रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

विज्ञान कथा - अंक 60 - अनुत्तरित प्रश्न // प्रज्ञा गौतम

साझा करें:

अनुत्तरित प्रश्न विज्ञान-कथा प्रज्ञा गौतम अ नुभा जी घर से बाहर निकल आयी थीं। आज वे नौ बजे अर्थात एक घंटा पहले ही महाविद्यालय के लिए निकल रही...

image_thumb1

अनुत्तरित प्रश्न

विज्ञान-कथा

प्रज्ञा गौतम

अ नुभा जी घर से बाहर निकल आयी थीं। आज वे नौ बजे अर्थात एक घंटा पहले ही महाविद्यालय के लिए निकल रही थीं। उन्होंने कार का दरवाजा खोला ही था कि घर के अन्दर से चीख सुनाई दी। ‘‘मंगला ? क्या हुआ मंगला?’’ कहते हुए वे उलटे पांव घर में भागी आयीं तो वहां का दृश्य देख कर दंग रह गयीं। नौकरानी मंगला को पीटर ने अपनी मजबूत बाँहों में जकड़ा हुआ था। मंगला रसोईघर में कार्य कर रही थी तभी पीटर ने पीछे से आकर ...... अनुभा जी ने पीटर के सुनहरे बाल पीछे से पूरी शक्ति लगा कर खींच लिए और पीटर किसी कटे वृक्ष की तरह भूमि पर गिर पड़ा। मंगला बुरी तरह घबरा गयी थी और रोने लगी थी। ‘‘मैडम, मैं अब कल से काम पर नहीं आऊंगी। आप कुछ और... अ ... प्र्बंध कर लें ......’’ वह हिचकियाँ भर कर रोये जा रही थी। ‘‘ठीक है मंगला तुम्हारे लिए यही उचित है।’’ वे बोलीं थीं। मंगला को पानी पिला कर, कुछ तसल्ली देकर उन्होंने विदा किया। मीटिंग के लिए विलम्ब हो रहा था। इस अत्यावश्यक मीटिंग के लिए ही तो वे आज जल्दी निकलीं थीं, नहीं तो दस बजे तक मंगला कार्य समाप्त कर के चली जाती है और पीटर?

उसको भी आज ही उन्होंने घर पर छोड़ा था अन्यथा वह भी उनके साथ कॉलेज जाता है। और आज ही यह घटना घट गयी। वे बेहद परेशान हो गयीं थीं। मस्तिष्क में कई विचार आ जा रहे थे। उन्होंने कार को ऑटो ड्राइविंग मोड पर सेट किया और सीट पर पीछे सर टिका लिया। यद्यपि ड्राइविंग का उन्हें शौक था पर आज जैसे उनकी आँखों के आगे अँधेरा सा छा रहा था । हाथ सुन्न पड़ गये थे। मस्तिष्क में विचारों की भारी उथल -पुथल मची थी। मन कई वर्ष पीछे अतीत में चला गया था। अनुभा, एक बड़े उद्योगपति की इकलौती कन्या, सुन्दर और प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी किन्तु स्वभाव से अहंकारी। बाईस वर्ष की अवस्था में जब वे शोध छात्रा थीं उनके लिए कितने ही विवाह प्रस्ताव आ रहे थे। उस समय विवाह करना उन्हें अपनी स्वतंत्रता में बाधक लगा था। उन दिनों विवाह अनिवार्य सामाजिक परंपरा माना जाता था।

आजकल तो विवाह संस्था लगभग समाप्त हो चुकी है। भले ही कोई विवाह न करे लेकिन सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य को एक साथी की आवश्यकता तो होती ही है। अहंकारी स्वभाव के कारण उनके जीवन में कोई नहीं आ सका था। एक अति बुद्धिमान और विनम्र साथी की तलाश में उनके जीवन के बीस वर्ष निकल गये। वे अब लगभग चालीस वर्ष की थीं। एकाकी रहने के कारण उनका स्वभाव चिड़चिड़ा और अन्तर्मुखी हो गया था। अब इस मध्य आयु में वे तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद स्वयं को कमजोर और असुरक्षित अनुभव करतीं।

