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देवेन्द्र आर्य की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल 1
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बुजुर्गी बचपना काला न कर दे।
कहीं गंगा हमें मैला न कर दे।

अंधेरे को ज़रा महफ़ूज रखिए
ये मनबढ़ रौशनी अंधा न कर दे।

सफ़र दुश्वार कर देंगे ये आँसू
तू मेरा रास्ता आसान कर दे।

तुम्हारे इल्म का चमकीला दर्पण
मेरे चेहरे को बे-चेहरा न कर दे।

मुझे अवहेलना चर्चा में लाई
बड़ाई सब कहीं उल्टा न कर दे।

ये चुप्पी दिग्विजय करने चली है
ख़मोशी बीच में हल्ला न कर दे।

इसे महफ़ूज रखिए दिल तलक ही
मोहब्बत जेहन पर हमला न कर दे।


ग़ज़ल 2
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तेरे भीतर पैदा हो यह गुन।
तू भी मतलब भर की बातें सुन।

घर इतने एख़लाक से पेश आया
मैंने खुद को समझ लिया पाहुन।

नफ़रत के अवसर ही अवसर हैं
प्यार का लेकिन बनता नहीं सगुन।

आँख लगी तो क्या देखा मैंने
गले मिले थे कर्ण और अर्जुन।

मन के दो ही रंग, हरा-भगवा
ऐसे में किस रंग का हो फागुन।

सुर भी बेसुर होने लगता है
जब बजती है एक ही धुन।

अब तक कब का बेच चुके होते
कविताएँ भी होतीं जो साबुन।

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रचनाकार – देवेन्द्र आर्य की ग़ज़लें अपना अलग रंग, सुर और तेवर लिए हुए होती हैं – अकसर, समाज को उसका नंगा चेहरा दिखाती हुईं.

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