देता है तभी जीवन में सब कुछ प्राप्त होता है अन्यथा पर उपदेश कुशल बहुतेरे तो बहुत होते हैं।

उनकी यह बात गौरव के कानों में भी पड़ जाती है। गौरव बीच में कहता है- वक्त हमारा मित्र है एवं जीवन में उमंग, तरंग व सृजन का जन्मदाता है। वक्त आशाओं का उद्गम है और कल्पनाओं को वास्तविकता में परिवर्तित करके सफलता की कहानी बनता है। सही समय पर हम दस्तक तो दें वक्त तो सभी को उपलब्ध है। वह अमीर और गरीब में भेदभाव भी नहीं करता, जिसने वक्त को पहचान लिया और सही समय पर अपना बना लिया उसी ने सुख शान्ति वैभव को पा लिया। वक्त सबसे बड़ा दाता है हम इसे समझकर इसके प्रति कृतज्ञ होकर हृदय से समर्पित हो अभिमान से दूर रहकर विनम्रता पूर्वक वक्त हो नमन करें यही जीवन का प्रारम्भ व अन्त है। पल्लवी की मां इन बातों को सुनकर कहती है जिन्दगी में किसी की भी सभी हसरतें पूरी नहीं होतीं। उसूलों पर चलने वाले हसरतों से नहीं डरते। हम नहीं समझ पाते हैं कि हसरतें हमारे जीवन का दर्पण एवं भविष्य का आधार हैं। हसरतों को पूरा करने के लिये कठिन परिश्रम धर्म ज्ञान और भाग्य के साथ कर्म का समन्वय भी अपनी भूमिका निभाता है। तभी सफलता का आधार हमें प्राप्त होता है। हमको अपने स्वभाव में धर्मवीर, कर्मवीर और दानवीर के गुणों का समावेश करना होगा तभी हमारी हसरतें पूरी करने की दिशा में हम आगे बढ़ सकेंगे।

पल्लवी तिरछी निगाहों से आनन्द की ओर देखकर कहती है- धनवान तो धन में भी धन को ही सोचता है और उसे सहेजता है। उसे धन के संचय में ही धन का सार नजर आता है। धन से धन कमाना उसे आता है। वह अपनी परछाईं में भी धन का मुख देखता है। वह शान्ति तृप्ति और संतुष्टि से दूर रहता है क्योंकि वह धन में ही जीता है और एक दिन सब कुछ यहीं छोड़कर विदा हो जाता है।

उसकी बात सुनकर आनन्द का अहम आहत होता है और वह बौखला जाता है वह पल्लवी से कहता है कि तुम मानवीय संवेदनाओं के विषय में कुछ नहीं जानतीं, यह एक गूढ़ और गम्भीर विषय है। परोपकार सदैव कृतार्थ करता है उसे आप माने या न माने यह आप पर निर्भर करता है। वह हमेशा दाता से अभिलाषा बढ़ाता है। वह अभिलाषा पूरी न हो तो अभिलाषी को निराशा होती है। वह सामने वाले की मजबूरी न समझ कर मदद नहीं करने के लिये बहाना बनाने वाली बात सोच लेता है। उसके मन में हमारे प्रति दुर्भावना आती है जो हमारी आत्मा को कष्ट देती है जीवन में सेवा से बड़ा धर्म और कर्म दूसरा नहीं है। यदि ऐसा संभव न हो तो कठोर वचन व घमण्ड पूर्ण वाणी का प्रयोग मत करो। यदि कुछ भी नहीं दे सकते तो प्रेम पूर्वक समझाओ और प्रेम की वाणी से सांत्वना अवश्य दो। यथा संभव उसकी पीड़ा में सहभागी बनकर मदद पहुंचाओ और उसके कष्ट को कम करने का प्रयास करो। इससे तुम्हें परम आनन्द की प्राप्ति होगी और परोपकार की राहों में चलने की शक्ति मिलेगी।

यह सब सुनने के बाद पल्लवी जीवन की राह के विषय में आनन्द एवं गौरव से पूछती है- आखिर हमारे जीवन की राह क्या, कैसी और क्यों होनी चाहिए। दोनों ही इस विषय पर अचकचा जाते हैं। वे पल्लवी से ही पूछते हैं तुम्हारा इस विषय में क्या विचार है।

