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चुनाव (लघु नाटिका ) - सुशील शर्मा

सुशील कुमार शर्मा

चुनाव

(लघु नाटिका )


दृश्य -1

पात्र -मास्टर जी चुन्नी ,नेता जी ,बुद्धिजीवी ,व्यापारी ,किसान ,गरीब लल्लू

(चुनाव का मौसम है कक्षा में मास्टर जी बच्चों को चुनाव एवं मतदाता जागरूकता के बारे में समझा रहे थे। )

चुन्नी -मास्टरजी ये चुनाव क्यों होते हैं ?

मास्टरजी -चुनाव से हम अपनी सरकार चुनते हैं ,हर पांच वर्ष में हमें नयी सरकार मिलती है ,जो हमारे देश को चलाती है।

चुन्नी -मास्टर जी सरकार क्या कोई स्त्री है जो देश चलाती है ?

(चुन्नी की बात से कक्षा में ठहाका गूंजता है मास्टरजी गुस्से से कक्षा को घूरते है ,सब सहम जाते है )

मास्टरजी -तुम लोग मूर्खों जैसे सवाल मत पूछो। तुम्हे एक काम करना हैं अपने मुहल्ले के सभी वोट डालने वाले लोगों को समझाना है कि मतदान के दिन वो  वोट डालने जरूर जाएँ। बोलो सब बच्चे इसमें सहयोग करेंगे।

सभी बच्चे -जी मास्टरजी हम सभी सहयोग करेंगे।

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दृश्य -2

(कुछ साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी की गोष्ठी चल रही थी मास्टर जी उस गोष्ठी में शामिल होते हैं )

बुद्धिजीवी -इस देश का क्या होगा ,समझ में नहीं आता ,हर तरफ भ्रष्टाचार ,अनाचार आखिर हर पांच वर्ष में चुनाव करके हम उन्ही सांपनाथ ,नागनाथों के हाथों में सत्ता की बागडोर सौंप देतें हैं।

मास्टरजी -आदरणीय ये संवैधानिक व्यवस्था है उसका पालन करना ही होगा।

बुद्धिजीवी -अब संविधान को बदलना चाहिए उस समय की बात और थी तब राजनीति में शुचिता थी ,नेता जनता की सेवा करते थे और आज जनता का शोषण।

साहित्यकार -आप बिलकुल सही कह रहे हैं आदरणीय बुद्धिजीवी जी। इस विषय पर मेरी एक तरोताज़ा रचना रखना चाहता हूँ।

(मास्टरजी और बुद्धिजीवी बुरा सा मुंह बनाते हैं लेकिन तब तक साहित्यकार अपनी रचना सुना ही देते हैं। )

अजीब सा सन्नाटा पसरा था उसकी सियासत में।

जो लोग सच बोलते थे खड़े थे हिरासत में।

बुद्धिजीवी -वह बहुत मन की बात कह दी।

साहित्यकार -मास्टरजी आज विधायक जी के पास नमस्कार करने नहीं गए।

मास्टर जी -हैं हैं हैं .. जी अब आचार संहिता लग चुकी है अब कैसे ---।

बुद्धिजीवी -मैं तो इन नेताओं से दूर ही रहता हूँ वोट तक नहीं डालता ,मेरी नजरों में इन चुनाव बुनाव का कोई महत्व नहीं सिर्फ समय और पैसे की बर्बादी है।

साहित्यकार -जी मैं तो अपनी लेखनी से इन सबकी बखिया उधेड़ देता हूँ ,भ्रष्टाचार पर मेरी किताब ने उनकी अच्छी खबर ली है ,आपने पढ़ी की नहीं।

(बुद्धिजीवी और मास्टरजी बुरा सा मुंह बनाते हैं )

मास्टरजी -जी अभी नहीं पढ़ी लेकिन पढ़ लेंगे। मैं आपसे कह रहा था कि आपलोग मतदाता जागरूकता में अपने लेखन और भाषणों से सहयोग दें ताकि अधिक से अधिक लोग मतदान में भाग लेकर स्वच्छ सरकार चुने।

बुद्धिजीवी -काहे की जागरूकता सब आखरी रात में बिक जाते हैं।

साहित्यकार -मुझे अभी भ्रष्टाचार पर लिखना है ,समय मिला तो जरूर सहायता करूँगा।

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दृश्य 3

(नेता जी अपने समर्थकों के साथ प्रचार के लिए निकल पड़े ,साथ में सबके मन की टोह ले रहें हैं )

नेता जी -आपका व्यापार तो बढ़िया चल रहा है ,कोई दिक्क्त हो तो बताइये।

व्यापारी - जी आपकी दुआ है ,बस जी एस टी का लफड़ा है वर्ना सब ठीक है।

नेता जी -अब ऐसा है देश हित में कुछ कष्ट तो सहने पड़ेंगे लेकिन हमारी सरकार ने व्यापारियों के लिए बहुत कुछ किया।

