उपन्यास - रात के ग्यारह बजे - भाग 9 - राजेश माहेश्वरी

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उपन्यास

रात के ग्यारह बजे

- राजेश माहेश्वरी

भाग 1  ||  भाग 2 ||  भाग 3 || भाग 4 || भाग 5 || भाग 6 || भाग 7 || भाग 8 ||


भाग 9

घर आने के लगभग एक माह बाद राकेश को मानसी का फोन आया कि पल्लवी और आनन्द आपसे मिलना चाहते हैं। किन्हीं गम्भीर विषयों पर आपसे सलाह लेना चाहते हैं। राकेश ने उन्हें तत्काल ही अपने पास बुला लिया। सामान्य औपचारिकताओं के बाद उसने आने का प्रयोजन पूछा। पल्लवी ने कहा- आप और दीदी ने मुझे इनसे मिलवाया था। मैं इनकी आदतों और इनकी हरकतों से बहुत परेशान हूँ। ये मेरे खिलाफ जासूसी करवाते हैं। होस्टल की सभी लड़कियों में मिठाई-फल वगैरह बांटकर उनसे मेरे विषय में पूछताछ करते रहते हैं। इन्होंने मेरी रुम पार्टनर को बाजार ले जाकर उसे कपड़े, परफ्यूम और अन्य सामान सिर्फ इसलिये दिलवाया ताकि वह मुझ पर नजर रखे और इन्हें जानकारी देती रहे। ऐसा ये क्यों कर रहे हैं। इससे मेरी इज्जत पर धब्बा लगता है। आनन्द कहता है मैं ऐसा कर रहा हूँ तो क्या गलत कर रहा हूँ। जब मैं तुम्हारे ऊपर प्रतिमाह ढेर सा रूपया खर्च कर रहा हूँ तो तुम्हारे विषय में सब कुछ जानने का अधिकार भी मुझे है।

पल्लवी बताती है कि ये प्रतिदिन रात में ग्यारह बजे फोन लगाकर मुझे फोन पर किस करते हैं। यह बात मेरी होस्टल की सभी लड़कियों को पता हो गई है। वे रात को ग्यारह बजे से पहले ही मेरे कमरे में आ जाती हैं। फिर मेरे मोबाइल का स्पीकर ऑन कर देती हैं। वे मुझसे कहती हैं कि बुढ़उ का फोन आने वाला है। इनका मजाक उड़ाती हैं और कहती हैं हम में कोई दम नहीं पर हम किसी से कम नहीं। आप ही बतलाइये ऐसी स्थिति में मैं उन्हें क्या उत्तर दूं।

पल्लवी इसके आगे कहती है कि इनके जैसा शक्की और पल-पल में रंग बदलने वाला मैंने पहले कभी नहीं देखा। इन्होंने मानसी पर आरोप लगाया है कि जो गहने इन्होंने मुझे दिये थे वे मानसी ले गई है। जबकि वे सारे गहने ये मेरे पास ही हैं। देख लीजिये। कोई कम तो नहीं है ? वह आगे कहती है कि इन्होंने जितने भी वादे मुझसे किये थे, एक भी पूरे नहीं किये। इन्होंने मकान दिलवाने का वादा किया था वह नहीं दिलवाया। इन्होंने बीस लाख की एफडी कराने का वादा किया था वह भी नहीं करवाई। गहने भी ये अपने लॉकर में रखते हैं सिर्फ मुझे पहनने के लिये देते हैं और फिर वापिस ले लेते हैं। आनन्द बोला- मैं बीस लाख की एफडी इसके और गौरव के ज्वाइन्ट नाम पर खुलवाने को तैयार हूँ। उसका ब्याज प्रतिमाह इन्हें मिलता रहेगा। गौरव के मृत्यु के बाद वह अपने आप इसके नाम पर हो जाएगी।

इतना सुनते ही गौरव जो वहां बैठा था। वह बिचक गया। वह बोला- मैं इन लड़कियों के चक्कर में नहीं पड़ता। बीस लाख के चक्कर में किसी दिन मेरी जान ही चली जाएगी। तुम तो मुझे मरवाने का इन्तजाम कर रहे हो। इतना कहकर वह उन लोगों के बीच से उठकर चल देता है। वह किसी के रोकने पर भी नहीं रूकता।