पल्लवी कहती है- गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम पवित्र हो सकता है किन्तु मोक्ष दायक नहीं होता। संगम में डुबकी से भावना बदल सकती है किन्तु क्रिया-कर्म एवं धर्म के बिना मोक्ष असम्भव है। हमारी सांस्कृतिक मान्यता है कि हम जैसा कर्म करेंगे वैसा ही फल प्राप्त होगा। हम सत्यमेव जयते, मनसा वाचा कर्मणा अपने जीवन में अपनाएंगे तो सुख, सम्पदा और स्नेह का होगा संगम। सूर्य जो हमें ऊर्जा देता है प्रकाश दिखलाता है रास्ता, सुहावनी सन्ध्या देती है शान्ति और निशा देती है विश्राम। चांदनी से मिलती है तृप्ति की अनुभूति और हम पर बरसेगी परमात्मा की असीम कृपा। हमारे जीवन में हो समर्पण कर्म में सेवा की भावना और धर्म में परोपकार के प्रति श्रृद्धा। धर्म पालन में हो ईमानदारी और सच्चाई, हृदय में हो आत्मीयता और वाणी में हो मधुरता ईश्वर हमारे साथ रहेगा और यह धरती स्वर्ग बन जाएगी।

पल्लवी की ये बातें सुनकर आनन्द व गौरव हत्प्रभ रह जाते हैं। उन्हें समझ में नहीं आता कि वे क्या उत्तर दें। पल्लवी मुस्कराती है और कहती है कि मैंने अब अपने आप को तुम्हारे प्रति समर्पित कर दिया है। मेरे जीवन में पुराने एक दो मित्रों के अलावा अब कोई नहीं आएगा। परन्तु मुझे हमेशा एक चिन्ता सताती है कि अभी तो तुम मुझे प्रतिमाह खर्चे की जितनी रकम देते हो उससे मेरा खर्च चल जाता है किन्तु आज समाज में रहने के लिये अनेक वस्तुएं जैसे फ्रिज, टीवी आदि रोजमर्रा की आवश्यकता बन गए हैं। यदि ये सामान्य मानी जाने वाली वस्तुएं भी किसी परिवार में न हों तो उसे एक बहुत ही हीन स्थिति का माना जाता है। फिर आज तो तुम हो किन्तु कल यदि तुम मेरा हाथ छोड़ दोगे तो मैं और मेरा परिवार तो कहीं का नहीं रह जाएगा।

यह बात सुनकर आनन्द कहता है, आशा से भरा जीवन सुख है निराशा के निवारण का प्रयास ही जीवन संघर्ष है। जो इसमें सफल है वही सुखी और सम्पन्न है। असफलता है दुख और निराशा में है जीवन का अन्त। यही है जीवन का नियम यही है जीवन का क्रम। मेरी महबूबा ! तुम चिन्तित मत हो। मैं तुम्हारे लिये सब कुछ व्यवस्था कर दूंगा। मेरे न रहने पर भी तुम्हारा जीवन सुखी व समृद्ध रहेगा।

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आनन्द एक बहुत होशियार और समझदार व्यक्तित्व का धनी था। वह नगर छोड़ने के पहले पल्लवी की सहपाठी एवं उसके साथ रहने वाली कुछ लड़कियों से मित्रता कर चुका था। उनके माध्यम से वह पल्लवी की एक-एक गतिविधि की जानकारी प्राप्त करता रहता था। उसे पता चल गया था कि पल्लवी कुछ दूसरे लोगों से भी मिलती है किन्तु यह बात वह हमेशा उससे छुपाती है। आनन्द इस बात को अभी उतनी गम्भीरता से नहीं लेता था किन्तु इतनी मदद करने के बाद एवं इतने आश्वासन देने के पश्चात उसने पल्लवी से इस विषय पर बात करने का मन ही मन निश्चय किया। उसने पल्लवी से पूछा- यह क्या माजरा है ? वे कौन हैं ? तुम्हारा और उनका क्या संबंध है ? पल्लवी ने बिना किसी घबराहट के कहा कि आगे आने वाले समय में ये सब बातें तुम्हें स्वयं पता लग जाएंगी। आनन्द को पल्लवी के इस उत्तर से संतोष नहीं होता।

