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नरेन्द्र कोहली का व्यंग्य : मेरे जीवन की नाटकीय त्रासदियाँ



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मेरी किशोरावस्था की त्रासदियाँ बड़ी भयंकर हैं. यह वह वय है, जिसमें स्मरण शक्ति बड़ी प्रखर होती है. कुछ भुलाए ही नहीं भूलता. अभी याद करने बैठूँ तो मेरी स्मरण-शक्ति पाठकों के लिए त्रासदी हो जाए. एक से बढ़कर एक बढ़िया से बढ़िया त्रासदियाँ याद आने लगेंगीं. पर इतनी सारी त्रासदियाँ याद कर क्या करूं - जिनके आंकड़ों से लगने लगे कि मेरा जीवन अपने-आप में एक त्रासदी है, जबकि मैं जानता हूँ कि सत्य यह नहीं है. यदि ऐसा होता तो मैं भी कवियों के समान नारा लगाता - 'मैं अपने कंधों पर अपना सलीब ढो रहा हूँ -' या, 'मैं अपने कंधों पर अपनी लाश ढो रहा हूँ' - ढोने को चाहे, अपना थैला न ढोया हो. कुछ ऐसे ही तथ्यों के कारण मैंने आंकड़ा शास्त्र तथा कवि के निष्कर्षों को कभी गंभीरता से स्वीकार नहीं किया.

पर बात कवियों तथा आंकड़ाशास्त्र की नहीं, मेरी किशोरावस्था की त्रासदियों की थी. मेरी किशोरावस्था की सबसे बड़ी त्रासदी रंगमंच रहा है. रंगमंच से मेरा अभिप्राय सीधे-सीधे नाटक से ही है. नाटक में न चुना जाना मेरी त्रासदी नहीं रही - जैसा कि पाठक समझ रहे होंगे. मेरी त्रासदियाँ तो नाटक के लिए चुने जाने के बाद आरंभ होती हैं. आज कोसता हूँ उन घड़ियों को, जब मुझे नाटक में अभिनय करने के लिए चुना गया था.

कालेज में पहुँचा तो नाटक में अभिनय करने को बहुत व्याकुल था. मुझे व्याकुलता के भयंकर दौरे पड़ते हैं - कभी ग्रहण के, कभी त्याग के. पर ठीक समय पर ठीक दौरा मुझे कभी नहीं पड़ा. विवाह के पूर्व ग्रहण (सूर्य-ग्रहण नहीं, कन्या ग्रहण) का दौरा पड़ा था और विवाह के पश्चात् त्याग की व्याकुलता का दौरा अनेक बार पड़ चुका है, पर घर में एक ओझा निरंतर उपस्थित है, जो सारे दौरे झाड़ देता है.

तो कालेज में अभिनय करने की व्याकुलता का दौरा पड़ा था. किसी ने चेहरे से व्याकुलता भांप ली होगी, तभी तो मुझे चुन लिया गया और नाटक के अंत में मंच पर उपस्थित हो, एक वाक्य बोलकर लौट आने का महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिया. दौरे की स्थिति थी. मैंने प्रस्ताव तत्काल स्वीकार कर लिया. स्वयं को समझा लिया कि महान् बनना है तो किसी काम को छोटा मत समझो. तो उस भूमिका को ही क्यों छोटा मानता. नाटक की नायिका (जैसा कि होना ही चाहिए था) बी.ए. अंतिम वर्ष की छात्रा थी. मैं अभी प्रथम वर्ष में ही आया था, इसीलिए उसकी दृष्टि में नगण्य जीव था. उसके व्यवहार से स्पष्ट था कि मैं उसे तनिक भी पसंद नहीं आया था. वह उस नाटक में भी मुझे अपने भाई के रूप में भी स्वीकार नहीं कर पाई थी. पर त्रासदी यह नहीं थी...

