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श्यौराजसिंह बेचैन का बेचैन कर देने वाला आत्मकथांश

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बेवक़्त गुज़र गया माली -श्यौराजसिंह बेचैन तब मेरी उम्र क़रीब पांच-छह साल की रही होगी. मेरी सब से बड़ी बुआ 'कलावती' डिबाई के पास भ...


बेवक़्त गुज़र गया माली

-श्यौराजसिंह बेचैन


तब मेरी उम्र क़रीब पांच-छह साल की रही होगी. मेरी सब से बड़ी बुआ 'कलावती' डिबाई के पास भीमपुर में, उससे छोटी 'मानों' अतरौली के पास पाली मुकीमपुर में और सबसे छोटी बुआ 'छोटी'_नरौरा के पास धुर्रा प्रेमनगर में ब्याही गई थीं. छोटी बुआ के सगे देवर गंगावासी से डोरी लाल के बड़े भाई गंगासाय की इकलौती संतान 'मानती' की शादी हो चुकी थी. चूंकि, जाति-बिरादरी से गंगासाय ताऊ चाचा (पिता) के भाई लगते थे, इसलिए छोटी बुआ और 'मानती' गांव के रिश्ते से बुआ-भतीजी और ससुराल के रिश्ते से देवरानी-जेठानी लगती थीं. डोरी ताऊ के घर में चन्दौसी की 'स्यामनियां' उर्फ़ 'भूरी' थी. ताई जावित्री और अम्मा सूरजमुखी सहित ये तीनों एक ही मुहल्ले की थीं.


गंगावासी और बीधो यानी दोनों फूफा लगभग तीस साल पहले मुर्दा मवेशी उठाने, चर्म शोधन करने और चर्बी बेचने का मामूली व्यवसाय किया करते थे. गंगावासी आज यानी लगभग चालीस साल बाद 21वीं सदी में भी वही काम कर रहे हैं और उसी कच्चे मकान में रह रहे हैं, जहां मेरे घर-परिवार रूपी बाग के माली ने अंतिम सांस ली थी. तब फूफा और गंगावासी दोनों भाइयों के परिवारों की जीविका रंगाई-फरहाई की आय पर निर्भर थी. स्थिति आज भी वही है, बदला कहीं कुछ भी नहीं है. गांव के भीतर इनका एक छोटा-सा झोपड़ीनुमा कच्ची मिट्टी से बना पुश्तैनी घर हुआ करता था. आस-पास जाटों के पक्के मकान, लम्बे चौड़े दालान और बड़े-बड़े घेर थे. फूफा बंधु जब मवेशी की खाल उतारकर गांव में लाते थे, हालांकि पूरी तरह छुपा कर ही लाते थे, तो गांव से बाहर उसे ज़मीन पर पसार कर, उस पर नमक रगड़ कर उसकी बदबू मार कर ही लाते थे. ग़ैर-कौम हिंदुओं को ऐतराज होता था. इस कारण उन्हें खालों को गांव के बाहर रखना पड़ता था. बाद में जब मैं छात्रा बन कर वहां रहा था. तब गंगावासी के इस काम में मैंने भी सक्रिय मदद की थी. मैंने अपने पेट और पढ़ाई के ख़र्च के लिए यह ठेके की मजूरी की थी.

जिन चमारों ने मवेशी उठाने का काम-धंधा छोड़ दिया था वे स्वयं को ऊंचे दर्जे का मानने लगे थे, जबकि माली हालत उनकी भी खराब ही थी. जाट-बामनों में यह काम नहीं होता था. दलित व्यवसाय बदल कर नई सम्भावनाएं तलाशने के पक्ष में थे. सवर्णों को दलितों के कार्यों का न अनुभव था, न ज़रूरत, बल्कि इसका आभास तक उन्हें अपमानजनक लगता था. उनके दैनिक स्वच्छ वातावरण में यह असुविधाजनक था.

पिता जी जिन्हें मैं चाचा कहता था, सिर पर पोटली रख कर घर से निकले थे तो उनके साथ जाने की मैंने बहुत ज़िद्द की थी. रोई तो 'माया' बहन भी ख़ूब थी, पर वह मना ली गई थी और मैं ज़िद्द पर अड़ा रहा था. बहन के बाद घर परिवार में बड़ा लड़का मैं ही था, इस कारण मुझे लाड़ -प्यार अधिक मिल रहा था. हालांकि बहन बड़ी थी, परन्तु पूरे परिवार का लाड़ मेरे प्रति अधिक था. वंश बेल तो लड़के से ही चलती है, शायद इस विश्वास का अतिरिक्त लाभ मुझे स्नेह के रूप में मिल रहा था. पिता जी ने साथ ले जाने का फ़ैसला कर लिया था. 'प्यारे' चच्चा को पोटली पकड़ा कर मुझे उन्होंने कंधों पर बिठा लिया था. अम्मा ने कहा था, ''जाइ मति लै जाउ परेशान करि लेगो.'' इस पर उन्होंने जवाब दिया था, ''करेगो तब देखंगे, अब जो रोवत विलखतु तो नाइ छोड़ो जातु.'' अम्मा काफ़ी दूर तक समझाती हुई पीछे-पीछे बोलती गई थी, ''ब्याह-बरात में भीड़-भाड़ बहुत होति है. छोटे बालकनु कूं काऊ के पांइ के नीचे दबन को डरु रहतु है. तुम अपनो खियालु रखोगे कै जाकूं संवारागे?'' रुकि जा बेटा, रुकि जा, मैं तोइ खीर खवाऊंगी'' जो दिउंगी वो दिउंगी...इत्यादि.


