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साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग - 12 // डॉ. महेन्द्र भटनागर

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. साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली/संस्मरणिका) डॉ. महेंद्र भटनागर द्वि-भाषिक कवि / हिन्दी और अंग्रेज़ी        (परिचय के लिए भाग 1 में य...

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साहित्यकारों से आत्मीय संबंध

(पत्रावली/संस्मरणिका)

डॉ. महेंद्र भटनागर

द्वि-भाषिक कवि / हिन्दी और अंग्रेज़ी

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       (परिचय के लिए भाग 1 में यहाँ देखें)

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भाग 12


मेरे गुरु : आचार्य डॉ. विनयमोहन शर्मा

सत्र 1947-48 में जब ‘नागपुर विश्वविद्यालय’ से हिन्दी में एम.ए. करने का निश्चय कर लिया तब श्री प्रभाकर माचवे और श्री प्रभागचंद्र शर्मा (सम्पादक : ‘आगामी कल’, खंडवा) से विदित हुआ कि इन दिनों, ‘नागपुर विश्वविद्यालय’ में हिन्दी-विभागाध्यक्ष आचार्य विनयमोहन शर्मा हैं। आचार्य विनयमोहन शर्मा जी के आलोचनात्मक लेख पत्र-पत्रिकाओं में प्रायः पढ़ने को मिल जाया करते थे। उनके कर्तृत्व और स्वभाव के संबंध में अनेक बातें माचवे जी से मालूम हुईं।

जब, नागपुर परीक्षा देने गया तो धर्मशाला में ठहरा। सर्वप्रथम, बिना किसी पूर्व-परिचय के, आचार्य विनयमोहन जी से मिलने उनके निवास पर जा पहुँचा। मेरे नाम से वे परिचित थे; क्योंकि उन दिनों मैं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छप रहा था। विनयमोहन जी बड़े प्रेम से मिले। उन्होंने बताया; स्वाध्यायी अध्यापक-परीक्षार्थियों को परीक्षा देने की सुविधा उपलब्ध होने के बावज़़ूद, हिन्दी में कम-ही परीक्षार्थी बैठते हैं। अधिकांश परीक्षार्थी बाहर के होते हैं। उन दिनों, मूल्यांकन-स्तर भी ऊँचा था। परीक्षक बाहर के लब्ध-प्रतिष्ठ विश्वविद्यालयीन प्रोफ़ेसर होते थे। प्रथम-श्रेणी पा लेना दुर्लभ था। जो हो, आचार्य विनयमोहन जी से मिल कर आत्म-बल में वृद्धि का अनुभव हुआ।

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एक साथ, क्रमशः आठों प्रश्न-पत्र ( पूर्वार्द्ध-उत्तरार्द्ध के) देने के बाद, अगले दिन अपने घर, उज्जैन लौट आया। विद्यालय की नौकरी और पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के प्रति तीव्र आकर्षण के कारण प्रश्न-पत्रों की पाठ्य-सामग्री का गंभीरतापूर्वक अध्ययन नहीं कर सका। डिंगल, मैथिली, अवधी और ब्रज विभाषाओं का ज्ञान बहुत ही कम था। स्वाध्यायी छात्रों को पढ़ाने-बताने वाला कोई होता नहीं। उन दिनों, साहित्यिक व्याख्या वाली कृतियाँ प्रकाशित ही नहीं हुई थीं। अतः प्राचीन और मध्य-कालीन प्रश्न-पत्रों की तैयारी ढंग से नहीं कर सका। बस, पाठ्य-कवियों के पर्याप्त काव्य-उद्धरण कंठस्थ कर डाले। सोचा, व्याख्या 30 अंकों की पूछी जाती है; आलोचना- भाग अच्छा तैयार कर लिया जाये। लेकिन, जब परीक्षा-भवन में, प्राचीन-काव्य का प्रथम प्रश्न-पत्र सामने आया तो उसे देखते ही पैरों-तले ज़मीन खिसक गयी; माथा पसीने से भर गया! लगा फ़ेल हुआ! हिन्दी का साहित्यकार बना फिरता हूँ और हिन्दी में ही अनुत्तीर्ण होऊंगा। कितनी बदनामी होगी! किसी को मुँह दिखाने क़ाबिल नहीं रहूंगा। हुआ यह कि प्रश्न-पत्र में व्याख्या वाला प्रश्न 70 अंकों का था और शेष आलोचना-भाग 30 अंकों का! पदों की व्याख्या कर ही नहीं सकता था। जो हो, साहस बटोर कर, आलोचनात्मक प्रश्नों के उत्तर लिखने शुरू किए। अनेक काव्य-उद्धरण कंठस्थ थे ही; अतः जम कर लिखता चला गया। काव्य-उद्धरणों के कारण उत्तर-पुस्तिका के पृष्ठ शीघ्र भर गये। पहला घंटा भी नहीं बजा कि मैंने खड़े होकर पूरक उत्तर-पुस्तिका की माँग की। इस पर हॉल के समस्त परीक्षार्थियों और निरीक्षकों ने मुड़ कर; घूम कर मेरी ओर आश्चर्य से देखा! तीन घंटे में, तीन उत्तर-पुस्तिकाएँ लगभग भरीं; किन्तु प्रश्न-पत्र तो 30 अंकों का ही हल किया! व्याख्या अटकल से लिख आया। आगामी प्रश्न-पत्रों के साथ भी ऐसा ही रहा; भले ही मानसिकता भिन्न रही। नागपुर से चलने के पूर्व, आचार्य विनयमोहन शर्मा जी को इस ‘हादसे’ के बारे में बताया था। उन्होंने कहा - ‘‘परीक्षार्थी पाठ्य-पुस्तकें नहीं पढ़ते; मात्र आलोचना-भाग तैयार करके परीक्षा देने चले आते हैं। वे पाठ्यांश भी पढ़ें; इस कारण, इस सत्र से, अंक-विभाजन की पद्धति बदली है।’’ आख़िर, एक दिन परीक्षा-फल घोषित हुआ। उन दिनों मैं आगरा में, अपनी बड़ी बहन के यहाँ गया हुआ था। आचार्य विनयमोहन शर्मा जी को पता दे रखा था। उन्होंने दि. 15 जून 1948 को मुझे, पत्र द्वारा, मेरे परीक्षा में उत्तीर्ण होने की सूचना दी :

. नागपुर

प्रियवर,

मुझे यह सूचित करते हुए अत्यन्त हर्ष हो रहा है कि आप द्वितीय श्रेणी में (एम.ए. परीक्षा में) उत्तीर्ण हो गए। आपका क्रम चौथा है। भ्पहीमत ैमबवदक ब्सें मिला है। शेष आपका पत्र पाने पर।

आशा है, आप प्रसन्न हैं।

आपका : वि.मो.

इस वर्ष, प्रथम श्रेणी कोई परीक्षार्थी नहीं पा सका। प्रावीण्य-सूची में नाम होने के कारण, मेरा नाम भी मध्य-प्रदेश के संबंधित ‘राजपत्र’ में प्रकाशित हुआ। एम.ए. की उपाधि पा लेना उपलब्धि भले ही न मानी जाये; किन्तु इस निमित्त आचार्य विनयमोहन शर्मा जी से निकट से परिचित होना और उनसे व्यक्तिगत संबंध-सूत्रों में बँध जाना, निश्चय ही, महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी-मेरे लिए। विनयमोहन जी से जो संबंध स्थापित हुए; वे अटूट बने रहे। शैक्षिक और साहित्यिक दोनों क्षेत्रों में उनका सहयोग, समय-समय पर, मुझे मिला।

