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आलेख - खंजन-सी फुदकती शैली का जादूगर- ‘कलम का जादूगर’- रामवृक्ष बेनीपुरी // - डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज

आलेख -  खंजन-सी फुदकती शैली का जादूगर- ‘कलम का जादूगर’- रामवृक्ष बेनीपुरी

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- डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज

“आषाढ़ की रिमझिम है। समूचा गांव खेतों में उतर पड़ा है। कहीं हल चल रहे हैं , कहीं रोपनी हो रही है । धान के पानी-भरे खेतों में बच्चे उछल रहे हैं । औरतें कलेवा लेकर मेड़ों पर बैठी हैं ।…उनकी खंजरी डिमक-डिमक बज रही है और वे गा रहे हैं, “ गोदी में पियवा, चमक उठे सखिया, चिहुंक उठे न..”।” -‘बालगोबिन भगत’ रेखाचित्र से

यह किस व्यक्ति की भाषा है? किसकी अद्भुत शैली है? दिल को छूती और गुदगुदाने वाली किसकी भाव-व्यंजना है? किस कलम का जादू है? कौन है कलम का जादूगर? –‘रामवृक्ष बेनीपुरी'। जी हां, सही पहचाना आपने । रामवृक्ष बेनीपुरी को पूरा संसार ‘कलम का जादूगर' के रूप में जानता है । छोटे-छोटे वाक्यों में खंजन-सी फुदकती शैली उनके लेखन की अपनी विशिष्टता है । जीवंत भाषा, ओजपूर्ण शैली, तथा आलंकारिकता के कारण पाठकों को विशेष रूप से प्रभावित करते हैं । शैली की विशिष्टता के कारण ही उन्हें ‘कलम का जादूगर' कहा जाता है।

रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बेनीपुर गांव में सन् 23 दिसंबर, 1899 ई. को पिता श्री फुलवंत सिंह के घर हुआ था । इनका मूल नाम रामवृक्ष शर्मा था । बेनीपुर में जन्म लेने के कारण अपना उपनाम ‘बेनीपुरी’ रखा । माता-पिता के बचपन में निधन हो जाने के कारण इनका लालन-पालन इनकी मौसी ने किया । बचपन के आरंभिक वर्ष अभावों-कठिनाइयों और संघर्षों में बीते। प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव और ननिहाल बंसीपचड़ा में पूरी की । मैट्रिक पास किया और कॉलेज की पढ़ाई छोड़ सन् 1930 में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़ गए । बाद में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से विचारक परीक्षा उत्तीर्ण की । इस मध्य स्वतंत्रता सेनानी महादेवशरण की पुत्री उमारानी के संग दांपत्य सूत्र में बंधे।

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साहित्य सेवा के क्षेत्र में पत्रकारिता के माध्यम से आए । 15 वर्ष की अवस्था में ही बेनीपुरी जी की रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थीं । यह एक बेहद प्रतिभाशाली पत्रकार थे । इन्होंने अनेक दैनिक साप्ताहिक एवं मासिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, जिनमें ‘तरुण भारत', ‘किसान मित्र', ‘बालक’, ‘योगी’, ‘जनता’, ‘जनवाणी’, और ‘नई धारा' उल्लेखनीय हैं । ये बहुमुखी प्रतिभा वाले लेखक थे । नाटक, एकांकी, जीवनी, संस्मरण, निबंध, यात्रा-वृत्तांत, रेखाचित्र, आदि गद्य विधाएं इनकी जादूभरी लेखनी से साकार होती हैं । संस्कृत के तत्सम, उर्दू-फ़ारसी, देशज शब्दों की प्रयुक्ति भरी भाषा में सरलता, सुबोधता तथा ओज गुण की प्रधानता है । रचनाओं में गहरी अनुभूतियां और उच्च कल्पना का अद्भुत समिश्रण है, तो स्वाधीनता की चेतना, मनुष्य की चिंता और इतिहास की युगानुरूप व्याख्या भी है । परिचयात्मकता, सृजनात्मकता और भावुकता की त्रिवेणी का विद्यमानपन है, तो समाजवादी मानववादी की समन्वित अभिव्यक्ति भी । समग्रतया कि उनके साहित्य मानस का निर्माण समाज, संस्कृति, इतिहास, दर्शन की चिंता-धाराओं से होता है ।

बेनीपुरी जी का व्यक्तित्व आकर्षक और शौर्य की आभा से दीप्त था । उनका जीवन-संघर्ष और रचना-कर्म दोनों परस्पर पर्याय हैं । इनकी आत्मा में राष्ट्रीय भावना लहू के संग लहू के रूप में बहती थी, जिसके कारण आजीवन वे चैन की सांस न ले सके । इनकी दृष्टि में नये समाज के लिए संस्कृति की प्रतिष्ठा, स्वीकृति और अंगीकृति अपरिहार्य है । भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में आठ वर्ष जेल में बिताए । अधिकतर रचनाएं उस काल में कीं । संगठनात्मक तथा प्रचारात्मक कार्यों द्वारा भी हिंदी की बड़ी सेवा की । बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना में विशेष योगदान दिया । 1946 से 1950 तक उसके प्रधानमंत्री तथा 1951 में सभापति रहे । 1929 में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रचार मंत्री रहे । 1957 में बिहार विधानसभा के सदस्य भी चुने गए ।

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इनके सम्मान में भारतीय डाक-सेवा ने डाक टिकटों का एक सेट जारी किया था तथा इनके सम्मान में बिहार सरकार द्वारा वार्षिक ‘अखिल भारतीय रामवृक्ष बेनीपुरी पुरस्कार' दिया जाता है । इनकी प्रकाशित तथा अप्रकाशित कृतियों की संख्या 60 से अधिक है । ‘बेनीपुरी प्रकाशन' के तत्वावधान में इनके समस्त कृतित्व को ‘बेनीपुरी ग्रंथावली' दस जिल्दों में प्रकाशित है । ग्रंथावली के प्रथम खंड के अंतर्गत कहानियां तथा उपन्यास – ‘माटी की मूरतें' (1941-45), ‘पतितों के देश में' (1930-32), ‘लाल तारा' (1937- 39) ,‘चिता के फूल’(1930- 32), ‘कैदी की पत्नी'(1940) , ‘गेहूं और गुलाब' ( 1948-50)। ग्रंथावली के दूसरे खंड में कुल छोटी-बड़ी 12 नाट्य कृतियां हैं –‘अम्बपाली’ (1941-45) ‘सीता की मां' , ‘संघमित्रा’ (1948-50), ‘अमर ज्योति' (1951), 'तथागत' , ‘सिंहल विजय', ‘शकुंतला’, ‘रामराज्य’, ‘नेत्रदान’ (1946-50), ‘गांव के देवता', 'नया समाज' तथा ‘विजेता’ (1953) । अन्य प्रकाशित कृतियों में ‘विद्यापति की पदावली' (संपादित), ‘बिहारी सतसई' की सुबोध टीका , ‘जयप्रकाश’ (जीवनी) और ‘वंदे वाणी विनायकौ' (ललितगद्य, 1953-54) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । इस महान पत्रकार, संपादक, साहित्यकार, नाटककार, , निबंधकार, उपन्यासकार और स्वतंत्रता सेनानी का निधन सितंबर, 1968 ई. को हो गया ।

डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज, शेखपुरा, खजूरी, नौबतपुर, पटना-801109. मो.नं.9334884520.

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