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विज्ञान कथा - अंक 60 - अनुत्तरित प्रश्न // प्रज्ञा गौतम

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अनुत्तरित प्रश्न

विज्ञान-कथा

प्रज्ञा गौतम

अ नुभा जी घर से बाहर निकल आयी थीं। आज वे नौ बजे अर्थात एक घंटा पहले ही महाविद्यालय के लिए निकल रही थीं। उन्होंने कार का दरवाजा खोला ही था कि घर के अन्दर से चीख सुनाई दी। ‘‘मंगला ? क्या हुआ मंगला?’’ कहते हुए वे उलटे पांव घर में भागी आयीं तो वहां का दृश्य देख कर दंग रह गयीं। नौकरानी मंगला को पीटर ने अपनी मजबूत बाँहों में जकड़ा हुआ था। मंगला रसोईघर में कार्य कर रही थी तभी पीटर ने पीछे से आकर ...... अनुभा जी ने पीटर के सुनहरे बाल पीछे से पूरी शक्ति लगा कर खींच लिए और पीटर किसी कटे वृक्ष की तरह भूमि पर गिर पड़ा। मंगला बुरी तरह घबरा गयी थी और रोने लगी थी। ‘‘मैडम, मैं अब कल से काम पर नहीं आऊंगी। आप कुछ और... अ ... प्र्बंध कर लें ......’’ वह हिचकियाँ भर कर रोये जा रही थी। ‘‘ठीक है मंगला तुम्हारे लिए यही उचित है।’’ वे बोलीं थीं। मंगला को पानी पिला कर, कुछ तसल्ली देकर उन्होंने विदा किया। मीटिंग के लिए विलम्ब हो रहा था। इस अत्यावश्यक मीटिंग के लिए ही तो वे आज जल्दी निकलीं थीं, नहीं तो दस बजे तक मंगला कार्य समाप्त कर के चली जाती है और पीटर?

उसको भी आज ही उन्होंने घर पर छोड़ा था अन्यथा वह भी उनके साथ कॉलेज जाता है। और आज ही यह घटना घट गयी। वे बेहद परेशान हो गयीं थीं। मस्तिष्क में कई विचार आ जा रहे थे। उन्होंने कार को ऑटो ड्राइविंग मोड पर सेट किया और सीट पर पीछे सर टिका लिया। यद्यपि ड्राइविंग का उन्हें शौक था पर आज जैसे उनकी आँखों के आगे अँधेरा सा छा रहा था । हाथ सुन्न पड़ गये थे। मस्तिष्क में विचारों की भारी उथल -पुथल मची थी। मन कई वर्ष पीछे अतीत में चला गया था। अनुभा, एक बड़े उद्योगपति की इकलौती कन्या, सुन्दर और प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी किन्तु स्वभाव से अहंकारी। बाईस वर्ष की अवस्था में जब वे शोध छात्रा थीं उनके लिए कितने ही विवाह प्रस्ताव आ रहे थे। उस समय विवाह करना उन्हें अपनी स्वतंत्रता में बाधक लगा था। उन दिनों विवाह अनिवार्य सामाजिक परंपरा माना जाता था।

आजकल तो विवाह संस्था लगभग समाप्त हो चुकी है। भले ही कोई विवाह न करे लेकिन सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य को एक साथी की आवश्यकता तो होती ही है। अहंकारी स्वभाव के कारण उनके जीवन में कोई नहीं आ सका था। एक अति बुद्धिमान और विनम्र साथी की तलाश में उनके जीवन के बीस वर्ष निकल गये। वे अब लगभग चालीस वर्ष की थीं। एकाकी रहने के कारण उनका स्वभाव चिड़चिड़ा और अन्तर्मुखी हो गया था। अब इस मध्य आयु में वे तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद स्वयं को कमजोर और असुरक्षित अनुभव करतीं।

एक दिन अचानक ही एक सेमिनार में उनकी भेंट कनुप्रिया और उसके पति डॉ. करणवीर से हुई। कनु उनके विद्यालय समय की सहपाठिनी थी। वे दोनों उनसे मिल कर बहुत प्रसन्न हुए थे और अगले दिन बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के उनके घर आ धमके थे। कनु अभी तक युवावस्था की सी चंचलता और उल्लास से भरी थी। उसकी आंतरिक प्रसन्नता उसके मुखमंडल की आभा से परिलक्षित हो रही थी। यह देख कर वे कुछ बुझ सी गयीं। कनु के पास सुनाने और सुनने को ढेर सारी बातें थीं किन्तु अनुभा जी चुप-चुप बनी रहीं। ‘‘इतने वर्षों बाद हम मिले हैं और तुम चुप हो। क्या हो गया है तुम्हें? तुम तो अपने समय की सबसे तेज और मुखर छात्रा रही हो। क्या करण से हिचकिचाहट .......’’ ‘‘नहीं! नहीं ऐसी बात नहीं ....’’ उनकी आँखें नम हो गयीं थी। वे आगे बोल नहीं पायीं। कनु विदा लेकर चली गयी। उनकी उंगलियां गोद में पड़े स्मार्ट फोन को एक बार छू कर शांत हो गयीं और उमड़ती हुई भावनाएं शब्दों के रूप में फोन के स्क्रीन पर उभरने लगीं। घर आकर कनु ने उनके सन्देश पढ़े।’’ तुम्हारी सखी को एक साथी की आवश्यकता है।’’ करण बोले । ‘‘बहुत जिद्दी है वह। इस आयु में किसी के साथ सामंजस्य बिठा पायेगी?’’