मुझे अपनी मां से भरपूर वात्सल्य मिला है, इसलिए सीनियर लड़कियों से प्रेम-व्यवहार चलाने की तृष्णा मुझ में कभी नहीं रही. और जब कभी किसी सीनियर लड़की ने ऐसा प्रयत्न किया है, मुझे श्रृंगार के स्थान पर हास्य की अनुभूति हुई है. पर वे किस्से फिर कभी सुनाऊँगा. अभी तो नाटक की नायिका की चर्चा चल रही है. ... और इस नाटक की नायिका तो सुंदर भी नहीं थी. ईमानदारी की बात यह है कि मुझे भी उसके साथ का यह रिश्ता तनिक भी पसंद नहीं आया था. उसकी उपेक्षा मेरे लिए कुछ अर्थों में सुखद ही रही थी. पर त्रासदी यह भी नहीं थी...

इस नाटक की त्रासदी थर्ड-वर्ल्ड में घटित हो रही थी. नायक महोदय का व्यवहार मेरे प्रति अत्यन्त स्नेहपूर्ण था. उन्हें नायिका-ग्रहण की व्याकुलता का दौरा बड़े जोर से पड़ा हुआ था, इसलिए वे नायिका के साथ मेरे इस नाटकीय संबंध को पूर्णतः यथार्थ धरातल पर ग्रहण कर रहे थे. नाटक तो जैसे-तैसे समाप्त हो गया, पर उसके प्रभाव जीवन में बहुत दूर तक चलते गए. जैसा कि होना चाहिए था, नायिका का विवाह नायक महोदय से नहीं हो सका. (इसमें नायिका के पिता का कोई दोष नहीं था. उसने शायद चाहा भी था. नायिका को ही यह लार टपकाता नायक पसंद नहीं आया था. उसकी सहज इच्छा का सम्मान करते हुए उसका विवाह कहीं और कर दिया गया था.) इधर नायक महोदय, नायिका का तो कुछ बिगाड़ नहीं पाए, मुझसे रुष्ट अवश्य हो गए. कह नहीं सकता, उसके मन में कौन-सी तर्क-श्रृंखला थी : क्या वह चाहते थे कि नायिका का नाटकीय भाई होने के नाते मैं उसका विवाह उनसे करवाने का सक्रिय प्रयास करता - जो मैंने नहीं किया? वे कदाचित् मेरी प्रकृति को नहीं समझते. मैंने तो सिवाय अपने, और किसी के भी विवाह में कभी रुचि नहीं ली. मेरा तो सिद्धांत ही है, न दूसरे के विवाह में हस्तक्षेप करो, न किसी को अपने विवाह में हस्तक्षेप करने दो. यह 'जिओ और जीने दो' की तर्कपूर्ण परिणति है. पर वे नायक महोदय न सिद्धांत को समझते थे, न तर्कशास्त्र को. न उस नायिका को और न मुझे. वे समझते थे कि नायिका की रुचि जितनी मुझमें होनी चाहिए थी, उससे अधिक हो गई थी. जो भी हो, नायक महोदय से मेरे संबंध आज तक उतने ही कटु चले आ रहे हैं. और इस कटुता के लिए वे ही पछता रहे हों तो पछता रहे हों, मझे संबंधों के पश्चाताप में अधिक विश्वास नहीं है. संबंधों की त्रासदी और किसे कहते हैं?

ऐसी ही त्रासदी एक अन्य नाटक में भी हुई. दूसरे नाटक के समय तक मैं पर्याप्त उन्नति कर चुका था, अर्थात् नायिका के भाई से स्वयं नायक बन चुका था. इस नाटक की नायिका उस समय तो काफी आकर्षक ही लगी थी- उस समय तक सावन के अंधे को हरा-ही-हरा सूझने लगा था - अर्थात् हर युवती अच्छी लगने लगी थी. आज पंद्रह वर्षों बाद उनमें से कोई दिख जाती है तो अपनी युवावस्था का नेगेटिव ही दिखाई पड़ती है और मैं अपनी पीठ ठोंकता हूँ कि भले बचे, इससे विवाह नहीं किया. आज जाने वह नायिका कैसी लगे. पर इस नायक-नायिका संबंध में बड़ी त्रासदी है साहब! लोगों ने हमसे पूछे बिना ही हमें प्रेमी-प्रेमिका मान लिया. मुझे नायिका के साथ देखते तो मुस्करा कर दूर हट जाते. अकेला देखते तो मुस्करा कर पूछते, "आज अकेले ही हो? वह साथ छोड़ गई?" नायक बनने के चक्कर में हम एकदम अकेले हो गए. नायक क्या बने, यार-दोस्तों को खलनायक दिखाई पड़ने लगे. न कोई हमें साथ बैठाए, न हमारे साथ बैठे : "तुमको फुर्सत कहाँ होगी? तुम्हारी तो हीरोइन आती होगी."

