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भारतेन्दु हरिशचन्द्र – समसामयिक नाटककार (“अंधेर नगरी” के परिप्रेक्ष में) – डा. रानू मुखर्जी

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भारतेन्दुजी अपने ही युग के निर्माता नहीं थे, समकालीन साहित्य के लिए भी एक अप्रतिम उदाहरण और आदर्श है. देश काल की सीमा से परे उनका साहित्य, साहित्य के द्वारा मनुष्य को जानने, देश के चरित्र और संस्कॄति की पहचान करने – कराने का माध्यम है. आलोचकों ने अगर कबीर को पहला युगप्रवर्तक कहा है तो उन्हें दूसरा, क्योंकि दोनों में ही अपने को मर मिटाने की भावना, क्रान्ति की चेतना और अपने ही वर्ग और वातावरण को, विदेशी सत्ता को भी और उसके साथ साथ स्वयं अपने देशवासियों की मानसिकता को बेबाक ढंग से कह देने की जिन्दादिली और निर्भीकता थी.

इस प्रकार से भरतेन्दुजी के लिए साहित्य एक जरिया था और एक पूरा आन्दोलन था स्वाधीनता आन्दोलन, भाषा आन्दोलन, सांस्कृतिक आन्दोलन, साहित्यिक आन्दोलन, सामाजिक आन्दोलन, धार्मिक आन्दोलन, रंगमंच आन्दोलन.

इसलिए बालमुकुन्द गुप्त जी ने उनके लेखन को तेज, तीखा बेधड़क लेखन कहा और समीक्षक डो. रामविलास शर्मा जी ने उन्हें हिन्दी नवजागरण और प्रगतिशील चेतना से जोड़ा है. वस्तुतः भरतेन्दुजी ने छुआछूत, विधवा-विवाह, अनमेल विवाह, नारी व्यक्तित्व आदी विषयों पर खुलकर लिखा, बल्कि प्रेमचन्द्र और निराला की भाती पुरानी घिसी-पिटी मान्यताओं को सडीगली धारणाओं को और पिछड़ेपान को आलोचनात्मक दृष्टि से देखना सिखाया. जनता के सुखदुःख, उनकी निरक्षरता, निर्धनता और उनके मनोरंजन सभी तत्वों के प्रति वो सजग थे और जनसाधारण में अति लोकप्रिय थे. वह जनता के हितैषी थे और उनके लेखक - अभिनेता रुप को जनता पहचानती थी. साहित्य और जनता का यह निकट का संबंध समकालीन साहित्य को एक दिशा दिखाता है.

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भारतेन्दु जी ने हिन्दी की कई विधाओं में से आलोचना की भी नींव डाली है. उनका “नाटक” एक प्रकार से नाट्यक्षेत्र में हिन्दी-आलोचना का महत्वपूर्ण दस्तावेज कहा जा सकता है. इस रचना में लेखक ने अपने अध्ययन, अनुभव, चिन्तन और अपनी उन्मुक्त विचारधारा को व्यक्त किया है. नाट्यरचना के संदर्भ में उनका कहना है, “मनुष्य की परिवर्तनशील स्वभाव को ध्यान में रखकर नाटक लिखे”.

अपनी बहुमुखी व्यक्तित्व के साथ भरतेन्दुजी ने नाट्यरचना के क्षेत्र में अपनी अद्भुत रचनाशीलता का परिचय दिया, नाटक उनकी प्रमुख विधा लगती थी केवल इसलिए नहीं की वे एक अभिनेता एवं निर्देशक थे बल्कि इसलिए भी कि क्रान्ति और नवजागरण, संस्कार और सुधार की नजर से जनता के लिए वह नाटक को सबसे सशक्त माध्यम समझते थे. दॄश्यकाव्य और साक्षात्कार होने के कारण उसकी प्रभावशीलता बढ जाती है उन्होंने प्रचुर नाट्य साहित्य की रचना की जो मौलिक भी है और अनूदित भी, सामाजिक, ऐतिहासिक, पौराणिक विविध विषयों को लेकर उन्होंने अपनी आधुनिक विचारधारा को ही व्यक्त किया हे.

उनकी नांट्य रचनाए -

वैदिकी हिंसा – हिंसा न भवति , प्रेमजोगिनी, विषम्य विषमौषधम , चन्द्रावली, भारत- दुदर्शा, नीलदेवी, अंधेर-नगरी, सती-प्रताप, विद्यासुन्दर (बांग्ला से रुपंतरित), सत्य हरिश्चन्द्र (संस्क्रृत से रुपान्तरित) इसके साथ ही अनूदित नाटकों की भी एक लंबी माला है.