सन् 1948 में, उज्जैन से, ‘सन्ध्या’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन प्रारम्भ किया। आचार्य विनयमोहन जी से भी रचनाएँ आमंत्रित कीं। ‘सन्ध्या’ के मात्र दो अंक निकल सके; क्योंकि प्रकाशक (होम्योपैथ डाक्टर) और खर्च करने की स्थिति में नहीं थे। एम.ए. की उपाधि पा लेने के बाद, ‘ऑल इंडिया रेडियो’ में, सर्विस-हेतु आवेदन किया; बम्बई इण्टरव्यू भी दिया। किन्तु प्रथम चयन प्रभाकर माचवे जी का हुआ। मैं रह गया। एक ही प्रांत मध्य-भारत से, एक ही नगर उज्जैन से, एक ही मुहल्ले माधवनगर से केन्द्रीय सरकार की एक-समान नौकरी में एक-साथ दो व्यक्तियों का चयन करना, सम्भवतः ठीक न समझा गया हो। माचवे जी वरिष्ठ थे। आवेदन-प्रपत्र उन्हें दिखाने गया था। उसे देख कर, बिना मुझे बताये, माचवे जी ने भी आवेदन कर दिया था! क्योंकि वे अपने व्याख्याता-पद से असंतुष्ट थे और उज्जैन से बाहर निकलने जाने के लिए उत्सुक थे। विनयमोहन जी ने अपने पत्र में, इसी पद-चयन का उल्लेख किया है :

. नागपुर

दि. 29-10-1948

प्रियवर,

‘संध्या’ आ गई। उसकी सादगी में चिन्तन-प्रवृत्ति पा कर प्रसन्नता हुई। मैं उसकी उत्तरोत्तर उन्नति चाहता हूँ। लेखशीघ्र भेजूंगा। काश, आपकी नियुक्ति रेडियो स्टेशन में हो जाती।

आपका : वि.मो.

सन् 1949 में, मेरा प्रथम कविता-संग्रह ‘तारों के गीत’ प्रकाशित हुआ। ‘गया प्रसाद एण्ड संस, आगरा’ ने छापा। विनयमोहन जी ने सहज हर्ष व्यक्त किया; अपनी सम्मति भेजी। सन् 1949 में प्रकाशित तो ‘टूटती शृंखलाएँ’ भी हुई; लेकिन प्रकाशक (कारवाँ प्रकाशन, इंदौर) ने बहुत ही कम प्रतियाँ समीक्षार्थ भेजीं।

इधर एम.ए. करने के बाद, मध्य-भारत सरकार ने मुझे एल.टी. करने देवास भेजा-‘शिक्षक प्रशिक्षण शासकीय महाविद्यालय’ में अध्ययन-हेतु। एल.टी. करते ही, ‘आनन्द इंटर महाविद्यालय, धार’ में हिन्दी-व्याख्याता बना दिया गया। महाविद्यालय में पदस्थ हो जाने के कारण, पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त काने की इच्छा उत्पन्न होना स्वाभाविक थी। आचार्य विनयमोहन जी ने भी शोध-कार्य करने-हेतु मुझे उत्साहित किया। अतः विषय-निर्धारण के संदर्भ में मेरा उनसे पत्र-व्यवहार हुआ :

. नागपुर

दि. 3-8-1949


     प्रियवर,

आपकी ‘तारों के गीत’ कविता मिली। बड़ी प्रसन्नता हुई।

- ‘तारों पर नभ ने अभिमान किया’; और मैंने उनके गीतों पर!

बधाई!

आपने प्रेमचंद पर रूपरेखा भेजी है, पर प्रेमचंद पर एक विद्यार्थी कार्य कर रहे हैं। अतएव आप किसी दूसरे विषय पर रूपरेखा तैयार कर भेज दें। ‘मालवा के लोक-साहित्य’ पर क्यों नहीं अनुसंधान करते? आपको किसी पर निर्भर रहने की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी।.शेष फिर।

आपका : वि.मो.

12 मई 1952 को मेरा विवाह सम्पन्न हुआ। ग्वालियर में। कुछ ही साहित्यिक मित्रों को आमंत्रण-पत्र भेजे। आचार्य विनयमोहन जी का आशीर्वाद इन शब्दों में प्राप्त हुआ :

. नागपुर

दि. 5-5-52

प्रियवर,

आपका पत्र मिला। आप जीवन के मधुरतम क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं; इस समय मैं वैदिक ऋषियों का संदेश ही उद्धृत कर सकता हूँ -

‘परमात्म-शक्ति तुम्हारी बुद्धि को जाग्रत करे -

तुम चिर-काल तक मधुमय जीवन व्यतीत करो।’

मेरे सशरीर उपस्थित न रहने पर भी मेरा मन पूर्ण भाव से आप दोनों के प्रतिज्ञा-ग्रहण का साक्षी रहेगा।

शुभाकांक्षी : वि.मो.

सन् 1953 में मेरा तीसरा कविता-संग्रह ‘बदलता युग’ प्रकाशित हुआ। आचार्य विनयमोहन जी मेरे ‘अन्तराल’ (सन् 1954 में प्रकाशित) नामक कविता-संग्रह की भूमिका ‘बदलता युग’ के प्रकाशन-पूर्व लिख चुके थे। यह भूमिका उनकी आलोचना-कृति ‘साहित्य, शोध, समीक्षा’ में भी समाविष्ट है (पृष्ठ 172-176)। चूँकि कविता में नये प्रयोगों के प्रति रुझान शुरू से रहा; इस कारण हिन्दी आलोचना-जगत में, कुछ समय, यह ग़लतफ़हमी पनपती रही कि मैं प्रयोगवादी कवि हूँ। आचार्य विनयमोहन जी ने ‘अन्तराल’ की भूमिका में, प्रयोगशीलता के संदर्भ में, कुछ इस प्रकार लिखा :

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‘‘श्री महेन्द्र भटनागर का हिन्दी-कविता के क्षेत्र में प्रयोगात्मक अभिनव शक्तियों के प्रतिनिधि के रूप में प्रवेश हुआ है।.इसका आशय यह नहीं कि कवि ने अपने लिए वाद का बंधन स्वीकार कर लिया है।.प्रायोगिक रचनाओं में आत्म-परक विचारों के साथ सामंजस्य साधित करने का यत्न किया जाता है। इसमें नूतन प्रतीक, नई कल्पनाओं तथा नव छंदों के द्वारा शैली की अभिनवता प्रदर्शित की जाती है। श्री महेन्द्र भटनागर की अनेक प्रयोगशील कविताएँ ‘अन्तराल’ में संगृहीत हैं। प्रस्तुत कविता में छंद और कल्पना की नूतनता दर्शनीय हो गई है :

घाव पुराने पीड़ा के

जाने-अनजाने में सब के

आज हरे गीले सूजे!

रह-रह कर बह जाती असह लहर

मानों बिजली का तीव्र करंट ठहर

मौन मांस तड़पा देता

नाली के कीड़ों जैसा इधर-उधर!’’

‘वेदना’ शीर्षक कविता से लिया गया यह उद्धरण, डा. गुलाबराय जी ने भी अपनी बहु-पठित प्रसिद्ध कृति ‘काव्य के रूप’ के नये संस्करण में उद्धृत किया; लेकिन, न जाने किसकी लापरवाही से, उद्धरण के अंत में रचनाकार का नाम अर्थात् मेरा नाम मुद्रित होने से रह गया! श्रीमती शचीरानी गुर्टू ने ‘साहित्यिकी’ कृति में मेरे प्रथम कविता-संग्रह ‘तारों के गीत’ के एक गीत ‘ज्योति-केन्द्र’ को प्रयोगवाद-चर्चा में, प्रयोगवादी कविता घोषित करते हुए, उद्धृत किया (लेख-‘प्रयोगवाद’, पृ. 209)

तत्कालीन प्रखर आलोचक श्री रामेश्वर शर्मा ने अपनी आलोचना-पुस्तक ‘राष्ट्रीय स्वाधीनता और प्रगतिशील साहित्य’ में तो एक लेख का शीर्षक ही रखा- ‘प्रयोगवाद और ‘टूटती शृंखलाएँ’। ‘टूटती शृंखलाएँ’ मेरा दूसरा प्रकाशित कविता-संग्रह है। इस लेख में ‘टूटती शृंखलाएँ’ के अनेक प्रयोगों की सोदाहरण व्याख्या की गयी है।

आकाशवाणी-केन्द्र नागपुर से, ‘टूटती शृंखलाएँ’ की समीक्षा प्रसारित करते हुए श्री गजानन माधव मुक्तिबोध ने भी तार-सप्तकीय काव्य-धारा से जोड़ने की चेष्टा की :

