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साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग - 13 // डॉ. महेन्द्र भटनागर

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साहित्यकारों से आत्मीय संबंध

(पत्रावली/संस्मरणिका)

डॉ. महेंद्र भटनागर

द्वि-भाषिक कवि / हिन्दी और अंग्रेज़ी

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       (परिचय के लिए भाग 1 में यहाँ देखें)

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भाग 1 || भाग 2 || भाग 3 || भाग 4 || भाग 5 || भाग 6 || भाग 7 || भाग 8 || भाग 9 || भाग 10 || भाग 11 || भाग 12 ||


भाग 13



डा. विश्वनाथ गौड़

. कानपुर

दि. 2-12-74

प्रियवर डा. महेंद्र भटनागर जी,

सभय नमस्कार। यह अपराधी-बल्कि एक फ़रार अपराधी लगभग ढाई महीने से समुचित बल, साहस और हिम्मत बटोरने की कोशिश करता हुआ आपके हज़ूर में आत्म-समर्पण के लिये हाज़िर हो सका है। मैं मानता हूँ कि पत्रों का उत्तर न देना एक बनसजनतंस बतपउम है। वैसे मैं ऐसा कभी नहीं रहा। पत्र लिखना मेरी हॉबी-सी हो गई है। कुछ लोगों को मैं विशेष रुचि से पत्र लिखता रहा हूँ। वे भी यह कह कर शायद मुझे बनाते रहे हैं कि आपके पत्रों में रस आता है। मेरे प्रिय छात्र ललित ( कवि-आलोचक -कहानीकार डा. ललित शुक्ल ) भी उनमें से एक हैं। ख़ैर, आपके निकट मेरी यह आत्म-श्लाघा नितरां उपहास की वस्तु होगी। आपका तो पहला अनुभव ही ख़राब किंवा विपरीत रहा; इब्तिदा ही ग़लत हुई। अपराधी वृत्ति में अभी इतना धृष्ट नहीं हो पाया हूँ। इसलिये शर्मिन्दगी है। लगभग ढाई महीना इसी में बीता कि अब कैसे लिखूँ!

गत मार्च में ललित शुक्ल को मैंने एक पत्र लिखा था। संयोग से उसे यहाँ पोस्ट होने से पहले कुछ नवयुवकों ने देख लिया। बस, उस पर ऐसी नज़र लगी कि तब से पत्र-लेखन भी ठप्प रहा। आप विश्वास मानें अन्दर और बाहर की कुछ ऐसी उलझनें चलती रहीं कि किसी को एक पत्र भी नहीं लिख सका। पत्रों का ढेर लग गया है जो कि मेरी इख़लाकी बदतमीज़ी की सही पैमाइश का पैमाना बन कर रह गया है।

धीरे-धीरे एक दिन (25-11-74) देवोत्थानी एकादशी आई। चार महीनों की लम्बी निद्रा में सोये देव जगे। सृष्टि में एक नया दौर-सा आता प्रतीत हुआ। मेरे मन में भी आशा का संचार हुआ कि मेरा सोया हुआ दौर भी जग उठे। कालिदास के यक्ष ने भी अच्छी प्रेरणा दी। आप जानते ही हैं कि उसने अपनी विरह विधुरा पत्नी के लिये कहलाया था-‘शापान्तो में भुजगशय नादुत्थिते शारंगपाण शेषान् मासान् गमय चतुरो....।’ मेरे नजराये पथराये लेखन ने भी करवट ली और उस दिन ललित को पत्र लिख कर लम्बे समय से जमी हुई बर्फ़ को तोड़ सका। तब से बराबर जुटा हूँ। कुछ रास्ता तय भी कर लिया है। सूची-कटार न्यााय से पहले छोटे- छोटे निपटाये गए हैं। इन छोटे पत्रों की आड़ लेता हुआ अपराधी मन जैसे सामने आने से बचता रहा हो।

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आप कहेंगे भूमिका काफ़ी बड़ी हो गई है। बात भी ठीक है। बड़ी नालायक़ी की। पैरवी थोड़ी बड़ी भी हो जाय तो शायद हर्ज़ नहीं होगा। पर, आशा है, अब इसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी।