भारतेन्दुजी ने बडी तीव्रता के साथ नाट्य की कलागत विशेषताओं को पुरी तरह समझा ही नहीं, उसके लिए सामूहिक और योजनाबद्ध ढंग से एक संपूर्ण आन्दोलन की तरह काम किया. मंडली की स्थापना करके अभिनेता और निर्देशक के रुप में उनकी सक्रियता इसे प्रमाण करती है. भारतेन्दुजी अपने युग की भारतीयता और आधुनिकता -दोनों संदर्भों में नाटक और रंगमंच की प्रकृति, नाट्य भाषा, लोक जीवन और लोकगीतों की सरसता के प्रति जागरूक थे हिन्दी के अपने नाट्यशास्त्र, नाट्य समीक्षक के मानदंडो के प्रति वे सतर्क थे. उनके सामने बहुत से प्रश्न एक साथ थे- नाट्यलेखन, अनुवाद, प्रदर्शन, राष्ट्रीय चेतना का विकास, लोक रुचि का परिष्कार फारसी थियेटर के विरुद्ध लडाई. वह निरंतर थियेटराना जगत से अलग नई नाट्य-परंपरा, भिन्न नाट्यशिल्प और हिन्दी रंगमंच की स्वतंत्र विकास परंपरा के प्रति संघर्षशील रहे. जनजीवन में गहरी पैंठ, सतर्क दृष्टि और संवेदनशीलता ने भारतेन्दु के नाटकों में ऐसी नाट्यभाषा और तिलमिला देनेवाले व्यंग्य को जन्म दिया जो लोकमानस से टकराने की शक्ति रखती थी. भारतेन्दुजी के पास विलक्षण रंग व्यक्तित्व, अद्भुत संवेदनशीलता और संगठनशक्ति थी. संकेतिकता, प्रतीक, लोकतत्व, संगीत, लय, व्यंग्य -आज के नाटक के सारे पक्ष उनके नाटक में मौजूद है.

अपने युग में भी नाट्यविधा और उसकी रंगमंचीयता को जितनी दृढ़ता के साथ भारतेन्दुजी ने पहचाना और उसे उदाहरण के रुप में प्रस्तुत किया वैसा शायद ही किसी अन्य नाटककार ने किया है. वह मानते थे कि “कला वास्तविक उन्नति का आधार है.” लेकिन इससे भी चिंतित थे कि हिन्दी का कोई रंगमंच नहीं है. अभिनेता, निर्देशक, अनुवादक, नाट्य समीक्षक के रुप में उन्होंने अपने प्रतिनिधि मंडल के साथ संगठित कार्य आरम्भ किया. उनके अभिनय रुप से उनके व्यक्तित्व की नाटकीयता से जनसमूह परिचित था.

“जानकी मंगल” नाटक में १८६८ ई. में बनारस में अभिनय किया और उस थियेटर में लक्ष्मण की भूमिका मे अभिनीत करके अपनी अभिनय प्रतिमा का प्रदर्शन किया. “नीलदेवी” नाटक में उन्होने पागल की चुनौतीपूर्ण भूमिका की थी. “सत्य-हरिश्चन्द्र” नाटक में हरिश्चन्द्र के रुप में स्वयं उनको देखकर जनता गदगद हो उठी थी वे प्रायः “स्वांग” भी किया करते थे.