वहां से वे लोग होटल वापिस आ जाते हैं। होटल में कमरे में व्हिस्की का दौर चालू हो जाता है। गौरव के लिये बियर बुलवाई जाती है। इसी बीच बातचीत में आनन्द, पल्लवी को आश्वासन देता है कि वह उसके लिये एक मकान खरीद देगा। वह उससे कहता है कि मकान की तलाश प्रारम्भ कर दो। वह उसे यह भी आश्वासन देता है कि उसके नाम से वह बीस लाख की एफ डी करा देगा। जिसका ब्याज उसे नियमित रुप से मिला करेगा। इसके अलावा फ्रिज, टीवी, स्कूटी आदि जो तुम्हें चाहिए वह भी मैं दिलवा दूंगा। यह सुनकर पल्लवी मन ही मन बहुत प्रसन्न हो जाती है। वह आनन्द का हाथ जोर से पकड़ लेती है। आनन्द कहता है इसे पकड़ा है तो छोड़ना मत। पल्लवी कहती है मैं जिसे पकड़ती हूँ उसे छोड़ती नहीं हूँ। उसकी बात सुनकर आनन्द के चेहरे पर एक भेद भरी मुस्कराहट आ जाती है। वह गहरी नजरों से पल्लवी की ओर देखता है। पल्लवी भी उसकी ओर देखते हुए मुस्कराने लगती है।

बियर पीने के बाद गौरव डिस्को जाने की इच्छा व्यक्त करता है। वहां से वे सभी लोग डिस्को के लिये निकलते हैं। पल्लवी की माँ डिस्को जाने से मना कर देती है, वे उसे रास्ते में उसके होटल में उतार देते हैं। तीनों डिस्को पहुँचते हैं तो वहां फिर ड्रिंक्स मंगवा लिये जाते हैं। यहां गौरव एक बियर और पीता है। बियर पीने के बाद गौरव फ्लोर पर डांस करने चला जाता है। बियर के नशे में वह डांस करते हुए बार-बार डांस करती हुई लड़कियों से टकराता है। एक बार तो गजब ही हो जाता है गौरव अचानक लड़खड़ाता है और संभलने के लिये सामने की एक लड़की को पकड़ने का प्रयास करता है। लड़की तो पकड़ में नहीं आती उसके कपड़े उसके हाथ आते हैं। गौरव गिर पड़ता है और उसके साथ ही उस लड़की के कपड़े फटकर उसके हाथ में रह जाते हैं। लड़की के ऊपर के कपड़े अलग हो जाते हैं। वह अपने सीने को हाथ से छुपाते हुए चीखती है। लोगों का ध्यान उस ओर चला जाता है। गौरव को नीचे पड़ा हुआ और लड़की को अपने आप को छुपाते देख कर हंगामा मच जाता है। यह देखकर आनन्द और पल्लवी गौरव के पास पहुँचकर उसे उठाते हैं। आनन्द अपना कोट उतार कर लड़की को ढांक देता है। फिर उससे क्षमा मांगता है। लड़खड़ाते हुए गौरव को लेकर वे डिस्को के बाहर आ जाते हैं।

दूसरे दिन सुबह गौरव पल्लवी की मां को साथ लेकर ताज होटल पहुँचता है। वहां की साज-सज्जा एवं पांच सितारा होटल की भव्यता देखकर मानसी की माँ भौंचक्की रह जाती है। गौरव उनको बताता है कि यह तो कुछ भी नहीं है वह दुनियां की बड़ी से बड़ी होटल में अपने बेटों के साथ रूका है। यह तो उन होटलों के आगे एक साधारण होटल है। वो साथ में यह कहना नहीं भूलता कि उसके बेटों ने उसे विदेशों में भ्रमण कराने में लाखों रूपये खर्च किये। मेरी धन की सम्पन्नता देखकर तो राकेश भी मुझसे मन ही मन जलता है। यह और बात है कि वह कुछ कहता नहीं है। वह उसे यह भी बतलाता है कि तुम्हारी लड़की के तो भाग्य खुल गये हैं जो उसे आनन्द जैसा धनवान, जिन्दादिल और परोपकारी इन्सान पसन्द करता है। मैंने ही राकेश से कहकर पल्लवी को आनन्द से मिलवाया था। इनकी दोस्ती करवाने के लिये मुझे कितना प्रयास करना पड़ा यह मैं ही जानता हूँ।

