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अमिताभ वर्मा की कविताएँ - क्यों रोता है मन

चाहत-सी बात


शाम और भी उदास हो जाती है
तेरे तस्सवुर में मैं खो जाता हूँ
रोशनी गुल कर, आँखें मींच कर
तनहाई में खो जाता हूँ।

बंद आँखों में रोशनी नहीं आती
तेरा चेहरा फिर भी उभरा आता है
जैसे तू रोशनी की हद से बाहर हो
जैसे फ़रिश्ता अँधेरे में चला आता है।

भूलने की कोशिशें नाकाम हुई जाती हैं
सोग में डूबी हर शाम हुई जाती है
तुझको चाहा तो नहीं, पर ऐ ख़ुदा
ये चाहत-सी बात क्यों हुई जाती है?


क्यों रोता है मन


दीपक किसके पथ में जलता है
कौन यहाँ आहें भरता है
किसे ढूँढ कर रोता है मन
जब चाँद बादलों में छुपता है?

कहने को एक झलक थी
चूड़ी की एक खनक थी
हो गया मगर मन चंचल
उफ़् कितनी अजब तड़प थी!

वह हुस्न फ़िज़ाँ में बिखरा
तो सारा आलम महका
वो पलक ज़रा-सी काँपी
प्याला मदिरा का छलका।

मिल नहीं सकेंगे तुम-हम
ये बात जानता है मन
फिर क्यों आहें भरता है
फिर क्यों रोता है ये मन?


कवि की व्यथा


एक बार इक कवि गए इक कवि सम्मेलन में
सूट-बूट में, हैट लगा कर, बनठन कर के
बनठन कर के गए, मगर थी किस्मत खोटी
भूल गए थे कवि बाँधना कमर पे पेटी।

बिन पेटी पतलून खिसकती जब भी नीचे
उसे खींचते ऊपर कविवर हो कर खीझे
थे खीझे-से कवि, तभी इक श्रोता चीखा
इस ऐक्शन के साथ गीत लगता है रूखा।

लगता गीत है रूखा, कविवर! बस भी करिए
या तो करिए बंद गीत, या पतलून न धरिए
मत धरिए पतलून, कि लगता नहीं है अच्छा
करता नहीं ठिठोली, हूँ मैं वचन का सच्चा।

बोले कवि ये माना है तू वचन का सच्चा
व्यथा मगर थोड़ी सुन मेरी भी, ओ बच्चा
बंद करूँगा गीत तो पैसा नहीं मिलेगा
आने जाने का बिल भी तब कौन भरेगा?

और अगर पतलून छोड़ दी मैंने अपनी
तो फिर सबको और भी अच्छा नहीं लगेगा
नहीं लगेगा अच्छा, पड़ेगा जेल में सोना
क्योंकि है अपराध भीड़ में नंगा होना।


हैप्पी दीवाली


सुबह-सुबह इक झपकी आयी, फिर इक सपना आया
सपने में जो कुछ दीखा वह हमको इक न भाया
हमको इक न भाया, भाता भी तो कैसे
दृश्य हमारे सपने के थे हॉरर फ़िल्मों जैसे

घुप्प अँधेरे जंगल में हम राहें खोज रहे थे
बदहवास था हाल, खुपड़िया नोच रहे थे
चमगादड़ थे कहीं लपकते और कहीं कंकाल
घबराहट के मारे भैया बुरा था अपना हाल

बुरा था अपना हाल, न था कुछ समझ में आता
सिर्फ़ अँधेरा ही होता तो शायद कम घबराता
पर यहाँ तो जैसे कोई छाती पर बैठा जाता था
साँसें नहीं हमारे अन्दर सिर्फ़ धुआँ आता था

तभी भयानक उस जंगल में कुछ प्रकाश-सा आया
हुआ भयंकर शोर एक, हम समझे परलय आया
भालू चीता हाथी बन्दर सभी जानवर भागे
एक गधे के पीछे थे हम, वह था थोड़ा आगे

पस्त हो गई हालत जल्दी, जलते थे दोनों पहलू
ठोकर खा कर गिरे, तो देखा शाख के ऊपर उल्लू
शाख के ऊपर के उल्लू ने किया हमें हैरान -
’’सचमुच, उल्लू ही है! इसको नहीं प्रलय का ज्ञान

’’रत्ती-भर भी अक़्ल जो होती तो यह भी उड़ जाता
’’दूर गगन की ऊँचाई में अपने प्राण बचाता’’
इसी तरह हम तरस थे खाते उल्लू की बुद्धि पर
तभी वो बोला, ’’देख, एक तो हूँ मैं ड्यूटी पर

’’दूजे, परलय नहीं है, ये हड़कम्प मचा है
’’बम-फोड़ू दीवाली का तो यही मज़ा है!’’
उल्लू के ड्यूटी पर होने से मैं थोड़ा चकराया
वर्दी देखी उसकी तो फिर अपनी समझ में आया