आनन्द मानसी से उस पर लगाये झूठे आरोप के लिये माफी मांगता है। वह आगे कहता है जैसी तुम राकेश के लिये समर्पित हो वैसी पल्लवी मेरे लिये समर्पित नहीं है। यह मुझे प्यार भी नहीं करती और सहयोग भी नहीं देती। इस पर पल्लवी कहती है मैं और कैसे प्यार करुं और क्या सहयोग करुं। पता नहीं इनकी क्या अपेक्षाएं हैं। ये दिन में पच्चीस-तीस बार मुझे फोन लगाते हैं और चाहते हैं कि हर बार फोन मैं ही उठाऊं। मैं क्या दिन भर एक ही जगह बैठी रहूंगी। क्या कहीं आउंगी-जाउंगी नहीं। मैंने मकान भी देख लिया था अब ये कहते हैं कि मकान दो मंजिल का लो। एक मंजिल का पैसा मैं दे दूंगा और दूसरी मंजिल का पैसा राकेश दे देगा। इससे एक मंजिल पर तुम रहोगी और दूसरी मंजिल पर मानसी रहने लगेगी।

इस पर मानसी बोल पड़ी- वाह! वह! क्या बात है। ऐसी कोई बात हमारे बीच नहीं है। राकेश कोई मकान नहीं खरीदेगा। उसका स्वयं का फ्लैट है। वह दूसरा मकान क्यों खरीदेगा। तुम्हें जरुरत है तो तुम अपनी व्यवस्था स्वयं करो। जहां तक फिक्स डिपॉजिट और बाकी चीजों की बात है, अगर आनन्द विश्वास नहीं करता है तो पल्लवी तुम्हें उसका विश्वास जीतना होगा। जहां तक ज्वाइन्ट एकाउण्ट की बात है तो वह पोंगा नम्बर दो तो भाग ही गया।

आनन्द बार-बार राकेश से कहता है कि देखो मैं इसे कितनी चीजें दे रहा हूँ फिर भी यह संतुष्ट नहीं है। इस मामले में तुम भाग्यवान हो जो तुम्हें मानसी जैसी मिली है। पल्लवी दूसरों के साथ भी घूमती है। क्या यह उचित है।

आपने तीस हजार रूपये महिना देने का वादा किया था लेकिन आप सिर्फ पन्द्रह हजार ही दे रहे हो। इस पर आनन्द भड़क जाता है और कहता है- मेरी महबूबा! मेरा विश्वास तो जीत फिर देख मैं तेरे लिये क्या-क्या नहीं करता हूँ।

आनन्द ने मुझे आश्वस्त किया था कि ये कोई अच्छा वकील करवा देंगे जिससे मेरा डायवर्स का केस जल्दी साल्व हो जाएगा। लेकिन आज तक इन्होंने इस दिशा में कुछ नहीं किया।

आनन्द कहता है कि हाँ! यह बात मैंने नहीं की। मेरी समझ में नहीं आता कि डायवर्स की तुम्हें क्या जल्दी है। कौन सी कमी है या कौन सा काम है जो डायवर्स के बिना अटका हुआ है। मैंने किसी वकील से इसलिये भी बात नहीं की क्योंकि मैं डरता हूँ, कहीं तुम उड़न परी बनकर उड़ न जाओ।

पल्लवी इस पर भड़क जाती है और अपनी बहिन से कहती है कि दीदी जरा इनकी बातें तो सुनो! ऐसे में किसको इनसे प्यार होगा। तुम्हीं समझाओ। उनकी तकरार बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे चलती रहती है। इसी बीच राकेश बोदका की बाटल निकाल लाता है। सबके लिये एक-एक पैग बनाता है और कहता है कि आपसी झगड़ा खतम करो और बोदका इन्ज्वाय करो।