राकेश तो जानबूझकर यहां नहीं आया क्योंकि यहां आता तो उसकी हीनता सामने आ जाती। लेकिन तुम्हारी बेटी मानसी बेवकूफ है जो इस यात्रा में नहीं आयी। उसे तो आनन्द से अपने संबंध अच्छे रखना चाहिए थे। पल्लवी की मां ने इन सब बातों का कोई उत्तर नहीं दिया किन्तु मन ही मन वह पल्लवी और आनन्द की मित्रता से बहुत प्रसन्न थी। बात करते-करते ही आनन्द का कमरा आ गया। उन्होंने कालबैल बजाई। आनन्द तैयार बैठा था। उसने माता जी को नमस्कार किया उन्हें अपना रुम दिखाया और बताया कि इसका किराया बीस हजार रूपया प्रतिदिन है। पल्लवी अभी नहा रही है, हम लोग नाश्ते के लिये चलते हैं, वह वहां आ जाएगी। वे तीनों नाश्ते के लिये डाइनिंग हाल में आ गये।

पल्लवी जब वहां आयी तो उसकी साड़ी देखकर उसकी मां ने उससे पूछा कि इतनी सुन्दर साड़ी उसे कहां से मिली ? पल्लवी ने बताया कि आनन्द ने इसी होटल से यह साड़ी पच्चीस हजार रूपयों में खरीदकर दी है। इन्होंने तुम्हारे लिये भी एक साड़ी पसन्द की है।

नाश्ते के दौरान वे दिन भर का कार्यक्रम बनाते रहे। जिसमें मुख्य रुप से शॉपिंग माल, रेस्टारेण्ट और दर्शनीय स्थलों का भ्रमण करने की ही योजना थी। शाम को वे महाबलीपुरम जाने का प्रोग्राम बनाते हैं। रात के डिनर के लिये वे वहां के ताज होटल में टेबल बुक करा देते हैं। नाश्ते के बाद वे चेन्नई भ्रमण के लिये निकलते हैं। पल्लवी के लिये उस दिन आनन्द लगभग डेढ़ लाख की शॉपिंग कराता है। पल्लवी की मां और गौरव के लिये भी आनन्द काफी मंहगे सामान खरीदता है। गौरव दिन भर आनन्द की प्रशंसा के पुल बांधता रहता है। आनन्द अपने आप को बहुत गौरवान्वित अनुभव करता है। वह पल्लवी और उसकी मां से यह भी कहता है कि यदि मानसी भी होती तो और भी अच्छा रहता। आनन्द मानसी के लिये भी एक साड़ी खरीदता है। यह सब देखकर गौरव व माता जी ऐसी अनुभव कर रहे थे जैसे वे स्वप्न लोक में आ गए हों। इसी प्रकार रात्रि भोजन के बाद वे अपने-अपने होटल आ गयें।

तीसरे दिन सुबह सबसे पहले माता जी को शंकर नेत्रालय में डाक्टर चेकअप करते हैं और उनके मोतियाबिन्द का आपरेशन करने के लिये उन्हें भरती कर लेते हैं। आनन्द अच्छे से अच्छा कान्टेक्ट लेन्स लगाने का आर्डर दे देता है। इसके बाद गौरव का चेकअप होता है। गौरव अपनी आदत के अनुसार डॉक्टर से कहता है- आई एम ए इन्टरनेशनल आर्टिस्ट। आई विल मेक ए पेन्टिंग फार यु एण्ड विल प्रेजेन्ट यू। आई हैव मेड सेवेरल पेन्टिंग्स फार सेवेरल मिनिस्टरस। आई हैव गाट सो मैनी एवार्डस। फारेनर्स नो द वैल्यू ऑफ माइ पेन्टिंग्स। डाक्टर उसे नम्रता पूर्वक चुप रहने का निर्देश देता है। वह पूरी तरह निरीक्षण करने के बाद आनन्द को अपने केबिन में बुलाता है। उसे बताता है कि इस व्यक्ति ने अपनी लापरवाही से अपनी एक आंख गंवा दी है। अब दुनियां में इसका कोई इलाज नहीं है। इसकी यह स्थिति आने में छः से सात साल का समय लगता है। अब आप इनकी दूसरी आंख की चिन्ता कीजिए ताकि उसका समय पर आपरेशन हो जाए। इसके बाद पल्लवी को दूसरी अस्पताल में चैकअप के लिये ले जाता है। वहां डाक्टर उसे चौबीस घण्टे के चेकअप के लिये भरती कर लेता है। वहां की स्त्री रोग विभाग की चिकित्सक आनन्द को केबिन में ले जाकर कहती है कि मुझे शक है कि इसे कोई न कोई गम्भीर बीमारी हो गई है। मैं शाम तक आपको इसकी खबर दूंगी।