अच्छा अब मतलब की बात पर आता हूँ। ललित शुक्ल ने आरम्भ में मुझसे आपके बारे में कहा था। आपने भी अपने पहले पत्र में अपना परिचय दिया था। वह परिचय विशेषनिष्ठ था। आपके सामान्य साहित्यिक कृतित्व औा व्यक्तित्व से मैं परिचित-सा ही रहा हूँ। आप साहित्यिक प्रतिष्ठा के विद्वान् और योग्य लेखक हैं। इस रूप में मैं आपको जानता रहा हूँ। उधर आपने अपने सम्पादन में तैयार किया हुआ ‘तुलसी-स्तवन’ भेजा था; अच्छी और सामयिक चीज़ बन पड़ी है। सब मिला कर आपका यह प्रयास उत्तम रहा है। इधर, नये ‘प्रकाशन समाचार’ में आपका बुक-रिव्यू ‘जलसाघर’ (रचयिता : श्रीकान्त वर्मा) पर आया है। आप जमे हुए लेखक हैं। रिव्यू अच्छा लगा। इधर, शरदावकाश में लखनऊ से डा. शम्भूनाथ चतुर्वेदी आए थे। उनसे भी आपके संबंध में बातचीत होती रही। ‘कवि श्री : महेन्द्र भटनागर’ (संयोजक- डा. शिमंगलसिंह ‘सुमन’/सम्पादक-डा. शम्भूनाथ चतुर्वेदी/प्रकाशक : सेतु प्रकाशन, झाँसी)

इधर, जीवाजी विश्वविद्यालय की ‘शोध उपाधि समिति’ में मैं-पता नहीं कैसे-सदस्य चुन लिया गया था। उन दिनों एक मीटिंग वहाँ होने की सम्भावना थी। शायद इस बहाने भेंट हो जाती। पर, वह बैठक हो नहीं सकी।

उस शोध-प्रबन्ध की रिपोर्ट आप भेज चुके होंगे। शायद, आपने भेज ही दी है। हमारे यहाँ मौखिकी होती है। मैं प्रयत्न करूंगा कि उसमें आप बुलाये जा सकें। यदि मेरा प्रयत्न सफल हुआ तो दर्शन का अवसर भी मिल जायगा। उस स्थिति में कॉलेज में भी आपका एक व्याख्यान होगा और अलग से 10-5 आदमियों की एक छोटी-सी गोष्ठी भी हो जायगी। विश्वविद्यालय के परीक्षा-कार्य के संबंध में आपकी रुचि का ध्यान रख कर आपके लिये उपयुक्त कार्य दिलवाने की चेष्टा भी करूंगा। किंबहुना। काम की बातें भी प्रायः सब हो गईं हैं। आशा है, आप मेरे इस negligence and criminal breach o`f cultural etequette को क्षमा करते हुए उत्तर देकर क्षमा-दान को confirm करेंगे।

भवदीय :

विश्वनाथ गौड

. कानपुर

दि. 31-12-74

प्रिय महेन्द्र भटनागर साहब,

सप्रेम नमस्कार। आपका कृपा-पत्र यथासमय मिला। मुझे संतोष है कि आपने मेरी परिस्थिति को appreciate किया और मुझे क्षमा भी दिया। ईश्वर चाहेगा तो अवश्य ही हमारे संबंध प्रगाढ़ होंगे। ‘व्यतिषजति पदार्थानान्तरः कोऽपि हेतुः।’ आजकल तो ललित भी इधर आये हुए हैं। आपके विषय में भी बातचीत होती रही।

‘आयाम’ की योजना के संबंध में प्रकाशक का मुखापेक्षी होना पड़ा था। अतः चुनाव में भी कुछ restriction रहे।

ग्वालियर ‘शोध उपाधि समिति’ की स्थगित बैठक 14/12 को हुई। गया था। आपके निर्देशन में आए हुए विषय स्वीकृत हो गये हैं। नववर्ष की बधाई स्वीकार करें।

भवदीय

विश्वनाथ गौड

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सहृदय आत्मीय मित्र कामरेड डा. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय

. सी-185, ज्ञान मार्ग

तिलकनगर, जयपुर-4 राज.

