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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 62 से 66 // सुधा गोयल 'नवीन'

प्रविष्टि क्रमांक - 62

सुधा गोयल ‘नवीन’

1.... कर्तव्य - बोध


सड़क पर पड़ा वह कराह रहा था।  चारों ओर भीड़ इकट्ठा हो गई थी। नई चमचमाती "डस्टर" गाड़ी उस मासूम को लगभग कुचलते हुए हवा में फुर्र हो गई थी। रास्ते से गुज़रते हुए पुलिस वाले को कर्तव्य बोध हुआ और डंडा घुमाते हुए भीड़ को चीर कर वह पीड़ित तक पहुंचा।  बच्चे के पूरे शरीर से खून रिस रहा था। पुलिस वाला चिल्लाया,

" किसने मारा" 

" गाड़ी का नंबर क्या था?"

"कितने बजे की घटना है?

" गाड़ी में कितने लोग थे?"

"गाड़ी की स्पीड बहुत तेज़ थी क्या?"

भीड़ में से किसी ने आवाज़ लगाई,

"सर…… इस समय इसे अस्पताल ले जाने की ज्यादा ज़रूरत है। "

पुलिस वाला भड़क गया।  "को है साला … हमें हमारा काम सिखाता है। कर्तव्य-बोध दे रहा है। पकड़ो साले को... "

जोर से डंडा ज़मीन पर पटकते हुए पुलिस वाले ने फिर से प्रश्नों की झड़ी लगा दी।

"क्यों?

' कैसे?"

"कहाँ?"

बच्चे के सिर, पैर, पेट से बेतहाशा खून बह रहा था।  धीरे-धीरे उसने दम तोड़ दिया।

प्रश्न बदस्तूर जारी रहे।

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प्रविष्टि क्रमांक - 63

सुधा गोयल ‘नवीन’

2....  भावुक मुर्ख

आँगन से सटे दालान में स्नेहा जी का बिस्तर एक बड़े से  तखत पर लगा है . वे चल-फिर नहीं सकतीं, उठना-बैठना भी किसी की मदद के सहारे ही होता है .. बड़ी सी कोठी है,  सात-आठ कमरे हैं.. . बैठक, रसोई, तीन-चार गुसलखाने, आँगन और यह एक दालान ... . स्नेहा जी का ठिकाना यही दालान है जो आँगन में खुलता है . आँगन से कोठी का मुख्य द्वार स्नेहा जी को साफ़ दिखाई देता है, तखत पर लेटे लेटे उन्हें सब पता रहता है कि कब दूधवाला आया, कब महरी, धोबी और सब्जी वाला … स्नेहा जी को इसी दालान और तखत से आभास होता था सूरज की पहली किरण का और शाम को घर लौटती चिड़ियों के शोर का ..….

जब अच्छे दिन थे तो अपने बच्चों की तारीफ़ करते न थकती ..गर्व से फूली जगत ठिंठोरा पीटती कि यदि इन्होने हठ न ठान ली होती तो उनके चौथा भी बेटा ही होता और राम-लक्षमण-भरत के बाद शत्रुघन की कमी न खलती…. चार-धाम का सुख उन्हें घर पर ही मिलता ..

आज अकेले पड़े-पड़े सोचती हैं, अच्छा हुआ चौथा न हुआ…ज़मीन-जायदाद के बंटवारे को लेकर तीनों आपस में लड़ने-भिड़ने पर उतारू हैं, कोई किसी से बात नहीं करता…. जब तक उनके पिता रहे, बच्चे आते थे, मकसद होता था जायदाद पर हिस्से की बात करना ...बराबर दबाव डालते रहे,  प्रयोजन सिद्ध न हुआ तो माँ को हवेली में भगवान भरोसे छोड़कर या कहो कि शांता बाई और मनोहर महाराज के भरोसे छोड़कर अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हो गए….….

सुबह का सूरज स्नेहा जी को हर दिन एक नई ऊर्जा और विश्वास से भर देता कि उनकी परवरिश में कभी,  कहीं कोई कमी नहीं रही तो ईश्वर उनके साथ कैसे अन्याय कर सकता है...चौदह साल का बिछोह तो माँ कौशल्या को भी सहना पड़ा था…. ज़रूर उनके बच्चों को किसी ने नहीं बताया होगा कि वे चल-फिर नहीं सकती, खटिया पकड़ ली है उन्होंने….. और हर शाम चीं.चीं..चीं चीं...करती शोर मचाती, घर लौटती चिड़ियों के साथ उनका मातृत्व पिघलने लगता और इंतज़ार का रूप लेकर आखों के कोने से बहने को बेचैन हो जाता… अवसाद से मन डूबने लगता...चिड़ियों का शोर थम जाता...शायद सब घर पहुँच चुकी होतीं… गहराती साँझ काली रात के आगोश में समा जाती… फिर सुबह होती और स्नेहा जी एक नई ऊर्जा और विश्वास से भर उठती ….वे सोचतीं, वह शाम कभी तो आयेगी जब चहकती चिड़ियों की तरह उनके राम-लक्ष्मण-भरत लौटेंगे……