(उसी समय विपक्षी नेता आ जाते हैं वो भी अपनी टोह लेने निकले थे। )

विपक्षी नेता -हाँ सारे र कष्ट तो व्यापारी ही सहेंगे बाकी के ऐशो आराम तो सत्ता पक्ष के लोग ही भोगेंगे। देश को जहन्नुम में झोंक कर अब सांत्वना जताने आएं हैं ,इस बार तो टा टा बाई बाई है आपकी।

नेता -आपके समय की तो बात करलो पहले सारे देश को बेंच कर घोटालों में डुबो दिया ,अब जनता जान चुकी है मुगालते में मत रहना अभी कुछ साल तक और इन्तजार करो।

व्यापारी (मन ही मन )-मेरा बस चले तो तुम दोनों को खम्बे से बांध कर लठ्ठ से इतना मारुं की तुम दोनों किसी काबिल न रहो।

(दोनों नेता मुस्कुराते हुए एक होटल में चाय पीते हैं एवं अपनी अपनी टिकिट की जुगाड़ की बात करते हैं। )

दृश्य -4

(नेताजी किसान के पास मुस्कुराते हुए पहुँचते हैं ,किसान गुस्से में देखता है )

नेताजी -और भैया आप कैसे हैं मुझे कल से आपकी बड़ी याद आ रही थी ,आज मैं अपने आप को रोक नहीं पाया ,पिताजी कहाँ हैं ?

किसान -उन्हें गुजरे तो 2 माह हो गए आप को अब याद आई।

नेता जी -भैया बड़ा दुःख हुआ ,पिताजी मुझे अपने बच्चे जैसा चाहते थे ,मुझे पता नहीं चल पाया वर्ना मैं जरूर आता। राजनीति में जनता की सेवा के कारण नहीं आ सका ,भैया मुझे माफ़ कर देना।

किसान -हाँ भैया आप 5 साल इतने व्यस्त रहे कि हमारी सुध भी नहीं आई।

नेता जी -हैं हैं भैया आप जानते तो हैं समाज सेवा बिलकुल समय नहीं मिलता।

किसान -भैया कर्जा बहुत है ,सूखा पड़ गया है ,फसल हुई नहीं,पिता जी तेरहवीं में पूरा पैसा लग गया।

नेताजी -कोनऊ बात नहीं भैया मैं हूँ न पैसा की फिकर मत करो (छोटे नेता से )रामलाल भइया को कल पांच हज़ार दे देना।

किसान -लेकिन नेताजी मैं पैसा कैसे चुकाऊंगा ?

नेताजी -अरे भैया पैसों की चिंता मत करो ,वो तो दूध पी रहें हैं आपके पास। बस वो खेत की रजिस्ट्री जमा कर देना। बाकी चिंता मत करना और चाहिए  हो तो और पैसा ले लेना।

किसान -नेता जी आप महान हैं।

नेताजी -बस भैया चुनाव में घर भर की वोटें सब मुझे ही मिलें ,आपका आशीर्वाद चाहिए। (नेताजी किसान के पैर छूतें हैं )

किसान भाव विव्हल होकर नेताजी के स्वागत सत्कार में ला जाता है ,नेताजी अपनी कामयाबी पर मन ही मन मुस्काते हैं।

दृश्य -5

(चुनाव के एक दिन पहले )

नेता जी -क्यों लल्लू तुम्हरे मोहल्ले के क्या हाल चाल हैं ?

लल्लू -नेताजी कुछ पैसे बढ़ाने पड़ेंगें ,लोग इतने में नहीं मान रहे हैं ,कह रहें हैं विपक्षी गुलाबी नोट के साथ कम्बल और बोतल भी दे रहा है।

नेताजी -बहुत भाव बढ़ गए हैं तुम्हारी जात के लोगों।

लल्लू -हैं हैं माई बाप यही तो समय हैं जब आप हम लोगों दबते हैं वर्ना तो हमें जूते ही पड़ते रहतें हैं।

नेता जी -ठीक है बकवास मत करो ,एक गुलाबी ,एक हरे और कंबल ,बोतल में खरीद लो।

लल्लू -आप चिंता न करें माई बाप एक तरफ़ा वोटिंग होगी ,आप की जीत सुनिश्चित है।

नेता जी -मुझे मालूम है लल्लू ,इस भारत के लोकतंत्र को मैं एक रात में खरीद सकता हूँ। और सुन इसकी खबर किसी को न लगे और हरेक से गंगाजल का लोटा हाथ में लेकर शपथ दिलवाना है कि वोट हमें ही देना है।

(नेपथ्य से आवाज़ गूंजती है )

इस भारत के संविधान की इज़्ज़त हमें बचाना हैं।

स्वच्छ और निष्पक्ष तरीके से चुनाव करवाना हैं।

पटाक्षेप

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