दि. 27-7-73

प्रिय भाई,

आपका कृपापत्र।

मंदसौर के कारण आपकी ‘मंद’ स्वीकृति मिली; इससे अबकी बार काम न चलेगा। 26 तथा 27 अगस्त को आप आ ही जाइए और वहीं ‘संवर्त’ आदि लाइए। इससे आपकी कविता को भी लाभ होगा और हमें भी। क्योंकि हम आप कामरेड्स होने पर भी कभी मिल नहीं सके। यह बढ़िया मौक़ा है।

आपने अनुभव किया होगा कि आपके अलग-थलग रहने से आपकी ओर समुचित ध्यान नहीं दिया गया। सो, कामरेड, अब इस कमी को पूरा कीजिए। वहीं भरतपुर में डट कर बातें करेंगे और सभी मित्रों से मिलना हो जाएगा। भोजन-निवास का प्रबंध है ही। सभी प्रगतिशील प्रमुख रचनाकार और कवि आ रहे हैं। उधर से और किन्हें बुलाया जाए, यह लिखें।

आपका ही,

विश्वम्भरनाथ उपाध्याय

(डा. विश्वम्भरनाथ जी ने इतने प्रेम और आग्रह से भरतपुर-अधिवेशन में बुलाया; किन्तु खेद है, कुछ अपरिहार्य कारणों से, सम्मिलित नहीं हो सका; यद्यपि जाने की तैयारी पूरी थी। समुचित ध्यान न दिये जाने की शिकायत मैंने कभी किसे से नहीं की। इसकी मुझे इतनी चिन्ता कभी नहीं रही और न आज है। अनेक विद्वानों के आलेख; जो समय-समय पर छपे; पर्याप्त हैं।)

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डा. उपाध्याय जी से एक बार आगरा में मिलना हुआ था - सन् स्मरण नहीं; किसी होटल में। चाय या दही की लस्सी साथ-साथ ली थी। दो-एक लोग उनके साथ और भी थे। तब डाक्टर साहब की कोई आलोचना-पुस्तक छपी थी; जिसमें एक स्थल पर मेरा मात्र नामोल्लेख था। इसका मैंने उनके सामने ज़िक्र किया। सुनकर वे बोल,े ‘हम तो निष्पक्ष रहने में विश्वास करते हैं। किसी की उपेक्षा नहीं करते।’ फिर, काफ़ी समय बाद, डा. उपाध्याय जी से मिलने मैं एक बार उनके जवाहरनगर-स्थित मकान पर गया था। लेकिन तब वे जयपुर से बाहर गये हुए थे। उनके सुपुत्र डा. मंजुल मिले थे। जयपुर, एक शोध-छात्र की मौखिकी लेने गया था; ‘विश्वविद्यालय’ के अतिथि-भवन में ठहरा था।)

. सी-185 ज्ञान मार्ग, तिलकनगर

जयपुर-4 राज.

दि. 9-2-74

प्रिय बंधु,

‘उत्तरशती’ का प्रकाशन कागज़ के अभाव में रुका हुआ है। जब वह निकलेगा तब देख लेंगे। आप उन्हें पत्र लिख दें कि वह मुझसे ‘संवर्त’ का रिव्यू ले लें; याद दिला दें। मैं रुचि के अभाव से नहीं, समय के अभाव से पीड़ित हूँ। मैं यह महसूस करता हूँ कि आप पर अब लिखा जाना चाहिए। बल्कि, विश्वविद्यालयों में अनुसंधान भी हो सकता है; होगा भी। पर, उधर के लोग इस दिशा में पहल कर सकते हैं। मैं ग्वालियर में कुछ को लिखूंगा।

आचार्य विनयमोहनशर्मा आपकी कृतियों पर समीक्षा-पुस्तक का सम्पादन कर रहे हैं; यह प्रतिष्ठा का विषय है। आचार्यजी की उदारता का भी यह प्रमाण है। वैसे बूढ़े आचार्य समकालीन साहित्य में रुचि नहीं लेते; तिस पर भक्तिकालीन व्यक्तित्व वाले लोग।

विश्वम्भवरनाथ उपाध्याय

पोस्टकार्ड में और जगह बची नहीं।

(आचार्य विनयमोहन शर्मा जी-द्वारा सम्पादित समीक्षा-पुस्तक ‘महेन्द्र भटनागर का रचना- संसार’ ख्याति-लब्ध कथाकार श्री सतीश जमाली जी ने अपने प्रकाशन ‘चित्रलेखा प्रकाशन’ (इलाहाबाद) से सन् 1980 में प्रकाशित की। यह मेरे काव्य-कर्तृत्व पर सम्पादित दूसरी पुस्तक है। प्रथम, प्रो. डा. दुर्गाप्रसाद झाला (शाजापुर - म.प्र.) के सम्पादन में ‘रवीन्द्र प्रकाशन’, ग्वालियर से पूर्व में सन् 1972 में छप चुकी थी- ‘महेन्द्र भटनागर : सृजन और मूल्यांकन’।)

. 7-ड-25, जवाहरनगर, जयपुर-4 राज.