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प्रविष्टि क्रमांक - 64

सुधा गोयल ‘नवीन’

3........रेत पर कारीगरी

“अनु,  क्या यह सच है कि तुम्हारे पापा की किडनी पूरी तरह खराब हो चुकी थी और तुम्हारी माँ ने अपनी इच्छा से अपनी किडनी उन्हें दान की है?”

“जी मैम …”

“परिवार की सारी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है … घर-खर्च, डॉक्टर-दवाई-अस्पताल सब कैसे संभाल लेती हो ? पगार भी कितनी कम है तुम्हारी….. क्या तुम्हें डर नहीं लगा कि पापा को बचाने की ज़िद में यदि माँ को भी कुछ हो गया तो …..”

“मैम, हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि किडनी खरीद सकते…...माँ की किडनी मैच कर गई थी, तो यही ठीक लगा…..”

“तुम्हें पता है कि कभी-कभी साल-छह महीने बाद भी किडनी रिजेक्ट हो जाती है ?…. फिर पापा तो नहीं बचेंगे, माँ का जीवन भी खतरे में पड़ जाएगा…”

“पता है…”

अनु गंभीर हो गई.. हरदम मुस्कुराने वाली लड़की एकदम संजीदा होकर बोली, “मैम आप तो ऐसा मत कहिये…. सबने मुझे डराया, उल्टी-सीधी बात बताकर निराश किया...... केवल आपने ही ने हर मुश्किल घड़ी में मेरी मदद की है...... आप भी.....”

अनु की आखें छलक गई।

इतनी निष्ठुर मैं कैसे हो गई, वह भी अनु के प्रति, जो मेरे दिल के इतने करीब है...... अपराध-बोध से बचने के लिए मैंने एकदम से कहा, “नहीं… नहीं…. मेरा वो मतलब नहीं था। तुम्हारे जैसी बहादुर लड़की के साथ ईश्वर कोई अन्याय नहीं करेंगे। जो लोग विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी संतुलन बनाए रखते हैं, हार नहीं मानते, ईश्वर उनके साथ रहते हैं...... यह तो तुमने सुना ही होगा। अनु मैं आज भी तुम्हारे साथ हूँ। मेरी मदद की आवश्यकता हो तो निःसंकोच कहना।”

अनु का मनोबल लौट आया था … बोली, “मैम आपने सुदर्शन पटनायक जी का नाम सुना हैं न...... वही जो जगन्नाथधाम-पुरी  उड़ीसा के हैं और रेत पर कारीगरी करते हैं......जिन्हें इन्डियन गवर्नमेंट ने 2014 में पद्मश्री से सम्मानित किया था।”

अनु सामान्य हो रही थी, उत्साहित भी…. मैंने चिंहुक कर ज़बाब दिया, “हाँ.हाँ..... सुना है, पर तुम क्या कहना चाहती हो ?”

“मैम, रेत के महल को पानी की एक लहर बहा कर ले जाती है… क्षणभंगुरता का इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता, फिर भी सुदर्शन जी ने हिम्मत नहीं हारी और आज उनकी बनाईं  रेत की कलाकृतियाँ लिमका गिनीस बुक में दर्ज़ हैं। मैं भी हार नहीं सकती मैम !”

अनु का मतलब मैं समझ चुकी थी।  विषम से विषम परिस्थिति में भी हार न मानने वाले, रेत पर कारीगरी करने वाले अद्वितीय कलाकार एवं  प्रेरणा के श्रोत, सुदर्शन को मैंने मन ही मन प्रणाम किया और अनु के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने लगी।

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प्रविष्टि क्रमांक - 65

सुधा गोयल ‘नवीन’

4........सबल संकल्प 

"सुनो, मैंने अपने ऑफिस के कुछ लोगों को सन्डे डिनर पर बुलाया है। यही कोई दस-बारह लोग हो जायेंगे। कुछ अच्छा सा बना लेना। और हाँ सभी मिठाई के बड़े शौकीन हैं, दो तरह की बना लेना। सभी तुम्हारे हाथ के खाने की तारीफ़ करते नहीं थकते।"