बड़े अक्षरों में लिखा था ’लक्ष्मी की सेवा में’
होंगे देवी के दर्शन! - हम बैठ गये आशा में
हाथ जोड़ कर पूछा हमने ’’कहाँ तुम्हारा है पैसेंजर’’
बोला उल्लू ’’अभी तो मैडम खड़ी हुई थीं उसी मोड़ पर’’

’उसी मोड़’ पर किया ग़ौर तो दिखी हमें इक कंकालिन
गहने तो पहने थे लेकिन काया थी उसकी बड़ी मलिन
मुँह के ऊपर जड़ा मास्क था, कानों में थे ईयर प्लग
ग्लास चढ़ा था आँखों पर, चलती थी वह डगमग-डगमग

विश्वास न होता था लक्ष्मी की ऐसी हालत होगी
हमने सोचा शायद माताजी डायटिंग पर होंगी
नए ज़माने में देवी भी तो मॉडर्न ही होंगी
यही सोच कर शेक-हैण्ड की हमने युक्ति सोची

हाथ मिलाया देवी ने, बोलीं ’’हाँ, मिस्टर वर्मा?
’’मिस्टर ही कहलाते हैं अब भल्ला हों या शर्मा
’’’श्री’ का स्वर अब देश में अपने देता नहीं सुनाई
’’क्यों ’श्री’ की आशा करते हो व्यर्थ में मेरे भाई

’’पुस्तक पढ़ कर ज्ञान-प्राप्ति कर लेना फिर से सीखो
’’व्हाट्स ऐप और ट्विटर के अंधे जाल में यूँ न उलझो
’’त्योहारों के नाम पे क्यों इतनी बारूद उड़ाते हो
’’पूजा करते हो या मृत्यु का कर्कश बिगुल बजाते हो

’’फाड़े कान के पर्दे और आँखों से ज्योति छीनी
’’दमे और दिल के रोगी की कैसी हालत कीन्ही
’’नासमझी में मानव ऐसे कब तक प्राण गवाँएगा
’’लाभ नहीं होगा बेटा कुछ, सर्वनाश हो जाएगा’’

सिहर गये हम सोते-सोते, सपना अपना टूटा
होश उड़ गये जब कमरे में ज़ोरों से बम फूटा
गली में कोई चिल्लाया ’’अंकल, हैप्पी दीवाली’’
डरे-डरे से हम बोले, ’’बेटा, हैप्पी दीवाली’’



पिताजी


मेरे प्रिय पिताजी,
आज आपकी बरसी पर
बहुत काम किया है मैंने
आपकी तस्वीर पर!
 
काट डाले हैं वो जाल
जो मकड़ी न जाने कब बुन गयी थी
पोंछ दी है धूल की वह पर्त
जो पता नहीं कैसे जम गयी थी
उखाड़ फेंकी हैं वह अगरबत्तियाँ
जो पिछले साल अधजली रह गयी थीं

धुएँ की एक ज़िद्दी लक़ीर, बस
रह गयी है फ्ऱेम पर
बहुत काम किया है मैंने
आपकी तस्वीर पर!

आपके जाने के अगले दिन ही तो
इस तस्वीर का ऑर्डर दिया था
हलवाई और तम्बूवाले के पास भी
उस दिन मैं ख़ुद ही गया था
चार दिनों में सब निपट जाए
सबसे इसका तक़ाज़ा किया था

उस लाल साग का स्वाद
अब भी बचा है जीभ पर
बहुत काम किया है मैंने
आपकी तस्वीर पर!
 
घर छोड़ जाना आसान न था
पर पाँचवे दिन मैं चल दिया था
विदा ली थी सबसे, पर फिर भी
दो कदम धर कर वापस मुड़ गया था
निहारा था आपकी तस्वीर को
आँख में आँसू भरे फिर बढ़ गया था

बन चुके हैं आप, बस
इक याद भर
बहुत काम किया है मैंने
आपकी तस्वीर पर!

गणित का सवाल हो
तो आप अंग्रेज़ी सही करवाते थे
नम्बरों में न उलझो - कह कर
बुनियादें सही करवाते थे
शिक्षक न थे, गुरू थे मगर
जीवन दर्शन समझाते थे

फिर टीस-सी उठती है दिल में
आँख फिर आती है भर
बहुत काम किया है मैंने
आपकी तस्वीर पर!

धूल के जमने और जालों के बुनने
से क्या फ़र्क पड़ता है
विछोह का घाव बाहर भर भी जाए
पर अन्दर हरा रहता है
रिश्ते तो कई होते हैं दुनिया में
पर पिता तो पिता ही रहता है

छाया मलिन है आपकी
पर स्नेह-सिन्धु है अमर 
बहुत काम किया है मैंने
आपकी तस्वीर पर!