‘‘तरुण कवि वर्तमान युग के कष्ट, अंधकार, बाधाएँ, संघर्ष, प्रेरणाएँ और विश्वास लेकर जन्मा है। उसके अनुरूप उसकी काव्य-़शैली भी आधुनिक है। इस तरह वह ‘तार-सप्तक’ के कवियों की परम्परा में आता है, जिन्होंने सर्व-प्रथम हिन्दी-काव्य की छायावादी प्रणाली को त्याग कर नवीन भाव-धारा के साथ-साथ नवीन अभिव्यक्ति शैली को स्वीकृत किया है। इस शैली की यह विशेषता है कि नवीन विषयों को लेने के साथ-ही-साथ नवीन उपकरणों को और नवीन उपमाओं को भी लिया जाता है तथा काव्य को हमारे यथार्थ जीवन से संबंधित कर दिया जाता है। इसे हम वस्तुवादी मनोवैज्ञानिक काव्य कह सकते हैं। भाषा में रवानी, मुक्त छंदों का गीतात्मक वेग और अभिव्यक्ति की सरलता-काव्य-शास्त्रीय शब्दावली में कहा जाए तो माधुर्य और प्रसाद गुण महेन्द्र भटनागर की उत्तरकालीन कविताओं की विशेषता है। किन्तु सबसे बड़ी बात यह है, जो उन्हें पिटे-पिटाए रोमाण्टिक काव्य-पथ से अलग करती है और ‘तार-सप्तक’ के कवियों से जा मिलाती है वह यह है कि अत्याधुनिक काव्य-धारा के साथ टेकनीक और अभिव्यक्ति की दृष्टि से उनका उत्तरकालीन काव्य modernistic या अत्याधुनिकतावादी हो जाता है।’’

श्री गिरिजाकुमार माथुर ने ‘आलोचना’ (जुलाई 1954, पृ. 64) में प्रकाशित अपने लेख ‘नई कविता का भविष्य’ में, कुछ प्रस्तावित सप्तकीय कवियों के क्रम में मेरा नाम भी सम्मिलित कर, इसी प्रकार का संकेत दिया।

डा. जयकिशन खण्डेलवाल की बहु-पठित छात्रोपयोगी कृति ‘हिन्दी साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ में भी प्रयोगवादी काव्य के विवेचन में, जगह-जगह ऐसी सोदाहरण चर्चा उपलब्ध है।

लेकिन ‘बदलता युग’ कविता-संग्रह के अपने ‘आमुख’ में मैंने, इस विषय पर, उत्पन्न भ्रांतियों को समाप्त कर दिया :

‘‘आज की हिन्दी-कविता ‘प्रगति’ और ‘प्रयोग’ के दृष्टिकोणों से देखी जाती है। मैं प्रयोग करता हूँ, यद्यपि प्रस्तुत संग्रह में उनका अभाव है, लेकिन प्रयोग से मेरा अभिप्राय उन प्रयोगवादियों से भिन्न है जो प्रयोग के चामत्कारिक प्रदर्शनों से साहित्य की जनवादी विचार-धारा को दबा रहे हैं। प्रयोगों का सामाजिक संबंध होना अनिवार्य है। प्रगतिशील दृष्टिकोण से जन-जीवन के भावों की अभिव्यक्ति यदि नाना रूपों में की जाती है तो वह एक स्वस्थ और जनवादी परम्परा कही जाएगी। मैं यह देख रहा हूँ हिन्दी के अनेक प्रगतिशील-जनवादी कवियों में आज वह तेज़ी नहीं रही जो पहले थी। उनमें से बहुत से प्रयोग शैली के भँवर में फँसकर जनवादी परम्पराओं से दूर होते जा रहे हैं। उनकी कविताएँ दुरूह, कलाहीन, अप्रभावशाली होती जा रही हैं। मैं जहाँ कविता में नये-नये प्रयोगों का समर्थक हूँ वहाँ दूसरी ओर उसके विचार-पक्ष में प्रगतिशील दर्शन की छाया भी देखना चाहता हूँ; तभी कविता राष्ट्रीय तथा सामाजिक चेतना दे सकेगी; ऐसा मेरा विश्वास है; अन्यथा वह थोड़े-से व्यक्तियों की चीज़ बन कर रह जाएगी और उसका स्रष्टा युगधर्म निभाने में असफल रहेगा।’’

आचार्य विनयमोहन जी ने ‘बदलता युग’ की समीक्षा (‘प्रतिभा’, नागपुर/अप्रैल 1954, पृ. 74 में प्रकाशित) में मेरे उपरिलिखित वक्तव्य को लक्ष्य कर, कुछ शब्द लिखे भी :

‘‘श्री महेन्द्र हिन्दी के प्रसिद्ध कवि हैं; जिनकी रचनाओं में युग का उत्पीड़न और चिन्तन का बाहुल्य होता है। भाषा में स्वच्छता और गति होती है।

‘बदलता युग’ के अपने ‘आमुख’ में, कवि महेन्द्र भटनागर ने, प्रयोगवादी कवियों की प्रवृत्ति की आलोचना कर डाली है। वे प्रयोगवाद को जनवाद का विरोधी तत्त्व समझते हैं। पर, हम ऐसा नहीं मानते।

काव्य में ‘प्रयोग’ किसी ‘वाद’ की भावना तक सीमित नहीं है। काव्य की वस्तु कोई भी हो सकती है। उसकी अभिव्यक्ति में जहाँ अभिनवता दृष्टिगोचर होती है; वहीं ‘प्रयोग’ के दर्शन हो सकते हैं।

काव्य के उत्कर्ष को बढ़ाने, उसे अधिक संवेद्य बनाने के लिए ‘प्रयोग’ का स्वागत है। पर, जहाँ वह केवल ‘प्रयोग’ मात्र है-उक्ति-वैचित्र्य मात्र है-वहाँ उसका प्रयोजन ‘खिलवाड़’ से अधिक नहीं है। ऐसे खिलवाड़ काव्य की आयु नहीं बढ़ाते।

यह सच है, अनेक पत्र-पत्रिकाओं में ‘प्रयोग’ के नाम पर जो छप रहा है; उसमें बाल-चापल्य और कुतूहल ही अधिक है! रसार्द्रता कम या नहीं के बराबर है।

‘बदलता युग’ का कवि सामाजिक चेतना का उपासक है; जिसकी व्याप्ति इस कृति में है। यद्यपि सभी कविताओं में गेयता नहीं है तो भी सभी में शब्द-योजना भावानुरूप है। ‘मिटाते चलो’ शीर्षक कविता की रवानी द्रष्टव्य है :

सदियों के बंधन मिटाते चलो तुम

तम के ये परदे हटाते चलो तुम,

अवरुद्ध राहों के पत्थर सभी ये

निर्झर-सदृश सब उड़ाते चलो तुम!

‘नई नारी’ से उसका कथन है :

तुम हो न सामाजिक, न वैयक्तिक

किसी भी क़ैदख़ाने में विवश,

अब रह न पाएगा

तुम्हारे देह-मन पर

आदमी का वश -

कि जैसे वह तुम्हें रक्खे रहो,

मुख से न अपने

भूल कर भी कुछ कहो!

जग के करोड़ों आज युवकों की तरफ़ से

कह रहा हूँ मैं -

‘तुम्हारा ‘प्रभु’ नहीं हूँ,

हाँ, सखा हूँ!

और तुमको

सिर्फ़ अपने प्यार के सुकुमार बंधन में

हमेशा बाँध रखना चाहता हूँ!