अपनी बात ख़त्म करते ही ये बाहर निकल जाते, उसके पहले मैंने रोक लिया और कहा, "मैंने आपको बताया था कि सोमवार से गीता के इम्तहान हैं..... हम पार्टी अगले हफ्ते कर लेंगे..... उसकी मदद के बिना मेरे लिए कितना मुश्किल होगा। "

इन्होंने मुस्कुराते हुए चुटकी ली, "तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे संध्या के इम्तहान हैं। गीता का काम है तुम्हारी मदद करना ........ अरे भई पैसे देते हैं हम उसे..... नहीं... नहीं..... मैं सबसे कह चुका हूँ, पार्टी तो होगी।"

संध्या हमारी बेटी है तो उसके इम्तहान होने पर न घर पर किसी को बुलाया जाता है और ना ही हम कहीं जाते हैं, जिससे उसका पढ़ाई से ध्यान न हटे, उसे डिस्टर्ब न हो। गीता हमारी कामवाली है, हमारे साथ रहती है , हम उसे पढ़ा रहे हैं। वह घर का सारा काम करती है, खाली समय में कब पढ़ती है, हमें पता भी नहीं चलता।

गीता बारहवीं का इम्तहान देगी इस बार। मैंने सोचा था जिस दिन पेपर होगा उसके एक दिन पहले उससे किसी काम को न कहूंगी। मैं बहुत उदास और दुविधा में थी। गीता ने मेरी परेशानी भांप ली।  मेरे पास आकर बोली,

"आंटी आप चिंता न करें, मैं बहुत अच्छे नंबर लाऊंगी। और काम भी मैं सब संभाल लूंगी।"

"सोमवार से तेरे इम्तहान हैं, एक दिन पहले रिवीज़न नहीं करेगी तो अच्छे नंबर कैसे आयेंगे।"

"करूंगी न....."

"कैसे"

"आंटी, मैंने अपने मोबाइल से  गेस-पेपर के सारे प्रश्नोत्तर की फोटो खींच ली है...... जब आप लोग बातें करते रहेंगे....... ड्रिंक लेते रहेंगे.......  मैं किचिन में बैठे-बैठे रिवीज़न कर लूंगी। किसी को पता भी नहीं चलेगा।"

भावावेश में मैंने गीता को गले लगा लिया।

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प्रविष्टि क्रमांक - 66

सुधा गोयल ‘नवीन’

5.......इश्तिहार

लाउड-स्पीकर पर फुल-वाल्यूम में गाने बज रहे थे.  “झण्डा ऊंचा रहे हमारा….. “ “मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे -मोती, मेरे देश की धरती .........”  “ ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आंख में भर लो पानी………. “

15 अगस्त का दिन ........

छुट्टी का दिन ....... न केवल स्कूल-कॉलेज में वरन गली मोहल्लों में भी उत्सव का माहौल था. रंग-बिरंगे, नए कपड़ों में बच्चे गा रहे थे, झूम रहे थे. मिठाई वालों ने अपनी-अपनी दुकानें सड़क तक बढा ली  थीं . देश की आजादी का जश्न था , धूम-धाम से मनाना भी चाहिये. अनगिनत वीरों की कुर्बानियों का दिन, बेहद खुशी का दिन.

जगह-जगह झंडारोहण की तैयारियां हो रही थीं। कहीं उच्चपदस्थ कर्मचारी तो कहीं नेता, कहीं स्कूल प्रतिनिधि तो कहीं सेनाप्रमुख ध्वजारोहण करने के लिए आमंत्रित थे।

दादा जी गर्व से सर ऊंचा किये, साफ़ सफ़ेद बुर्राक धोती कुर्ता  पहने उस ओर बढ़ रहे थे जहाँ से लाउड-स्पीकर की आवाज आ रही थी. वहाँ एक तम्बू लगा था. एक स्टेज बना था और कुछ कुर्सियाँ पड़ी थीं . थोडी देर में वहाँ पर स्थानीय  नेता जी और सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी का आगमन होने वाला था. देश-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत दादा जी, सेना के अधिकारी का ओजस्वी भाषण सुनने की बेताबी में जल्दी-जल्दी, बढ़े चले जा रहे थे. दादा जी समय के बड़े ही पाबन्द थे। गाँधी जी के पक्के भक्त। दादा जी को पता था कि सेना के अधिकारी अनुशासन, नियमबद्धता, और समय के कितने पाबन्द होते हैं इसलिए वे जल्दी में थे। वे सेना-प्रमुख के भाषण का एक शब्द भी छोड़ना नहीं चाहते थे।