दि. 3-1-85



प्रिय भाई,

‘अबलौं नसानी’ की ग्लानि दूर करने के लिए समीक्षा संलग्न। इसे टंकित कराके एक प्रति मुझे भेज दें; ताकि मैं उसे शुद्ध कर दूँ। सही टाइप हो नहीं सकता, प्रथम बार में। मेरा लेख गांधी जी से भी खराब है।

मुझे आगरा में 17 को और 18 को ग्वालियर में बैठकें अटेंड करनी थीं। आगरा से सुबह 18 को सात बजे की बस पकड़ कर भागे तो 11 बजे सीधे यूनीवर्सिटी जाना पड़ा-‘टोपों वाली गली’ बस-अड्डे से दूर बताई गई अन्यथा आकर तब जाते। सो, यह रहा।

अगली बार शायद भेंट हो। आपको चाहिए था कि आप बैठक में 18/12 को अपराह्र तक आकर हमें टटोल लेते तो आपके साथ जाने की बात बन जाती। बैठक के बाद 18/12 को रात में-बहुत सबेरे उठ कर बाग मुज़फ़्फ़र खाँ, आगरा से बस के अड्डे तक आना, बैठक में मगज़पच्ची, बिना नहाए-धोए, दिन-भर 18/12 की शाम तक थक गए। फिर नहीं पहुँच पाए ‘टोपों की गली’। सुबह भाग लिए। सवाल यह है कि आपको मेरा कार्यक्रम तो अज्ञात था, पर आप 18/12 को टटोलीकरण के लिए क्यों नहीं आए? तब आप मेरा अपहरण कर सकते थे।

आप प्रत्येक कक्षा के लिए पुस्तकें, प्रकाशकों के पते सहित, प्रस्तावित कर मुझे भेज दें। सभी प्रश्न-पत्रों के लिए। इससे सुविधा रहेगी।

(स्थानाभाव के कारण हस्ताक्षर तक नहीं!)

डा. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय को, हमारे विश्वविद्यालय ‘जीवाजी विश्वविद्यालय’ (ग्वालियर) के ‘हिन्दी अध्ययन मंडल’ ने, बाह्य विशेषज्ञ सदस्य के रूप में सम्मिलित किया था। अतः वे ‘मंडल’ की प्रथम बैठक में भाग लेने ग्वालियर आये थे। मेरी उनसे भेंट होनी थी। चूँकि, ठीक पूर्व में मैं ‘मंडल’ का अध्यक्ष रह चुका था (तीन-वर्ष); इस कारण, नये सत्र में हो रही ‘मंडल’ की प्रथम बैठक वाले दिन, विश्वविद्यालय जाना मैंने उचित नहीं समझा। घर पर ही डा. उपाध्याय जी की प्रतीक्षा करता रहा। उन दिनों मैं टोपों वाली गली, जीवाजीगंज में रहता था; जहाँ डा. उपाध्याय जी एक बार मुझसे मिल चुके थे; जब वे किसी शोधार्थी की मौखिकी लेने ग्वालियर आये थे।

उपर्युक्त पत्र पढ़ कर, डा. उपाध्याय जी के प्रेम से गद्गद हो उठा! बाद में, ऐसा लगा, कोई हर्ज़ न था; उस रोज़ डा. उपाध्याय जी से मिलने विश्वविद्यालय चला जाता। हालाँ कि डा. उपाध्याय जी ने मुझे इतना मान दिया; लेकिन मैंने उन्हें विचारार्थ प्रस्तावित पुस्तकों (नाटक, उपन्यास, खंडकाव्य आदि) की कोई सूची नहीं भेजी। पाठ्य-संकलन तो ‘विश्वविद्यालय’ द्वारा हम पूर्व में ही तैयार करवा चुके थे; जिन्हें ‘मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी’ ने प्रकाशित किया था।

डा. उपाध्याय जी ने उपर्युक्त पत्र में जिस समीक्षा का उल्लेख किया है; वह


मेरे तेरहवें कविता-संग्रह ‘जूझते हुए’ पर है। यह समीक्षा डा. हरिचरण शर्मा (जयपुर) द्वारा सम्पादित समीक्षा-पुस्तक ‘सामाजिक चेतना के शिल्पी : कवि महेंद्र भटगागर’ में समाविष्ट है (पृ. 187-189/प्र. बोहरा प्रकाशन, जयपुर)।