पिता की मौत


मेरे निस्पन्द शरीर के गिर्द
मेरे बच्चे फुसफुसा रहे थे
कभी मेरे गुण गा रहे थे
तो कभी आँसू बहा रहे थे

मेरा हृदय भर आया
मैंने अंतिम ज़ोर लगाया
कलेजा मुँह को आया
पर फिर नज़र आया

बेटा-बहू, बेटी-दामाद
सभी कर रहे थे मुझको याद
मृत्यु दो, पर कुछ पल बाद
- की ईश्वर से मैंने फ़रियाद

मौत दे रही थी मीठी थपकी
मेरी साँसें थीं अब भी अटकी
लेकिन पलकें ज़रा-सी झपकीं
भीड़ यह देखते ही लपकी

इन्होंने बेकार ही डरा डाला था
हमने भी क्या-क्या सोच डाला था
कितना ज़रूरी काम टाला था
- बच्चों ने झट से कह डाला था

एक नज़र डाल सभी चल दिए
मैंने भी दुनिया को हाथ जोड़ दिए
बच्चों को आशीश दे दिए
और बुझा लिए अपनी आँखों के दिये

नया साल


कैलेण्डर बदलने से नहीं आता है नया साल, ऐ दोस्त
करो ऐसा, कि कैलेण्डर न बदले, पर साल बदल जाए!

मन्दिर-मस्जिद के चढ़ावों से ख़ून की बू हो रुख़सत
क़ातिलों, दरिन्दों, हैवानों की वहशी चाल बदल जाए!

बन्द हो बेबस लड़कियों की अस्मत लूटने का रिवाज
हमें इस साल हर अबला में माँ की सूरत नज़र आए!

उड़ा न सके अब कोई जम्हूरियत-जनतन्त्र का मज़ाक़
हमारा अवाम झूठे नेताओं की गन्दी चाल समझ पाए!

’अमिताभ’ अब उकता चुके हैं ख़ादिमों के ज़ुल्म से
अस्पतालों-अदालतों-पुलिस सबका रवैया बदल जाए!

माँ तुमने बहुत रुलाया है


माँ तुमने बहुत सताया है, माँ तुमने बहुत रुलाया है।

गोदी में था मैं, आँचल से तुमने माथा मेरा पोंछा था
मुझे निहारती मुस्काई थीं, फिर न जाने क्या सोचा था
एक उबासी ली थी मैंने, नींद में आँखें मूँदी थीं
चिल्ला कर जागा था, सपने में इक बिल्ली कूदी थी
‘शेर है तू, बिल्ली से डरता है!’ तुमने ललकारा था
कभी नहीं भूलूँगा माँ जो उस दिन रूप तुम्हारा था

बड़ा हुआ तो देखा, माँ, तुम औरों-जैसी ना थीं
स्कूल के बाक़ी बच्चों की तो कितनी सुंदर माँ थीं
उनके मँहगे कपड़ों से कितनी ख़ुश्बू आती थी
इंगलिश में गिटपिट करती थीं, गाड़ी में जाती थीं
तुम तो बस उस एक-ही कपड़े में अक्सर आती थीं
इंगलिश क्या, हिन्दी बातों से भी तुम सकुचाती थीं

हुई पढ़ाई, मिली नौकरी, जब मैं घर पर आया
ख़ुशी से तुमने चूमा लेकिन नैन नीर भर आया
‘भगवान ने मेरी सुन ली,‘ धीरे से बोली थीं तुम
बाबूजी की फ़ोटो के आगे फिर रोई थीं तुम
‘रोना-धोना छोड़-भी माँ, पहली तनख़्वाह आने दे
ढेर लगा दूँगा तेरे आगे कपड़े-गहनों के‘

शान से बोला था मैं, ‘माँ, जब तू सज कर आएगी
तेरी सकुचाहट भी अपने-आप निकल जाएगी
क्या बतलाऊँ जब तू सादे कपड़ों में आती है
अपने पर और तुझ पर मुझको बड़ी शर्म आती है
कई बार तुझको ले कर यारों ने बड़ा चिढ़ाया है
तूने अनजाने में माँ मुझको बहुत सताया है‘

सन्न रह गई थीं तुम, कुछ देर तो कुछ न बोलीं
फिर अपराधी जैसे स्वर में तुमने गुत्थी खोली
हृदय फट गया ग्लानि से जब सारा क़िस्सा जाना
तेरी तपस्या के आगे हर दर्द हुआ बचकाना
अपनी नासमझी पर मुझको उस दिन रोना आया
भाग्यवान हैं वो जिन पर रहता है माँ का साया

समझ गईं तुम मेरी हालत, बोलीं, ‘ये क्या पगले?
आज का दिन है बड़ी ख़ुशी का, आज तो जी भर हँस ले
मैं क्या पशुओं की भी माँ, बच्चों की ख़ातिर जीती है
यही जगत् का सच है बेटा, यही जगत् की रीति है‘
माँ से लिपट गया मैं, बोला ‘सब तूने सच बतलाया है
माँ मैंने बहुत सताया है, माँ मैंने बहुत रुलाया है।‘

बुढ़ापे की होली


बचपन की होली में तन भीगता था!
रंग की बौछार का
पानी की फुहार का
कीचड़ की मार का
मज़ा उन दिनों हर तरफ़ दीखता था
बचपन की होली में तन भीगता था!