...इस तरह अम्मा की ओर से मुझे कई बाल प्रलोभन दिए गए. बल्कि ताऊ भी कह रहे थे- ''राधो! अरे जाइ छोड़ि जा जो दस-बारह कोस तेरे कंधानु पै ही लदि कें जाइगो, जोऊ हारि जाइगो और तू हू!'' यह सुन कर चाचा ने आश्वस्त किया था कि हम सब चले जाइंगे. भैया तू चिंता मति करै, 'प्यारे' हमारे संग है, हम अदल-बदल कें ले जांगे. देखि आवेगो बरात और अपनी बुआ तें मिल आवेगो. छोटी (बुआ) ने हूं विल्लात दिन तें नाइ देखो है. जाको नाम 'सौराज' तो छोटी ने ही धारो है. बुआ को का कम लड़ैंतो है जो?''


''रुक जा बेटा, ले जाउ ले जाउ,'' दादी ने आज्ञा दी, ''जा बेटा, जाइ ही रओ है तो ठीक तें हँसी-खुशी तें जा. एक जोड़ी कमीज पाजामा और धारि लै जा. रत्ता (रास्ता) में प्यास लगेगी, बालक है तो एक लुटिया-डोर संग लै जाउ.''


कुछ देर तक यह सब कशमकश चलती रही. अंततोगत्वा चाचा( पिता ) के साथ मेरा जाना निश्चित हुआ. आज कितना वक्त ग़ुज़र गया. मेरे खुद के दो बच्चे आ गए अजातिका बारह साल की हो गई और आयूष दस पार का हो गया. कमोबेश तब इससे आधी ही उम्र रही होगी मेरी. पर स्मृतियों में आज तक मौजूद पिता का वह स्नेह छवि मैं स्पष्टतया महसूस करता रहा हूं. यद्यपि उनकी शक्ल भी आज पूरी तरह मेरे जहन में नहीं है. उनकी आकृति को महसूस भर कर सकता हूं. उनकी कमी की कहानी तो पूरे परिवार पर कहर और तबाही की कहानी है. मेरे स्नेही चाचा पतले, इकहरा बदन और लम्बे क़द काठी के थे. वे कंधों पर बिठा कर मुझे बुआ के गांव ले गए थे. यह कंधे पर बैठ कर जाना न जाने मुझे कैसे याद रह गया और क्यों याद रहा, जबकि मैं जीवन में कितनी ही चीज़ें भूल चुका हूं, कितने कटु अनुभवों से गुज़र चुका हूं, पर पिता का वह अल्पकालिक सान्निध्य मैं विसार नहीं पाया हूं. सम्भवतया, हर बालक की तरह मेरे बाल-जीवन में भी माता-पिता के स्नेह जैसी कोई दूसरी चीज़ नहीं थी. मेरे खाली मन-मस्तिष्क में बाल काल की घटनाएं अमिट रूप से अंकित हो गईं. शायद इसी समय से आत्मीय स्नेह और छोटी-छोटी जरूरत की चीज़ों से वंचित रहने के कारण मैं धीरे-धीरे गम्भीर और जिम्मेदार होता चला गया. इस घटना का सही-दिन तारीख और वर्ष तो मुझे आज भी याद नहीं, इसकी खोज भी करूं तो कैसे? बुआ-फूफा नाते-रिश्तेदारों से लेकर घरवालों, यहां तक कि उनके बच्चों में भी कोई साक्षर तक नहीं है. बुआ की सास-ससुर अनपढ़ ननद-ननदोई की जीविका भी मुर्दा मवेशी उठाने और खाल काढ़ने, पकाने (चर्म-शोधान करने) और बेचने पर ही निर्भर थी. वे शिक्षा, सभ्यता, साहित्य और संस्कृति की विकसित हो रही दुनिया से अलग सदियों से कायम अत्यंत पिछड़ी और समाज से बहिष्कृत एवं तिरस्कृत दुनिया में जी रहे थे.