एक दिन अचानक ही एक सेमिनार में उनकी भेंट कनुप्रिया और उसके पति डॉ. करणवीर से हुई। कनु उनके विद्यालय समय की सहपाठिनी थी। वे दोनों उनसे मिल कर बहुत प्रसन्न हुए थे और अगले दिन बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के उनके घर आ धमके थे। कनु अभी तक युवावस्था की सी चंचलता और उल्लास से भरी थी। उसकी आंतरिक प्रसन्नता उसके मुखमंडल की आभा से परिलक्षित हो रही थी। यह देख कर वे कुछ बुझ सी गयीं। कनु के पास सुनाने और सुनने को ढेर सारी बातें थीं किन्तु अनुभा जी चुप-चुप बनी रहीं। ‘‘इतने वर्षों बाद हम मिले हैं और तुम चुप हो। क्या हो गया है तुम्हें? तुम तो अपने समय की सबसे तेज और मुखर छात्रा रही हो। क्या करण से हिचकिचाहट .......’’ ‘‘नहीं! नहीं ऐसी बात नहीं ....’’ उनकी आँखें नम हो गयीं थी। वे आगे बोल नहीं पायीं। कनु विदा लेकर चली गयी। उनकी उंगलियां गोद में पड़े स्मार्ट फोन को एक बार छू कर शांत हो गयीं और उमड़ती हुई भावनाएं शब्दों के रूप में फोन के स्क्रीन पर उभरने लगीं। घर आकर कनु ने उनके सन्देश पढ़े।’’ तुम्हारी सखी को एक साथी की आवश्यकता है।’’ करण बोले । ‘‘बहुत जिद्दी है वह। इस आयु में किसी के साथ सामंजस्य बिठा पायेगी?’’

‘‘एक उपाय है ....’’ ‘‘अच्छा विचार है, करण। मैं बात करती हूँ अनुभा से।’’ पीटर को घर लाने की सलाह कनु ने ही दी थी। अब दो वर्ष से पीटर उनके साथ था। पीटर एक रोबोट था। अत्याधुनिक रोबोट। आज से लगभग तेरह वर्ष पूर्व ये रोबोट्स बाजार में आये थे। पीटर इस श्रेणी के रोबोट्स में तीसरी पीढ़ी का रोबोट था। उसकी सिलिकन की त्वचा मानव सदृश और कोमल थी और वातावरण के प्रति अनुक्रिया हेतु शक्तिशाली सेन्सर्स युक्त थी। आँखों में विजन सेन्सर्स थे। उसके रेशमी चमकीले केश सौर ऊर्जा को अवशोषित कर मस्तिष्क को ऊर्जा पंहुचाते थे। उसमें सोचने की क्षमता थी। उसके मस्तिष्क में भी सिनेप्स बनते थे और मानवीय भावनाओं के प्रति अनुक्रिया हेतु डिजिटल हारमोन्स भी। ‘‘नील एंड रोबिनसन’’ कम्पनी ने स्त्री और पुरुष दोनों ही आकृतियों में ये रोबोट्स बाजार में उतारे थे।

अनुभा जी, कनु के साथ कम्पनी के शोरूम में गयी थीं। विभिन्न रंगरूप के रोबोट्स एक साथ देख कर वे दंग रह गयीं। आँखों, बालों, त्वचा के रंग और नयन-नक्श में इतनी विविधता थी जैसे वे विश्व के सभी भागों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों। उन्होंने पीटर को चुना था। सुनहरे केश, गौर-वर्ण और उच्च बौद्धिक क्षमता युक्त रोबोट।

उस दिन शाम को कम्पनी से दो कर्मचारी पीटर को छोड़ने उनके घर आये थे। उन्होंने बड़े ही सौजन्यतापूर्वक अनुभा जी का परिचय उससे करवाया था। ‘‘अनुभा जी पीटर से मिलिए। आज से आपका साथी, सलाहकार और हमदर्द।

