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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 53 - 54 // डॉ संध्या तिवारी

प्रविष्टि क्रमांक - 53

डॉ संध्या तिवारी

उगता सूरज

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उसे अपने माही सरीखे लम्बे बालों से बड़ा प्यार था।

आज उसका आईआईटी का रिजल्ट आया था। आईआईटी में सेलेक्ट होने की खुशी में नाते रिश्तेदारों के फोन अड़ोसी पड़ोसी का घर आना जाना लगा हुआ था।

वह झटके से अपने लम्बे बालों को पीछे फेंक कर सभी का अभिवादन कर रहा और बधाइयाँ ले रहा था।

तभी उसे किसी ने दरवाजे के बाहर से पुकारा।

दरवाजे पर उसके कालेज के प्रिंसिपल और मैनेजिंग डायरेक्टर खड़े थे।

उन्हें देखते हुए एक पल को उसका मन कौंध कर आज से दो महीने पीछे चला गया।

हाईस्कूल के बाद ही आईआईटी की तैयारी के लिए उसे कोटा जाना था लेकिन आईआईटी के लिए इन्टर भी पास करना जरूरी था।

इन्टर करने के लिए उसने अपने शहर के एक इन्टर कालेज में डमी स्ट्यूडेंट के बतौर एडमीशन ले लिया था। जहाँ पूरे साल बिना उपस्थित हुए केवल स्कूल की फीस भरकर एक्जाम दिया जा सकता था।

इन्टर, सेकेण्ड इयर में इत्फाक़न वह अपने शहर में था। जब उसकी फेयर वेल पार्टी थी।

डमी स्ट्यूडेंट है तो क्या?है तो इसी कालेज का- सोच कर उसने शेरवानी पहनी अपनी लम्बी जुल्फ़ों को सँवारा और पार्टी में पहुँच गया।

प्रिंसिपल और सारे टीचर उसके इस रूप को देखकर हिल गये। उन्हें लगा यदि यह लड़का यहाँ ज़्यादा देर ठहरा तो उनके कालेज के लड़के बागी हो जायेंगे। लड़कियाँ बिगड़ जायेंगी। संस्कार और संस्कृति का क्या होगा? "बाल कटा कर सभ्य तरीके से स्कूल आओ।"

उन्होंने उसे यह कह कर स्कूल से खदेड़ दिया।

"हेलो! दीपक कहाँ खो गए?"

प्रिंसिपल साहब की आवाज और उनका हाथ मिलाने के लिए बढ़ा हाथ देख-सुन वह वर्तमान में लौट आया।

"जी.. सर.., मैं.. यहीं .. हूँ।"

कहकर उसने गर्मजोशी से हाथ मिलाया और उन्हें घर के अँदर ले गया।

मैनेजिंग डायरेक्टर और प्रिंसिपल साहब दोनों उसे बधाई देते हुए बोले

" दीपक, तुम्हारा एक लेटेस्ट फोटो चाहिए कालेज फ्लैक्सी के लिए।"

"लेकिन सर मेरे जो भी फोटो है बड़े बालों में ही हैं।" दीपक ने कहा

हें...हें...हें... कोई बात नहीं दीपक... तुम तो हमारे कालेज के... स्टार स्ट्यूडेंट...।

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प्रविष्टि क्रमांक - 54

डॉ संध्या तिवारी

जल्पना


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बेसिर पैर के सपने देखने की बीमारी है मुझे । न जाने कितने वैद्य हकीम डॉक्टर इससे निजात न दिला पाए।

सेल्फ फाइनेंस कालेज के मैनेजमेंट ने एक साथी शिक्षक को बिना किसी पूर्व सूचना या ग़लती के निकाल दिया

दूसरे शिक्षक साथी बता रहे थे....

मैंने देखा सबूटी नदी में पानी बहुत कम हो गया सबाना के हरे भरे मैदान लगभग रेगिस्तान बन गए हैं।

शाकाहारी जीवों के प्रवास का समय है

वे अपनी जान बचाने को झुन्ड की ताक़त में है, आदमखोर भरसक दूरी से नज़र गड़ाए हैं शिकार ताड़ लिया गया है । झुंड को ख़बर नहीं। रफ़्तार, रफ़्तार और रफ़्तार..., हमला...,  शिकार लड़खड़ा कर गिर गया...

साथ वाले भागते गये..., भागते गये..., कोई नहीं रूका.... , चीं... चीं... चीं... की कुछ आवाज़ें और आदमखोर ने टेंटुआ दबा दिया.... कुछ देर को भगदड़ ठहर गई... कुछ ने कान फड़फड़ाये... कुछ ने नथुने फैलाये सिकोड़े...., कुछ ने गर्दन मोड़ आँखें फाड़कर देखा... फिर अपनी राह चल पड़े।

"सुन रहे हैं न आप?" साथी शिक्षक होंठ फड़फड़ा रहा था..., दूसरा शिक्षक कान..., तीसरा आँखें... , मैं भी अपनी गर्दन उचका कर हवा में माँस ख़ून की घुलीमिली गंध सूँघ रहा हूँ...।

वातावरण निर्विकार है..., हवा सब ढो ले गई शायद....

अचानक लगा किसी की चिकोटी से मेरा बेसिर पैर का सपना भंग हो गया। मुझे चिकोटी काटने वाला शिक्षक मैनेजिंग डायरेक्टर के सम्मान में खड़ा था। मैं भी हड़बड़ा कर खड़ा हो गया।

मैं ख़ुद न समझ पाया, कि मेरी जल्पना के तार कहाँ तक फैले हैं।

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डॉ संध्या तिवारी

पीलीभीत

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 8165759773629519329

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  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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  2. दोनों कथायें बहुत बढिया एवं सारगर्भित हैं।
    पवन जैन, जबलपुर।

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