शाम को जब आनन्द पल्लवी की रिपोर्ट पता करने पहुँचता है तो यह जानकर कि उसे सिफलिस है उसके हाथों के तोते उड़ जाते हैं। वह वास्तव में भीतर ही भीतर घबरा जाता है। वह पल्लवी का उपचार तो तत्काल करवाता ही है एक दूसरे अस्पताल में जाकर अपना भी चेकअप करवाता है। उसे बड़ी राहत मिलती है जब उसे पता लगता है कि उसे कोई मर्ज नहीं है।

आनन्द आकर गौरव को उसकी वास्तविक स्थिति बतला देता है कि उसकी एक आंख हमेशा के लिये अपनी रोशनी खो चुकी है और उसका कोई उपचार नहीं है। आनन्द वहां से फोन पर उसके लड़कों को भी बतला देता है। वे यही कहते हैं कि सब पापा की कंजूसी का परिणाम है। ये हमेशा चाहते हैं कि इन्हें सब कुछ प्राप्त हो पर इनका एक पैसा भी खर्च न हो किन्तु आज के समय में ऐसा संभव ही कहां है। ये केवल मुफ्त के जुगाड़ में रहते हैं जिसका यह परिणाम हम सब के सामने है। बतलाइये हम लोग क्या कर सकते हैं। यदि हम हिन्दुस्तान आ भी जाएं तो अब क्या हो सकता है। इनके इलाज में जो भी खर्च हुआ हो आप हमें बतला दीजिये हम यहां से वह आपको भेज देंगे।

यह सुनकर आनन्द उन्हें मना कर देता है। वह कहता है कि गौरव मेरा सबसे अभिन्न मित्र है। मुझे तो अफसोस इस बात का है कि अगर मुझे पहले पता लग जाता तो मैं पहले ही इसका इलाज करवा देता। यह पिछले दस साल से तो मेरे बहुत की करीब है पर इसने कभी भी अपनी इस परेशानी के विषय में नहीं बताया।

दो दिन बाद ही पल्लवी की मां को अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है। गौरव के रूकने का भी कोई औचित्य नहीं रह गया था। अभी पल्लवी को एक सप्ताह तक अस्पताल में ही रहना था। इसलिये आनन्द गौरव और पल्लवी की मां को वहां से वापिस घर भेज देता है। वह स्वयं वहीं रूक जाता है ताकि पल्लवी का उपचार पूरा हो जाए। आनन्द प्रतिदिन रात में ग्यारह बजे पल्लवी के पास आकर उसे चूम कर गॉड ब्लैस यू कहकर गुड नाइट करके जाता है।

एक सप्ताह में पल्लवी ठीक हो जाती है। आनन्द डॉक्टर से बात करता है डॉक्टर उसे बतलाता है कि अब वह पूरी तरह से सामान्य है। डाक्टर समझता था कि आनन्द पल्लवी का पति है इसलिये वह यह भी बतलाता है कि अब वह कामक्रीड़ा सुरक्षित रुप से कर सकती है। किन्तु अभी कुछ समय तक कण्डोम का प्रयोग करना हितकर रहेगा। वह उसे लेकर होटल आ जाता है। इतने लम्बे समय में साथ-साथ रहने और पास-पास रहने के कारण आनन्द उससे मिलन के लिये बहुत व्याकुल था। वह उसे बतलाता है कि अभी दो दिन और चेन्नई में ही रहना पड़ेगा और डाक्टर को प्रतिदिन रिपोर्ट देना पड़ेगी।

उस समय रात के ग्यारह बजे थे जब आनन्द पल्लवी के पास उसके बिस्तर पर आ गया। उसने पल्लवी को बांहों में भरकर चूम लिया। धीरे-धीरे बात आगे बढ़ती गई। वह रात भर उसके बिस्तर पर उसके साथ ही रहा। सुबह पांच बजे जैसे ही उसकी नींद खुली वह भालू के समान पल्लवी के जिस्म को मसलने लगा। पल्लवी घबराकर उठ बैठी। वह उस पर झुंझलाई फिर बाथरुम चली गई। उनका यह हनीमून दो दिन तक चला। उसके बाद वे वापिस अपने गृहनगर आ गए।

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(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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