कृति को पढ़ कर, पाठक के समक्ष, बदलते युग का परिदृश्य उपस्थित हो जाता है। देश का समसामयिक इतिहास इसमें चल-चित्र के समान घटित होता दिखाई देता है।’’

श्रीमती शचीरानी गुर्टू ‘हिन्दी के आलोचक’ नामक समीक्षा-कृति का सम्पदन कर रही थीं। वे मेरे और विनयमोहन जी के संबंधों से परचित थीं। अतः उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि मैं ‘आचार्य विनयमोहन शर्मा की आलोचना-शैली’ पर एक लेख उन्हें दूँ। आचार्य जी की समस्त आलोचना-कृतियाँ मेरे पास थीं ही। लेख तैयार करके शीघ्र प्रेषित कर दिया। लेकिन; पुस्तक के प्रकाशन में विलम्ब था। अतः लेख किसी पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेजना उचित समझा। यह लेख जब ‘नई धारा’ (पटना) में प्रकाशित हुआ तो आचार्य विनयमोहन जी ने, अपने स्वभावानुसार, अपनी प्रतिक्रिया, पत्र द्वारा, इस प्रकार व्यक्त की :

. नागपुर

दि. 5-5-54

प्रियवर,

आपके पत्र मिले। ‘नई धारा’ का लेख भी पढ़ा। मुझे ऐसा लगता है कि इन लेखों में लोग प्रचार की ध्वनि न सुनें। मुझे बहुत संकोच लगता है; क्योंकि ऐसे सहानुभूति पूर्ण लिखे गए परिचयात्मक लेखों में अतिरंजन तो होता ही है। ख़ैर, आपकी सद्भावना के लिए धन्यवाद दे कर भी संतोष नहीं होता। क्योंकि शब्द छोटा है और आपकी भावना अथाह है, बहुत विशाल और पवित्र है।

शेष जब आप यहाँ आएंगे।

आपका : वि.मो.

इसमें संदेह नहीं, लेख में महत्त्वांकन है; किन्तु वह तथ्यपरक है-सोदाहरण है। यह लेख ‘हिन्दी के आलोचक’ (प्रकाशक : आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली/1954) में समाविष्ट है। मेरी आलोचना-कृति ‘आधुनिक साहित्य और कला’ (1956) में भी यह लेख संगृहीत है। बाद में, इसे डा. मनमोहन सहगल (पटियाला) ने आचार्य विनय मोहन शर्मा जी की अभिनन्दन-स्मारिका (1978) में प्रकाशित किया।

शोध-कार्य मेरा बड़ी धीमी गति से चला। नौकरी के (महाविद्यालय के) दायित्व और पारिवारिक झंझटों के साथ-साथ रचनात्मक लेखन के प्रति तीव्र झुकाव बराबर बना रहा। शोध-कार्य पिछड़ता गया। प्रेमचंद-साहित्य पर प्रकाशित आलोचनात्मक कृतियाँ भी सुगमता से उपलब्ध न हो सकीं। पंजीकृत शोधार्थियों की सूची में से जब नाम कटने की नौबत आ गयी तब कुछ चेते। जो-जैसा और जितना लिखा, टंकित करवाके प्रस्तुत कर दिया!

कुछ अध्याय, शोध-निर्देशक आचार्य विनयमोहनशर्मा जी को,डाक से अवलोकनार्थ भेजे थे; कुछ उन्हें इंदौर जाकर दिखाये थे; जब वे अपने किसी संबंधी के यहाँ आये और वहाँ ठहरे हुए थे। धार से उज्जैन स्थानान्तरण हो चुका था। अचानक एक दिन, आचार्य विनयमोहन जी का पत्र मिला :

. नागपुर

दि. ..... 1957

प्रियवर,

मुझे यह सूचित करते हुए अत्यन्त हर्ष होता है कि ‘विद्या-परिषद्’ ने आज की बैठक में आपको पी-एच. डी. उपाधि प्रदान करने का निश्चय कर लिया है। मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।

आपको यह जान कर और भी प्रसन्नता होगी कि आपके साथ-साथ मुझे भी अपने ‘मराठी संतों की हिन्दी को देन’ शोध-प्रबन्ध पर ‘परिषद्’ ने पी-एच. डी. की उपाधि देना तय किया है।

इस तरह हम दोनों परीक्षा में साथ-साथ उत्तीर्ण हो गए।

स्नेही : वि. मो.

आचार्य विनयमोहन जी ने अपने शोधपरक लेखों का संग्रह पी-एच. डी. उपाधि हेतु, विश्वविद्यालय में प्रस्तुत कर रखा था; मुझे विदित न था। अतः उनके पी-एच. डी. होने का और वह भी मेरे साथ-साथ, समाचार, मेरे लिए अपूर्व हर्ष का, एक ‘अचानक आश्चर्य’ रहा! मेरे परीक्षक डा. राजपति दीक्षित और डा. इंद्रनाथ मदान थे। डा. राजपति दीक्षित जी के प्रतिवेदन में जब कुछ इस आशय का लिखा पढ़ा कि शोध-प्रबन्ध पर डी. लिट्. की उपाधि दी जाए, इस पर दो मत हो सकते हैं; किन्तु पी-एच. डी. की उपाधि निर्भ्रान्त रूप से प्रदान की जा सकती है-तो मैं चौंका और विनयमोहन जी से इस संबंध में जानना चाहा। पता चला कि मेरा पंजीयन पुराने नियमों के अधीन हुआ था; जिनके अन्तर्गत डी. लिट्. की उपाधि प्राप्त करने के लिए शोधार्थी को पहले पी-एच. डी. होना अनिवार्य नहीं। उच्च-स्तरीय शोध-प्रबन्धों पर परीक्षक सीधे डी. लिट्. की उपाधि प्रदान करने की अभिशंसा कर सकते हैं। काश, यह मुझे पहले पता होता! तो शोध-कार्य के प्रति, शायद, इतनी लापरवाही न बरतता! दौ-सौ पृष्ठ और लिख कर शोध-प्रबन्ध की कलेवर-वृद्धि कर डालता। यहाँ भी, मारे गये गुलफ़ाम!

चूँकि शोध-प्रबन्ध प्रेमचंद पर था, व्यावसायिक दृष्टि से लाभप्रद था; अतः उसे कोई भी प्रकाशक सहर्ष छाप सकता था। श्रीकृष्णचंद्र बेरी जी के प्रकाशन-संस्थान ‘हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय, वाराणसी’ के तत्कालीन सलाहकार श्री सुधाकर पाण्डेय जी मेरी एक आलोचना-कृति ‘आधुनिक साहित्य और कला’ प्रकाशित कर चुके थे। अतः मैंने पहले ‘हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय’ को ही लिखा। बेरी जी ने कृति की प्रति मँगवा ली और तुरन्त पंद्रह प्रतिशत रॉयल्टी पर, सन् 1957 में ही, ‘समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ अभिधान से प्रकाशित कर दी। इसकी लगभग दो-पृष्ठ की भूमिका आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी ने लिखी। बेरी जी ने एक-एक हज़ार के दो संस्करण निकाले। ‘संस्थान’ का बँटवारा हो जाने पर, मेरी कृतियाँ श्री ओमप्रकाश बेरी के हिस्से में चली गयीं। तीसरा संस्करण उन्होंने अपने ‘हिन्दी प्रचारक प्रतिष्ठान’ से प्रकाशित किया। किन्तु, ओमप्रकाश बेरी जी प्रकाशन-व्यवसाय में सफल नहीं हो सके। उनका प्रकाशन बंद हो गया। तीसरे संस्करण की पूरी-पूरी रॉयल्टी भी नहीं मिल सकी। कुछ समय तक कृति बाज़ार में अनुपलब्ध रही।

इसका चौथा संस्करण ‘ज्ञान भारती’ (‘नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली/

सन् 1982) ने साढ़े-बारह प्रतिशत रॉयल्टी पर प्रकाशित किया। रॉयल्टी प्रति वर्ष आ तो रही है; भले ही प्रतियाँ नहीं के बराबर बिकती हों! एक-हज़ार प्रतियों का संस्करण पंद्रह वर्षों में भी नहीं बिका! सब अद्भुत है!! वित्तीय दृष्टि से, इस कृति ने, मुझे लाभान्वित किया हो; ऐसा नहीं-प्रकाशक भले ही लाभान्वित होते रहे हों! उनकी ‘माया’ कौन जान सकता है!

