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आँख वाले तो देख लेते - दीपक दीक्षित

कई साल पहले की बात है ,मेरे ग्यारह वर्षीय पुत्र ने गिटार सीखने की इच्छा जाहिर की थी। मेरे घर के पास ही एक संस्थान था जहाँ बच्चों को गिटार सीखने का प्रशिक्षण दिया जाता था, अत: मैंने अपने बेटे का दाखिला वहां करा दिया। वहां दो तीन महीने की शिक्षा के बाद मेरा तबादला दूसरे शहर में हो गया । नए शहर में जाकर एक और संस्थान ढूंढ कर मैं अपने बेटे को वहां लेकर गया।

उसने अब तक क्या सीखा है यह देखने के लिए वहां के नए शिक्षक ने मेरे बेटे से गिटार बजाकर दिखाने को कहा। उस समय मैं भी वहां उपस्थित था। उसकी गिटार को पकड़ने की मुद्रा को असहज और अस्वाभाविक देख कर शिक्षक ने उसे टोका तो मेरा भी ध्यान उस और गया। मुझे यह समझते देर नहीं लगी कि मेरा बेटा जो एक लेफ्टी (बाएं हाथ का अधिक प्रयोग करने वाला) था ,उसने गिटार को अपनी स्वाभाविक मुद्रा के उलट पकड़ा था यानी बाएं की बजाय वह दाएं हाथ का प्रयोग करके गिटार बजने का प्रयास कर रहा था और इस प्रक्रिया में असहज हो रहा था।

पूंछने पर पता लगा कि पहले वाले संस्थान में गिटार सीखने वाले गुरूजी दृष्टिहीन थे। उन्होंने सब बच्चों के साथ प्रारंभिक सत्र से ही मौखिक निर्देश देकर दाएं हाथ से से गिटार पकड़ना /बजाना सिखाया ।अब गुरूजी तो मेरे पुत्र की असहजता देख नहीं सकते थे और मेरा ग्यारह वर्षीय पुत्र में इतनी समझ और साहस नहीं था कि वह गुरूजी के आदेशों को चुनौती देता और उनकी कमी निकलता। अत: उसे इस असहजता की पीड़ा से गुजरना पड़ा।

इस समस्या से निबटने के लिए नए गुरूजी को कई दिनों तक मेरे पुत्र के विशेष सत्र लेने पड़े जिसमें उन्होंने उसे फिर अपनी स्वाभाविक मुद्रा में गिटार पकड़ना सिखाया।

पर आज मैं कई ऐसे आँख वाले माँ - बाप को देखता हूँ जो अपने बच्चों की असहजता को या तो देख नहीं पाते या देखना नहीं चाहते और ऐसे कृत्य करने पर मजबूर करते हैं जो उनकी नैसर्गिक / स्वाभाविक स्वभाव के विरुद्ध है।

आँखें होते हुए भी वे दृष्टिहीन सा आचरण करते है। ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे।


दीपक दीक्षित

निवास : सिकंदराबाद (तेलंगाना)

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

संपर्क​ : coldeepakdixit@gmail.com

रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया।

पढने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी । कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी हैं।

भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो,योगी बनो' नामक पुस्तक तथा 6 साँझा-संकलन प्रकाशित हुए हैं ।

कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति , भोपाल तथा नई लक्ष्य सोशल एवं एन्वायरोमेन्टल सोसाइटी द्वारा वर्ष 2016 में 'साहित्य सेवा सम्मान' से सम्मानित किया गया। अमृतधारा संस्था ,जलगॉंव द्वारा 'अमृतादित्य साहित्य गौरव' सम्मान प्रदान किया गया (2018). के बी साहित्य समिति , बदायूं (उ. प्र.) द्वारा ‘हिंदी भूषण श्री’ सम्मान दिया गया (2018) ।

वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी,कविता का प्रकाशन। कई रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं तथा वेबसाइट (प्रतिलिपि.कॉम, रचनाकार.ऑर्ग आदि) में प्रकाशित हुई हैं।

साहित्य के अनेको संस्थान में सक्रिय सहभागिता है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई गोष्ठियों में भाग लिया है। अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं।

साँझा-संकलन

संपादक का नाम

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विधा

प्रकाशक

डा. डी. विद्याधर

हिंदी की दुनियां ,दुनियां में हिंदी

निबंध

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कहानी

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जयकांत मिश्रा

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लघुकथा

भाषा सहोदरी -हिंदी, दिल्ली

जयकांत मिश्रा

सहोदरी सोपान-५

कविता

भाषा सहोदरी -हिंदी, दिल्ली

डा प्रियंका सोनी 'प्रीत'

काव्य रत्नावाली

कविता

साहित्य कलश प्रकाशन , पटियाला

राजेश अग्रवाल तथा अन्य

हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति : वैश्विक परिदृश्य

निबंध

मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद

लघुकथा 8006049966378859981

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