दादा जी ने ठीक स्टेज के सामने, पहली पंक्ति में  अपनी कुर्सी संभाल ली और व्यग्रता से मुख्य अतिथियों के आने का इंतज़ार करने लगे. जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था उनका धैर्य जबाब देता जा रहा था. वे बड़बड़ाए, “समय की पाबंदी नहीं ...  देश की बागडोर क्या संभालेंगे .... एक हमारा ज़माना था ....” बात-बात में अपने जमाने को याद करने की दादा जी की आदत सी हो गई थी .. फिर भी वे बैठे रहे। देश-प्रेम से ओत-प्रोत भाषण दादा जी को स्वतंत्रता-संग्राम और अपने ज़माने की याद दिलाता था। उनकी रगों में जोश और उत्साह का संचार कर देता था।

मोटर-गाड़ियों की कर्कश आवाज, उमडते हुए जन-समूह, धूल-धक्कड़ के साथ मुख्य अतिथियों ने पंडाल में प्रवेश किया. संकेतों की भाषा से लाउड-स्पीकर पर गाने बंद करने का आदेश हुआ, नेता जी व् सेना-प्रमुख ने मिलकर ध्वजारोहण किया।  तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा पंडाल गूँज उठा। स्कूली बच्चों ने वंदे मातरम और जन-मन-गण पूरे जोश से गाया।

स्वागत आदि की कुछ औपचारिकताओं के बाद नेता जी ने अपने भाषण में स्वतंत्रता सेनानियों की अनेकानेक बार दोहराई गई कुर्बानियों के साथ अपनी पार्टी के योगदान पर प्रकाश डाला, फिर आज के नौजवानों में देश पर मर-मिट जाने के ज़ज्बे में आई घोर गिरावट पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि पहले  सेना में भर्ती होने की होड़ लग जाती थी. फौलादी इरादों वाला हर नौजवान चाहता था कि उसकी अंतिम सांस देश के नाम पर हो. अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे दादा जी ने अभिमान पूर्वक स्वीकृति में सिर हिलाया . इधर नेता जी ने सेना के अधिकारी की ओर देखते हुए, जो पीछे बैठे अपनी बारी आने का इंतज़ार कर रहे थे, कहा, “जोशी जी, आप ही बताइये कि आज सेना में भर्ती के लिए और नौजवानों को प्रेरित करने के लिए आपको कैसे-कैसे पापड़  बेलने पडते है.”

जोशी जी ने माइक सम्भाला और मुँह लटकाये हुए बोले, “जी हाँ जनाब आज की युवा पीढ़ी में देश प्रेम का वह जज्बा देखने को नही मिलता जो पहले हुआ करता था.  सेना में भर्ती होने के लिए नौजवानों को आकर्षित करने के लिए बहुत विचार-विमर्श करने के बाद हमने एक इश्तिहार निकाला .. और जनाब मेरा विश्वास करे उस इश्तिहार ने तो कमाल ही कर दिया. आवेदन-पत्रों की संख्या ने हमें अचंभित कर दिया.”

कुछ आवाजें उठी “इश्तिहार क्या था.”

जोशी जी बोले, “जनाब आज हीरो-हीरोइनों के प्रति जो आकर्षण है वह देश-प्रेम से बढ़कर सिद्ध हो रहा है. हमने इश्तिहार दिया था कि यदि आप प्रियंका चोपड़ा, प्रीटि जिंटा, अनुष्का शर्मा या  सेलिना जेटली जैसी हीरोइनों के पिता बनना चाहते हैं तो सेना में भर्ती होइये क्योंकि इन सभी हीरोइनों के पिता सेना में रहे हैं...... .”

सेना-प्रमुख का भाषण जारी था।  वे पूरे जोश से और भी कारगर तरीकों की व्याख्या किये जा रहे थे, लेकिन दादा जी का उत्साह ठंडा पड़ गया था।  अभिनेताओं और उनके इश्तिहारों में उनकी कोई रूचि न थी। वे अनमने मन से उठे और घर का रुख किया.

वे बड़बड़ा रहे थे, “ क्या ज़माना आ गया है. हमारे ज़माने.....” बाक़ी के शब्द कहीं खो गए। दादा जी बुझा मन लिए घर लौट आये। सफ़ेद बुर्राक कपड़े उतारते समय उन्हें लगा जैसे उनके कपड़ों पर बहुत सारे कीचड़ के दाग लगे हों।

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सुधा गोयल " नवीन"


3533 सतमला विजया हेरिटेज फेस - 7

कदमा ,  जमशेदपुर  - 831005


इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से मास्टर्स (हिंदी )

'और बादल छंट गए " एवं "चूड़ी वाले हाथ" कहानी संग्रह प्रकाशित

आकाशवाणी से नियमित प्रसारण एवं कई पुरस्कारों से सम्मानित ...

झारखंड की चर्चित, एवं जमशेदपुर एंथम की लेखिका

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2265430574828581386

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  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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