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फिर भी क्यों // रतनलाल जाट की कविताएँ

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  फिर भी क्यों                यह बात गलत है सबको इसका पता है फिर भी लोग क्यों ऐसी बात करते हैं उसको यह काम नहीं करना चाहिए इससे एकदि...

 

फिर भी क्यों 
             
यह बात गलत है
सबको इसका पता है
फिर भी लोग क्यों
ऐसी बात करते हैं
उसको यह काम नहीं करना चाहिए
इससे एकदिन विनाश पक्का है
तो भी उसके जैसे हम क्यों
ऐसे काम को अन्जाम देते हैं
हर कहीं आप सुनते हैं
कि नशा बहुत बुरी चीज़ है
फिर वो कौन है जो
दिन-रात नशे में डूबे हैं
झूठ छुपता नहीं है
अन्त में जीत सत्य की है
फिर भी हर तरफ देखो
झूठ के बिना काम नहीं चलता है
चोरी-रिश्वतखोरी शब्द सुनके
हर कोई नाक-भौंह सिकोड़ता है
फिर भी आज तक क्यों
इनका नामोंनिशान नहीं मिटा है
लूट और हत्या जघन्य अपराध है
तो भी अखबार के पन्ने पलटो
बिना खूनी छींटों के कोई पृष्ठ नहीं है
यह सब तो बहुत आम बात है
पर इज्जत और चरित्र सबसे ऊपर है
फिर ये पर्दे के पीछे मुँह छिपाये क्यों
अंत में सलाखों में जा पहुँचते हैं

आखिर क्यों
          
टीवी, अखबार और मोबाइल पर
आये दिन देखते हैं हम
किसी प्रेमी युगल ने दी है जान
पर कुछ समझ नहीं आती है बात
प्रेम का मतलब जानते हो क्या है
अलग-अलग कामों में दुनिया ने देखा हैं
कोई इसका संबंध वासना से
तो कोई नाजायज रिश्ते से
यहाँ तक लोग एसिड अटैक में
और मर्डर-रेप में भी प्रेम देखते हैं
आखिर क्यों बदनाम करते हो
क्यों पाप के बीच प्रेम खोजते हो
माना कि प्रेमी सब कुछ वार देता है
पर प्रेमिका की बलि क्यों चढ़ाता है
प्यार की ख़ुशी के लिए है त्याग का महत्व
प्यार को मिटाकर मरना नहीं है इसका अर्थ
दुख से लड़ा जाता है खून का घूँट पीया जाता है
पर कभी जहर ना पीया जाता है ना ही दिया जाता है
जहाँ कोई स्वार्थ हो वहाँ क्या प्यार है
जो किसी से कुछ चाहे वो कैसा प्रेम है
इसमें ना दुनिया का डर ना कोई कायरता होती है
हर मुश्किल में हाथ थामे सीना ताने लड़ा जाता है
जब कहीं दुर्गंध दिखाई दे
तो नाम कभी प्यार का ना दे
उनको प्रेमी जन कभी ना कहना
अय्याशी या कामुकता का नाम ही देना


पूछा था बेटी ने
               
एकदिन पास आकर मेरे
बड़ी ही मासूमियत से
पूछा था बेटी ने
भगवान ही सबको जन्म देता है

फिर क्यों लोग
सब एक जैसे नहीं होते हैं
क्यों बनते हैं बुरे वो
क्यों नहीं अच्छे होते हैं

चुपचाप मैं उसे देखता रहा
होंठ अभी भी हिल रहे थे
और आँखों में साफ झलक रहा था
विस्मय, क्रोध और दुःख सब साथ थे

मैंने कहा, मेरी प्यारी गुडिया
भगवान तो सबको अनमोल मनुष्य जन्म देता हैं
ना किसी को वो अच्छा बनाता है ना ही बुरा 
सब कुछ यहीं पर ही सीखते हैं

कई राम और कई रावण बनते
कोई लंका में नाम राम का है भजता
तो कोई अयोध्या में रह करके
अपनों को ही वनवास है दिलाता


इसमें भगवान का कोई दोष नहीं है
यहाँ की हवा और पानी ही कुछ ऐसा है
किसी को तो हवा लग जाती है
और कोई हवा को ही बदल देता है

कोई पानी से प्यास बुझाता है
और कोई पानी में जहर घोलता है
देखो,  दुनिया में सब कुछ होता है
पर हमको संभलकर ही चलना है

ना तो हवा लगनी चाहिए
ना ही पानी बदबू वाला पीजिए
बस, जो यहाँ पर जैसा बोता है
उसको वो फल भी वैसा ही देता है


आरक्षण
            
एकदिन उसने खाना बनाकर,
मुझसे कहा था इशारा कर।
सुनो, सबसे पहले जली-कटी दो-तीन रोटी खाकर,
फिर अंत में खाओगे तुम एक अच्छी रोटी हाथ लेकर।।
और हाँ भूखा मत रहना,
पर इसका पूरा ध्यान भी रखना।
मैं सुनता ही रहा उसकी सारी बात,
पर कुछ समझ नहीं पाया था खास।
भला सोचो कौन पसंद करेगा?
जली-कटी रोटी सबसे ऊपर मुर्ख होगा।
कौन बाद में सन्तुष्टि के तौर पर,
खाएगा चुपड़ी रोटी दिखावे के खातिर।

मैं सोच ही रहा था,
इस उलझन से कैसे पार पाऊँ?
तभी उसने गंभीर स्वर में कहा,
बताओ, सबसे पहले अच्छी रोटी ही क्यूँ?
देखो, सरकार और कानून को,
जो पहले शून्य से दस अंक वालों को।
और फिर अंत में गिनती है वो,
नब्बे से ऊपर वालों को।।
मैं मूक था उसके सामने,
तभी कहा उसने हँस करके।
मैं आरक्षण की बात कर रही थी,
तुम कितने सीधे हो? समझे ही नहीं।


ये सब क्या है?
                