हमारी यात्राएं उन दिनों पैदल ही तय करनी हुआ करती थी. गांव की अगड़ी जातियों की तरह हमारे पास बैलगाड़ियां नहीं थीं. यूं हमारे लिए तो पैदल यात्रा करने के अलावा कोई चारा ही नहीं था. नदरोली से 'धुर्रा' तक की यात्रा सुबह से शाम तक की थी. इस दौरान हम कितनी जगह, कितने पेड़ों के नीचे बैठे, सुस्ताए, कितने कुंओं का पानी पिया और चलते गए. उस पैदल यात्रा की धुंधली सी छाया मेरे जेहन में बाक़ी तो है, पर पूरी तरह वह भी स्पष्ट नहीं है. रामघाट पर गंगा में डुबकी लगाना, नाव में बैठ कर लहरों के उठने-गिरने का आनंद लेना तब मेरे बाल मन के लिए कौतूहल के विषय थे. पर आज तो मैं उन क्षणों की केवल कल्पना मात्र ही कर सकता हूं, या प्रसंग के आगे-पीछे के सूत्र पकड़ कर कड़ी जोड़ सकता हूं. यूं वह मेरी पहली नाव-यात्रा थी.


शाम को जब हम लोग धुर्रा-प्रेमनगर के क़रीब पहुंचे तो सभी ने अपने-अपने कपड़े बदले. उन दिनों यात्रा में पहने गए नए कपड़े भी बारात में दोबारा पहनने लायक और खास कर उत्सव में शामिल होने योग्य नहीं रह जाते थे. यही हमारी स्थिति थी. घर से ही कपड़े बदलने के लिए साथ ले गए थे. बारात तब तक आई नहीं थी. शादी का सारा कार्यक्रम गांव के बाहर ही सम्पन्न होना था. गांव के बाहर बने घर पर, जहां मानती रहती थी और वहीं चर्म-शोधन की कार्यशाला संचालित होती थी. बाहर से आने वाले किसी व्यक्ति या बारात का गांव में प्रवेश इसी रास्ते से होता था. मुझे स्मरण नहीं कि हम पहले मानती के घर पर रुके थे या नहीं, पर इतना याद आ रहा है कि छप्पर के घर में चाचा मुझे गोद में लेकर बैठे थे. उन्हें बूरा का शरबत पिलाया गया था. भातई पूरे दिन व्रत रख कर आता था. ऐसी प्रथा प्रचलित थी. उसी के तहत चाचा भी पूरे दिन बगैर कुछ खाए पिए ही रहे थे. बुआ ने मेरे हाथ पैर और मुंह धो कर कुछ मीठा खाने को दिया था. उन दिनों बुआ के पास भी कोई बच्चा नहीं था. हल्दी से पुती बैठी बुआ की ननद के पास मैं बार-बार आ जा रहा था. मैं शरारती भी कुछ अधिक था. ऐसा मेरी बुआ भी कहती है. मैंने हल्दी से पुती दुल्हन को कुछ परेशान भी किया था क्योंकि वह किसी अजीब रंगीन-मूर्ति-सी लग रही थी.



