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नारी के प्रति पारदर्शी न्याय के हिमायती थे बापू डॉ. चन्द्रकुमार जैन

भारतीय जीवन शैली, भारतीय संस्कृति, भारतीय परंपरा, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गाँधी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतीय - समाज की परिकल्पना वह राम - राज्य के आधार पर करते है। वह एक ऐसे समाज के निर्माण का स्वप्न देखते थे जिसमें न्याय, समानता व शांति भारतीय समाज की प्रमुख धरोहर हो। गाँधी जी के अनुसार भारत में न्याय, समानता व शांति तब तक स्थापित नहीं हो सकती जब तक स्त्रियां सही सम्मान व न्याय की अधिकारिणी न हो जाएं । महिला अधिकारों के विषय में उनके विचार एवं योगदान इनमें से एक है।

महात्मा गांघी ने अनेक प्रसंगों में मानवता के महान प्रेमी होने का प्रमाण दिया है। अन्याय और असमानता के घर शत्रु तथादलितों के परम मित्र बापू ने महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए नाना प्रयत्न किये। उनका मार्गदर्शन किया।  दक्षिण अफ्रीका में अपने आंदोलन के समय से ही बापू ने महिला उत्थान पर ज़ोर दिया था। गांधी जी ने कहा - " हमारे समाज में कोई  वर्ग सबसे ज्यादा हताश हुआ है तो वे स्त्री वर्ग ही है । और इस वजह से हमारा अधःपतन हुआ है। स्त्री-पुरुष के बीच जो फर्क प्रकृति से पहले है और जिसे खुली आंखों से देखा जा सकता है, उसके अलावा मैं किसी किस्म के फर्क को नहीं मानता।" ( हरिजनसेवक, 21 जनवरी 1947 )

गांधीजी ने स्त्रियों को देश की आज़ादी की लड़ाई के साथ जोड़कर तथा उन्हें आश्रम वयवस्था में समान अधिकार देकर समाज में स्त्रियों के वास्तविक स्थान का एहसास करवाया। दरअसल, बापू चाहते थे कि समाज में ऐसे वातावरण का निर्माण हो जिसमें घर और बहार दोनों स्तरों पर उनके कर्म कौशल तथा प्रबंध क्षमता का सदुपयोग किया जाये।  वे महिलाओं और उनकी समस्याओं को भलीभांति समझते ही नहीं थे, उनसे उनका गहरा सरोकार भी रहता था।

राजकुमारी अमृतकौर को वर्धा से 20 अक्टूबर 1936 को लिखे गए पत्र में गांधीजी ने कहा था - " यदि आप महिलाएं अपने सम्मान और विशेषाधिकार को समझ भर सकें और मानव जाती के लिए इसका भरपूर उपयोग करें तो आप इसे बेहतर बना  सकेंगी। मगर पुरुषों ने आपको दासी बनाने में आनंद लिया है और आप इच्छुक दासियाँ साबित हुई हैं। अंत में दास-दासी मानवता के पतन के अपराध में मिलकर एक हो गए हैं। आप कह सकती हैं, बचपन से ही मेरा विशेष कार्य महिला को उसका सम्मान समझने योग्य बनाना था। कभी मैं भी दास-स्वामी था, मगर 'बा' एक अनिच्छुक दासी सिद्ध हुईं और इस प्रकार उन्होंने मेरे मकसद के प्रति मेरी आँखें खोल दीं। "

उल्लेख्य है कि भारतीय समाज में आज भी पुत्रियों से ज्यादा पुत्रों को महत्व दिया जाता है। आज भी कन्या - शिशु की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है। यह सामाजिक विषमता महात्मा गाँधी को बहुत कष्ट पहुँचाती थी। उनके अनुसार 'पारिवारिक संपत्ति में बेटा और बेटी दोनों का एक समान हक होना चाहिए। उसी प्रकार, पति की आमदनी को पति और पत्नी की सामूहिक संपत्ति समझा जाना क्योंकि इस आमदनी के अर्जन में स्त्री का भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से योगदान रहता है। भारतीय समाज में विवाह के समय लड़कियों का कन्यादान यानी दान किया जाता है। गाँधी ने इस विचारधारा की काफी आलोचना की है। उनके अनुसार एक बेटी को किसी की संपत्ति समझा जाना सही नहीं है।

गाँधी जी दहेज - प्रथा के खिलाफ थे। दहेज - प्रथा एक ऐसी सामाजिक बुराई है जिसने भारतीय - महिलाओं के जीवन के पददलित बना दिया। गाँधी इसे 'खरीद - बिक्री' का कारोबार मानते हैं । उनके अनुसार 'कोई भी युवक, जो दहेज को विवाह की शर्त रखता है, अपनी शिक्षा को कलंकित करता है, अपने देश को कलंकित करता है और नारी -जाति का अपमान करता है।

बाल - विवाह भारतीय समाज की ऐसी कुप्रथा है जिसने लड़कियों का बचपन छीन लिया। जिस आयु में लड़कियों को विवाह का अर्थ भी नहीं पता होता उस आयु में वह विवाह के परिणय - सूत्र में बांध दी जाती है। गाँधी जी बाल - विवाह के विरोधी थे। शारदा अधिनयम में शादी की उम्र 14 साल तक बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया तब गाँधी को महसूस हुआ कि 'यह 16 या 18 साल तक बढ़ा देनी चाहिए। वहीं गाँधी का एक आग्रह है कि 'अगर बेटी बाल - विधवा हो जाए तो दूसरी शादी करा देनी चाहिए। जब कोई स्त्री पुनर्विवाह करना चाहती थी तो उसे जाति से बाहर कर दिया जाता था। किन्तु गाँधी पुनर्विवाह के पक्षधर थे। उन्होंने विभिन्न समुदायों को संबोधित करते हुए कहा था कि 'यदि कोई बाल - विधवा पुनर्विवाह की इच्छुक हो तो उसे जातिच्युत या बहिष्कृत नहीं करें।

गाँधी को इस बात पर पूरा यकीन था कि आर्थिक रूप से स्वतंत्रता महिला सशक्तिकरण में अहम भूमिका अदा कर सकती है। वह महिलाओं को चरखा कातने के लिए प्रेरित करते थे। 1919 में नाडियाड में महिलाओं को संबोधित करते हुए क्रांतिकारी शब्दों में उन्होंने जोर देते हुए कहा - आपके पास 2 या 3 घन्टे ऐसे होते हैं जब आपके पास करने के लिए कुछ नहीं होता। आप उसे मंदिरों में पूजा - अर्चना में बिताते हैं । परन्तु वर्तमान समय में भक्ति का असली रूप कपड़े के इस कार्य में निहित है, जो भी पैसों को ध्यान में रखकर कताई कार्य करेगा उसे प्रति पाउण्ड  सूत 2 आना मिलेगा और पैसे की एक - एक पाई उपयोगी और हितकारी है। कमाई का यह श्रेष्ठ जरिया है।

स्पष्ट है कि गांधी महिलाओं को स्व-विकास का पूरा अधिकार देना चाहते थे। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि महिलाओं को अपना भाग्य संवारने का उतना ही अधिकार है जितना पुरुषों को। वे महिला-पुरुष समान- के पक्षधर थे। मानवता की यही पुकार और वक्त की यही मांग है कि हम गांधी मार्ग पर चलते हुए उनके विचारों को नए सिरे से समझें, अपनाएँ और राष्ट्र के नव-निर्माण तथा विश्व कल्याण के लिए सार्थक योगदान करें।

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