. कुलपति, कानपुर विश्वविद्यालय

दि. 27-5-91

प्रिय साथी,

आपका पत्र मिला। मुझे याद नहीं कि ‘जीने के लिए’ शीर्षक का कविता-संग्रह मिला है कि नहीं। किताबें खोजकर समय मिलने पर लिखना चाहूंगा। किन्तु यहां समय नहीं मिलता है; इसलिए यह भी सम्भव है कि यहाँ से मुक्ति के बाद आप पर लिख पाऊँ।

शेष कुशल है।

भवन्निष्ठ,

विश्वम्भरनाथ उपाध्याय

. जयपुर

दि. 6-8-98

प्रिय भाई,

आपका कृपापत्र। धन्यवाद।

आपने आजीवन जन-चेतना प्रेरक कवितात्मक लेखन किया है; यह अभिनन्दनीय है।

व्यस्तता वश आपके लिए लिखा नहीं जा सका। मेरे पास जो संग्रह हैं, उन्हें पुस्तकों के जंगल में खोजना होगा; खोजेंगे। आपकी इधर कोई रचना नहीं मिली है।

ग्वालियर-लश्कर क्षेत्र के साहित्यिक और सचेत साहित्य के प्राघ्यापक आपके अभिनन्दन के लिए कार्यक्रम आयोजित करें, तो भाग लूंगा।

पाठ्यक्रम पुस्तक व्यवसायी प्राध्यापकों, अध्यक्षों से मैं सदा दूर रहा हूँ और ‘वे’ व्यवसायी भी हैं; अतः साहित्य में ही आपका गौरव-वर्धन हो तो बेहतर होगा।

शेष कुशल है। स्मरण के लिए आभार।

भवदीय,

विश्वम्भरनाथ उपाध्याय

(‘राजस्थान विश्वविद्यालय’ से संबंधित कोई काम था; इस कारण जयपुर के किसी प्रोफ़ेसर के बारे में पूछा था-नाम स्मरण नहीं। उनके बारे में डा. उपाध्याय


जी की धारणा मेरे लिए अज्ञात थी।)

इस समय तक मेरे कर्तृत्व पर दो शोध-कार्य सम्पन्न हो चुके थे -

(1) ‘जीवाजी विश्वविद्यालय’, ग्वालियर में/‘हिन्दी प्रगतिवादी काव्य के परिप्रेक्ष्य में महेन्द्र भटनागर का विशेष अध्ययन’/शोधार्थी : कु. माधुरी शुक्ला/1985;


(2) ‘नागपुर विश्वविद्यालय’ में/‘महेन्द्रभटनागर और उनकी सर्जनशीलता’/शोधार्थी : श्रीमती मृणाल मैंद/1990.

विवरण ‘शोध संदर्भ’ (भाग : 3) / सं. डा. गिरिराज़शरण अग्रवाल (बिजनौर) में दृष्टव्य।)

. जयपुर

दि. 21-8-98

प्रिय भाई,

‘आहत युग’ मिल गया। इसके बहाने आपका संक्षिप्त मूल्यांकन संलग्न है। इसका चाहे जहाँ उपयोग कर सकते हैं।

मेरा विचार है कि अब आपको सारे संग्रहों से चुनी हुई उत्कृष्ट रचनाओं का एक संग्रह प्रकाशित कराना चाहिए। उससे आपका भविष्य भास्वरित होगा। सोचिएगा। बहुत बड़ा नहीं। लगभग एक-सौ पृष्ठों का प्रतिनिधि रचनाओं का संग्रह पर्याप्त होगा।

फिर, ग्वालियर या अन्यत्र एक कार्यक्रम हो तब विवेचना हो।

शेष कुशल है।

मैं अपना एक जीवन-वृत्त भेज रहा हूँ।

भवदीय,

विश्वम्भरनाथ उपाध्याय

डा. विश्वम्भरनाथ उपाध्याय में बड़ी ऊर्जा और आग देखी मैंने। प्रतिभा और श्रम का समन्वय है उनके व्यक्तित्व में। अनेक विधाओं में उन्होंने उत्कृष्ट साहित्य रचना की है। व्यक्ति-रूप में वे एक बहुत ही अच्छे मित्र हैं। उदार व सहृदय। हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में, एक विद्वान; किन्तु तटस्थ-निष्पक्ष आलोचक के रूप में उनकी छवि सर्वविदित है।

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मेरे प्रेरणा-स्रोत विश्वम्भर ‘मानव’