आचार्य विनयमोहन जी ने इस कृति पर जो औपचारिक सम्मति मुझे भेजी वह इस प्रकार है :

. जबलपुर

दि. 30-5-58

प्रियवर,

मैं 20 ता. से 29 तक दिल्ली-आगरा-भोपाल रहा। सहसा जाना पड़ा। इससे सूचना नहीं दे सका। ‘संग्रह’ मिल गए हैं। जुलाई में जब बोर्ड बन जाय तब एक-एक प्रति सभी सदस्यों के पास भिजवा दीजिए। ‘थीसिस’ के संबंध में मैं क्या लिखूं? यह तो मेरी अपनी ही चीज़ है। कदाचित् प्रकाशक के उपयोग के लिए आपको पंक्तियाँ चाहिए। अतः दो-शब्द लिख रहा हूँ :

‘डा. महेन्द्र ने प्रथम बार प्रेमचंद के उपन्यासों में समस्या विशेष की ओर इंगित किया है और इस प्रकार शोध की नई दिशा पर प्रकाश डाला है। विषय का प्रतिपादन सर्वथा वैज्ञानिक और स्पष्ट है। कहीं भी खींचतान नहीं की गई है। हिन्दी में यह कदाचित् सबसे कम पृष्ठों की, पर बड़े महत्त्व की, ‘थीसिस’ है। आशा है, प्रेमचंद के आलोचनात्मक साहित्य में इसका अपना विशिष्ट स्थान होगा।’

शेष कुशल है।


आपका शुभाकांक्षी : वि. मो.

यह सम्मति कृति में कुछ अन्य सम्मतियों के साथ छपी है।

सन् 1956 में ‘नई चेतना’ (अजन्ता प्रकाशन, पटना) नामक कविता-संग्रह का प्रकाशन हुआ। विनयमोहन जी ने इसकी समीक्षा ‘अजन्ता’ मासिक पत्रिका (हैदराबाद) में की; जो डा. विनयमोहन शर्मा जी-द्वारा सम्पादित ‘कवि महेन्द्र भटनागर का रचना-संसार’ (प्रकाशन 1980) में समाविष्ट है। इसका कुछ अंश इस प्रकार है :

‘‘ ‘नई चेतना’ की रचनाएँ गेय-अगेय (पाठ्य) दोनों हैं। पर, उसकी पाठ्य रचनाओं में गीति-तत्त्व न रहने पर भी प्रवाह है। कवि की दृष्टि स्वस्थ है। उसकी भाषा में स्वाभाविकता है, गति है और विचारों में युग के तारुण्य की प्रतिक्रियाएँ। ‘नई चेतना’ में जीवन को उद्बुद्ध करने वाले तत्त्वों की प्रचुरता है।’’

सन् 1959 में प्रेम-गीतों का संग्रह ‘मधुरिमा’ प्रकाश में आया। आचार्य विनयमोहन जी ने अपने दो पत्रों में इसका उल्लेख किया :

. रायगढ़ (म.प्र.)

दि. 20-10-1959


प्रियवर,

आपका पत्र मिला।

मैंने तो उन्हीं पुस्तकों की समीक्षा रेडियो पर प्रसारित की थी जिन्हें उन्होंने भेजा था। तीन पुस्तकों के बाद चौथी का नम्बर ही नहीं आया।

मुझे ‘मधुरिमा’ के गीत सचमुच ‘मधुर’ लगे। उसमें आपकी स्निग्ध भावनाएँ साकार हो उठी हैं।’

यथावकाश कहीं लिखूंगा। यह वर्तमान पद इतना अधिक बहिर्मुखी कार्यों में उलझाए रखता है कि लेखन-पठन के लिए समय ही नहीं मिल पाता। जो कार्य ‘व्याख्याता’ के पद पर रह कर मुझसे हुआ उसका शतांश भी अब नहीं हो पा रहा है। फिर भी वर्षों का स्वभाव कैसे छूटेगा। थोड़ा-बहुत पढ़ता ही हूँ।

उज्जैन के क्या समाचार हैं?

आपका : वि.मो.



. रायगढ़ (म.प्र.)

दि. 26-1-60

प्रियवर महेन्द्र जी,

आपका पत्र आया।.

मुझे नवम्बर तक सेवानिवृत्त होना है। आगे का कार्यक्रम अभी अनिश्चित है।

‘मधुरिमा’ के गीत मुझे बहुत रुचे। उनमें कवि की आत्मा ही जैसे गा रही है।

‘हिन्दुस्तान’ में तो समालोचना छप गई है। किसी ने लिखी है।

आपका : वि.मो.

डा. विनयमोहन शर्मा जी, मध्य-प्रदेश सरकार की महाविद्यालयीन सेवान्तर्गत ‘शासकीय स्नातक महाविद्यालय’ के प्राचार्य-पद से सेवानिवृत्त होकर, ‘केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान, आगरा’ के निदेशक बने। इधर, सन् 1962 में, श्रीकृष्णचंद्र बेरी जी ने, मेरा कविता-संग्रह ‘जिजीविषा’ प्रकाशित किया। इस कृति पर डा. विनयमोहन जी की प्रतिक्रिया इस पत्र में अंकित है :

. आगरा

दि. 11-12-62

प्रियवर,

आपकी नूतन कृति ‘जिजीविषा’ प्राप्त हुई। अनेक धन्यवाद। इसमें आपके गीत और गद्य-गीत दोनों संगृहीत हैं। मुझे गीतों में विशेष रस मिला, क्योंकि मुझे गीत ही अधिक रुचते हैं। आपके गद्य-गीत आधुनिक नई कविता की अभिव्यंजना-शैली के अनुरूप हैं। उनमें कई कल्पनाएँ नूतन हैं और चित्रात्मक भी। मेरी बधाई स्वीकार कीजिए।

श्री नर्मदाप्रसाद ने मेरे पास आपकी कोई कृति नहीं भेजी। कृपया भिजवाइए।

अभी तक केन्द्रीय शासन ने मुझे यहाँ से मुक्त नहीं किया । पता नहीं करता भी है या नहीं। 15 फ़रवरी को मेरा तीन महीने का नोटिस समाप्त हो जायगा। मैंने नियमानुसार तीन महीने का नोटिस दे दिया है।

आपका शुभाकांक्षी : वि.म.

‘केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान, आगरा’ का कार्यकाल समाप्त हो जाने के बाद, डा. विनयमोहन शर्मा जी ‘कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय’ में हिन्दी-प्रोफ़ेसर / अध्यक्ष पद पर नियुक्त हुए। श्री नर्मदाप्रसाद खरे के आग्रह पर, मैंने एक छात्रोपयोगी निबन्ध-संग्रह ‘साहित्यिक निबन्ध’ का सम्पादन किया; जो ‘लोकभारती प्रकाशन’,


जबलपुर से सन् 1963 में प्रकाशित हुआ। इसमें डा. विनयमोहन जी का ‘आधुनिक हिन्दी काव्य में श्रमिक-वर्ग’ नामक निबन्ध समाविष्ट है। प्रकाशन-अनुमति के लिए पत्र भेजा। उत्तर में, पूर्णाधिकार ही उन्होंने मुझे दे दिया :

. कुरुक्षेत्र

दि. 3-12-63

प्रियवर,

सस्नेह। आपका पत्र मिला। आप मेरी पुस्तकों का जो भी उपयोग करना चाहें, कर सकते हैं। संभवतः अगले माह भी आपके प्रांत में जबलपुर जाना पड़े। तब सूचित करूंगा। परामर्शदाताओं की सूची की प्रथा का मैं समर्थक नहीं हूँ। अतः अकारण श्रेय लेना मुझे अच्छा नहीं लगेगा। शेष फिर।

आपका शुभाकांक्षी : वि.मो.

‘साहित्यिक निबन्ध’ की सफलता से प्रभावित हो कर, ग्वालियर के एक प्रकाशक ‘कैलाश पुस्तक सदन’ ने, साहित्यिक और सामान्य निबन्धों के एक और निबन्ध-संग्रह का सम्पादन-दायित्व मुझे सौंपा। इस ‘संग्रह’ में डा. विनयमोहन जी का ‘हिन्दी की सामयिक समस्याएँ’ नामक लेख संगृहीत है। इस ‘संग्रह’ के परामर्शदाताओं में डा. विनयमोहन शर्मा का नाम प्रमुख है। अन्य परामर्शदाता डा. विजयपाल सिंह और डा. भास्करन नायर हैं। यह कृति सन् 1965 में प्रकाशित हुई। विनयमोहन जी का स्वीकृति-पत्र इस प्रकार है :

. कुरुक्षेत्र/दि. 23-3-64

प्रियवर,

आपका पत्र मिला। उस दिन जबलपुर यूनिवर्सिटी के सहसा तार आ जान ेसे मुझे यात्रा रोक देनी पड़ी और खरीदा हुआ टिकट लौटाना पड़ा। मुझे दुःख है कि जबलपुर यूनिवर्सिटी की ढिलाई के कारण आप सबको और मुझे भी परेशानी उठानी पड़ी। अब जबलपुर यूनिवर्सिटी ने 6 अप्रैल ‘64 की तिथि पी-एच.डी. की मौखिक परीक्षा निश्चित की है। अतः मैं 5 अप्रैल को उसी गाड़ी (पंजाब मेल) की जबलपुर बोगी से दिल्ली से रवाना हूंगा और 6 अप्रैल को प्रातः जबलपुर पहुँचूंगा। भाई, अवकाश मिले तो पुनः कष्ट कीजिए। गत दो बार भी इसी तरह जबलपुर यूनिवर्सिटी ने तारीख बदली थी। इसी प्रकार की अनिश्चितता के कारण मैं आपको सूचना देकर कष्ट नहीं दिया चाहता था।

आप जहाँ चाहे नाम दे सकते हैं। शेष भेंट होने पर।

आपका : वि.मो.

