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लड्डू मोदकम // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

हलवाई का नाम हलवाई इसलिए पड़ा कि वह हलवा बनाता है। शायद हलवा ही सबसे पहली मिठाई रही हो। बाद में तो जैसा हम जानते ही हैं किसिम किसिम की एक से बढ़कर एक मिठाइयां बनने लगीं। पर मिठाइयां कितनी ही क्यों न बन जाएं, एक मिठाई है जिसे लड्डू कहते हैं – उसका वर्चस्व कभी कम न हुआ। मिठाइयों की मिठाई है, लड्डू। लड्डू को ‘मोदक’ यों ही नहीं कह दिया गया। लड्डू मोदक है क्योंकि वह मोद प्रदान करता है। उसे खाकर मन मुदित हो जाता है।

किसी भी चीज़ को आप गोलाकार बाँध दें तो वह लड्डू की शक्ल ले सकती है। सारा ब्रम्हाण्ड गोल लड्डू की शक्ल का ही है। हमारी पृथ्वी भी गोल है। शून्य भले ही रिक्तता का प्रतीक हो लेकिन वह भी गोल है, लड्डू की तरह। बस उसे खा नहीं सकते।

खानेवाला लड्डू कई चीजों से बन सकता ही। आटे या सूजी का लड्डू, बेसन या बूंदी का लडडू, खजूर का लड्डू, मेवे का लड्डू। कितने ही तो प्रकार हैं लड्डू के। खुशी का बस कोई मौक़ा होना चाहिए, लड्डू बांटे जाएंगे। शादी के सात फेरों में ‘बंधने’ के बाद भी, और ‘स्वतंत्रता’ दिवस पर भी, लड्डू-वितरण से बेहतर और कुछ नहीं हो सकता। लड्डुओं का व्यापार बड़ा व्यापक है।

कानपुर में लड्डुओं की एक मशहूर दुकान है – ठग्गू के लड्डू। इस दुकान के मालिक का कहना है कि हमारे पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब भी कानपुर आते थे “ठग्गू” से ज़रूर मिलते थे। और यदि वे नहीं आ पाते थे तो ठग्गू जी स्वयं उनके पास जाकर लड्डूओं का एक पैकेट उन्हें भेंट करते थे। ठग्गू के लड्डुओं को अमिताभ बच्चन की शादी में भी लोगों ने स्वाद लेकर खाया था। ठग्गू के साथ लड्डू की जुगलबंदी – क्या कहने हैं !

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हमारे आराध्य देवताओं में भगवान् शिव को भांग धतूरा पसंद है। माँ काली को खिचड़ी, और लक्ष्मी को खीर पसंद है। पर हमारे विघ्नहर्ता देव, गणेश को लड्डू ही पसंद हैं। इसी प्रकार बाल गोपाल भी संभवत: लड्डू ही पसंद करते रहे होंगे। कृष्ण के बाल-रूप को इसीलिए लड्डू-गोपाल कहते हैं। श्रद्धालु लोग मंगल और शनिवार के रोज़ मोदक-प्रिय हनुमान या बजरंगबली को प्रसाद रूप में लड्डू ही चढाते हैं और लड्डू ही पाते हैं| गणेश चतुर्थी पर लड्डू खाने का अपना ही स्वाद है। कहते हैं गणेश जी का एक दांत टूटा हुआ है इसलिए वे मुलायम लड्डू आसानी से खा लेते हैं। हमारे दादा को भी मुलायम मोतीचूर का लड्डू ही पसंद था।

मुलायम लड्डू और सख्त लड्डू में क्या अंतर है ? मुलायम लड्डू ढीला ढाला होता है। उसे ठीक से बांधा नहीं जाता। छूते ही बिखर जाता है। लेकिन जो लड्डू खूब अच्छी तरह से बंधे होते हैं वे आसानी-से बिखरते नहीं। लड्डू बिखरे नहीं इसलिए ज़रूरी है कि वह ठीक से बंधा हुआ हो। हाल ही में शिकागो में विश्व हिन्दू कांग्रेस में हिस्सा लेने आए प्रतिनिधियों को वेलकम पैकेट के तौर पर लड्डू देकर उन्हें एकजुटता का सन्देश दिया गया। पैकेट में दो लड्डू थे जिसमें एक नरम और दूसरा सख्त था। कार्यक्रम के आयोजकों का इस तरह के लड्डू देने का मकसद हिन्दू समाज को यह बताना था कि समाज नरम लड्डुओं की तरह् आसानी से बिखरने वाला नहीं होना चाहिए, बल्कि एक सख्त लड्डू की तरह होना चाहिए जो मजबूती से बंधा हो। मेरे ख्याल में लड्डुओं का इस तरह से सामाजिक-राजनीतिक सन्देश के लिए उपयोग किया जाना शायद पहली बार ही हुआ हो। लड्डू के ज़रिए समाज में एकजुटता का स्वाद लाने के लिए यह एक अद्भुत प्रयोग था। हैट्स-ऑफ। लेकिन हिन्दू समाज में एकजुटता की यह कल्पना करना सिर्फ मन के लड्डू खाना है।

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अक्सर हम खुश होते हैं और किसी कारणवश बताना नहीं चाहते कि प्रसन्न हैं। ऐसे में बस मन ही मन लड्डू फूटते हैं। पर अपने मोद को प्रकट नहीं होने देते। इस कसरत में लेकिन हम कितने कामयाब हो पाते हैं, कहना ज़रा मुश्किल ही है। अक्सर आँखें हमारी चुगली किए बगैर नहीं रहतीं।

कोई गम न पालिए। खुश रहिए। मोदक खाइए और मोद मनाइए। द्वंद्व ओर तनाव की स्थिति में कभी लड्डू खाकर देखिए, राहत मिलेगी।

डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १ सर्कुलर रोड, इलाहाबाद – २११००१

ललित निबंध 7415960160236173595

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  1. अब तो लड्डू खाने का मन करने लगा है। लड्डू से दुनिया है और दुनिया खुद एक लड्डू है। मज़ेदार बात।

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  2. हमारी तरह आपके लेख से गणेशजी भी प्रसन्न हुए होंगे, लड्डू की बात ही निराली है। भोजन का राजनीति में प्रयोग अक्सर होता है, आजकल नेतालोग परोसकर लोगों को खुश करने लगे हैं,बात आगे बढ़ रही है, बढ़िया।

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