शाम को गाजे-बाजों के साथ जोर-शोर से बारात चढ़ी. लड़कियों के कपड़े पहन कर काग़ज़ और बांस की खपच्चियों से बने मोर को कमर में डाल कर डफली की ताल पर नचकैया नाच रहे थे. उनमें एक नचकैया तो बेहद मशक्कत कर रहा था. दूल्हा के चेहरे पर खजूर की पत्तियों का मोहर यानी सेहरा बंधा हुआ था. महिलाओं और बच्चों की भीड़ उत्सुकता से दुल्हा की सूरत देख-देख कर प्रतिक्रियाएं कर रही थी. देर रात जाकर शादी की रस्में संपन्न हुईं. दही बूरा की दावत जेंम कर बारात जनमासे में चली गई थी. चाचा वहीं कुछ बारातियों और घरातियों के बीच में ठहर गए थे. आमतौर पर बारातें देर में ही सो पाती थीं. उस रात भी सब लोग देर तक जागते रहे थे. नींद में मैं कहां किस के पास सुलाया गया था मुझे याद नहीं. करीब आधी रात के बाद जब मेरी आंखें खुलीं, और मैंने अपने आस-पास 'चाचा' (पिता) को खोजा, तो वे वहां नहीं थे. मैं रोता बड़बड़ाता उठा तो देखा कि कई लोग 'चाचा' को चारों ओर से घेर कर बैठे हैं. रात बाहरी हवा लग जाने के कारण अचानक उनकी तबियत खराब हो गई थी. वे दगड़े में पेशाब करके आए थे. वहीं उन्हें उल्टियां आई थीं और आवाज बंद हो गई. बुआ-फूफा वहां मौजूद थे. लेकिन कोई डॉक्टर या बैद्य वहां नहीं था, यदि होता तो क्या अछूतों के घर आता? बुआ बहुत अधिक घबरा रही थी. वह रो-रो कर कह रही थी_''जब मेरो भैया शराब नांय पीअतु है तो जिद्द करि-करि कें और कसमें चढ़ाइ चढ़ाइ कें काये कूं पियाई नाशपीटेऔ. का ब्याह बरात में जहर पीनों जरूरी है?''
जहां तक मेरी याददाश्त है, मेरे घर परिवार के जो संस्कार रहे, उनमें शराब जुआ या अन्य व्यसनों के लिए कोई जगह नहीं थी. व्रत, पूजा, गंगा-स्नान आदि सब वंश रीति के अनुसार चलते थे. लेकिन हमारे देवताओं में नौंना चमारी, भौपुर की चामुंडा, बंगाले के बंगाली बाबा, सैय्यद बाबा, भीमपुर की दाई मैया प्रमुख थीं. मेरे घर सहित पूरे चमरियाने में दारूबाजी का चलन तो दूर नशीले पदार्थों का नामोनिशान तक नहीं था. परन्तु कुछ भूत-देवता सियानों पर आते थे तो दारू मांगते थे. अपेक्षाकृत संपन्न सवर्ण महिलाएं इन सियाने ओझाओं की अहमियत बढ़ातीं थीं. खास कर बांझ बनैनियां, मुसलमानियां और अहीरियां इन सियानों से बेटे मांगा करतीं थीं. जिनके बेटी पैदा हो जाती, उनकी शिकायत पर उल्टा उन्हें ही दोषी ठहराया जाता, कि पूजा साफ मन से नहीं की. बेटा होता तो वह औरत कानों कान गांव भर में सियानों का प्रचार करतीं कि मखनी भगत ने दओ है. दिलचस्प यह कि सामान्य स्थिति में ये दलित भगत इन सवर्ण औरतों के यहां काम करने जाते थे तो ये पूरी छुआछूत बरतती थीं.


जैसा कि मैं ऊपर कह चुका हूं उन दिनों मेरे गांव में दारुबाजी नहीं थी. पर अब सभी जातियों के युवक दारु पीते हैं और स्त्रियां किसी भी जाति की किसी भी तरह का नशा नहीं करती हैं. युवा ज़रूर अपने घरों की सुख-शान्ति से खिलवाड़ व उपद्रव करते हैं. मैं साहित्यिक मित्रों के साथ जब कभी खुशी या मेल-जोल के मौके पर यदाकदा शराब पी लेता हूं तो मुझे अक्सर अपने पिता के साथ हुए प्राण लेवा हादसे की याद आ जाती है. तब मैं गम्भीर हो जाता हूं.


उस वक्त क़ी वह स्याह रात, लम्बी और डरावनी लग रही थी, पर वह मिट्टी के दीपक की लौ के सहारे गुज़र तो रही ही थी निशा धीरे-धीरे. चाचा को बार-बार उल्टियां करते देख मेरी नींद भाग गई और मैं रोने-बिलखने लगा. मैं उनके सिर के पास जाकर उनसे लिपट गया था. उन्होंने उसी अस्वस्थता की स्थिति में मेरे सिर पर हाथ रखा था. बुआ ने मुझे गोद में उठा लिया था. भोर हो चुकी थी. फूफा जी बोल रहे थे. ''बालक डरिपि जाइगौ याइ अलग हटाइ देउ.'' पर मैं चाचा से दूर रहना नहीं चाह रहा था. इसलिए मैं बुआ या किसी और की गोद में नहीं रुक पा रहा था.
चाचा को एक के बाद एक बहुत उल्टियां हो रहीं थीं. उनके शरीर में पानी की कमी की पूर्ति नहीं की गई. सवेरे तक उनकी शारीरिक दशा काफी खराब हो गई. मैं पांच-छह साल का बच्चा रोने या डरने और घबराने के सिवाय कुछ नहीं कर पा रहा था. उस रात का डर आज तक मेरे भीतर से नहीं निकला है. ऐसे ही कुछ डर और भी हैं जो मेरे भीतर जड़ें जमाए बैठे हैं. पर अन्य डरों में से वह डर गहरा और प्रभावी था. उपचार परंपरागत हुआ. वही झाड़फूंक, वही भूत पूजा. कोई सही नई पध्दति का इलाज नहीं हुआ. वह जान-बूझ कर नहीं कराया गया था, यह कहना शायद इल्जाम हो. असल बात लोगों में गहरी अज्ञानता, अशिक्षा और अन्धाविश्वास का होना था.