बोदका के असर से पल्लवी के चेहरे पर सुरुर आ जाता है। राकेश आनन्द को कुछ इशारा करता है। आनन्द पल्लवी को लेकर अंदर चला जाता है। थोड़ी देर बाद राकेश जब कमरे का दरवाजा खोलता है तो दोनों कपड़े पहन रहे होते हैं। उसके बाद सभी एक-एक पैग और लगाते हैं। फिर पल्लवी और आनन्द वहां से चले जाते हैं। उनके जाने के बाद मानसी राकेश पर भड़क उठती है कि आपने उन दोनों को अपना कमरा उपयोग के लिये क्यों दिया। वह बताती है कि तुम्हारी अनुपस्थिति में आनन्द तुम्हारे खिलाफ क्या-क्या कहता है। वह यह भी बताती है कि आनन्द के घर वालों ने गौरव का उसके घर आना-जाना बन्द कर दिया है। बात समाप्त हो जाती है और राकेश भी अपने घर निकल जाता है।

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दूसरे दिन राकेश मानसी और गौरव को एक रेस्टारेण्ट में बुलाता है। राकेश पूछता है- कल अपनी जो चर्चा हुई उस पर तुम लोगों का क्या सोचना है?

मैं तो इसलिये उठकर चला गया था कि मैं आनन्द के इन चक्करों में नहीं फंसना चाहता, गौरव ने कहा। इनकी पत्नी और बच्चों ने मुझसे साफ-साफ कहा था कि मैं इनके घर न आऊं। ये मेरे कारण ही बिगड़े हैं। उन्होंने तो मेरे ऊपर यह आरोप भी लगा दिया कि मैं इनके लिये लड़कियों का बन्दोबस्त करता हूँ। इसीलिये मैं आनन्द के किसी भी काम में शामिल नहीं होना चाहता। आनन्द मेरे और पल्लवी के ज्वाइन्ट एकाउण्ट में पैसा रखना चाहता है। वह पैसा मेरे मरने के बाद ही पल्लवी को मिलेगा। पैसों को पाने के लिये पल्लवी मेरी हत्या भी तो करवा सकती है। मैं इनके इस झंझट में अपनी जान जोखिम में क्यों डालूं। आनन्द का तो स्वभाव ही है कि वह हमेशा दूसरों के कंधों पर रख कर बंदूक चलाता है।

राकेश ने मानसी की ओर देखा तो वह कहने लगी- आनन्द को शर्म नहीं आयी जो उसने मेरे ऊपर चोरी का इल्जाम लगा दिया। अंत में तो वे सारी वस्तुएं पल्लवी के पास ही प्राप्त हुईं। इतना बड़ा आरोप लगाने के बाद माफी मांगने से क्या मेरा जो अपमान उसने किया है वह समाप्त हो जाएगा। वह होगा पैसे वाला इससे मुझे क्या लेना देना। कहते-कहते मानसी तमतमा गई।

इसीलिये तो मैंने बात को बढ़ता देख कर बोदका ला कर दी थी ताकि बात आगे न बढ़े। यह जो हो गया सो हो गया अब आगे क्या करना है।

आप एक बात गांठ में बांध लीजिये। भविष्य में अपने फ्लैट आदि का प्रयोग इन्हें किसी भी हालत में मत करने दीजियेगा। आनन्द आपके विषय में पीठ पीछे आपको भी मक्कार आदि कहता है। वैसे तो मुझे आप लोगों के व्यक्तिगत संबंधों के विषय में नहीं बोलना चाहिए किन्तु मेरी राय में तो आपको भी आनन्द से दूर ही रहना चाहिए।

पल्लवी है तो मेरी बहिन लेकिन वह भी कम शातिर नहीं है। उसे किसी से भी प्यार नहीं है। वह केवल एक चीज से प्यार करती है और वह है पैसा। वह पैसे की खातिर ही अपने छोटे-छोटे बच्चों को भूखा छोड़कर आ गई। जिसके मन में अपने बच्चों के प्रति भी मोह-माया न हो वह किसी और की क्या होगी। मैं अपने घर में इतने अत्याचारों के बाद भी केवल अपने बच्चों के कारण ही तो रह रहीं हूँ। मेरे विचार से तो पल्लवी और आनन्द के झगड़ों से हम अपने को दूर ही रखें तो अच्छा है।

राकेश और गौरव दोनों ने ही मानसी की इस बात पर सहमति में सिर हिलाया। मानसी की साफ-साफ बातें सुनकर राकेश के मन में उसके प्रति जो अपनत्व था वह और भी बढ़ गया।