‘‘सोल मेट भी कह सकतीं हैं।’’ दूसरा कर्मचारी शरारतपूर्ण हंसी के साथ बोला। ‘‘सोल मेट? इस मशीन को’’ उन्होंने मन ही मन कहा। ‘‘और पीटर, ये हैं अनुभा जी। आपकी साथी। आशा है आप दोनों एक साथ अच्छा समय व्यतीत करेंगे।’’ पीटर ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। अनुभा जी ने देखा छह फुट लम्बा सुदर्शन युवक अपनी जीवन्त आँखों से उनको निहार रहा था। वे लजा गयीं। उन्होंने झिझकते हुए पीटर का हाथ थाम लिया। आश्चर्य! उसका हाथ कोमल और उष्ण था। शोरूम में बुत की तरह खड़ा पीटर अभी कितना सजीव दिख रहा था।

पीटर के आने से घर में रौनक हो गयी थी। उसका हास्य बोध गजब का था। उनकी खोयी मुस्कराहट लौट आयी थी। घर में और घर के बाहर वह उनका अच्छा सहयोगी बन गया था। प्रयोगशाला में जिन कार्यों को करने में उन्हें आठ-दस दिन लग जाते थे, पीटर के आने के बाद वे दो दिन में निपट जाते।

उसकी कार्य क्षमता आश्चर्यजनक थी। ढेर सारे आँकड़ों का विश्लेषण कर वह क्षण भर में निष्कर्ष निकाल देता। कार्य-भार कम होने से अब उन्हें स्वयं पर ध्यान देने का समय मिला। अब यह आवश्यक भी था क्योंकि पीटर की चौकस डिजिटल आँखें उन्हें हर समय देखती रहतीं। ‘‘आपकी केश-सज्जा, आपके चेहरे के अनुरूप नहीं है।’’ पीटर बोला जब वे अपने केश संवार रहीं थीं। ‘‘क्या तुम इस विषय में कोई सुझाव दे सकते हो?’’ ‘’मैं आपके सौन्दर्य के साथ-साथ इस घर के सौन्दर्य में भी निखार ला सकता हूँ।’’ उसके मुख पर चिरपरिचित हास्य था और उसकी आँखें कमरे का सूक्ष्म निरीक्षण कर रहीं थीं। ‘‘अच्छा।’’ अपने शरीर के साथ-साथ उन्होंने घर की भी घोर उपेक्षा की थी। कई वर्षों से दीवारों पर रंग नहीं हुआ था। परदे नहीं बदले गये थे। पीटर उनके चेहरे के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव को ताड़ लेता था। उनको परेशान देख कर तुरन्त सहायता के लिए उपस्थित हो जाता। वे अभिभूत थीं किन्तु फिर भी मन के किसी कोने में तो यह बात थी ही सही कि......यह मशीन है। हृदयहीन! डिजिटल सतही प्रेम! उस दिन जब बगीचे में पड़े घायल पक्षी को उसने निर्दयता से उठा कर एक कोने में डाल दिया था। ‘‘हृदयहीन, मशीन !’’ वे उस पर जोर से चिल्लाई थीं। ‘‘मंगला, जल्दी से पानी और डेटोल लाओ।’’ वे पीटर से भी आदेशात्मक लहजे में बात करतीं।

तमाम योग्यताओं के बाद भी उनका मन उसे साथी का दर्जा नहीं दे पा रहा था। समय गुजरता रहा। बार-बार मशीन पुकारा जाना पीटर को पसंद नहीं था। वह तो उनका साथी बनने के लिए आया था। इसके विपरीत मंगला उसके साथ बड़े आदर के साथ पेश आती। जब मैडम ने उसे प्रथम बार बताया था कि वह मात्र एक मशीन है, इंसान नहीं तो उसे विश्वास नहीं हुआ था। और आज भी वह यही मानती है कि वह इंसान ही नहीं बल्कि उस से भी बढ़ कर है। सुपर हीरो! उसे त्वरित गति से कार्य करते देख उसकी आँखों में आश्चर्य और प्रशंसा के मिले-जुले भाव होते थे। अक्सर वह कहती ‘‘पीटर बाबू , तुम तो देवता हो। कैसा तो रूप है और कितनी ताकत।’’ वह मुँह पर दोनों हाथ रख लेती। उस समय पीटर के मशीनी मस्तिष्क में क्या- क्या विचार आते ये वही जान सकता था।