नाटक के उद्देश्य की चर्चा करते हुए उन्होने पांच उद्देश्य बताए है – (१) हास्य, (२) श्रृंगार, (३) कौतुक, (४) समाज संस्कार और (५) देशवत्सलता. उस युग के बालकृश्ण भट्टजी का भी विश्वास था कि नाटक में केवल क्षणिक मनोरंजन ही नहीं देशोन्नति का भी कुछ उपदेश होना चाहिये. सामाजिक सुधार के साथ साथ किशोरीलाल गोस्वामी, अम्बिकादत्त व्यास, काशीनाथ खत्री ने भी मनोरंजन और उपदेश दोनों पक्षों को महत्व दिया. भारतेन्दुजी के “सत्य हरिश्चंद्र” नाटक में सत्यवादिता, कर्तव्यपरायणता, चारित्रिक दृढ़ता जैसे मूल्यों के साथ साथ युवा वर्ग के लिये उपयोगी आदर्श भी थे. “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवती” में सामाजिक, धार्मिक विकृतियों पर क्रूर व्यंग्य है,” विषम्य विषमौसधम” में अंग्रेजों की चतुर शोषण प्रणाली और भारतीयों की मोहाशक्त स्थिति का चित्रण है. “कोउ नृप होउ हमें का होनी” “नीलदेवी” में जहां राजपूतानी आन बान है वहीं नारी व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा भी है. “भारत दुर्दशा” और “भारत-जननी” नाटक नवजागरण सजगता समसामयिक परिस्थितियों का चित्रण और विदेशी शासन की दासता के चुंगल में फंसे भारतीयता और राष्ट्रियता की भावना को जगाने वाले नाटक है. “प्रेमजोगिनी” में काशी के धर्माड्म्बर का चित्र है तो “चन्द्रवली” उनकी वैष्णव भक्ति और प्रेम तत्व की प्रतीक है. “मुद्राराक्षस” का अनुवाद इसलिये किया क्योंकि इसमें चाणक्य जैसा एक ऐसा पात्र है जो कि झूठी नैतिकता को नहीं दोहराता है मनुष्यता को ही आधार बनाता है. “विषस्य विषमौषधम” केवल मात्र- एक पात्रीय नाटक है लेकिन उसमें भावों, के स्वर के इतने उतार-चढाव हैं, मुहावरे, किस्सागोई, चुटकुले, संस्कृत- उर्दू के रोचक प्रयोग, दोहे चौपाई की आर्कषक व्यंजना और अभिनय की लयात्मकता, रवानी इतनी अधिक है कि एक पात्रीय नाटक भी दर्शकगण को चमत्कृत कर देता है. “हमहुं कहब अब ठकुर सुहाती” “हमें तो गद्दी से काम है- कोई तडपे होउ हमैं का हानी” जैसे बेधड़क, सांकेतिक खरी आलोचना से भरे रोचक प्रसंगों से नाटक भरा पडा है. “अंधेर नगरी” इसी प्रकार के जीवंत रचना कौशल का प्रमाण है.

कुछ रचनाएं समय के साथ साथ कभी पुरानी नहीं होती है. अपितु बदलते परिवेश बदलती परिस्थितियों में नए-नए अर्थों में प्रतिबिम्बित होती है. “अंधेर नगरी” नाटक हर काल, हर स्थान से जुड़ता है और जुड़कर अपना नया सौंदर्य प्रदर्शित करता है. कहने को तो “अंधेर नगरी” एक प्रहसन है लेकिन इसमें समसामयिकता और आधुनिक रंग चेतना का इतना गहरा समावेश है कि इसने विख्यात नाटकों में अपना स्थान बना लिया है.

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१८८१ ई. में लिखा गया यह नाटक किसी जमींदार को आधार बनाकर नेशनल थियेटर के एक ही बैठक में लिखा गया था. एक ही रात में भारतेन्दुजी ने एक लोकोक्ति “अंधेर नगरी चौपट्ट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा” को इतना व्यंग्यात्मक, सार्वजनीन, सार्वलोकिक और सृजनात्मक अर्थ दे दिया. आरंभ मे इसकी प्रस्तुति को भले ही प्रहसन के रुप में लिया गया है परंतु बाद की प्रस्तुतिओं में आधुनिक रंगकर्मियों ने इसे अपने देश की बदलती परिस्थितियों, क्रियाओं, चरित्रों, मूल्यहीनता और खोखलेपन को देखना शुरु किया और तब इस नाटक की महत्ता और अधिक बढ गई.

