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लघुकथाः श्रद्धांजलि

-पुष्पा रघु

आज बाबू जी की तेरहवीं है. शामियाना लगा है. मेज पर बाबू जी का फ्रेम किया हुआ चित्र रखा है – ताजे गुलाबों की माला से सुशोभित. धूपबत्ती जल रही है. सारा वातावरण सौरभ और श्रद्धामय. पहले स्वामी नित्यानंद का प्रवचन हुआ – जीवन की अनित्यता तथा मृत्यु की नित्यता का बखान. तत्पश्चात् सबने बारी-बारी माला अथवा पुष्पों से श्रद्धांजलि अर्पित की. सभी मरने वाले का गुणगान कर रहे थे. “बड़े भले मानस थे बाबूजी. इतने सालों से गली में रह रहे थे. कभी किसी से नहीं झगड़े.”

“ड्यूटी के पाबंद थे. सदा नियत समय पर ऑफ़िस जाते थे.”

“बड़े ईमानदार थे जी तभी तो बेटे इतने अच्छे मिले हैं.” आदि-आदि.

बाबूजी के दोनों बेटे और बहुएँ फूट-फूट कर रो रहे थे. “हाय बाबूजी. हमें अनाथ कर गए बाबूजी. अम्मा तो पहले ही चली गई थी. अब आप भी हमें छोड़ गए.”

लोग उन्हें सांत्वना दे रहे थे. “तुमने तो अपना कर्तव्य पूरा कर दिया. रात-दिन सेवा की अब मौत पर किसका वश है?” एक पड़ोसी बोला. दूसरे ने कहा - “माता-पिता का साया तो सभी चाहते हैं. परन्तु वे बेचारे तो कष्ट ही पाते थे जबसे एक्सीडेन्ट में टाँग कटी थी उनकी. सब्र करो! ईश्वर की मर्जी बेटा!”

तीसरा बेटा जन्म से मंदबुद्धि था पर बाबूजी का अपार स्नेहपात्र था वह. अब उसके पास न कोई काम था न अपना. वह पिता के चित्र को टकटकी बांधे देख रहा था और बड़बड़ा रहा था, “बाबू जी आप तो देख रहे हैं ना! कुछ देर पहले तो ये सारे कचौड़ी मालपुए उड़ा रहे थे, जश्न मना रहे थे और अब...”

मेहमान-मित्र-रिश्तेदार चले गए. वह भूखा प्यासा एक कोने में लुढ़क गया. रात को दोनों भाइयों के झगड़ने की आवाज से उसकी नींद खुल गई – ‘कल मैं बाबू जी की पोस्ट के लिए आवेदन-पत्र देने जाऊँगा’ बड़ा कह रहा था.

मंझले की तेज आवाज आई ‘वाह जी सेवा की मैंने, खर्च किया मैंने, नौकरी तुम करोगे? मैं भी तो बेरोजगार हूँ.’

‘हां-हां मैं ही लूंगा उनकी नौकरी. बेवकूफ – तुम सेवा करते रहते और बूढ़ा खाट पर पड़ा पड़ा रिटायर हो जाता. पाप तो मेरे सिर पर है. उनको मुक्ति दिलाने की हिम्मत किसने की? मैंने.’

बड़े की आवाज का लावा छोटे को संज्ञाशून्य बना गया.


कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित रचनाकार पुष्पा रघु के बहुत से कहानी संग्रह / बाल-कथा संग्रह तथा बालगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

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