. इलाहाबाद

दि. 11-1-60

प्रिय महेन्द्र जी,

आपकी ‘मधुरिमा’ और पत्र दोनों यथासमय प्राप्त हुए।

मेरा ट्रांसफ़र अकारण जयपुर को हो गया था। यह मुझे अनुचित लगा। इसी पर मैंने त्यागपत्र दे दिया। अब मैं स्वतंत्र हूँ। आजकल एक उपन्यास प्रेस में है। नाम है-‘प्रेमिकाएँ’।


‘मधुरिमा’ के गीत मुझे बहुत आकर्षक लगे। इनमें से कुछ गीतों को मैंने बार-बार पढ़ा है। आकर्षण, रूप और प्रणय का चित्रण स्वाभाविक बन पड़ा है। आपके सभी पिछले संग्रहों से भावनाओं की कोमलता इसमें अधिक रक्षित है। उस काल में जब कि गीतों के प्रति एक प्रकार का उपेक्षा-भाव प्रदर्शित किया जा रहा है; ऐसे मधुर गीत लिखने के लिए मैं आपको बधाई देता हूँ।


नव वर्ष के लिए मेरी शुभ कामनाएँ स्वीकार करें।

विश्वम्भर ‘मानव’

. इलाहाबाद

दि. 25-12-62

प्रिय महेन्द्र जी,

‘जिजीविषा’ की प्रति प्राप्त हुई। इसके लिए मेरा हार्दिक धन्यवाद स्वीकार करें।

सबसे पहले इन रचनाओं की सुबोध शैली मन को मुग्ध करती है। टेकनीक में कहीं भी जटिलता अथवा दुर्बोधता नहीं। जनता के सुख-दुःख


से आपके मन ने सहज भाव से एकाकार स्थापित कर लिया है। अन्य मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति भी विवेक का आश्रय लेकर हुई है।

उसमें कोरी भावुकता नहीं है। वह बहुत नॉर्मल और स्वाभाविक है। इस कृति का आशावादी स्वर मुझे अत्यधिक प्रेरणाप्रद लगा।


विश्वास है, स्वस्थ और सानंद हैं।

विश्वम्भर ‘मानव’

. इलाहाबाद

दि. 6-7-63

प्रिय महेन्द्र जी,

आपकी दोनों पुस्तकें प्राप्त हुईं। इनमें से ‘टूटती शृंखलाएँ’ मैं पहले ही पढ़ चुका हूँ। आपके ग्रंथों की सूची देखने से पता चलता है कि गद्य और पद्य दोनों में आपने बहुत लिखा है।


‘संतरण’ में मनुष्य का जो चित्र आपने दिया है, वह बहुत भव्य है। जीवन का चित्र भी आलोकमय और आशापूर्ण है। आपके काव्य में आत्म-विश्वास का स्वर मुझे सदैव से आकर्षित करता रहा है। कला की दृष्टि से आपके गीत संगीत के तत्त्वों और मुक्त-छंद की रचनाएँ नवीन लय से युक्त हैं।


कृपा-दृष्टि बनाए रहें।

विश्वम्भर ‘मानव’

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डा. विष्णुकान्त शास्त्री

280, चित्तरंजन एवेन्यू

कलकत्ता-6

दि. 1-1-69

श्रीहरि

प्रियवर महेन्द्र जी,

आपकी कविता-पुस्तकों का रसास्वादन तो मैं पहले ही कर चुका था; लेकिन प्राध्यापकीय आलस्य के कारण उनके बारे में अपनी कृतज्ञता स्वीकारने में आजकल-आजकल करते इतना विलम्ब हो गया! तब-तक आपका स्नेह-पत्र भी आ गया। चलिये, अच्छा हुआ। नव वर्ष की शुभकामनाओं के ज्ञापन के साथ-साथ काव्य-समाराधन भी हो जायेगा।


‘टूटती शृंखलाएँ’ से ‘बूँद नेह की; दीप हृदय का’ तक एक लम्बी यात्रा है; जिसमें दो अविरोधी स्वर गूँजते रहे हैं। एक है, आस्था और विश्वास के साथ समाज को नये साम्य और भ्रातृत्व के भावों की दीक्षा देने का तथा दूसरा, ऐसे स्वस्थ वैयक्तिक प्रणय का, जो मनुष्य को जगत-जीवन से काटने के स्थान पर युक्त करता है। यह ठीक है, कि आरम्भ में कैशोर विश्वास ही अधिक मुखरित हुआ है (प्रमाण - 1946 में रचित ‘ढहता महल’ कविता; जिसमें रूस की भावुकतापूर्ण प्रशस्ति है; यद्यपि तब-तक स्टालिन का जन-विरोधी रूप प्रकट हो चुका था।); किन्तु उत्तरोत्तर दर्शन को सामयिक राजनीति की ढाल बनाने के स्थान पर सामान्य जीवन विश्वास के रूप में व्यक्त किया गया है। सिद्धान्तों के छद्म देवता के आगे सहज देश-प्रेम एवं मानव-प्रेम की बलि नहीं चढ़ायी गयी है (‘संतरण’ की कविता ‘माओ और चाऊ के नाम’ इसका प्रमाण है और यह कथन भी कि ‘‘स्पष्ट है, मेरी कविताएँ मात्र साम्यवाद की श्रेणी में नहीं आतीं-‘नई चेतना’ के प्राक्कथन से)