‘‘एक उपाय है ....’’ ‘‘अच्छा विचार है, करण। मैं बात करती हूँ अनुभा से।’’ पीटर को घर लाने की सलाह कनु ने ही दी थी। अब दो वर्ष से पीटर उनके साथ था। पीटर एक रोबोट था। अत्याधुनिक रोबोट। आज से लगभग तेरह वर्ष पूर्व ये रोबोट्स बाजार में आये थे। पीटर इस श्रेणी के रोबोट्स में तीसरी पीढ़ी का रोबोट था। उसकी सिलिकन की त्वचा मानव सदृश और कोमल थी और वातावरण के प्रति अनुक्रिया हेतु शक्तिशाली सेन्सर्स युक्त थी। आँखों में विजन सेन्सर्स थे। उसके रेशमी चमकीले केश सौर ऊर्जा को अवशोषित कर मस्तिष्क को ऊर्जा पंहुचाते थे। उसमें सोचने की क्षमता थी। उसके मस्तिष्क में भी सिनेप्स बनते थे और मानवीय भावनाओं के प्रति अनुक्रिया हेतु डिजिटल हारमोन्स भी। ‘‘नील एंड रोबिनसन’’ कम्पनी ने स्त्री और पुरुष दोनों ही आकृतियों में ये रोबोट्स बाजार में उतारे थे।

अनुभा जी, कनु के साथ कम्पनी के शोरूम में गयी थीं। विभिन्न रंगरूप के रोबोट्स एक साथ देख कर वे दंग रह गयीं। आँखों, बालों, त्वचा के रंग और नयन-नक्श में इतनी विविधता थी जैसे वे विश्व के सभी भागों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों। उन्होंने पीटर को चुना था। सुनहरे केश, गौर-वर्ण और उच्च बौद्धिक क्षमता युक्त रोबोट।

उस दिन शाम को कम्पनी से दो कर्मचारी पीटर को छोड़ने उनके घर आये थे। उन्होंने बड़े ही सौजन्यतापूर्वक अनुभा जी का परिचय उससे करवाया था। ‘‘अनुभा जी पीटर से मिलिए। आज से आपका साथी, सलाहकार और हमदर्द।

‘‘सोल मेट भी कह सकतीं हैं।’’ दूसरा कर्मचारी शरारतपूर्ण हंसी के साथ बोला। ‘‘सोल मेट? इस मशीन को’’ उन्होंने मन ही मन कहा। ‘‘और पीटर, ये हैं अनुभा जी। आपकी साथी। आशा है आप दोनों एक साथ अच्छा समय व्यतीत करेंगे।’’ पीटर ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। अनुभा जी ने देखा छह फुट लम्बा सुदर्शन युवक अपनी जीवन्त आँखों से उनको निहार रहा था। वे लजा गयीं। उन्होंने झिझकते हुए पीटर का हाथ थाम लिया। आश्चर्य! उसका हाथ कोमल और उष्ण था। शोरूम में बुत की तरह खड़ा पीटर अभी कितना सजीव दिख रहा था।

पीटर के आने से घर में रौनक हो गयी थी। उसका हास्य बोध गजब का था। उनकी खोयी मुस्कराहट लौट आयी थी। घर में और घर के बाहर वह उनका अच्छा सहयोगी बन गया था। प्रयोगशाला में जिन कार्यों को करने में उन्हें आठ-दस दिन लग जाते थे, पीटर के आने के बाद वे दो दिन में निपट जाते।