विनयमोहन जी दूसरों की असुविधा का कितना ध्यान रखते थे; यह उपर्युक्त पत्र से प्रकट है। इन दिनों मैं ‘शासकीय लक्ष्मीबाई कला-वाणिज्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय’, ग्वालियर में पदस्थ था। महू-मंदसौर स्थानान्तरण से, पुनः मालव-भूमि जा पहुँचा। डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ से समय-समय पर मिलना होता रहा। ‘सेतु प्रकाशन’ (झाँसी) के स्वामी श्री सुमित्रानन्दन गुप्त अपनी ‘कविश्री माला’ प्रकाशन-योजना का संयोजन-भार डा. ‘सुमन’ पर डाल गये। ‘सुमन’ जी ने इस माला में मुझे भी सम्मिलित किया; ‘कविश्री : महेन्द्र भटनागर’ डा.शम्भूनाथ चतुर्वेदी (लखनऊ) द्वारा सम्पादित होकर प्रकाशित हुई। मेरे प्रस्तावानुसार भी, कुछ विद्वानों को ‘कवि श्री’ का सम्पादन-दायित्व ‘सुमन’ जी ने सौंपा। मेरे आग्रह पर, ‘कविश्री : धर्मवीर भारती’ का सम्पादन डा. विनयमोहन शर्मा जी ने स्वीकार कर लिया; किन्तु प्रकाशकीय शिथिलता के कारण कार्य आगे नहीं बढ़ सका। मात्र दस ‘कविश्री’ ही प्रकाशित हुईं :

. कुरुक्षेत्र

दि. 25-1-69

प्रियवर महेंद्र जी,

आपका पत्र मिला। आप ‘कविश्री : धर्मवीर भारती’ के लिए मेरा नाम सुझा सकते हैं। आप मेरे लेख अपने संकलनों में ले सकते हैं। मुझे कोई आपत्ति नहीं है।

यहाँ परीक्षा संबंधी नियम बहुत भिन्न हैं। इस संबंध में फिर लिखूंगा।

मेरा कार्यकाल अप्रैल तक बढ़ गया है।

शेष आनन्द है।

सस्नेह, आपका

शुभाकांक्षी : वि.मो.

महू में, मैं काफ़ी अस्वस्थ रहा। विनयमोहन जी मेरा हौसला सदा बढ़ाते रहे :

. कुरुक्षेत्र

दि. 11-8-69

प्रिय डा. महेन्द्र जी,

सस्नेह। आपका पत्र मिला। आपका स्मरण मुझे सदैव रहता है और रहेगा। स्थानीय परिस्थितिवश बहुत से कार्य जो करना चाहता हूँ, नहीं कर पाता।


आप मुझे चाहे जहाँ रखें, पर समयाभाव से, अधिक सर्जनात्मक कार्य नहीं हो पाता। आदान-प्रदान का विचार मेरे मन में कभी नहीं आता। इससे आप निश्चिन्त रहें। यहाँ पी-एच.डी. परीक्षक-नियुक्ति के नियम बड़े विचित्र हैं। केवल यूनिवर्सिटी प्रोफ़सर तथा रीडर (रिटायर्ड भी) नियुक्त किए जाते हैं।

‘राधाकृष्ण प्रकाशन’ ने उसका गेटअप तो अच्छा तैयार किया है, पर भाषा संबंधी भूलें चिन्त्य हैं। इसी से मैंने उन्हें किसी को आलोचनार्थ न भेजने का निर्देश दिया है। ‘टेक्स्ट-बुक’ के योग्य मैं उसे नहीं समझता। आपकी प्रेमचंद पर पुस्तक एम.ए. के लिए मान्य है। ‘प्रगति’ पर इस वर्ष विचार नहीं हो सकेगा। यहाँ दो वर्ष से पूर्व पाठ्य-क्रम दुहराया नही ंजाता। गत वर्ष ही उसे दुहराया गया है।

आपके स्वास्थ्य में क्या कमी है? आप तो अभी नव युवक हैं। ख़ूब प्रातः-सायं भ्रमण कीजिए और आसन-प्राणायाम भी। भोजन भी सादा करें।

मेरा सेवाकाल पुनः 6 महीने के लिए बढ़ा दिया गया है।

शेष आनन्द है।

आपका शुभाकांक्षी : वि.मो.

‘कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय’ का कार्य-काल समाप्त हो जाने के बाद, विनयमोहन जी अरेरा कॉलोनी, भोपाल-स्थित अपने मकान में रहने आ गये।

प्रकाशकों के व्यवहार से आचार्य विनयमोहन जी भी कोई कम क्षुब्ध न थे। ‘राधाकृष्ण प्रकाशन’ जैसे स्तरीय प्रतिष्ठान ने उनकी कृति को किस रूप में प्रकाशित किया; खेद जनक है। अपने एक पत्र में, मैंने उन्हें प्रकाशकों के संदर्भ में तो लिखा ही; कुछ उनके व्यक्तिगत पक्ष पर भी संकेत कर गया! जब नया मध्य-प्रदेश बना; तब तत्कालीन मुख्य-मंत्री पं. रविशंकर शुक्ल आचार्य विनयमोहन शर्मा जी को नागपुर (महाराष्ट्र) से नये मध्य-प्रदेश में ले आये; अन्यथा वे नागपुर में ही बने रहते। ऐसा विनयमोहन जी ने एक बार बताया था। पं. रविशंकर शुक्ल के बेटों (श्री. श्यामाचरण शुक्ल और श्री. विद्याचरण शुक्ल) ने भी मघ्य-प्रदेश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण सक्रिय भूमिका अदा की। आज भी उनका अपना स्थान है। विनयमोहन जी सेवानिवृत्ति-बाद, ‘ केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान ’, आगरा और ‘कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय’ तो प्रतिनियुक्ति पर गये; किन्तु मध्य-प्रदेश में उन्हें कोई प्रतिष्ठित पद नहीं सौंपा गया। जिसकी अपेक्षा थी। शुक्ल-बन्धुओं ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। तमाम साधारण व्यक्ति सेवानिवृत्ति-बाद विभिन्न सम्मानित पदों पर नियुक्ति पा जाते हैं; किन्तु यशस्वी लेखक व रचनाकार विनयमोहन शर्मा जी के साथ ऐसा नहीं हुआ; जब कि पं. रविशंकर शुक्ल साग्रह उन्हें नये मध्य-प्रदेश में लाये। शासन-द्वारा आचार्य विनयमोहन शर्मा जी की यह उपेक्षा मुझे खलती थी। आचार्य जी के भोपाल आ जाने के बाद, एक बार, मैंने इस विषय को सहज ही छू दिया। लगा; उपेक्षा की पीड़ा आचार्य जी के मन में


है। आत्म-सम्मान प्रिय आचार्य विनयमोहन जी ने कभी किसी की परवा नहीं की और वे अपने बल-बूते पर ही पूर्ण-प्रतिष्ठा से जिए :

