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मीरा शलभ की कुछ व्यंग्य कविताएँ


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-मीरा शलभ

*स्त्री
उसने सोचा था उसे पाँव की जूती
तभी तो आज वह काटने को आमादा हो गई।

*मिल बांट कर खाओ
माँ ने सिखलाया था
बचपन में कि सब मिल बाँट कर खाओ
इसी लिए तो आज
हम सभी मिल बाँट कर खा रहे हैं.


*यक्ष-प्रश्न
चिड़िया घर में
भेड़िये को देखकर
डर गया था वह नन्हा-सा बालक
और – अधिक सिमट गया था माँ के अंक में
किंतु... डरते डरते भी
कर बैठा एक यक्ष-प्रश्न
माँ क्या तुम वास्तव में नहीं डरीं
भेड़िये को देखकर
और क्यों नहीं डरीं?
जबकि अकसर-
आदमी को देखकर डर जाती हो।

*उद् घाटन
पुल के उद् घाटन से पूर्व
मुख्यमंत्री जी ने
अपने हृदय में
पुल देवता का
आह्वान किया...


तथा मन ही मन उन्हें
दंडवत् प्रणाम किया
और साथ में यह प्रार्थना की
कि... कृपया प्रभु
आप धैर्यपूर्वक
मेरे यहाँ रहने तक
यों ही स्थिर रहना।

*ग़ज़ल
फिर वही पुराना सिलसिला है
संग मेरे दर्द का क़ाफ़िला है

पत्थरों के शहर में मेरा
एक शीशे का किला है

किस किस से करूँ हिफ़ाज़त
हर हाथ में मुझे पत्थर मिला है

खुद ब खुद चटकने लगी हूँ मैं
टूटने का खौफ़ न निकला है

देख कर लहूलुहान जिस्म मेरा
कोई पत्थर नहीं पिघला है

रचनाकार – मीरा ‘शलभ’ की कई कहानियाँ एवं कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा आपके कई कहानी/कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. ये लघुकथाएं – उनकी सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह – अंतर्मन की आग ( प्रकाशक – अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान, गाजियाबाद, आईएसबीएन क्र. 181-89105-12-4) से चुनी गई हैं.रचनाकार में इनकी अन्य रचनाएँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं : http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_10.html http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_19.html

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