उसकी कार्य क्षमता आश्चर्यजनक थी। ढेर सारे आँकड़ों का विश्लेषण कर वह क्षण भर में निष्कर्ष निकाल देता। कार्य-भार कम होने से अब उन्हें स्वयं पर ध्यान देने का समय मिला। अब यह आवश्यक भी था क्योंकि पीटर की चौकस डिजिटल आँखें उन्हें हर समय देखती रहतीं। ‘‘आपकी केश-सज्जा, आपके चेहरे के अनुरूप नहीं है।’’ पीटर बोला जब वे अपने केश संवार रहीं थीं। ‘‘क्या तुम इस विषय में कोई सुझाव दे सकते हो?’’ ‘’मैं आपके सौन्दर्य के साथ-साथ इस घर के सौन्दर्य में भी निखार ला सकता हूँ।’’ उसके मुख पर चिरपरिचित हास्य था और उसकी आँखें कमरे का सूक्ष्म निरीक्षण कर रहीं थीं। ‘‘अच्छा।’’ अपने शरीर के साथ-साथ उन्होंने घर की भी घोर उपेक्षा की थी। कई वर्षों से दीवारों पर रंग नहीं हुआ था। परदे नहीं बदले गये थे। पीटर उनके चेहरे के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाव को ताड़ लेता था। उनको परेशान देख कर तुरन्त सहायता के लिए उपस्थित हो जाता। वे अभिभूत थीं किन्तु फिर भी मन के किसी कोने में तो यह बात थी ही सही कि......यह मशीन है। हृदयहीन! डिजिटल सतही प्रेम! उस दिन जब बगीचे में पड़े घायल पक्षी को उसने निर्दयता से उठा कर एक कोने में डाल दिया था। ‘‘हृदयहीन, मशीन !’’ वे उस पर जोर से चिल्लाई थीं। ‘‘मंगला, जल्दी से पानी और डेटोल लाओ।’’ वे पीटर से भी आदेशात्मक लहजे में बात करतीं।

तमाम योग्यताओं के बाद भी उनका मन उसे साथी का दर्जा नहीं दे पा रहा था। समय गुजरता रहा। बार-बार मशीन पुकारा जाना पीटर को पसंद नहीं था। वह तो उनका साथी बनने के लिए आया था। इसके विपरीत मंगला उसके साथ बड़े आदर के साथ पेश आती। जब मैडम ने उसे प्रथम बार बताया था कि वह मात्र एक मशीन है, इंसान नहीं तो उसे विश्वास नहीं हुआ था। और आज भी वह यही मानती है कि वह इंसान ही नहीं बल्कि उस से भी बढ़ कर है। सुपर हीरो! उसे त्वरित गति से कार्य करते देख उसकी आँखों में आश्चर्य और प्रशंसा के मिले-जुले भाव होते थे। अक्सर वह कहती ‘‘पीटर बाबू , तुम तो देवता हो। कैसा तो रूप है और कितनी ताकत।’’ वह मुँह पर दोनों हाथ रख लेती। उस समय पीटर के मशीनी मस्तिष्क में क्या- क्या विचार आते ये वही जान सकता था।

आज अनुभा जी एक घंटा पहले निकली थीं, कोई मीटिंग थी। पीटर को कम्प्यूटर पर कुछ कार्य करने का निर्देश दे कर वे बाहर निकल गयीं थीं पर पीटर वहीं खड़ा रहा। सुबह एक घंटा बगीचे की धूप में बैठ कर वह अपने आप को काफी स्फूर्त अनुभव कर रहा था। अब भी वह बरामदे की धूप में खड़ा मंगला को देख रहा था। उसके सुनहरी केश धूप में चमक रहे थे, जैसे उस एक टुकड़ा धूप की सारी ऊर्जा अवशोषित कर लेना चाहते हों। उसके मस्तिष्क में जैसे नए सिनेप्स बन रहे थे, डिजिटल डोपामाइन और ऑक्सीटोसिन का स्तर बढ़ रहा था। ऊर्जा की तरंगें मस्तिष्क से सम्पूर्ण शरीर में फैल गयी थीं।

मैडम के निर्देश की अवहेलना कर के वह रसोईघर की तरफ बढ़ गया था....... मीटिंग में दौरान अनुभा जी अनमनी रहीं।

इस घटना ने उनको बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दिया था।

अगले दिन ही उन्होंने मंगला की छुट्टी करके काम पर एक लड़का रख लिया था। उन्होंने अनुभव किया कि पीटर का व्यवहार अब बिलकुल बदल गया है। वह अब चुप रहता, जो आदेश मिलता वह कार्य करता बस। यह जानकर भी उन्होंने पीटर से इस विषय में कोई बात नहीं की। कुछ माह यूँ ही व्यतीत हो गये।

‘‘बाईसवीं सदी में जल प्रबंधन’’ विषय पर उनका शोध कार्य पूर्ण हो गया था और इसमें पीटर का बहुत सहयोग रहा था।

आज वे प्रसन्न मुद्रा में महाविद्यालय जा रहीं थीं। कार का दरवाजा खोल कर उन्होंने कार स्टार्ट की और पसंदीदा संगीत का आदेश दिया। कार के ब्रेक कठिनाई से लग रहे थे।’’ कार को सर्विस की आवश्यकता है, मैडम ‘‘पीटर ने कल याद भी दिलाया था पर वे ही भूल गयीं थीं। महाविद्यालय आ गया था।