. भोपाल

दि. 6-4-76

प्रियवर महेन्द्र जी,

आपका पत्र मिला। ‘सेतु प्रकाशन’ तो व्यापारी संस्था है। जो उनके व्यापार में सहायक होता है, उसी की ओर उनकी दृष्टि रहती है और उसी को तुष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। ‘पूर्वोदय प्रकाशन’ की भी यही दृष्टि है। श्री प्रदीप इंदौर जाया करते हैं और कभी-कभी भोपाल भी आ जाते हैं और मुझसे मिल लेते हैं। मैं उनसे आपके प्रस्ताव की चर्चा करूंगा। पर, उन्हें मंज़ूर होगा या नहीं कहा नहीं जा सकता। क्योंकि मैं ‘कुर्सी’ पर नहीं हूँ और न कहीं उनकी सहायता करने में सक्षम हूँ। संसार की गति यही है - इस हाथ दे, उस हाथ ले। जिनके पास देने को कुछ नहीं है उसके पास कोई क्यों आकर अपना अमूल्य समय नष्ट करेगा? मैं यहाँ लगभग छह साल से हूँ। मैंने किसी ‘कुर्सीधारी’ से सम्पर्क नहीं बनाया। मंत्रियों से तो क़तई नहीं। यदि सम्पर्क बढ़ाता तो कहीं-न-कहीं शासकीय ‘आसन’ को प्राप्त करना आसान होता। पर, परमात्मा ने जो कुछ बनाया - दिया है वही बहुत है - संतुष्ट हूँ। यदि कोई बुलाता है तो जाता हूँ; अन्यथा अपने घर में ही पढ़ता-लिखता हूँ। ‘जिनका’ आपने उल्लेख किया है उनके परिवार को जानते हुए भी ‘निकट’ नहीं जाता - उन्हें न बुलाने की ज़रूरत है और न मुझे उनकी प्रतीक्षा रहती है।

अपने विश्वविद्यालयीन जीवन में ‘टेक्स्ट बुक’ लेखन का लोभ नहीं किया। आप नागपुर और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालयों के हिन्दी-विभाग के पाठ्य-क्रम देख डालिए। न कहीं आदन-प्रदान का क्रम रखा। इससे मन में बड़ी शांति रही। अब 71 वर्ष की देहली छू ली है। बस, आप जैसे स्नेही मित्रों के स्नेह की अनुभूति से सुख मिलता रहता है।

मैं भी चाहता हूँ, आप यूनिवर्सिटी में कहीं जम जाएँ। यदि कहीं मेरा उपयोग हो सकेगा तो मुझे आत्म-तोष होगा। इति।

आपका शुभाकांक्षी : वि.मो.

सन् 1977 में मेरा बारहवाँ कविता-संग्रह ‘संकल्प’ प्रकाशित हुआ। इसके पूर्व ‘संतरण’ (1963) और ‘संवर्त’ (1972) निकल चुके थे। इन कृतियों पर विनयमोहन जी के प्रतिक्रिया-पत्र उपलब्ध नही हैं। ‘संकल्प’ पर उन्होंने अपना अभिमत इस प्रकार प्रेषित किया :


. भोपाल

दि. 1-4-77

प्रियवर महेन्द्र जी,

सस्नेह नमस्ते। आपका पत्र तथा काव्य-कृति प्राप्त हुए।

आप अभी भी अपने कवि को जीवित रखे हुए हैं और समय की आवाज़ को मुखरित करते जा रहे हैं। आपकी कविताएँ दिमाग़ में खरोंच नहीं पैदा करतीं, वे सीधे ही भीतर प्रवेश कर जाती हैं। आप आत्म-निष्ठ और बहिर सृष्टि को साथ-साथ अपने में सँजो लेते हैं। इस संग्रह में तो वर्तमान आक्रोश सामाजिक ही नहीं, राजकीय घटनाओं के प्रति भी व्यक्त हुआ है।

‘सेतु प्रकाशन’ की गति विचित्र जान पड़ती है। मेरा उनसे कोई प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं है। पता नहीं, वे कब संग्रह प्रकाशित करेंगे।

कभी भोपाल आना हो तो अवश्य मिलें। मैं तो यहाँ बहुत दूर रहता हूँ। दूरी के कारण,शहर आदि स्थलों के साहित्यिक कार्यक्रमों में बहुत कम शामिल हो पाता हूँ। कार्यक्रम प्रायः रात को होते हैं; अतः आने-जाने में कष्ट होता है।

शेष सब पूर्ववत्। अपने समाचार देते रहें।

आपका शुभाकांक्षी : वि.मो.

सन् 1977 में, मेरे ‘ताशकंद विश्वविद्यालय’ में दो वर्ष के लिए प्रतिनियुक्ति पर जाने की बात चली। पूछताछ के लिए, मैंने डा. विनयमोहन शर्मा जी का नाम निर्देशित किया था। पर, ऐसी कोई छानबीन नहीं हुई और मेरा चयन हो गया। ताशकंद- प्रसंग स्वयं में बडा रोचक है; जिसे मैंने ‘आत्म-कथ्य’ में दर्ज़ कर दिया है। विनयमोहन जी को, होने वाली इस प्रतिनियुक्ति की सूचना दे देना ज़रूरी था। इस पत्र में उनका पारिवारिक परिचय भी जानना चाहा; सहज जिज्ञासावश :

. भोपाल

दि. 7-9-77

प्रियवर महेंद्र भटनागर जी,

आपका पत्र मिला।

यदि USR की एम्बेसी से कोई पूछताछ हुई तो मैं सहर्ष अनुशंसात्मक पत्र लिखूंगा। अच्छा है, विदेश यात्रा भी एक अतिरिक्त योग्यता मानी जाती है। सरकारी तंत्र अपना ही मार्ग ग्रहण करता है। नए-पुराने चेहरे विशेष परिस्थितियों में ही अभिलषित कार्य कर पाते हैं। यदि ‘परिचय’ काम आए तो प्रयोग कर देखिए ।

अभी तो जीवन-यात्रा चल रही है। अतः जीवन-परिचय कैसा! मेरी चार संतति हैं। ज्येष्ठ पुत्र डा. श्रीशचंद्र तिवारी उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति-विज्ञान में रीडर; जबलपुर विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर-पद पर चयन हो गया है, पर अभी नियुक्ति-पत्र नहीं मिला। छोटा पुत्र भूगर्भ-शास्त्री है। वह आंध्र-प्रदेश में ताम.. में कार्यरत है। उसका नाम रश्मिकांत है। ज्येष्ठ पुत्री प्रमोदिनी है-पति श्री रमेशचंद्र तिवारी संभागीय यंत्री (MPEB) है और ...... में है। छोटी कन्या अनीता है-पति डा. गिरीशचंद्र हैं, जो सीनियर साहित्यिक अधिकारी हैं।

शेष सब कुशल है।

आपका : वि.मो.

इन दिनों मैं ‘शासकीय महाविद्यालय’, मंदसौर में हिन्दी स्नातकोत्तर अध्ययन एवं शोध-विभाग का अध्यक्ष था। (24 नवम्बर 1969 से 30 जून 1978 तक)। सत्र 1969-1970 में ही, आचार्य विनयमोहन शर्मा जी के साहित्य पर, एम.ए. उत्तरार्द्ध की एक विदुषी छात्रा कुमारी चंद्रकला विद्याार्थी से लगभग एक-सौ पृष्ठों का स्तरीय लघु शोध-प्रबन्ध तैयार करवाया था (‘आचार्य विनयमोहन शर्मा के साहित्य का अनुशीलन’)। इसके प्र्रथम अध्याय में आचार्य जी का संक्षिप्त जीवन-परिचय दिया गया है; किन्तु पारिवारिक परिचय नहीं। खेद है, यह कृति आज-तक प्रकाशित नहीं हो सकी।

1 जुलाई 1978 को ‘कमलाराजा कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय’, ग्वालियर स्थानान्तरित होकर आ गया। ‘जीवाजी विश्वविद्यालय’ का वरिष्ठतम हिन्दी-प्रोफ़ेसर होने के कारण, ‘मध्य-प्रदेश साहित्य परिषद्, भोपाल’ एवं ‘जीवाजी विश्वविद्यालय’ के संयुक्त तत्वावधान में, ग्वालियर में, आयोजित ‘युवा लेखक शिविर’ (दि. 16 और