ज्यादातर स्त्री-पुरुषों का कहना था कि चूंकि रात के बारह बजे राधो ने घेर के सामने के चौराहे पर पेशाब कर दिया था, इस कारण चौराहे वाली चुडैल ने उसे पकड़ लिया है. जब तक बड़े 'सयानों- ओझाओं द्वारा चौराहे वाली से बड़े देवी-देवता नहीं बुलाए जाएंगे तब तक राधेश्याम का इलाज नहीं हो सकेगा. 'प्यारे' चच्चा को यह बात पता थी कि नदरोली में मक्खन और खचेरी के सिर पर 'बंगाली बाबा', 'सैय्यद बाबा' और 'भोपुर' की चामुण्डा खेलती है. यदि वे आ जाएं तो राधो के सिर से बड़े से बड़ा भूत उतर सकता है. अपने देवी-देवता सभी के देवी-देवताओं से अधिक शक्तिशाली हैं, यह भ्रामक सोच हमारे जाति बन्धुओं में अभी तक कायम है.


दूसरे दिन पड़ोसी गांव से झाड़-फूंक करने वाले सयानों का एक दल बुलाया गया. मुख्य सयाने ने देखते ही घोषणा कर दी कि इसे मामूली भूत ने नहीं पकड़ा है. चौराहे वाली बहुत ताक़तवर है और उसके साथ कई और भूतनियां भी हैं. इसलिए दो तीन दिन तक लगातार थाली बजेगी, बैठक बैठेगी और चाबुक चलेगा.

मिट्टी के एक कमोरे पर थाली रख कर छन्दों, यानी भूत गीतों और थाली बजने का छनन-छनन शोर लय-ताल के साथ शुरू हुआ. इस शोर में संगीत जैसी लय होती थी. यह थाली बजने की परंपरा इधार के चमारों और भंगियों में पिछले सैकड़ों सालों से प्रचलित थी.


एक-दो दशकों से जब से चमार गांवों से निकल कर नगरों, महानगरों में मेहनत-मजूरी करने लगे हैं, विदेशों से आ रही ज्ञान-विज्ञान की उन्नत सभ्यता-संस्कृति के संपर्क में आने लगे हैं. तब से यह भूत पूजा अब कम होती दिखाई दे रही है. भूत पूजा और अंधाविश्वासों के ख़िलाफ़ बाद के दशकों में मैंने भी अपने गांव-बस्ती में पुरजोर मुहिम चलाई थी और कई जोखिम उठाए थे. बिरादरी से कोई भी मेरे साथ इस मुहिम में नहीं आया था. मुझ से पूर्व के पढ़े-लिखे भी खुद भूतों में विश्वास करते थे. आर्य समाज के संपर्क से और कुछ कम्यूनिस्ट साहित्य पढ़ कर मैंने पाखण्डों के विरूद्ध निरंतर संघर्ष किया. अब आकर कुछ फल मिलता, सो गांव में पहुंची राजनीति के घटिया तरीकों, शिक्षा की कमी और परिवार कल्याण की जानकारी के अभाव ने सब सपने धूमिल कर दिए हैं. वहां केवल चमारों को ही नहीं, यादवों, वाल्मीकियों और मुसलमानों की बस्तियां भी बर्बादी के कगार पर हैं. अस्पृश्यों के लिए मेरा गांव शान्ति और तरक्की के केन्द्र नहीं हैं. भूमिहीनों के लिए तो यह खुला काराबास बन गया है. इन वर्षों में भूत पूजकों ने अपने आप को कम बदला है. लेकिन उनके काम को आगे ले जाने वाली मेरी हमउम्र नई पीढ़ी पैदा नहीं हुई. अच्छा हुआ कि यह क्रम थम गया. गांव-बस्ती के माहौल में मुझे भी शुरू में भूतों के अंधाविश्वासों ने जकड़ रखा था. शुरू में ईश्वर में विश्वास रखने के कारण भी भूत-प्रेत विश्वासी बना गया था. क्योंकि ये देवी-देवता मुझे ईश्वर के निकट-संबंधी लगते थे. बंगाली बाबा को जलेबी खिला कर उसे अपने पक्ष में रखने के अलावा और क्या हो सकता था? खैर यह सब तो बाद में पहले पिता रूपी माली के प्रसंग पर लौटता हूं.

