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प्रमोद जैन प्रेम के गीत

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अनबोला प्रेम

    
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जीवन भर कहना चाहा , पर प्रेम रहा मेरा अनबोला ।
ना उसने ही किया इशारा , ना मैंने ही उसे टटोला ।।

वो हार गले का बन बैठे
हम बिका किये बाजारों में
महफिल मुंह फेर खडी हो गई
मन गांठ लगाई बहारों ने 
हम मंडी में बेभाव बिके,हर भाव मिला हमको भोला।।
जीवन भर कहना .................................

ना अधरों से कुछ कह पाये
ना नजरों से कोई बात कही
पर एक अजानी सी छटपट
उस ओर रही इस ओर रही
हम दोनों का स्वभाव रहा,पल में मासा,पल में तोला।।
जीवन भर कहना .........................

हम तने रहे वो तुनक गई
बेबात में हम से भुनक गई
हम मुठ्ठी भींचे रहे , मगर थी
रेत समय की सरक गई
मन खाली सा जीवन खाली , सब खाली था जो कर खोला ।।
जीवन भर कहना ....................

हम बरषों तक हमसफर रहे
हम बरषों बन हम कदम चले
पहले तुम , पहले तुम करते
ना जाने कितने पल निकले
हम ढोल बजाते ही रह गये , उठ चला यार का था डोला ।।
जीवन भर कहना ............................

हम गिने नहीं जो कदम चले
जो गिने कदम वो गुने नहीं
हम अपनी धुन वो अपनी में
जो गुने किसी ने धुने नहीं
हम थक कर बैठ गये मग में , प्रियतम ने छोड दिया चोला ।।

राम की चिट्ठी


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राम के घर से चिटठी आई , उसमें लिखा बुलावा है ।
राम नाम है सत्य जगत में , बाकी सभी भुलावा है ।।

ओ ! मेरे प्रिय राम भरोसे
सत्य भरोसा तेरा है ,
श्रद्धा तेरी फलीभूत है
औ विश्वास घनेरा है ,
स्वंय राम ने लिख भेजा है
पक्का दावा तेरा है ,
बजने लगी वक्त की घंटी
दुनियां रैन बसेरा है ,
जीवन भर दरख्वास्त लगाई , उसका ही यह दावा है ।।
रम के घर से .....................................

मुट्ठी बांध तुझे भेजा था
खाली कर आना होगा ,
उल्टा नाम जपै जग सारा
तुझको मर जाना होगा ,
ये घर तो माया घर है
अपने घर आना होगा ,
राम बुलाते हें अब तूझको
अपना दर पाना होगा ,
राम का दर ही तेरा दर है ,दुनियां दर-दर भटकावा है।।
राम के घर से ...........................

छण भंगुर में जिया अभी तक
अब अनंत से मिलना है ,
अंतर मन का फूल मधुर अब
नील गगन में खिलना है ,
राम ने दूत लिवाने भेजा
तुझको उठ अब चलना है ,
छोड - छाड सब मोह जगत
ये तो छलिये की छलना है ,
तन - मन सब बदलेगा तेरा , बदलेगा पहनावा है ।।
राम के घर से ...........................

कुछ सांसों की मोहलत है
सबसे मिल आज विदाई ले ,
राग , द्वेष सब छोड यहीं
अब उठा हाथ अंगडाई ले ,
विदा गीत की धुन बजती
ले हाथों में शहनाई ले ,
राम नाम जपले होठों पर
एक तुलसी की चौपाई ले ,
रम नाम है सत्य , जगत जीवन तो एक छलावा है ।।
राम के घर से .........................

फेरा


                         ----------
दर तेरा , दीवारें तेरी , गाँव , शहर सब तेरा है ।
अपना तो बस पल दो पल का , इन गलियों फेरा है ।।

भोर कुहासे में आये हैं
सांझ ढले तक जाना है ,
और गाँव बाहर मरघट में
बिस्तर वहीं सजाना है ,
थकन देह कु रख सिरहाने
चिरनिद्रा में सो जाना है ,
पल दो पल क्या? राग लगायें , जीवन सांझ सवेरा है।।
दर तेरा ..............................


चुन - चन हाथों तिनका - तिनका
क्या? नीड बनाए हम अपना ,
स्वांस - स्वांस में जन्म मरण
जीवन जैसे लगता सपना ,
सांसों की कंठीमाला में
बस नाम राम का है जपना ,
अपने मन को बना कमंडल , करना रैन बसेरा है ।।
दर तेरा .......................


देखे महल दोमहले तेरे
ओट अटारे माटी के ,
बंधन अंधी आंखों पर हें
चिरपरिचित परपाटी के ,
कौन ? बंधे बंधन में प्रिय-
तम , हम तो यार लंगोटी के ,
खेल खेलता झूठ - मूठ के , कैसा चतुर चितेरा है ।।
दर तेरा ............................

सागर एक है लहर अनेकों
जल पर ढेर शिकारे हैं ,
एक ही दरीया रंग रंगा
सबकी अपनी पतवारें हैं ,
अल्ला के सब बंदे जग में
सभी राम के प्यारे हैं ,
एक नूर से सब रोशन है , बाकी घना अंधेरा है ।।

 

   अदना


                  --------------

अनबोला तो अनबोला है
अनबोले को कैसे ? बोलूं ।
मैं तो छोटा हूं , खोटा हूं
फिर अपना मुंह कैसे ? खोलूं ।।

तुमने तो पर्वत तौल दिये
विधु की गहराई नाप चुके
सूरज को जाडा दे डाला
हिम तल पर आगी ताप चुके
मैं तिनका भी ना तौल सका
फिर खुद को मैं कैसे ? तौलूं ।।
अनबोला तो अनबोला .......

तुम बडे हुये क्या ? बात हुई
दिल तो पाया है जर्रे सा
मन का मद अंबर कर डाला
स्वार्थ में रत रेशा - रेशा
मैं छोटा हूं फरफोटे सा
मैं जहर क्यों ? मन में घोलूं ।।
अनबोला तो अनबोला ........

छोटे का छोटापन पाओ
तो तन होगा मोटा - मोटा
मत बडे बनो फट जाओगे
जो उठा लिया मैंने शोटा
तुम मिल जाओगे माटी में
मिट जाओगे जो मुंह खोलूं ।।
अनबोला तो अनबोला .............

कविता 8898344919867109025

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