17 मार्च 1980) का संयोजन-दायित्व मुझे सौंपा गया। यह ‘शिविर’ मात्र जीवाजी विश्वविद्यालय-क्षेत्राधिकार में स्थित महाविद्यालयों के छात्र-रचनाकारों के लिए आयोजित था। आचार्य विनयमोहन शर्मा जी ने इस ‘शिविर’ का उद्घाटन ही नहीं किया; अपना शोधपरक आलेख भी पढ़ा। इस ‘शिविर’ में डा. विद्यानिवास मिश्र, श्री हरिहरनिवास द्विवेदी, डा. ललित शुक्ल, डा. गोविन्द ‘रजनीश’, डा. कमला प्रसाद पाण्डेय प्रभृति विद्वानों ने भी भाग लिया। इस अवसर पर पढ़े गये आलेख ‘संवाद’ नामक पुस्तिका में संगृहीत हैं।

सन् 1980 में ही, आचार्य विनयमोहन शर्मा जी द्वारा सम्पादित समीक्षा-पुस्तक ‘कवि महेंद्रभटनागर का रचना-संसार’, श्री सतीश जमाली ने अपने प्रकाशन-प्रतिष्ठान ‘चित्रलेखा प्रकाशन’, इलाहाबाद से प्रकाशित की। ‘आमुख’ इसलिए महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि यह मेरी बारह काव्य-कृतियों के प्रकाशन-बाद लिखा गया है :

‘‘कवि महेन्द्र भटनागर की काव्य-कृतियों के मूल्यांकन का यह संग्रह है। व्यक्ति महेन्द्र मेरे इतने नज़दीक है कि मैं ‘कवि महेन्द्र’ को पूरी तरह देख नहीं पाता-मूल्यांकन करना तो और भी दुष्कर व्यापार है। निकट की वस्तु की अपेक्षा दूर की वस्तु बहुत साफ़ दिखाई देती है और उसकी ‘नाप-जोख’ भी सरल हो जाती है; शुद्ध भले ही न हो। जिस समय बारह वर्ष के बालक ने गुनगुनाना प्रारम्भ किया होगा उस समय वह यह नहीं जान पाया होगा कि वह कविता गा रहा है-वर्षों की दूरी ने ही उसे अपने में ‘कवि’ होने का भान कराया है। उसने इतनी लम्बी अवधि में कविताओं का अम्बार लगा दिया होगा, पर पुस्तक के रूप में अभी उनकी संख्या बारह है। उनके शीर्षक हैं-‘तारों के गीत’, ‘विहान’, ‘अभियान’, ‘अन्तराल’, ‘टूटती शृंखलाएँ’, ‘बदलता युग’, ‘नई चेतना’, ‘मधुरिमा’, ‘जिजीविषा’, ‘संतरण’, ‘संवर्त’ और ‘संकल्प’। वातावरण कवि का निर्माण करता है और कवि वातावरण का। महेन्द्र का कवि सृजन की दोनों प्रक्रियाओं से गुज़रा है। सबलगढ़ के जंगल और घास के मैदान जब उसकी आँखों में चलचित्र के समान झूम उठे तब उसका सोया कवि जाग उठा था। और जब देश में स्वातंत्र्य-युद्ध धधक रहा था, वह वनों से हट कर जनसंकुल समाज में आ खड़ा हुआ। उसकी पीड़ा और अभाव ने उसे कुरेदना प्रारम्भ किया। देश और मानवता के प्रेम ने उसे कविता के उस ‘वाद’ के निकट ला दिया जो हिन्दी में प्रगतिवाद के नाम से प्रचारित था। यद्यपि जहाँ तक मेरी जानकारी है, महेन्द्र किसी वाद के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं। उनकी प्रतिबद्धता अपने प्रति-अपने अनुभूत सत्य के प्रति-है। इसी से उन्हें किसी खेमे के खूँटे से नहीं बाँधा जा सकता। उन्होंने अपनी आँखों से अपने ही प्रांत में जनता की ग़रीबी-बेबसी को देखा था। उसे अनाज के अभाव से भूख-विह्वल देखा था। इन दृश्यों ने समाज की व्यवस्था के प्रति उनमें विद्रोह भर दिया, जिसका विस्फोट उनकी अनेक कविताओं में देखा जा सकता है। सामाजिक अन्याय के प्रति कवि की अभिव्यक्ति काल्पनिक नहीं है। उसने भोगी हुई ज़िन्दगी को शब्द प्रदान किए हैं। पर, शब्द कवि की अनुभूति को पूर्ण रूप नहीं दे पाते। उसका आभास मात्र देकर रह जाते हैं। इसलिए कवि को आज के जीवन को मुखर बनाने के लिए ऐसे शब्दों की खोज की चिन्ता रहती है जो उसके भावों को ईमानदारी के साथ अर्थ दे सकें। शब्दों की इस असफलता के कारण कवि को शब्दों में नये अर्थ भरने को विवश होना पड़ता है। वह उनका प्रतीकों के रूप में प्रयोग करने लगता है। ‘महेंद्र’ कवि को भी यह कार्य करना पड़ा है। पर, ऐसा करते समय उसने यह भी ध्यान रखा है कि सम्प्रेषणीयता खटाई में न पड़ जाए। यद्यपि वर्तमान कवि सम्प्रेषणीयता को आवश्यक नहीं मानता। इसका परिणाम यह हुआ है कि उसकी कविता केवल उन्हीं के लिए आत्म-विलास का साधन बन कर रह गयी है।

कवि महेंद्र भटनागर की कविता में अद्यतन युग का स्वर है। नवीनता है, पर उसमें ‘नयी कविता’ का वह ‘वाद’ नहीं है जो अमर्यादित विकारों का भोंडापन प्रदर्शन करने में आधुनिकता-बोध का सगर्व विज्ञापन करता है।। यह गर्व की बात है कि उनकी अनेक रचनाओं का विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है।’’

डा. विनयमोहन शर्मा जी से मुलाक़ातें कम ही हुईं। प्रथम बार नागपुर में मिलने के बाद, फिर इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर और भोपाल में मिलना हुआ। इंदौर में, शोध-प्रबन्ध के अध्याय दिखाने गया था; जब वे अपने किसी संबंधी के यहाँ आये हुए थे। तब उन्हें इंदौर के एकाधिक दर्शनीय स्थान दिखाये; ‘नव प्रभात’ कार्यालय भी ले गया। तत्कालीन सम्पादक मित्र थे। कार्यालय में विनयमोहन जी का स्वागत-सत्कार हुआ। उनकी दोनों बेटियाँ भी उनके साथ थीं। इंदौर के सूचना-विभाग से वाहन उपलब्ध हो गया था। स्वच्छ धवल खादी की वेशभूषा में विनयमोहन जी का व्यक्तित्व बड़ा भव्य लगता था। ‘माधव महाविद्यालय’, उज्जैन के कार्यक्रम में भाग लेने जिस दिन वे आये, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद साहब का निधन हो गया था। अतः कार्यक्रम निरस्त करना पड़ा। उस रोज़ उज्जैन के अनेक ऐतिहासिक स्थान उन्हें दिखाये। ग्वालियर में, अपने महाविद्यालय ‘महारानी लक्ष्मीबाई कला-वाणिज्य महाविद्यालय’ में, उनका भाषण रखा। वार्धक्य से प्रभावित होते हुए भी एकाधिक बार ग्वालियर पुनः आये - पी-एच, डी. के शोध-छात्र की मौखिकी लेने; ‘युवा लेखक शिविर’ का उद्घाटन करने। एक बार, मैं उनसे मिलने, उनके अरेरा कॉलोनी-स्थित आवास पर भोपाल गया। आँगन पार करके, एक छोटे कमरे में, तख़्त पर, उनके पास बैठ कर अनेक बातें कीं। चना-चबेना (विनयमोहन जी के शब्दों में) खाया। वे बड़े सादगी-पसंद थे। परहेज़ रखते थे। नींबू का सेवन बहुत करते थे। उन जैसा आत्मीयतापूर्ण व्यवहार रखने वाले दुनिया में बहुत कम हैं। उनसे मेरे संबंध रहे; इसका मुझे गर्व है।

उन्हें आज फिर सादर प्रणाम!

.


(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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रचनाकार: साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग - 12 // डॉ. महेन्द्र भटनागर
साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग - 12 // डॉ. महेन्द्र भटनागर
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