“अंधेर नगरी” का कथानक बहुत बडा या गम्भीर नहीं है जो है वो एक दृष्टान्त की तरह सामने आया है. महन्त अपने दो शिष्यों – गोवर्धन और नारायणदास – के साथ भजन गाते हुए प्रवेश करते है और लोभी बृत्ति से बचे रहने का उपदेश देकर बडे दिखनेवाले सुन्दर नगर में दोनों को भिक्षा लेने भेजते हैं. इसके बाद ही अगला दृश्य बाजार का आता है. जहां हर दुकानदार अपने अपने सामान की आवाज लगाता सामान बेच रहा है. यह दृश्य ही इस नाटक का प्राण है, क्योंकि यहां पूरा विश्व है, पूरा देश है, पूरा इतिहास है, अंग्रेजियत और भारतीयता तो है ही. इस बाजार के मोह जाल में जब गोवर्धन प्रवेश करता है तो हर चिज टके सेर दिखती है. उसे लगता है “बडा आनंद है, हर चीज टके सेर है.” और भरपूर मिठाई खाता है. और गाता नाचता जंगल पहुंचता है. मंहतजी उसे समझाते हैं कि “ऐसी नगरी में रहना उचित नहीं”. पर वह लोभवश वह वहीं रहना चाहता है. चौथा दृश्य राजा मंत्री और उनके दरबार का है जहां राजा का मदिरा-पान, मूर्खता, मंत्री की चमचागीरी, नौकरों का सेवाभाव, फरियादी का आकर अपनी फरियाद सुनाना और फिर राजा द्वारा एक एक अपराधी को दरबार में बुलाकर मूर्खता भरे प्रश्न करना और कोतवाल को फांसी की सजा देकर दरबार बरखास्त करने का चित्रण है. सब चले जाते है फरियादी कि फरियाद वही की वही रह जाती है कि मेरी बकरी दीवार के नीचे दबकर मर गई. पांचवा दृश्य जंगल में गाते आते गोवर्धनदास का है जो लोभवश मोटा हो गया है. इतने में फांसी के फंदे के आकार के अनुसार किसी मोटे आदमी को तलाश के आदेश में राजा के सिपाही उसे जबरदस्ती पकड़कर ले जाते हैं. वो रोता चिल्लाता और गुरुजी के आदेश को न मानते पर पश्चाताप करता रह जाता है. अंतिम दृश्य श्मशान का है जहां फांसी पर चढाये जाने की तैयारी है लेकिन महंतजी की इस उक्ति से कि “इस समय ऐसा शुभ समय है कि जो मरेगा सीधा बैकुंठ में जाएगा.” लोगों में प्रतियोगिता सी होने लगती है कि हम फांसी पर चढ़ेंगे. अंततः राजा स्वयं अपने को फांसी पर चढाये जाने का आदेश देता है और महंत कहते हैं.

“जहां न धर्म न बुधी नाही, नीति ना सुजान समाज.

ते ऐस हिं आपुहिं नसे, जैसे चोपट राज”.

यह ऊपर से हास्य प्रधान दिखने वाला नाटक वस्तुतः तीखी व्यंग्यपूर्ण रचना है. मुख्य बात तो यह है कि भारतेन्दुजी का व्यंग्य बहुत कटु, और उतना प्रत्यक्ष नहीं है, जो हंसता है वह तिलमिलाता है. इस नाटक में सामंती व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था की भ्रष्टाचारिता, सत्ता के विवेकहीनता, शिथिलता जड़ता, सत्ताधारी मानसिकता, उसकी निरंकुशता, निरीह जनता को लम्बे समय तक उलझाते और ठगने की प्रवृत्ति आज के युग में मूल्यों की विकृति और विसंगति को चित्रित किया गया है. इसके केन्द्र बिन्दु लोभवृत्ति और चौपट राजा की परिणति. लेकिन नाटक का मुल स्वर प्रचलित अराजकता, मूल्यहीनता अमानवीय व्यवस्था प्रणाली का है जिसमें अन्याय है, झूठ है, लोभ स्वार्थ, शोषण जैसी प्रवृत्तियां पनप रही है और प्रवाहमान है. “अंधेर नगरी” अन्ध व्यवस्था का प्रतीक है. चौपटराजा विवेकहीनता और न्यायदृष्टि के न होने का प्रतीक है. उनके न्याय पर अन्धता का प्रभाव है. अविवेकी प्रमादी राजा के मूल्यहीनता को तो भारतेन्दुजी ने दिखाई ही है साथ ही उन्होंने गोवर्धन के द्वारा मनुष्य के लोभ वृत्ति पर भी व्यंग्य किया है. “अंधेर नगरी” व्यंग्य ही है पर यह अंधेर नगरी विश्व के किसी भी कोने में हो सकती है क्योंकि ये प्रवॄत्तियां आधुनिक युग की देन है.

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परिचय

डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण आनुवाद कार्य में संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा), पहचान (दिल्ली), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “गुजराती लेखिकाओं नी प्रतिनिधि वार्ताओं” का हिन्दी में अनुवाद (शीघ्र प्रकाश्य), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शीघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रिय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमि गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक पुस्तकों क परिचय कराना।

संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

17, जे.एम.के. अपार्ट्मेन्ट,

एच. टी. रोड, सुभानपुरा, वडोदरा – 390023.


Email – ranumukharji@yahoo.co.in.

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