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कविताः भार्या


- सत्य प्रसन्न राव


कभी कठिन पाषाण लगे तो,
कभी मृदुल नवगीत लगे।
कभी क्लिष्ट भावों की कविता,
कभी सरल नवगीत लगे।

कभी ओस सी हिमशीतल तो,
कभी तप्त इस्पात लगे।
कभी कुंद की कोमल कलिका,
कभी खिला जलजात लगे।

कभी गहन गंभीर भैरवी,
कभी यमन-कल्याण लगे।
कभी लगे मावस की रंजनी,
कभी पूर्ण पवमान लगे।

स्थिर तड़ाग सी कभी लगे तो,
सरिता कल-कल कभी लगे।
कभी लगे बस मौन साधिका,
चंचल राधा कभी लगे।

कभी जेठ की लू के जैसी,
कभी मंदिर मधुमास लगे।
कभी भोर की प्रथम किरण सी,
कभी उतरती शाम लगे।

कभी श्लेष उत्प्रेषा रूपक,
कभी यमक अविराम लगे।
कभी लगे बस स्तंबन आचमन,
कभी छलकता जाम लगे।

*-*-*
टेक्नोक्रेट-रचनाकार सत्य प्रसन्न राव की कविताएँ कई कविता संग्रहों में प्रकाशित हो चुकी हैं.

4 टिप्पणियाँ

  1. awsome-o kavita jise baar baar padna pada

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  2. भाई कालीचरण,
    आपने सिर्फ पढ़ा या पत्नी को भी सुनाया?

    जवाब देंहटाएं
  3. कविता अच्छी लगी ।

    जहाँ तक मेरी समझ है , आप " मंदिर मधुमास " के बजाय "मदिर मधुमास" और " मावस की रंजनी" के बजाय " मावस के रजनी" लिखना चाहते होगें ।

    जवाब देंहटाएं
  4. भाई अनुनाद,
    आपका कहना सही है. टाइपिंग की ग़लती मान लें :)

    जवाब देंहटाएं

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