और इधर, नायिका थी कि एकांत होते ही अपने मंगेतर की कहानियाँ इस प्रकार सुनाने लगती जैसे मच्छरों को भगाने के लिए 'फ्लिट' छिड़का जाता है. ...वह देखने में कैसा है, क्या काम करता है, क्या चाहता है... मैं नायिका को समझाना चाहता था कि मुझे उसके मंगेतर में कोई रुचि नहीं है, पर हरिनारायण आप्टे ने ठीक कहा है: 'कौन ध्यान देता है.' वह पूरी नायिका थी - अर्थात् वन-वे-ट्रैफिक! बोलती धारा प्रवाह थी. सुनने वाला चैनल वह थी ही नहीं. मित्रों को समझाना चाहता था कि मुझे इस नायिका में कोई रुचि नहीं है - पर उधर भी कौन सुनता था. नायक बनकर, मुझ पर दोहरी त्रासदी घट रही थी और मैं था कि किसी को हाले-दिल समझा ही नहीं पा रहा था - उन्हीं दिनों मैं समझ पाया कि ट्रैजिक हीरो किसे कहते हैं.

उस समय तो मैं इतनी ही त्रासदी से परेशान था - यह नहीं समझ रहा था कि वह तो रिहर्सल-मात्र था - असल नाटक तो आगे आने वाला था. - हुआ यह कि मैं बी.ए. कर पंजे झाड़ कर निकल गया. कालेज छूटा तो छूटा, एम.ए. करने के चक्कर में नगर भी छोड़ दिया. उस प्रवास में हमारी भूतपूर्व नायिका के जो पत्र आए, वे और बड़ी नायकीय त्रासदी लिए हुए थे. उसने लिखा था, उसे अकेली देखकर लोग आवाज़ें कसते हैं. कुछ तो सहानुभूति भी दिखाते हैं कि मैं उसे छोड़ भागा. बेवफा कहीं का. यह भी कोई तरीका है. उसने लिखा था कि मुझ पर बेवफाई के ये आरोप उसे अच्छे नहीं लगते. उसे मुझसे सहानुभूति थी और मैं सोचता रहता कि कृष्ण मथुरा चले गए तो राधा भी उन्हें ऐसे ही पत्र लिखा करती होगी.

मैं भी बहुत परेशान रहा, बेवफाई की त्रासदी से. अब मैं बैठा हूँ दिल्ली में और बदनाम हो रहा हूँ जमशेदपुर में. किसे-किसे समझाने जाऊँ, कि इसमें बेवफाई का कण भी नहीं है. जिसे लोग हमारा प्रेम समझ बैठे थे, वह तो अपने अध्यापकों के निर्देशन में की गई हमारी एक्स्ट्रा कैरिकुलर एक्टिविटी थी. भला एक्स्ट्रा कैरिकुलर एक्टिविटी में बेवफाई का क्या काम! बेवफाई तो एक्स्ट्रा करिकुलम में ही नहीं है. पर वापस लौट कर अपनी वफा का प्रमाण देने का प्रयत्न करता तो नाटक में नहीं - जीवन में भयंकर त्रासदी घट जाने की संभावना थी....