शोध-पत्र प्रकाशन सम्बन्धी कुछ औपचारिकतायें उन्हें आज पूर्ण करनी थीं। प्रयोगशाला में पंहुच कर उन्होंने अपना कम्प्यूटर खोला। शोध-पत्र सम्बन्धी फाइल नहीं मिल रही थी।

उन्होंने देखा कुछ महत्वपूर्ण फाइल्स नष्ट हो गयीं थीं। उनके ललाट पर स्वेद-बिंदु छलछला आये। हृदय की धड़कन तेज हो गयी। याद आया कि पीटर ने फाइल को फ्लैश-ड्राइव में संग्रहित कर लिया था। उनकी जान में जान आयी। माथे के पसीने को पोंछ कर उन्होंने पर्स से चाबी निकाली और अलमारी की दराज खोली। दराज में फ्लैश-ड्राइव नहीं था।

शायद पीटर घर ले गया हो यह सोच कर उन्होंने पीटर को फोन लगाया किन्तु उसने अनभिज्ञता जाहिर की। उन्होंने घबराहट में अपना आपा खो दिया, गिरती पड़ती वे महाविद्यालय के द्वार तक भागीं और कार स्टार्ट कर दी। वे भूल गयीं थीं कि कार के ब्रेक.... .....उन्होंने कार को ऑटो-पायलट मोड पर लगा दिया। भारी ट्रैफिक में कार लाल बत्ती की अवहेलना करके आगे बढ़ गयी और एक ट्रक से टकरा गयी। अनुभा जी की दर्दनाक मृत्यु हो गयी। पुलिस को प्रयोगशाला सहायक ने बताया कि उनके शोध सम्बन्धी आंकड़े नहीं मिल रहे थे इसलिए वे घबराहट में यहाँ से निकली थीं। दुर्घटना के समय पीटर घर पर ही था। पुलिस को दिए बयान में उसने कहा ‘‘शोध-पत्र की फाइल और फ्लैश-ड्राइव मैंने ही नष्ट किये थे पर मेरा कोई गलत अभिप्राय नहीं था। मुझे इस तरह डिजाईन किया गया है कि मैं अपनी साथी को किसी प्रकार की चोट या आघात नहीं पंहुचा सकता। हम साथी श्रेणी के रोबोट्स हैं जो वर्तमान युग में जीवनसाथी के विकल्प के रूप में काम में लिए जा रहे हैं, किन्तु अनुभा जी मुझे कभी अपना साथी नहीं समझ पायीं। वे हमेशा मुझे कमतर समझतीं और अक्सर मशीन कह कर संबोधित करतीं। हमारे डिजिटल हारमोंस की सक्रियता साथी के व्यवहार पर निर्भर है। उनकी शोध फाइल मेरी स्मृति में संग्रहित है, मैं सभी पत्रों को पुनः टंकित कर देता। उनका हृदय जीतने के लिए ही मैंने ऐसा किया .....लेकिन यह हादसा हो गया.....’’

कुछ माह पश्चात् .........

विश्व प्रहरी, 12 जनवरी 2031

राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एन.एस.सी.) से गुप्त सूचनाएं एक आतंकवादी संगठन तक पहुँचीं। गुप्तचर विभाग के समय पर सतर्क हो जाने से देश पर आने वाला एक बड़ा संकट टल गया। जांच में पता चला कि स्मिथ और ब्राउन नामक दो रोबोट्स इस कार्य के लिए उत्तरदायी थे। सी.बी.आई. द्वारा की गयी पूछताछ में उन्होंने बताया की वे एजेंसी के सी.ई.ओ. श्री आनंद मुखर्जी के सलाहकार हैं। श्री मुखर्जी द्वारा अपमानित करने पर उन्होंने यह कदम उठाया। देश के सबसे बड़े समाचार-पत्रों की प्रमुख खबर! विगत दोनों घटनाओं से वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों में एक राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ गयी थी। रोबोट्स की यह पीढ़ी अति-बुद्धिमान है। इन मशीनों के पास अति तीव्र गति से सोचने वाला मस्तिष्क है, मानवीय भावनाओं के प्रति अनुक्रिया करने वाले डिजिटल हॉर्मोन हैं। पर क्या ये सही-गलत, नैतिकता-अनैतिकता के दायरे में रह कर सोच सकते हैं? क्या यह हमेशा संभव है कि मनुष्य इन्हें सिर्फ मशीन समझ कर आदेश देता रहे और ये उसे मानते रहें?

❒ ई मेल : pragyamaitrey@gmail.com

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