राकेश उठकर रेस्टरुम की ओर जाता है लेकिन कुछ कदम बाद ही वह लड़खड़ाकर गिर पड़ता है। गौरव और मानसी झपट कर उसकी ओर जाते हैं। वह चेतना शून्य हो चुका था। गौरव यह देखता है तो उसके हाथ पांव फूल जाते हैं। रेस्टारेण्ट का मेनेजर एम्बुलेन्स बुलाने के लिये फोन करने लगता है। गौरव यह देखता है तो और भी घबरा जाता है। वह सोचता है कि यदि यह बात सामने आती है और मानसी के साथ राकेश को लेकर वह अस्पताल जाएगा तो उसकी पोल खुल जाएगी और बदनामी होगी। यह सोचकर वह वहां से धीरे से भाग जाता है।

मानसी भी राकेश की हालत देख कर घबरा जाती है। वह राकेश की छाती मलने लगती है। उसके मुंह से मुंह लगाकर उसे सांस देने का प्रयास करती है। उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारती है। वहां उपस्थित लोग भी उसकी मदद करते हैं। राकेश की चेतना वापिस आने लगती है। कुछ ही देर में वह सचेत हो जाता है। तब तक एम्बुलेन्स भी आ जाती है। राकेश उसे वापिस भेज देता है। वह बताता है कि अब वह अपने को स्वस्थ्य अनुभव कर रहा है। धीरे-धीरे वातावरण सामान्य हो जाता है। मेनेजर मानसी की ओर इशारा करके राकेश को बताता है कि इनके कारण ही आप स्वस्थ्य हो गये। मानसी रोकने का प्रयास करती है लेकिन वह बतला ही देता है कि कैसे मानसी ने उसकी मूर्छा से उसे सचेत किया है। राकेश मानसी की ओर देखता है तो वह नजरें झुका लेती है। राकेश कहता है कि आज जो तुमने किया है उसको मैं कभी नहीं भुला पाउंगा। आज तुमने मुझे जीवन दान दिया है। तभी उसे गौरव का ध्यान आता है वह उसके विषय में पूछता है तो मानसी कोई उत्तर नहीं दे पाती। वह मानसी से कहता है कि मैं तुम्हारा आभारी नहीं हूँ बल्कि जीवन भर तुम्हारा ऋणी रहूंगा।

मानसी कहती है-आप ठीक हो गए यही मेरे लिये बहुत है वरना आज मेरे मुंह पर कालिख पुत जाती। चलिये अब घर चलते हैं। वहां से वे घर की ओर चल देते हैं। घर पर मानसी राकेश को बैठाकर काफी बनाकर लाती है। दोनों काफी पी रहे थे तभी मानसी कहती है-

पल्लवी की जो भी बातें हैं, जो भी सामान, मकान, जेवर या अन्य बातें वे सब आनन्द और उसके बीच की निजी बातें हैं। इसके पहले तक न तो आनन्द ने अपने से कोई बात की थी और न ही पल्लवी ने आनन्द के किसी वादे के विषय में अपने को बताया था। दोनों ही अपने आप में काफी चतुर हैं। पल्लवी को जब वादा खिलाफी का अंदेशा हुआ तो वह ये सब बातें अपने बीच में लेकर आई है ताकि आनन्द के ऊपर दबाव बन सके। मैं पल्लवी के स्वभाव से परिचित हूँ। जिस दिन ये सारे वादे आनन्द पूरे कर देगा वह उसे छोड़कर चली जाएगी। आज यदि आप या मैं इस विषय में कुछ भी कहते हैं तो कल अपनी स्थिति बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसी हो जाएगी। इन दोनों से अपने संबंध तो खराब होंगे ही साथ में अपने को भी बुरा लगेगा कि हमने अनावश्यक रुप से इनके बीच में दखल दिया। देखा जाए तो कायदे की बात तो यह है कि मित्र होने के नाते आप को आनन्द को यह सब समझा देना चाहिए। लेकिन मैं जानती हूँ कि अभी उनकी आंख पर पल्लवी की चाहत का पर्दा पड़ा है। आप समझाएंगे भी तो उनकी समझ में नहीं आएगा और आपकी स्थिति और खराब हो जाएगी।

