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आँख से आँख मिलाने से कतराता है, लगता है कोई अपना यार पुराना है। तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

-एक-

फक्कड़पन तो अपना मीत पुराना है,

मयखाना तो अपन्य ठौर ठिकाना है।

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जलते-जलते राख हुआ अपना तन-मन,

अब जीवन में क्या खोना क्या पाना है।

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धरती-धरती अपराधों में डूब गयी,

अम्बर-अम्बर दुनिया नई बसाना है।

​​

आँख से आँख मिलाने से कतराता है,

लगता है कोई अपना यार पुराना है।

​​

‘तेज’ मुझे क्या लेना-देना दरपन से,

चेहरा बदले गुज़रा एक ज़माना है।

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-दो-

कोई जा रहा है परीशाँ-परीशाँ,

ख़रामा-ख़रामा बहाराँ-बहाराँ।

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घूमता फिरे है ग़में-आश्ना में,

दरीचा-दरीचा वियाबाँ-बियाँबा।

​​

सदा दे रहा है बचपन को याराँ,

ज़माना-ज़माना नियागाँ-नियागाँ।

​​

नए दौर की स्याह परतें चढ़ी है,

गरीबाँ-गरीबाँ चरागाँ-चरागाँ।

​​

कहाँ तक चलेगा बता ‘तेज’ कबतक,

अकेला-अकेला पशेमाँ-पशेमाँ।

​​

<><><>

-तीन-

साग़रो-मीना को उठाले साक़ी,

बात बिगड़ी है बनाले साक़ी।

​​

अपनी बाहों का सहारा दे-दे,

अबकी गिरने से बचाले साक़ी।

​​

करके उलफ़त का दिख़ावा बेशक,

आज नफ़रत को छिपाले साक़ी।

​​

बहुत मुमकिन सहर का ना होना,

आज जी भरके रुलाले साक़ी।

​​

‘तेज’ तो एक रोज खुद ही मर लेगा,

जुर्म ये अपने सिर ना ले साक़ी।

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-चार-

लोग हुए बातूनी बातों-बातों में,

अर्थ हुए बेमानी बातों-बातों में।

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पहले सा इंसान कहाँ अब धरती पे,

दुनिया हुई पुरानी बातों-बातों में।

​​

दादी के जलवों की बातें क्या करना,

गढ़ती नई कहानी बातों-बातों में।

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नटखट बदली के जैसी शर्माती है,

बेटी हुई सयानी बातों-बातों में।

​​

चेहरे-चेहरे ‘तेज’ बुढ़ापा बैठा है,

चुकता ही जवानी बातों-बातों में।

​​

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-पांच-

याँ इम्तिहाँ-दर-इम्तिहाँ काफी हुए,

हैं लोग अपने राज़दाँ काफी हुए।

​​

उस शहर रिश्ता पुराना है मिरा,

जिस शहर में गालिबाँ काफी हुए।

​​

मैं अकेला ही चला था कल मगर,

चलते-चलते इमनवाँ काफी हुए।

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आदमी से आदमी इतना कटा,

दोस्त दुश्मन नागहाँ काफी हुए।

​​

जीते जी अपना न कोई हो सका,

मर मिटे तो मेहरबाँ काफी हुए।

​​

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-छ:-

जीवन का अपने अनोखा सफ़र है,

कि पहलू मेरे, ना जोरू, न ज़र है।

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पिपल पे मेरे न चिड़ियों का जमघट,

चूल्हा न चक्की, न खटिया न घर है।

​​

न बकरी की मैं-मैं, न गैया न बछड़ा,

न पाने की चिंता, न खोने का डर है।

​​

सूरज न चंदा, न तारों की महफिल,

न सागर, न गागर, न नदिया-नहर है।

​​

मातम न खुशियाँ, न पीड़ा न उत्सव,

न सांसों में खुशबू, न महकी सहर है।

​​

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-सात-

बाद मुद्द्त के सहर आई है,

लेके पाँवों में सफर आई है।

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ख़्वाब उलफत का सलौना लेकर,

पीके सदियों का ज़हर आई है।

​​

आओ! आँखों में रौशनी भर लें,

धूप धरती पे उतर आई है।

​​

रात उनका ही मुक़द्दर तो नहीं,

रात अपनी भी सँवर आई है।

​​

अब तो गौरी को राज़दाँ कर लें,

पीर जीने की उभर आई है।

​​

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-आठ-

कौन मरता है ज़माने के लिए,

लोग ज़िन्दा हैं कमाने के लिए।

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मुल्क अपने की राजधानी में,

बहुत तरसे हैं ठिकाने के लिए।

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ख़ाकसारों ने क़सम खाई है,

ख़ाकसारी को मिटाने के लिए।

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हाथ नफरत के कहाँ ख़ाली हैं,

माँग उलफ़त की सजाने के लिए।

​​

‘तेज’ संसद ही बहुत काफी है,

अहले-ख़िलकत को रुलाने के लिए।

​​

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-नौ-

लोग दुनिया में पशेमाँ है बहुत,

अपने आपे से परीशाँ हैं बहुत।

​​

एक मैं ही तो नहीं शिकस्तादिल हूँ,

चाक़ महफिल में गरीबाँ है बहुत।

​​

मेरी किस्मत ही निकम्मी तो नहीं,

मेरे जैसे याँ नसीबाँ है बहुत।

​​

वो जो होंठों पे दुआ रखते हैं,

उनके जैसे भी कबीराँ है बहुत।

​​

‘तेज’ बेशक है आदमी लेकिन,

बज्मे-शाही में परीख्वाँ है बहुत।

​​

परीख्वाँ = जादूगर

गरीबाँ = दामन

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-दस-

बात जीने की चली है साहिब,

आग सीने में पली है साहिब।

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माना चलने का हुनर है उनमें,

चाल अपनी भी भली है साहिब।

​​

बहते दरिया के किनारों की तरह,

उम्र अपनी भी ढली है साहिब।

​​

शहर सुन्दर है, बडा है लेकिन,

तंग रिश्तों की गली है साहिब।

​​

भूख लड़ने की तमन्ना लेकर,

पाँव-दो पाँव चली है साहिब।

​​

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( ‘ट्रैफिक जाम है’ (ग़ज़ल संग्रह) से प्रस्तुत)

तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय।

​​

तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं।

​​

स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं।

​​

सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।

​​

आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

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सम्पर्क: E-mail — tejpaltej@gmail.com

ग़ज़लें 1150260944068418363

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