आज अनुभा जी एक घंटा पहले निकली थीं, कोई मीटिंग थी। पीटर को कम्प्यूटर पर कुछ कार्य करने का निर्देश दे कर वे बाहर निकल गयीं थीं पर पीटर वहीं खड़ा रहा। सुबह एक घंटा बगीचे की धूप में बैठ कर वह अपने आप को काफी स्फूर्त अनुभव कर रहा था। अब भी वह बरामदे की धूप में खड़ा मंगला को देख रहा था। उसके सुनहरी केश धूप में चमक रहे थे, जैसे उस एक टुकड़ा धूप की सारी ऊर्जा अवशोषित कर लेना चाहते हों। उसके मस्तिष्क में जैसे नए सिनेप्स बन रहे थे, डिजिटल डोपामाइन और ऑक्सीटोसिन का स्तर बढ़ रहा था। ऊर्जा की तरंगें मस्तिष्क से सम्पूर्ण शरीर में फैल गयी थीं।

मैडम के निर्देश की अवहेलना कर के वह रसोईघर की तरफ बढ़ गया था....... मीटिंग में दौरान अनुभा जी अनमनी रहीं।

इस घटना ने उनको बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दिया था।

अगले दिन ही उन्होंने मंगला की छुट्टी करके काम पर एक लड़का रख लिया था। उन्होंने अनुभव किया कि पीटर का व्यवहार अब बिलकुल बदल गया है। वह अब चुप रहता, जो आदेश मिलता वह कार्य करता बस। यह जानकर भी उन्होंने पीटर से इस विषय में कोई बात नहीं की। कुछ माह यूँ ही व्यतीत हो गये।

‘‘बाईसवीं सदी में जल प्रबंधन’’ विषय पर उनका शोध कार्य पूर्ण हो गया था और इसमें पीटर का बहुत सहयोग रहा था।

आज वे प्रसन्न मुद्रा में महाविद्यालय जा रहीं थीं। कार का दरवाजा खोल कर उन्होंने कार स्टार्ट की और पसंदीदा संगीत का आदेश दिया। कार के ब्रेक कठिनाई से लग रहे थे।’’ कार को सर्विस की आवश्यकता है, मैडम ‘‘पीटर ने कल याद भी दिलाया था पर वे ही भूल गयीं थीं। महाविद्यालय आ गया था।

शोध-पत्र प्रकाशन सम्बन्धी कुछ औपचारिकतायें उन्हें आज पूर्ण करनी थीं। प्रयोगशाला में पंहुच कर उन्होंने अपना कम्प्यूटर खोला। शोध-पत्र सम्बन्धी फाइल नहीं मिल रही थी।

उन्होंने देखा कुछ महत्वपूर्ण फाइल्स नष्ट हो गयीं थीं। उनके ललाट पर स्वेद-बिंदु छलछला आये। हृदय की धड़कन तेज हो गयी। याद आया कि पीटर ने फाइल को फ्लैश-ड्राइव में संग्रहित कर लिया था। उनकी जान में जान आयी। माथे के पसीने को पोंछ कर उन्होंने पर्स से चाबी निकाली और अलमारी की दराज खोली। दराज में फ्लैश-ड्राइव नहीं था।