एक साथ तीन सयानों के सिरों पर भूत खेल रहे थे. वे झूम-झूम कर अजीब मुद्राएं कर रहे थे, और हवा में हाथ लहरा-लहरा कर पूरे जोर से चाचा के गालों पर थप्पड़/चांटे मार रहे थे. चांटे भूत को लग रहे हैं, यह मान कर मेरे फूफा और बुआ चारपाई पर बीमार हालत में लेटे हुए चाचा को बार-बार पकड़ कर इन सयानों के सामने पेश कर रहे थे. मेरी आंखों के समक्ष उपस्थित वह भूतों के प्रति अंधभक्ति और रोगी के प्रति क्रूरता का ऐसा दिल दहलाने वाला नज़ारा था जो किसी पत्थर दिल व्यक्ति को भी द्रवित कर देता. शादी में पहुंची कलावती बुआ आग्रह कर रही थी_मेरे भइया कूं शहर लै चलौ, पर कोई सुनने वाला नहीं था. उसने कहा था_बीधो तेरी नाअक्ली ने मेरो भइया मारि लओ' जैसे-जैसे समय बढ़ रहा था वैसे-वैसे चाचा की हालत बिगड़ती जा रही थी. उन्हें सही और त्वरित उपचार की ज़रूरत थी. लेकिन सयानों की मंडली उन्हें शारीरिक रूप से यातनाओं पर यातनाएं दिए जा रही थी. चाचा को खाट से खींच कर ज़मीन पर डाल दिया गया था. घर बाहर के सब लोग यह मान रहे थे कि मारपीट और यातनाएं 'राधो' को नहीं, बल्कि इस की देह पर सवार उस चौराहे वाली को दी जा रही हैं. त्रासद वेदना से लबालब चाचा के आंसुओं की भाषा समझने वाला वहां कोई नहीं था. मैं उनका खून था पर उनका मददगार नहीं था. 'छोटी' बुआ पूछतीं_''कब तक ठीक है जाइगो मेरो भैया?'' तो वे जबाव देतेµ ''छोटी, तू फिकर मत करि, हम कर रए हैं. पर जब तक हवा नांय जाइगी, तब तक हम हू नाय जांगे राधो कूं छोड़ि कें हम हमेशा कूं जाकी देह तें भूत लिकारि कें दम लिंगे.''

मैं बार-बार चाचा से लिपटता, देखता कि सियाने कभी चांटा मारते, तो कभी हवा में लहरा कर उनकी पीठ पर चाबुक जमा देते थे. चाचा बार-बार कहते- ''मेरे ऊपर कोई भूत-भूतनी नांय है, काऊ बैद्य कूं बुलाइ देउ, मोइ जिन्दे कूं मत मारो.''


उनकी अपील सुनने के बजाय हर ओझा के सिर आया भूत यही कहता था कि_''जब तक या पै जमि कें मार नांय पड़ेगी गे नांइ उतरै गौ. मारि, ससुरि के मैं चाबुक मारि. या पै चौराहे वाली बोल रही है, और वे चाचा की बोलती बंद करा देते. चाचा की आंखें मदद की आशा से खुलतीं और मार खाते ही आंसुओं में डूब जातीं. यह क्रम दो-चार घंटे नहीं, बल्कि पूरे तीन दिन तक लगातार चला था. 'धुर्रा प्रेमनगर' और उसके आस-पास के गांवों में शोर हो गया था कि चमारों के घर भूत उतारने का लंबा उपक्रम चल रहा है. अछूतों की अलग दुनिया मान कर गैरदलित उसमें हस्तक्षेप नहीं करते थे. हां, चमारों के घर के आस-पास देखने वालों की भीड़ लगी रहती थी. भूत-प्रेतों में विश्वास रखने वाले सयाने और ग़ैर-सयानों की यह मंडली किसी बाहरी व्यक्ति की राय मानना तो दूर किसी की एक बात भी सुनने को तैयार नहीं होती थी.


बुआ के देवर यानी 'मानती' के पति 'गंगावासी' को दुवारी में छिपा दिया था कि कहीं राधो पर से उतरकर भूत गंगावासी पर न चढ़ बैठे. आख़िर वे मेरे गांव नदरोली भेज दिए गए थे, यह कह कर कि वहां तें राधो की बहू को संग लै आएं. 'प्यारे' ने कहा था ''अपने गांव के दो-तीन सयाने 'खचेरी' और 'मखनी' को संग लै आएं जो शायद मिल-जुल कर के राधो पर चढ़ी चौराहे वाली से पीछा छुड़ा सकें.''


बुआ, फूफा और 'मानती' का परिवार सास ससुर सहित तीन दिन तक सयानों की मंडली की खातिरदारी करते रहे, क्योंकि असल में तो वे नाराज होते ही अदृश्य भूतों की अपेक्षा खुद ही मुनष्य रूप में साक्षात् ज़िन्दा भूत बने क्रुद्ध और क्रूर हो रहे थे. उनका कोप चाचा की देह और दिल-दिमाग़ पर बरस ही रहा था. वह हमारे पारिवारिक जीवन में भी प्रलय ला देगा. ऐसी बला को न तो मैं ठीक से जानता था और न उसे टालने की स्थिति में था. मुझे कभी बुआ तो कभी कोई अन्य चाचा की खाट से हटा कर अलग ले जाते रहे. मैं बार-बार उनके पास भाग आता था. सयानों ने पूजा के नाम पर जो अंगारे जला रखे थे, उन पर लौंग और सामग्री चढ़ाई जा रही थी. देसी घी जलाया जा रहा था और रोज़-रोज़ प्रसाद बांटा जा रहा था. अलग-अलग देवताओं के स्तर के अनुसार उनके प्रसाद भी अलग-अलग बंट रहे थे.