‘ओ भवितव्य के अश्वो’ इस श्रेणी की उत्कृष्ट कविता है। मानवता के प्रति आपका यह विश्वास संक्रामक हो! प्रेम की मर्म मधुर कविताओं में ‘कौन तुम अरुणिम उषा-सी मन-गगन पर छा गई हो’, ‘गीत में तुमने सजाया रूप मेरा’ आदि


कविताएँ बरबस ध्यान खींच लेती हैं। विरह-विधुर कविताओं में ‘दूर तुम’, ‘अब नहीं’ की व्यथा हृदयस्पर्शी है। ‘बूँद नेह की; दीप हृदय का’ तो दोनों धाराओं का संगम-स्थल ही है। यह निश्चय ही आपके कवि-व्यक्तित्व को स्पष्ट करने वाला संग्रह है।


     आपने स्नेहपूर्वक ये पुस्तकें भेजीं, इसके लिए आभारी हूँ।

‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी-साहित्य’ कब-तक प्रकाशित हो रहा है?

भगवान की कृपा से आप सानंद रहें।

स्नेही :

विष्णुकान्त शास्त्री

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यशस्वी साहित्य-स्रष्टा वीरेन्द्र कुमार जैन

. विले पारले (प.), बम्बई

दि. 7-10-59

प्रिय भाई,

आपके 27-9-59 के पत्र के लिए हृदय से कृतज्ञ हूँ। इंदौर से लौटते ही अस्वास्थ्य, व्यस्तता और अनेक परेशानियों के कारण, अपके इस सहृय पत्र का तुरन्त उत्तर नहीं दे पाया-लज्जित हूँ। क्षमा करेंगे।

भाई, आपने इतने स्नेह-समादर से मेरे ना-कुछ कृतित्व को याद किया, तो जी चाहता है कि आपको अपना सद्य-प्रकाशित कविता-संग्रह भेज सकूँ। पर, मुझे तो बहुत कम कॉपियाँ मिली थीं-वे समाप्त हो गईं। प्रयत्न करूंगा कि प्रकाशकों से अनुरोध करके सीधे ही भिजवाऊँ। आज ही आपकी प्रति के लिए पत्र लिखूंगा।

हाँ, मेरी सन् ’52 से ’57 के बीच की नवीनतम कविताओं का संग्रह ‘अनागता की आँखें’ के नाम से सुप्रभात प्रकाशन, कलकत्ता से ही, अभी कोई तीन सप्ताह पहले ही, प्रकाशित हुआ है। ख़ास बात यह कि इस संग्रह में 43 पृष्ठों की एक विस्तृत भूमिका है-गत 50 वर्षों.के आधुनिक विश्व-काव्य के प्रवाहों पर उसमें मैंने सर्वथा मौलिक प्रकाश डाला है। एकेडेमिक नहीं-एकदम स्वसंवेदित चिन्तन है। अपने आप में वह मेरे दर्शन-चिन्तन की एक कम्प्लीट थीसिस है। कविता-संग्रह तो मेरा मात्र यही निकला है। यदि यह सफल रहा तो इससे पहले की कविताओं के दो संग्रह तथा बाद की कविताओं का एक और निकालना चाहता हूँ। देखें क्या होता है।

‘अनागता की आँखें’ की कुछ प्रतियाँ यदि उज्जैन के कोई प्रमुख विक्रेता और विक्रम विश्वविद्यालय भी मँगवा सकें-तो कृपया देखें।

‘प्रतिकल्पा’ से कोई मालव-कथाकारों का कहानी-संग्रह आप निकाल रहे थे- उसका क्या हुआ? मैंने भी कहानी भिजवा दी थी। मेरी हार्दिक इच्छा है कि मेरी माँ-भोम मालव के जन-मन तक मेरी तुच्छ वाणी पहुँच सके।