मैं गौरव को ये सारी बातें समझा दूंगा। उसके माध्यम से आनन्द तक सारी सच्चाई पहुँच जाएगी फिर वह जैसा चाहे वैसा करे। तब तक काफी समाप्त हो चुकी थी। राकेश वहां से अपने घर को निकल गया।

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गौरव आनन्द को फोन करके सारी घटना बताता है और कहता है कि मुझे लगता है कि राकेश की मृत्यु हो चुकी है। स्थिति ऐसी थी कि मैं अपने को इसमें नहीं उलझा सकता था इसलिये वहां से चला आया हूँ। कहीं कोई पुलिस केस न बन जाए। अगर ऐसा होता है तो तुम्हें मुझको इस मामले से बचाना होगा।

आनन्द उसे समझाता है कि तुमने अच्छा किया जो वहां से चले आए। अब आगे देखेंगे क्या होता है। मैं मामले को जानने का प्रयास करता हूँ फिर तुम्हें बताउंगा। अभी तो पल्लवी को बता दूं।

गौरव से बात समाप्त होने पर वह राकेश को फोन लगाता है। राकेश फोन उठाता है और कहता है हलो!

आप कौन बोल रहे हैं ?

राकेश के यह कहने पर कि मैं राकेश बोल रहा हूँ आनन्द कुछ चौंकता है किन्तु अपनी भावनाओं को छुपाकर बोला-

मैं आनन्द बोल रहा हूँ। तुम्हें क्या हो गया था भाई! अचानक कैसे तबियत बिगड़ गई।

पता नहीं यार! अचानक ही चक्कर सा आया और उसके बाद कुछ भी होश नहीं रहा। पर तुम्हें कैसे पता चला।

गौरव का फोन आया था उसने ही बतलाया।

अरे हाँ! उस समय वह भी तो हमारे साथ था। फिर पता नहीं कहाँ भाग खड़ा हुआ ?

यार वह भागा नहीं था। वह तो तुम्हारे लिये डॉक्टर को लेने गया था। लेकिन जब तक वह डॉक्टर को लेकर पहुँचा तुम वहाँ से जा चुके थे। अब क्या हाल है।

अब तो बिल्कुल ठीक हूँ।

चलो यह जानकर खुशी हुई। थोड़ी सावधानी रखो और ठीक तरह से स्वास्थ परीक्षण करवा लो।

राकेश से बात पूरी होते ही आनन्द गौरव को फोन लगाता है। गौरव के फोन उठाते ही वह उस पर बरस पड़ता है। वह उसे बताता है कि उसने अभी-अभी राकेश से बात की है और वह बिल्कुल ठीक-ठाक है। वह उसे यह भी ताकीद करता है कि ऐसा अब वह किसी और से न कहे। वह उससे यह भी पूछता है कि क्या उसने किसी और से भी ऐसा कहा है।

नहीं मैंने केवल तुम्हें ही यह बतलाया था।

तब ठीक है। मैंने राकेश से कहा है कि तुम वहां से डाक्टर को लेने चले गये थे और जब तुम लौटकर आये तो वे लोग वहां से जा चुके थे। वह यह भी बतलाता है कि ऐसा उसने केवल इसलिये कहा ताकि राकेश से उसके संबंध न बिगड़ें। गौरव उसके प्रति भारी कृतज्ञता व्यक्त करता है और कहता है कि उसने बहुत अच्छा किया जो बात को संभाल लिया।

गौरव राकेश को फोन करता है। वह उसका हालचाल पूछता है। जब राकेश उसके चले जाने की बात कहता है तो वह उसे वही सब बता देता है जो आनन्द ने कहा था। राकेश भी उसकी बात सुनकर चुप रह जाता है। फिर राकेश गौरव को उसके आने के बाद की पूरी कहानी बताता है। वह यह भी बताता है कि वहां से आने के बाद उसकी और मानसी की क्या बातचीत हुई थी। वह गौरव को सब कुछ बताकर समझाता है कि आनन्द हमारा मित्र है और वह चाहता है कि उसके साथ धोखा न हो इसलिये गौरव आनन्द को इस सारी स्थिति से अवगत करा दे।

गौरव कहता है कि राकेश स्वयं उसे यह सब क्यों नहीं बताता?