जवानी की होली में मन भीगता था!
उसकी मुस्कान के
ग़रीब दास्तान के
दुनिया-जहान के
नशे की ख़ुमारी में दिन बीतता था
जवानी की होली में मन भीगता था!

बुढ़ापे की होली में भीगी हैं पलकें!
अपनों की विदाई के
बच्चों की जुदाई के
वक़्त की ढिढाई के
घाव भरते भी हैं तो बहुत हल्के-हल्के
बुढ़ापे की होली में भीगी हैं पलकें!


अपंग की होली


होली है परसों, फिर माँ को जल्दी उठना होगा
सेठ दुअन्नीमल के घर पर फिर एक जलसा होगा

सुबह की निकली माँ जब अपने घर वापस आएगी
उसके मैले कपड़ों से मेहनत की बू आएगी

घर के टूटे छप्पर में से चाँद झलकता होगा
ढिबरीवाला आला फिर से धुआँ उगलता होगा

माँ खोलेगी डब्बा, देगी जूठा भात, कढ़ी, सब्ज़ी,
टुकड़ा एक पुए का जिसमें रमता होगा देसी घी

पाँव घिसटता मैं चौकी के कोने तक आऊँगा
माँ की आँखों में देखूँगा, उसके हाथों से खाऊँगा

अगर हाथ चलते मेरे तो मैं भी माँ कुछ करता
और नहीं कुछ तो माँ आख़िर अपना पेट तो भरता

पाँव सलामत होते तो मैं भी कुछ कर पाता
वज़न उठाता, हाँक लगाता, कारीगर बन जाता

रंगों की दो पुड़ियाँ होली पर चुपके से लाता
पीछे से आ कर माँ मैं तुझको सराबोर कर जाता

अपनी भी होली में अम्मा होती ख़ूब ठिठोली
मन मसोस कर न रहता कि ये होली भी हो ली

--


अमिताभ वर्मा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय प्रौद्योगिक संस्थान से खनन अभियांत्रिकी में स्नातक हैं। उन्होंने निजी क्षेत्र की विभिन्न कम्पनियों में पैंतीस वर्ष कार्यरत रहने के बाद 2016 में अवकाश ग्रहण किया। वे आकाशवाणी से बतौर समाचार सम्पादक और समाचार वाचक सम्बद्ध रहे हैं। उनके तेरह-तेरह एपिसोड के दो धारावाहिक नाटक - बाल-श्रम के विरुद्व ’अब ऐसी ही सुबह होगी’ तथा कन्या-संरक्षण पर ’नन्ही परी’ - आकाशवाणी पर प्रसारित हुए। वे सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के टेलिविज़न तथा रेडियो कार्यक्रमों में अभिनय तथा पटकथा लेखन द्वारा योगदान करते रहे है। उनकी रचनाओं का संकलन, ’कृतिसंग्रह’, बहुत सराहा गया। उन्होंने एक अंग्रेज़ी पुस्तक, ’स्टेइंग इन्सपायर्ड’, भी लिखी है। अभी हाल में उनकी ई-बुक - कहानी-संग्रह ’उसने लिखा था’ - प्रकाशित हुई है। 

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  1. माँ मैंने बहुत सताया है, माँ मैंने बाहर रुलाया है,
    अमिताभ वर्माजी दिल छूने वाली कविता है, मैं वैसे बड़ा
    कठोर दिल का इंसान हूँ लेकिन इस कठोर दिल को
    भी पिघला दिया माँ तुमने बहुत रुलाया है !
    बधाई देता हूँ आपकी कलम को !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी6:37 pm

    आदरणीय हरेन्द्रजी,
    पढ़ते तो बहुत हैं, पसन्द भी कई करते हैं, किन्तु रचनाओं को पढ़ कर प्रतिक्रिया व्यक्त करनेवाले विरले ही होते हैं। अनेक धन्यवाद! आप जैसे पाठकों का प्रोत्साहन ही अनजाने लेखकों को लिखते रहने की प्रेरणा देता है।
    भवदीय,
    अमिताभ वर्मा

    उत्तर देंहटाएं

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