यह त्रासदी यहीं रुक जाती, तो भी रो-धोकर मैं उसे भूल ही जाता. जब इतनी झेली हैं, तो इसी की उपेक्षा क्यों करते हो? पर करनी विधाता की यह हुई कि उसी नाटक में एक खलनायक महोदय भी थे. जब तक नाटक-वाटक होते रहे, तब तक तो वे खासे भले मानस बने रहे, पर जब मेरे साथ सारी त्रासदियाँ घट चुकीं, तो उन्होंने ताबूत में अंतिम कील ठोंकी. उन महाशय ने हमारी नायिका से विवाह रचा लिया. अब साहब, लगी दुनिया हम पर थू-थू करने. "देखो! साला कैसे हीरो है, विलेन इसकी हीरोइन को उड़ा ले गया और यह खड़ा देखता रहा. न मैं उसे गोली मार सका, न स्वयं मर सका." मैंने बहुत चाहा कि उन्हें समझाऊँ, "यारो! वह नाटक में विलेन था तो क्या हुआ! वैसे तो भला आदमी है. देश के संविधान से अन्तर्गत दी गई स्वतंत्रताओं के अनुसार वह किसी भी कन्या से प्रेम करने अथवा विवाह करने को स्वतंत्र है." पर किसी ने मेरी नहीं सुनी. अपना ही बैंड बजाते रह गए...

तब से आज तक, घोर आस्तिक भक्तों के समान ईश्वर से एक ही प्रार्थना करता रहा हूँ कि "हे प्रभु! ऐसी नाटकीय त्रासदी मुझ पर तो ढाई सो ढाई, अब और किसी पर मत ढाना."

पर कहाँ मानता है वहा! हम नाटक के प्रांप्टर के समान अपने डायलॉग प्राम्प्ट करते रहे हैं, पर वह सुनता ही नहीं. पता नहीं, उसने कोई स्क्रिप्ट याद कर रखी है, या इम्प्रोवाइज़ करता चलता है.

हुआ यह कि हमारी नाटकीय प्रसिद्धि ने दिल्ली में भी हमारा साथ नहीं छोड़ा. मैं तो एम.ए. में पढ़ाई कर अच्छा परीक्षा-फल लाने के चक्कर में था, पर यारों ने धर पकड़ा. पकड़ा क्या साहब, नायक ही बना दिया. इस बार नायिका थी भयंकर तुनकमिजाज. अच्छा-खासा जानती थी कि मेरा प्रेम कहीं और चल रहा है, फिर भी मुझसे लड़ती ही रहती थी कि कहीं मैं उसके निकट जाने का प्रयत्न न करुं. बस, यहीं से दोहरी त्रासदी प्रारंभ हो गई. ...जिन्होंने उसे मुझसे झगड़ते देख लिया, उन्होंने मुझे झगड़ालू घोषित कर दिया, "साला! अपनी हीरोइन से भी झगड़ा करता है." और जिन्होंने उसे मुझसे झगड़ते नहीं देखा - वे दूसरा भ्रम पालने लगे. इसी वर्ग में मेरी अपनी सगी प्रिया भी थी. एक ओर नाटक के रिहर्सल चल रहे थे- दूसरी ओर मेरे जीवन की नाटकीय त्रासदियाँ. दिन भर मैं रिहर्सल में नायिका से लड़ता और शाम को कहीं एकांत ढूंढकर अपनी प्रिया के सामने नाक रगड़ता. बस साहब! हम अब दुइ पाटन के बीच पिस रहे थे और साबत बचने की कोई आशा नहीं थी.

मेरी प्रिया मुझ पर बेवफाई का आरोप लगा मुझसे दूर भाग रही थी और नायिका के प्रेमी महोदय, मुझसे अपनी प्रिया की रक्षा करने के लिए मुझसे चिपकते जा रहे थे. परिणामतः जब वे नाटक में और कुछ नहीं कर सके तो प्राम्प्टर बन गए. इससे कुछ तो निर्देशक महोदय संतुष्ट हुए और कुछ संतोष मुझे भी हुआ कि नायिका स्वयं को सुरक्षित पाकर मुझसे झगड़ा नहीं करेगी. उसके प्रेमी महोदय स्वयं घटना-स्थल पर उपस्थित रहेंगे तो हमसे बदगुमानी नहीं पालेंगे. फिर प्रेमी के साक्षात् उपस्थित रहने पर, रिहर्सलों के पश्चात् न तो हमें नायिका को चाय पिलाने का दायित्व ढोना पड़ेगा और न उसे घर छोड़ने जाने का नैतिक कर्तव्य निभाना होगा. जिसकी ड्यूटी है, वह स्वयं बजाता फिरेगा. हम क्यों बंदर की बला अपने सिर लें...