पाली मुकीमपुर 'धुर्रा' से मात्र 5-6 कि. मी. की दूरी पर है. इस शादी में वहां से कई लोग शामिल हुए थे. पाली में मंझली बुआ 'मानों' ब्याही थी. चाचा की गम्भीर आपात् स्थिति की ख़बर पा कर वह भी वहां उपस्थित हो गई थीं. अधिक संवेदनशील होने के कारण 'मानो' बुआ पर इस हादसे का असर अपेक्षाकृत बहुत गहरा पड़ा था.


तीसरे दिन सांझ को गंगावासी वापस आए. उन्होंने बताया, ''मैं खबर देकर उलटे पांव लौट आया हूं. कई जने आ रहे हैं.'' चाचा के शरीर में अभी चंद सांसें बाक़ी थीं. सूरज ओझिल हो रहा था. मैं बाहर रास्ते पर गांव की ओर आंखें गड़ाए अम्मा के आने की प्रतीक्षा कर रहा था. मेरे चारों ओर बीते तीन दिन से जो क्रूरतम वातावरण बना हुआ था, उससे मैं पस्त हो चुका था. अम्मा आए, चाचा को देख ले और बचा तो इनकी जान बचा ले. उपचार के नाम पर तिल-तिल कर मार रहे इन हत्यारों के हाथों से चाचा की जिंदगी को छीन ले, लौटा ले. ढातीसरी रात होते-होते बाहर खचेरी ताऊ, मक्खन, दयाराम चाचा और बाबूराम ताऊ दिखाई पड़े. मैं दौड़ कर उनके पास पहुंचा. ''ताऊ, अम्मा क्यों नांइ आई?''- यही पहला प्रश्न किया था मैंने.
''आइ रई हैं बेटा! तेरी अम्मा और सब आइ रए हैं.''

अम्मा शरीर से काफी हृष्ट-पुष्ट थी. लेकिन उन दिनों करीब डेढ़ दो सप्ताह पहले मेरे छोटे भाई राम भरोसे का जन्म हुआ था. हाल ही में वह जचपने से बाहर निकली थी. इस कारण एक तो वह काफ़ी कमजोर हो चुकी थी, दूसरे, एक बच्चा गोद में और तीसरा नेकसिंह सवा साल का था. साथ में घर वाले थे अंधे ताऊ, अंधे गंगी बब्बा और लंगड़े 'बीधो' बब्बा. ये सब पैदल यात्रा करने की दृष्टि से अक्षम थे और बैलगाड़ी रखने की हमारी स्थिति नहीं थी. परन्तु संकट की घड़ी में उन्हें भी जैसे-तैसे आना पड़ा. इस तीसरे दिन की शाम को ही जब सयानों ने देखा कि चौराहे-तिराहे वाली का उतरना तो दूर रहा, उल्टे राधो की जान ख़तरे में है, उन्हें बेहद नाजुक स्थिति में पहुंचा कर वे अपनी थाली, चाबुक और तीन दिन का मेहनताना लेकर एक-एक कर रफू चक्कर हो गए थे. अब भी किसी डॉक्टर को बुला कर फूफा ने चाचा को दिखाने का प्रयास नहीं किया था. उनकी मज़बूरियां क्या रही होंगी, मैं नहीं जानता, सिवाय इसके कि डॉक्टरी इलाज में उनका विश्वास नहीं था. यह उनके स्वभाव से पता चलता था. वे काल्पनिक देवी-देवताओं की कृपा किसी भी दवा से ज्यादा कारगर मानते थे. अभी तक वे अपने बच्चों के लिए शिक्षा जैसी चीजें ग़ैर-ज़रूरी मानते रहे हैं. मुर्दा मवेशी का काम छोड़ कर क़र्ज़ के पैसे से दावत खिलाकर वे चमार से जाटव ज़रूर बन गए थे, परन्तु एक भी बच्चे को स्कूल नहीं भेज पाए. आज सब भट्टों पर ईंटें पाथते हैं और करजों में डूबे रहते हैं, जबकि जुआ शराब आदि किसी तरह की आदत उनमें नहीं है. वर्तमान खराब है तो भविष्य अच्छा होने से रहा?

