नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

बाल कहानी - अहंकार का फल - सार्थक देवांगन

अहंकार का फल

एक गांव में एक पहलवान था। उसे भ्रम था कि वह अपने गांव में सबसे ज्यादा ताकतवर है। उसका नाम बल्ली था। उसके पास कुछ कमी नहीं थी। उसकी एक बुरी आदत थी , वह कमजोरों को परेशान करता था। एक दिन एक आदमी बाजार से फल लेकर आ रहा था। बल्ली पहलवान को फल खाने का मन किया उसने फल छीन लिया।

उसी गांव में एक दूसरा पहलवान था जिसका नाम रघु था। लेकिन वह कभी किसी को तंग नहीं करता था और किसी को बताता तक नहीं था कि वह पहलवान है। वह कभी घमंड नहीं करता था। लेकिन उसकी एक परेशानी थी कि वह डरपोक था। रघु को लगता था कि वह अगर बता देगा कि वह पहलवान है तो , कहीं बल्ली गुस्से में उसे मार ना दे। बल्ली बहुत गुस्से वाला इंसान था और घमंडी भी बहुत था। बल्ली ने एक दिन रघु को पकड़ लिया और उसके हाथों के सामान को छीनकर रघु को झापड़ मार दिया……….। उस समय तक उसे पता नहीं था कि रघु भी पहलवान है। रघु ने भी उसे बहुत जोर से मार दिया। बल्ली को गुस्सा आया और कहने लगा - मुझे मारने की हिम्मत कैसे हुई ? आज तक कोई भी व्यक्ति मेरी ओर सिर उठाकर बात तक नहीं करता है और तुमने मार दिया। अब तू नहीं बचेगा। उस दिन रघु ने पहली बार सच्चाई बताई कि वह भी एक पहलवान है। बल्ली ने कुश्ती की चुनौती दे दी। रघु ने बल्ली के कहा - इतना अभिमान ठीक नहीं है। बल्ली अपने बल के अभिमान में पागल था। बल्ली ने मुकाबले का एलान कर दिया और पूरे गांव में ढिंढोरा पिटवा दिया।

मुकाबले का दिन आ गया। उन दोनों को बेसब्री से इंतजार था। गांव के लोगों ने पहली बार जाना कि रघु भी पहलवान है। मुकाबला शुरु हो गया। बल्ली के आतंक से त्रस्त गांव का कोई भी आदमी उसकी ओर नहीं था। पूरे गांव का सपोर्ट रघु को था। परंतु हमेशा अभ्यास नहीं कर पाने की वजह से , रघु कुश्ती के बहुत सारे दांव पेंच नहीं जानता था। वह लगातार मार खाता रहा। मगर ताकत में वह बल्ली से कम नहीं था। गांव वालों के असहयोग के कारण बल्ली को गुस्सा आ रहा था। इसी गुस्से में वह बेकाबू हो गया जिसका फायदा उठाकर रघु ने बल्ली को ऐसा घूंसा मारा कि वह उठ नहीं पाया। उसकी छाती पर सवार हो गया। बल्ली ने पूरा जोर लगाया परंतु उसका ध्यान कुश्ती से अधिक , गांव के उन लोगों की की ओर था जो उसके खिलाफ दिख रहे थे। इस चक्कर में वह दांव पेंच भूल गया। वह चाहकर भी उठ नहीं पाया। वहीं निढाल हो गया। रघु जीत गया। बल्ली का अभिमान टूट गया।

सार्थक देवांगन

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.