शायद पीटर घर ले गया हो यह सोच कर उन्होंने पीटर को फोन लगाया किन्तु उसने अनभिज्ञता जाहिर की। उन्होंने घबराहट में अपना आपा खो दिया, गिरती पड़ती वे महाविद्यालय के द्वार तक भागीं और कार स्टार्ट कर दी। वे भूल गयीं थीं कि कार के ब्रेक.... .....उन्होंने कार को ऑटो-पायलट मोड पर लगा दिया। भारी ट्रैफिक में कार लाल बत्ती की अवहेलना करके आगे बढ़ गयी और एक ट्रक से टकरा गयी। अनुभा जी की दर्दनाक मृत्यु हो गयी। पुलिस को प्रयोगशाला सहायक ने बताया कि उनके शोध सम्बन्धी आंकड़े नहीं मिल रहे थे इसलिए वे घबराहट में यहाँ से निकली थीं। दुर्घटना के समय पीटर घर पर ही था। पुलिस को दिए बयान में उसने कहा ‘‘शोध-पत्र की फाइल और फ्लैश-ड्राइव मैंने ही नष्ट किये थे पर मेरा कोई गलत अभिप्राय नहीं था। मुझे इस तरह डिजाईन किया गया है कि मैं अपनी साथी को किसी प्रकार की चोट या आघात नहीं पंहुचा सकता। हम साथी श्रेणी के रोबोट्स हैं जो वर्तमान युग में जीवनसाथी के विकल्प के रूप में काम में लिए जा रहे हैं, किन्तु अनुभा जी मुझे कभी अपना साथी नहीं समझ पायीं। वे हमेशा मुझे कमतर समझतीं और अक्सर मशीन कह कर संबोधित करतीं। हमारे डिजिटल हारमोंस की सक्रियता साथी के व्यवहार पर निर्भर है। उनकी शोध फाइल मेरी स्मृति में संग्रहित है, मैं सभी पत्रों को पुनः टंकित कर देता। उनका हृदय जीतने के लिए ही मैंने ऐसा किया .....लेकिन यह हादसा हो गया.....’’

कुछ माह पश्चात् .........

विश्व प्रहरी, 12 जनवरी 2031

राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एन.एस.सी.) से गुप्त सूचनाएं एक आतंकवादी संगठन तक पहुँचीं। गुप्तचर विभाग के समय पर सतर्क हो जाने से देश पर आने वाला एक बड़ा संकट टल गया। जांच में पता चला कि स्मिथ और ब्राउन नामक दो रोबोट्स इस कार्य के लिए उत्तरदायी थे। सी.बी.आई. द्वारा की गयी पूछताछ में उन्होंने बताया की वे एजेंसी के सी.ई.ओ. श्री आनंद मुखर्जी के सलाहकार हैं। श्री मुखर्जी द्वारा अपमानित करने पर उन्होंने यह कदम उठाया। देश के सबसे बड़े समाचार-पत्रों की प्रमुख खबर! विगत दोनों घटनाओं से वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों में एक राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ गयी थी। रोबोट्स की यह पीढ़ी अति-बुद्धिमान है। इन मशीनों के पास अति तीव्र गति से सोचने वाला मस्तिष्क है, मानवीय भावनाओं के प्रति अनुक्रिया करने वाले डिजिटल हॉर्मोन हैं। पर क्या ये सही-गलत, नैतिकता-अनैतिकता के दायरे में रह कर सोच सकते हैं? क्या यह हमेशा संभव है कि मनुष्य इन्हें सिर्फ मशीन समझ कर आदेश देता रहे और ये उसे मानते रहें?

❒ ई मेल : pragyamaitrey@gmail.com

image

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

---***---

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|नई रचनाएँ_$type=complex$count=8$page=1$va=0$au=0

|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=blogging$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3830,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,335,ईबुक,191,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2771,कहानी,2096,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,485,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,329,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,49,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,820,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,307,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1908,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,644,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,685,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,54,साहित्यिक गतिविधियाँ,183,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: विज्ञान कथा - अंक 60 - अनुत्तरित प्रश्न // प्रज्ञा गौतम
विज्ञान कथा - अंक 60 - अनुत्तरित प्रश्न // प्रज्ञा गौतम
https://lh3.googleusercontent.com/-LgmjF1qmURg/W7R2rA41tGI/AAAAAAABEeo/8wp3HXLYap0wdNaAn0dskbLMXi0d2PfLwCHMYCw/image_thumb1_thumb?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-LgmjF1qmURg/W7R2rA41tGI/AAAAAAABEeo/8wp3HXLYap0wdNaAn0dskbLMXi0d2PfLwCHMYCw/s72-c/image_thumb1_thumb?imgmax=800
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2018/10/60_9.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2018/10/60_9.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