मेरी बात वह नहीं मानेगा। उसे मेरी बात का विश्वास ही नहीं होगा। किन्तु फिर भी वह चाहता है कि आनन्द को वस्तु स्थिति का ज्ञान हो जाए।

उस रात को गौरव आनन्द से मिलता है। वे दोनों एक रेस्तरां में जाकर डिनर लेते हैं। इसके लिये गौरव ने ही कहा था इसलिये इस बात से आनन्द आश्चर्य में था। गौरव कभी इस प्रकार की फरमाइश नहीं करता था। डिनर के दौरान जब गौरव और आनन्द की बातचीत होती है तो गौरव उसे वह सब कुछ बताता है जो राकेश ने उससे कहा था।

गौरव की बातें सुनकर आनन्द कुछ भी नहीं कहता लेकिन उसका चेहरा बतलाता है कि वह किसी गहरे सोच में पड़ा था। गौरव उससे पूछता है तो वह उसे टाल जाता है।

रोज की तरह आनन्द रात को ग्यारह बजे जब पल्लवी को फोन लगाता है तो सिर्फ चुम्बन लेकर गुड नाइट नहीं कहता है वरन उससे बात करता है। वह उससे कहता है कि राकेश और मानसी तुम्हारे और मेरे बीच में फूट डालना चाहते हैं। मैं उन्हें ऐसा नहीं करने दूंगा। वे अगर हमारे संबंधों से जलते हैं तो जलें।

कल मैं तुम्हारे साथ बाजार चलूंगा। मैंने तुमसे जो सामान दिलाने का वादा किया है वह मैं तुम्हें कल ही देना चाहता हूँ। उनके बीच दूसरे दिन मिलने का कार्यक्रम तय हो जाता है।

दूसरे दिन आनन्द पल्लवी को लेकर बाजार जाता है। वह उसे वॉशिंग मशीन, रेफरीजेरेटर, स्कूटी, टीवी सहित लगभग डेढ़ लाख का सामान खरीद देता है। इस खरीददारी में लगभग पूरा दिन समाप्त हो जाता है। इस दौरान वह उसे वे सारी बातें भी बताता है जो उसे गौरव ने बतलायी थीं।

इतने सारे उपहार पाकर पल्लवी हर्षित थी। वह इतनी प्रसन्न थी कि अगली-पिछली सारी शिकायतें भूल चुकी थी। वह आनन्द के साथ नियत समय पर शाम को 6 बजे घूमने जाती है। आनन्द भी उसके प्रसन्नचित्त चेहरे को देखकर फूला नहीं समाता। वह उसकी तारीफ के पुल बांध देता है। आज वे एक दोनों एक दूसरे को पूरी तरह से समर्पित थे। दोनों एक दूसरे में खोये हुए थे और एक दूसरे की तारीफ कर रहे थे। इस दौरान आनन्द यह कहने से भी नहीं चूका कि मैंने जो तुम्हारे लिये किया है उसका दसवां भाग भी राकेश ने मानसी के लिये किया है क्या ? तुम उसे यह बात समझाओ। पल्लवी भी उसी समय मानसी को फोन करती है। वह भी तो उसे जलाना चाहती थी। वह मानसी को बताती है कि आज आनन्द ने उसके लिये क्या-क्या किया। उसकी बात सुनकर मानसी उसे सुखद भविष्य के लिये बधाई देती है।

इस घटना के तीसरे दिन आनन्द राकेश को फोन करता है। उसकी आवाज कांप रही थी। वह बहुत अधिक बदहवास था। उसने फोन पर राकेश से कहा कि पिछले चौबीस घण्टों से मैं पल्लवी से संपर्क करने की कोशिश कर रहा हूँ लेकिन उसका कोई पता नहीं चल रहा है। मैंने मानसी से भी पूछा था। उसने बताया कि उसकी सास की तबियत अचानक खराब हो गई है और पल्लवी अस्पताल में उसके पास है। जब मैंने अस्पताल में पता किया तो उसकी सास का वहां कोई पता नहीं चला। मैं चाहता हूँ कि मैं व्यक्तिगत रुप से अस्पताल जाकर उसकी सास का पता करना चाहता हूँ। क्या तुम मेरे साथ चल सकते हो।

मैं तैयार हूँ। तुम आ जाओ। मैं चला चलूंगा। चाहो तो गौरव को भी साथ में ले लो।

वह गौरव को साथ लेकर राकेश के पास जाता है। फिर वे अस्पताल जाते हैं। वहां गौरव कार से नहीं उतरता। वह कहता है कि तुम लोग ही जाकर पता कर लो। मेरी क्या आवश्यकता है। मैं तो तुमने कहा इसलिये तुम्हारा साथ देने के लिये आ गया हूँ। मुझे पल्लवी या उसकी सास से क्या लेना-देना?