अनायास ही
आँखों का मिल जाना
मिलकर हँसना
और फिर शरमाना
आँखें झूक जाती है
या दूसरी तरफ मुड़ जाती है
दिल में खुशी
समाये नहीं समाती है
वापस अचानक ही
आकर मिल जाती है
आँखें कुछ बातें कहती

जो कभी खत्म नहीं होती हैं
और पता ही नहीं चलता
वक्त बहुत गुजर जाता
दिल चाहे वक्त को थामना
पर कोई रोक नहीं पाता
हजार गम आ पहुँचते
जब जुदा वो होते हैं
फिर वापस शुरू हो जाते
कुछ एहसास नये
खुल जाती है
आत्मा की आँखें
कभी करती है बातें
और कभी आते हैं यादों के सपने
कुछ समझ नहीं आता ये सब क्या है


रूपये
    
रूपये-पैसों से भरा बैग
या कोई लाखों का चैक
क्या चाहिए आपको
अपनों का प्यार
या चैन की नींद
नहीं चाहिए आपको
बहुत कुछ है
फिर भी बहुत ही कम है
यही लोगों की सोच है
नहीं है पता आपको
पैसे वाले पैसों के लिए
लड़ते हुए दिखते
और गरीब लोग अमीरों पर
दया है दिखाते
क्या अमीरों को
दया करते देखा है
मैंने नहीं देखा
इसीलिए पूछा है आपको
गाड़ी है बंगला है
पर रहने वाला नहीं है
या कहें कि फुर्सत कहाँ है
कोई कहता है कभी
आज अपनों के साथ हूँ यहीं
कोई तो कह ही देता है
क्या आज जल्दी नहीं है आपको


प्यारा बेटा
  
मेरा कुछ उदास चेहरा देख
पूछ लिया उन्होंने आकर पास
तुम बीमार हो और
नहीं कराया कुछ भी इलाज
मैंने पूछा आपको कैसे मालूम
तो बोले देखो तुम्हारी आवाज़
कितनी बुरी हालत कर दी
चलो जल्दी अस्पताल
लोग सोच रहे थे कि
ये कौन हैं मेरे
तो सुनो ये मेरे पिता से बढ़कर है
क्योंकि मैं इनका प्यारा बेटा हूँ

बात वो
        
अक्सर घर के भीतर ही होते हैं सब
और साथ भी रहते हैं रात-दिन
फिर भी कुछ कह नहीं पाते हैं
सब कुछ दिल में ही छुपाते हैं
जब कभी वक्त मिलता कुछ पल
उस समय पूरी गाँठ जाती है खुल
जबकि कभी पूछा नहीं एक दूसरे को
और बिना कुछ कहे बता दी बात वो
नहीं कह पाये थे घर में
नहीं सुन पाये जिसे अपने


पानी
         
पानी को मालुम
मछली का जीवन कितना
कौन है महत्वपूर्ण
दोनों को ही है पता
यदि वो मिलेगा नहीं
तो इसका हाल क्या होगा
यह जानता है बस वही
मैं इसके लिए सबकुछ हूँ क्या
मेरे बिना वो जी सकेगी
हाथ में उसके जीवन नहीं अपना
मछली तड़पती उसके लिए
कि वो कुछ पल जीने को देगा
पानी! अगर वो मर गयी
तो तुम्हारा धर्म नहीं बचेगा
आखिर सोचो जान चली गयी
तो क्या पानी पानी रहेगा



अनमोल मिलन
           
मन में बार-बार
आ रहा था एक ही विचार
काश! हमें आज वो मिल जाता
पर आखिर शाम हो गई
और मिलने की कोई उम्मीद ना शेष थी
बस, दिल में आस अब भी थी
पर मैं हिम्मत हार गया
सपनों पर पानी फिर गया
जब चलने की बारी आ गई
तो दिल का दीया बुझ गया था
अपने नीड़ की राह पकड़
चलने लगा था मैं अधूरे मन
और अचानक सामने
राह में आते हुए
वो दिखाई दिया
मेरी ही तरफ आ रहा था
पर एकाएक विश्वास ना हुआ
शायद जैसे कोई सपना था
मैंने कहा, क्या तुमको पता था
कि मैं अभी यहाँ से गुजर रहा हूँ
देखो, कितना अच्छा संयोग है
वैसे इधर मैं कभी नहीं आता हूँ
पर आज यूँ ही आ गया
हँसकर उसने कहा था
नहीं, यह मिलन
अपना नहीं है
दिलों के प्यार का
अनमोल मिलन है
मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा था
तो वो भी सिर हिलाकर गवाही देने लगा

---

       

लेखक-परिचय

रतन लाल जाट S/O रामेश्वर लाल जाट

जन्म दिनांक- 10-07-1989

गाँव- लाखों का खेड़ा, पोस्ट- भट्टों का बामनिया

तहसील- कपासन, जिला- चित्तौड़गढ़ (राज.)

पदनाम- व्याख्याता (हिंदी)

कार्यालय- रा. उ. मा. वि. डिण्डोली

प्रकाशन- मंडाण, शिविरा और रचनाकार आदि में

शिक्षा- बी. ए., बी. एड. और एम. ए. (हिंदी) के साथ नेट-स्लेट (हिंदी)


ईमेल- ratanlaljathindi3@gmail.in

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रचनाकार: फिर भी क्यों // रतनलाल जाट की कविताएँ
फिर भी क्यों // रतनलाल जाट की कविताएँ
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