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बाल कथा : चिकी-मिकी तुम सुधरोगे भी?

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-पुष्पा रघु

चिकी-मिकी उस पोखर के राजकुमार थे. क्योंकि उनकी माँ रोमी से उस ताल के सारे मेंढक-मेंढकी डरते थे. उसका शरीर खूब मोटा-ताजा था. पीले मटमैले रंग में हरी धारियाँ बड़ी सुन्दर लगती थीं. जब वह अपनी गोल आँखों को चमकाते हुए जोर से टर्राती तो पूरे पोखर में उसकी आवाज गूंज उठती. छोटी-मोटी मछलियाँ भी रोमी के सामने पड़ने से डरती थीं. वह थी भी झगड़ालू और घमण्डी. माँ की तरह चिकी-मिकी भी घमण्ड में रहते और ताल के सारे बच्चों से लड़ते-झगड़ते रहते. दूसरों के घर में घुसकर उनकी चीजें छीन लाना या तोड़-फोड़ करना उनका रोज का काम था. कोई उन्हें कुछ कहता तो उनकी माँ आँखें चमका कर इतनी जोर से टर्राती कि बेचारे डरकर दुबक जाते.

शुरू-शुरू में तो चिकी-मिकी की शरारतों की शिकायत करने लोग रोमी के पास आते थे, पर रोमी अपने बच्चों को डाँटने की बजाय उनसे ही लड़ने को उतारू हो जाती. वह उन लोगों को बुरी तरह दबोच लेती. उसकी छलांग सबसे लम्बी थी और शरीर भी सबसे ज्यादा मजबूत था. जान तो सबको प्यारी है. अतः धीरे-धीरे प्रायः सभी ने उन माँ-बेटों का विरोध करना छोड़ दिया. इससे चिकी-मिकी बहुत उद्दण्ड और आवारा हो गए. उन्हें माँ ने कोई काम करना तो सिखाया ही नहीं था. वे कभी किसी का न आदर करते थे न किसी से अच्छा व्यवहार.

पोखर के सब मेंढक और मछली बहुत दुःखी थे. एक दिन समझदार और बुजुर्ग मेंढकों ने एक सभा की. सबका कहना यही था कि चिकी-मिकी को सुधारने के लिए रोमी का घमण्ड दूर करना आवश्यक है. उसके लिए कई तरकीबें सोची गईं. कप्पू बड़ा बुद्धिमान था. उसने कहा कि यदि रोमी को ताल के बाहर भेजा जाए तो उसे अवश्य ही अपनी असलियत का पता चल जाएगा कि उससे भी ज्यादा ताकतवर लोग हैं. तब वे माँ-बेटे सुधर जाएंगे. सबने यह बात मान ली और एक योजना बनाई.

बस फिर क्या था. योजना के अनुसार सरकंडों की एक सुन्दर सी गाड़ी बनाई गई. जिसमें घोंघे के पहिए लगाए गए और मोर पंख की छतरी. एक उत्सव में यह गाड़ी रोमी को भेंट की गयी. उसे ऊँचे मंच पर बैठाकर फूलों की माला पहनायी और कहा कि रोमी हमारी रानी है. कई मेंढकों ने उसकी प्रशंसा में भाषण दिए, गीत गाए. चिकी-मिकी की बहादुरी को खूब सराहा गया. सबके बाद में कप्पू बोला, ‘हम सब रोमी जैसी रानी और चिकी-मिकी जैसे राजकुमार पाकर धन्य हैं. ताल के सभी वासियों की ओर से मैं रानी को यह गाड़ी भेंट करता हूँ. इसे खींचने को दो मेंढक सदा आपकी सेवा में रहेंगे. आप लोग रोज गाड़ी पर सैर के लिए जाएँ ताकि दूसरी ताल के मेंढक भी हमारी इस शान-बान को देखें.’

सबने तालियाँ बजाईं. रोमी और चिकी-मिकी खुशी से झूम उठे. रोमी अपने गलफड़े फुलाकर आँखें घुमाने लगी. चिकी-मिकी टर्ट-टर्र करके उछलने लगे.

अगले दिन से ही रोमी रानी अपने लाड़ले चिकी-मिकी के साथ गाड़ी पर सवार होकर सैर को जाने लगीं. गाड़ी के नीचे एक बाजा फिट था जो उसके चलने पर बजता टम-टमा-टम. दूसरा पोखर कुछ ही दूर था. बाजे की आवाज सुनकर सारे मेंढक किनारे पर आ गए. गाड़ी खींचने वाले मेंढकों ने ‘रोमी रानी की जय’ बोली तो वे भी जयकारे बोलने लगे, पर पास आने की हिम्मत नहीं हुई उनकी. जयकारे सुनकर मां-बेटे और भी अकड़कर बैठ गए.

इसी तरह तीन-चार दिन तो रानी की शोभा-यात्रा आराम से चलती रही. रोमी की अकड़ भी बढ़ती रही.

एक दिन जब रोमी की गाड़ी पगडंडी पर शान से टम-टमा-टम करती जा रही थी तो एक भैंस पोखर की ओर आयी. वह भागती आ रही थी. उसके गले में पड़ी घंटियों की आवाज में गाड़ी की आवाज दब गयी. गाड़ी खींचने वाले मेंढक भैंस को देखते ही गाड़ी एक किनारे खिसकाने लगे लेकिन रोमी बिगड़ उठी, ‘वाह, रानी क्यों हटे? भैंस को बचकर निकलना चाहिए.’

कहकर रोमी ने अपना शरीर फुलाया और पूरे जोर से टर्राने लगी, पर भैंस ने देखा भी नहीं. वह उसी मस्ती से दौड़ी आ रही ती. वे दोनों मेंढक तो गाड़ी छोड़, उछलकर एक झाड़ी में जा छुपे. चिकी-मिकी भी उस भयंकर जीव को देखकर डर से कांप उठे, पर रोमी अपनी अकड़ में बैठी थी.

अगले ही पल चिकी-मिकी उछलकर झाड़ी में जा छिपे. भैंस का पैर लगते ही गाड़ी और रोमी दोनों मिट्टी में मिल चुके थे.

चिकी-मिकी अपराधी-से रोते-कांपते ताल में आए. रोमी की दुखद मौत ने उनके जीवन को बदल दिया. वे अब मेहनती, दयालु और शरीफ बालक बन गए. उन्हें पता चल गया था कि घमण्ड आदमी को नष्ट कर देता है.

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कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित रचनाकार पुष्पा रघु के बहुत से कहानी संग्रह / बाल-कथा संग्रह तथा बालगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

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