आनन्द और राकेश भीतर जाकर पता करते हैं तो पता चलता है कि उस नाम की कोई महिला भरती ही नहीं हुई थी। आनन्द चकरा जाता है वह राकेश को बताता है कि यह पता तो मानसी ने दिया था। वह मुझसे झूठ बोली। ऐसा करते हैं कि अपन मानसी के घर चलते हैं वहीं से सारी हकीकत पता चल जाएगी। वे वहां से मानसी के यहां पहुँचते हैं। वहाँ भी पल्लवी नहीं मिलती। मानसी कहती है कि वह अपनी सास के पास अपने घर पर होगी।

राकेश आनन्द को समझाता है कि अब वह सीधा घर जाए। जरुर पल्लवी किसी निजी काम में फंसी होगी। जैसे ही वह फुरसत होगी वह स्वयं फोन करेगी। अगर ज्यादा खोजबीन करोगे तो व्यर्थ का हल्ला होगा। बदनामी अलग से होगी।

गौरव ने भी उसे समझाया कि बेकार में देवदास बनकर मत घूमो। आराम से घर पर रहो। अपने आप उसका फोन आएगा। आनन्द उनकी बात सुनकर भारी मन से घर वापिस चला जाता है।

अगले दिन पल्लवी का फोन आनन्द के पास आता है। आनन्द उससे पूछता है कि वह पिछले साठ से भी अधिक घण्टों से कहाँ थी। पल्लवी उसे अपनी सास की बीमारी वाली वही कहानी सुना देती है आनन्द को मानसी ने सुनाई थी। आनन्द को भरोसा नहीं होता। पर उसे इस बात का संतोष रहता है कि पल्लवी का फोन आ गया।

ष्शाम को वह गौरव को लेकर राकेश के पास आता है। तीनों मित्र एक होटल में डिनर के लिये जाते हैं। डिनर के पहले जब व्हिस्की का दौर चल रहा था तभी बातचीत के बीच में आनन्द अपनी मनःस्थिति बतलाता है। वह पल्लवी को लेकर बहुत चिन्तित था। उसे लग रहा था कि पल्लवी कहीं उसे धोखा दे रही है। अपने मन की बात वह अपने मित्रों को भी बताता है। वह यह भी कहता है कि मैं इस घटना की जड़ तक जाना चाहता हूँ। वह राकेश से कहता है कि मैं पल्लवी के पीछे प्रायवेट जासूस लगवाउंगा। जो मुझे लगाता पल्लवी के विषय में सारी जानकारी एकत्र करके देगा।

राकेश उसे समझाता है कि यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं है जिसे लेकर तुम इतनी चिन्ता कर रहे हो। तुम्हारी मनःस्थिति सामान्य नहीं है। अच्छा होगा कि तुम शान्त ही रहो। फालतू में इस प्रकार की मूखर्ता करके बखेड़ा मत खड़ा करो। गौरव भी राकेश की बात का समर्थन करता है और मुस्कराता रहता है।

पल्लवी वास्तव में आनन्द की कमजोरी बन चुकी थी। वह दिन भर में कई बार उससे फोन पर बात करता था। पहला फोन सुबह की गुडमार्निंग से प्रारम्भ होता था तो आखिरी फोन रात को ग्यारह बजे गुडनाइट का होता था। इस बीच में कई बार वह पल्लवी से बात करता था। पल्लवी उसकी इस बात से परेशान हो जाती थी। इस घटना के बाद कुछ ही दिन बीते थे कि पल्लवी को एक शादी के सिलसिले में अपने एक रिस्तेदार के यहां कानपुर जाना पड़ा।