पर हम क्या जानते थे कि यह नाटक फिर मेरे साथ, हार्डी के उपन्यासों की त्रासदी करने जा रहा है.

एम.ए. करते-करते ही नायिका और उसके प्रेमी का विवाह हो गया. और साहब! मित्रों ने फिर मुझे शोक-संदेश भेजने प्रारंभ कर दिए, "भाई क्या जमाना है. लोगों को दोस्ती का भी खयाल नहीं रहता." कुछ लोगों ने मुझे ही दोषी पाया, "तुम साले! फिसड्डी ही रह गए. तुमसे तो प्राम्प्टर ही प्राम्प्ट निकला." जब कभी मैंने किसी को समझाने का प्रयत्न किया, तो उसने प्रखर वक्रता से उत्तर दिया, "हाँ! हाँ! अंगूर खट्टे हैं."

तंग आकर मैंने सोचा कि कुछ ऐसा करूं कि फिर नाटकीय त्रासदी मुझे न छू पाए. एक ही मार्ग सूझा कि जीवन की त्रासदी को अंगीकार कर लूँ! बस - झटपट विवाह कर लिया. मैं अपनी ओर से बहुत संतुष्ट था कि मैंने नाटकीय नायिकाओं से मुक्त हो, अपने जीवन की नायिका को पा लिया है. पर यारों का दृष्टिकोण ही और था. उनका विचार था कि नाटक के प्राम्प्टर की नियुक्ति कर ली है... अब स्थिति यह है कि घर के भीतर जो कुछ बोलता हूँ, मेरी पत्नी मानी है कि मैं नाटक कर रहा हूँ, और घर से बाहर जो कुछ बोलता हूँ, उसे यार लोग मेरी प्राम्प्टर की वाणी मानते हैं....

लिखते-लिखते कलम रुकने लगी है... इसलिए नहीं कि रचना लंबी हो गई है... आशंका जाग उठी है , नाटकीय त्रासदियों की चर्चा करते-करते कहीं जीवन की त्रासदी का मार्ग तो प्रशस्त नहीं कर रहा... जब पत्नी इन कन्फैशंस को पढ़ेगी तो बखेड़ा नहीं मचाएगी, 'पहले तो कबी चोंच नहीं खोली. मुझे खोले में रख विवाह कर लिया. और अब बुढ़ापे में ससुर अपनी प्रेमकथाएँ लिखने बैठे हैं.' ... इस आशंका के मारे इसी क्षण निर्णय कर लिया है कि संपादक महोदय से प्रार्थना करूंगा कि इस कन्फैशन को प्रकाशित करें तो नीचे यह अवश्य छापें कि रचना के सारे पात्र काल्पनिक हैं. पर अपने संपादक भी क्या कम हैं? संपादकीय त्रासदियों को विषय में फिर कभी लिखूंगा. पर इस समय तो यही भय सता रहा है कि अपनी टिप्पणी में उन्होंने यदि लिख दिया कि 'नरेन्द्र कोहली की इसी रचना के सारे पात्र काल्पनिक हैं, अन्य रचनाओं के विषय में हम कुछ नहीं कह सकते' तो मैं अपनी अन्य प्रेम-कथाओं के बारे में क्या सफाई दूंगा. या उन्होंने अधिक कृपा की और लिख दिया कि "इस रचना के, लेखक समेत सारे पात्र काल्पनिक हैं" तो मैं अपने अस्तित्व की रक्षा कैसे करूंगा?...

मुझे अपने जीवन की त्रासदियों का अंत नहीं दीखता...

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चित्र - रेखा श्रीवास्तव की पेंसिल कलाकृति.

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