योग्य सेवा लिखें।

आपका भाई :

वीरेन्द्र कुमार जैन

पुनश्च :

‘धर्मयुग’ के लिये कभी कुछ नहीं भेजेंगे ?े

. धर्मयुग, बम्बई

दि. 14 मार्च, 1960

प्रिय भाई,

15/1 के पत्रोत्तर में विलम्ब के लिए क्षमा करेंगे।


‘मधुरिमा’ मेरे पास पहुँची है।

उसके मधुर गीत मन का मौसम बदल देते हैं।


श्री भारती जी ‘धर्मयुग’ में अब समीक्षा की नयी प्रणाली स्थापित कर रहे हैं। उसी के अन्तर्गत आपकी पुस्तक भी मैंने समीक्षार्थ दे दी है। आशा है, अवश्य ही उसकी समीक्षा देर-अबेर समुचित रूप से होगी ही।

मेरा संग्रह अब तक आपके पास अवश्य पहुँचा होगा। कृपया सूचित करें। क्या उज्जैन में वह अब भी उपलब्ध नहीं है? आश्चर्य!

आशा है, सानंद हैं।

आपका :

वीरेन्द्र कुमार जैन

. धर्मयुग, बम्बई

दि. 14-4-60

प्रिय भाई,

आपके 18-3 के पत्र का उत्तर देने में विलम्ब हुआ - अपनी परेशानियों के कारण। माफ़ करेंगे।

आपके युनिवर्सिटी पुस्तकालय में अब तक मेरी पुस्तक आ गई होगी। आपको प्रकाशक ने पुस्तक न भेजी, मुझे अत्यन्त खेद है। असल में उनके यहाँ अब डाक आदि की कोई व्यवस्था नहीं है। वे तो पुस्तक का पूरा लॉट किसी को उठा देने की फ़िक्र में हैं। यह है कवि का भाग्य! ख़ैर ...

इंदौर में मेरे भाई ने स्वयम् प्रकाशकों को प्रेरित किया-पर किसी ने पुस्तक ऑर्डर नहीं की। मुझे लज्जा है और आत्म-ग्लानि है-कि मैं ऐसी अँधियारी और जड़ प्रजा के बीच पैदा हुआ। मुझे अपने को मालवीय कहने में शर्म आती है। अब मैं


बम्बई का हूँ, इस सागर-तट का हूँ-विश्व का हूँ। मध्य-प्रदेश एक खोल थी, जो उतर गई।


आधुनिक हिन्दी-साहित्य पर शोध के अछूते विषयों के बारे में भारती जी से बात हुई थी। उन्होंने कहा कि आप ‘हिन्दी साहित्य परिषद’, इलाहाबाद को लिख कर ‘साहित्य अनुशीलन’ नामक उनके पत्र का वह अंक मँगवा लें जिसमें अब तक हो चुके शोध-विषयों की सम्पूर्ण सूची है। उससे आपको नये विषयों के निर्णय में मदद हो जायेगी। शोध के लिए नये विषयों का सुझाव अपनी ओर से सोच कर फिर कभी दूंगा।

‘मधुरिमा’ की समीक्षा के लिये मैंने भारती जी से बातचीत की है। उन्होंने कहा है कि गीत-संग्रहों पर कोई लेख बनेगा, तब यह भी शरीक़ हो जायेगी। दो-चार-छह पुस्तकों पर एक साथ एक समीक्षा-लेख लिखा जायेगा-यही नयी प्रणाली होगी। इस संबंध में आप भी भारती जी को लिखें। यह मेरे हाथ में नहीं है अब।

अब गीत आप भारती जी को ही भेजें। मेरा सामग्री से कोई संबंध नहीं रहा है।

आप स्वयं कुछ विशिष्ट पुस्तकें चुन कर, एक पार्श्व-भूमिका बना कर, समीक्षा-लेख लिखें; तो भारती जी ले सकेंगे।

श्री नरेन्द्र शर्मा से मेरा अच्छा संबंध है। आप जो मुझसे कहलाना चाहें; लिखें। मैं व्यक्तिगत रूप से ही कह दूंगा; ख़ूब अच्छी तरह। अपना काम मुझे बतायें। मैं आपका परिचय यथेष्ट उन्हें दे दूंगा। उनका पता ‘आकाशवाणी’, बम्बई है।

सानंद होंगे।

सस्नेह,

वीरेन्द्र कुमार जैन

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संस्मरण 8488167320586804990

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