वह आनन्द को बिना बताये ही कानपुर चली गई। वह मानसी को बता कर गई थी लेकिन उसने उसे यह भी कहा था कि वह यह बात आनन्द को न बताये। वहां भी उसके फोन पहुंचेंगे और उसकी मुसीबत हो जाएगी। दो दिन बाद वह वापिस आकर आनन्द को बता देगी।

वह शाम को कानपुर के लिये रवाना होती है। जाने से पहले वह आनन्द से मिली थी लेकिन उसने उसे नहीं बताया कि वह बाहर जा रही है। रोज की तरह रात को ग्यारह बजे जब वह पल्लवी को फोन लगाता है तो फोन नहीं उठता। वह अनेक बार प्रयास करता है। तब वह राकेश को फोन लगाता है और उसे बताता है कि उसका फोन नहीं उठ रहा है। राकेश उसे समझाता है कि वह सो गई होगी। कई बार जब आदमी गहरी नींद में होता है तो उसे फोन आदि की आवाज सुनाई नहीं देती है। उसकी बातों से आनन्द को कुछ तसल्ली होती है और वह सो जाता है। दूसरे दिन सुबह-सुबह फिर राकेश के पास फोन आता है। अब आनन्द इस बात से परेशान था कि सुबह की गुडमार्निंग नहीं हुई थी। राकेश फिर उसे समझा देता है।

वास्तव में आनन्द उसका दीवाना हो चुका था। जब पूरे दिन उसकी पल्लवी से बात नहीं होती तो वह शाम को मानसी के घर पहुँच जाता है। वह उससे पल्लवी का पता पूछता है। मानसी उससे इतना ही कहती है कि वह शहर से बाहर है किन्तु वह उसे यह नहीं बताती कि वह कहाँ गई है। आनन्द व्याकुल हो जाता है। वह वहां से सीधा राकेश के पास आता है। वह उससे कहता है कि मानसी से पूछकर पल्लवी का पता बता दे। राकेश फोन पर मानसी से बात करता है। पूरी बात पता लगने पर वह भी आनन्द को यही समझाता है कि चिन्ता मत करो। पल्लवी दो दिन में तुमसे आकर मिलेगी।

राकेश की बातों से आनन्द झल्ला उठता है। उसे लगता है कि कोई राज है जो राकेश और मानसी उससे छुपा रहे हैं। झल्लाहट में वह राकेश और मानसी के लिये भला बुरा कहने लगता है। वह मानसी पर यह आरोप भी लगा देता है कि वह सब जानती है किन्तु उसे नहीं बता रही। इसके पीछे कोई गहरा षड़यंत्र है। वह यह शक भी जाहिर करता है कि मानसी ने किसी और रहीस को फांस लिया है और पल्लवी को उसी के पास भेज दिया है इसलिये वह उससे सब कुछ छुपा रही है। राकेश उसे समझाने का प्रयास करता है किन्तु उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

दो दिन इसी तरह बड़ी मुश्किल से कटते हैं। राकेश और मानसी दोनों की नाक में दम हो जाता है। दो दिन बाद पल्लवी वापिस आती है। वह बहुत थकी हुई होने के कारण मानसी के घर पर ही आकर ठहर जाती है। वहां वह आराम करने की गरज से सो जाती है। मगर आनन्द को तो चैन था ही नहीं। वह तो सुबह-शाम मानसी और राकेश के चक्कर भी लगा रहा था और उन्हें भला-बुरा भी कह रहा था। वह मानसी के घर पहुंचता है और जब वह बैठक खाने में जाता है तो पल्लवी को वहां सोया हुआ देखता है। यह देखकर वह बौखला जाता है। वह मानसी के साथ पल्लवी को भी खरी-खोटी सुनाता है। इससे पल्लवी बहुत नाराज हो जाती है। उनके बीच विवाद होने लगता है। दोनों की ही आवाज तेज हो जाती है। मानसी इस स्थिति में दोनों पर ही बिगड़ जाती है और दोनों से कहती है कि वे उसके घर पर यह सब करके आस-पड़ोस में उसकी बदनामी न करें। यह सब करना है तो कहीं और जाकर करें। आनन्द वहां से चला जाता है।

(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद 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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: उपन्यास - रात के ग्यारह बजे - भाग 9 - राजेश माहेश्वरी
उपन्यास - रात के ग्यारह बजे - भाग 9 - राजेश माहेश्वरी
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