शाम का समय था. कुदरत का सूरज छिप गया था. अंधेरा छाने लगा था. अशुभ घटित होने की आशंका के कारण अगले दिन बड़हार खाकर जाने वाली बारात को अब तुरत-फुरत विदा कर दिया गया था. राधो के साथ कुछ अनहोनी हो गई तो ज़िंदगी भर को लड़की के माथे पर कलंक लग जाएगा_बड़ों ने राय ज़ाहिर की थी. पर वे जितने अनहोनी के परिणामों के प्रति सचेत थे उतने चाचा के इलाज के प्रति नहीं थे. आखिर जल्दी-जल्दी बुआ की वह दुल्हिन ननद की विदाई की तैयारी उसी घर में और उसी समय में की गई. वह एक तो घर के विछोह से उदास दूसरे एक चिंताजनक वातावरण में उधार दुल्हिन धीमेधीमे कदमों से चौखट पार कर रही थी, और इधर बराबर वाले कच्ची मिट्टी के मकान में चाचा के प्राण देह से विदा हो रहे थे.

रात होते-होते बाहर से अम्मा ने घर में पांव रखे ही थे कि कुछ क्षण पूर्व ही ज़मीन पर पड़ा हमारे घर और जीवन के सूरज को भी डूबते क्षण चारपाई से ज़मीन पर उतार लिया था. परिवार के सभी सदस्यों की आखों के आगे से प्रकाश अंधेरे में बदल रहा था. मैं दोहरे अंधेरे से घिर रहा था. अब भी उनकी सांसों की आख़िरी डोर चल रही थी. देह सियानों के चाबुकों की मार से लहूलुहान हुई सूज रही थी. कलावती बुआ ने घोषणा कर दी थी कि मेरो भइया बीधो के पागलपन ने मारो है. सिरहाने बैठे नेत्रहीन बाबूराम ताऊ ने पूछा था_'भैया-लल्ला' ताऊ प्यार से चाचा को लल्ला कहते थे. का, मुसीबत है? हम आइ गए तोइ बचाइ लिंगे.'' कहते हुए वे उनके हाथ थाम रहे थे और अम्मा घबरा कर उनकी गर्दन से लिपट रही थी. जुबान से शब्द नहीं निकल रहे थे, पर वे आख़िरी वार भी मुझे देखना चाहते थे. प्यारे चच्चा ने मेरा चेहरा उनके हाथों के पास पहुंचा दिया था. आंसुओं से भरी आंखों की भाषा में उन्होंने अम्मा से कुछ कहा ही था कि तब तक तो पंछी उड़ गया था. भरे-पूरे बाग में बसंत आने से पहले ही माली बेवक्त ग़ुज़र गया था. अम्मा देखते ही पछाड़ खाकर गिर पड़ी थी. अंधे गंगी बब्बा, लंगड़े बीधो बब्बा और ज्योतिहीन आंखों वाले ताऊ भी अम्मा की चीख के साथ ऊंचे स्वर में विलाप करने लगे थे. अम्मा की गोद से छोटे भाई को बुआ की सास ने ले लिया था और उसके हाथों की चूड़ियां तोड़ दी गई थीं, उसके कपड़े बदल दिए गए थे, बाल खोल दिए गए थे और उसे चाचा की लाश पर से कौली भर कर अलग हटा दिया गया था.


मैं सहमा हुआ यह सब देख रहा था. मैंने बच्चे तो रोते देखे थे, पर इतने बड़ों को रोते हुए पहली बार देख रहा था जिनमें सबसे बूढ़े बब्बा भी फफक-फफक कर रो रहे थे. लेकिन किसी को सयाने ओझाओं पर ज़रा भी गुस्सा नहीं आ रहा था. उनका वह अज्ञान इस असमय हुई मौत के लिए उन्हें जिम्मेदार ही नहीं मान रहा था. बुआ का घर मातमी खामोशी से भर गया था. हर आंख में आंसू थे और अम्मा का तो हाल ही बेहाल हो रहा था. मैं जब घर से गया था तो बारात देखने की खुशी में हँसता-खेलता चाचा के कंधों पर सवार होकर गया था और अब पिता के चले जाने पर लौट रहा था तो मेरा बचपन मेरे कमजोर कंधों पर उठाने के लिए रह गया था.


अब रात का अंधेरा गहरा हो चला था. मां और बच्चों के भविष्य की चिंता का बोझ संभालने में लंगड़े बब्बा की हिम्मत ही टूट चुकी थी. घर के सभी सदस्यों के दिलो- दिमाग़ पर इस घटना से गहरा आघात पहुंचा था. करुणा भरी दहाड़ों, पछाड़ों, सांत्वना और धीरज बंधाने के क्रम में रात क़रीब आधी गुज़र गई. सवेरे जल्दी लाश को गंगा घाट ले जाना था. मैं अपनी आंखों के सामने घटित हुए, इस पूरे परिदृश्य से इतना सहम गया था कि मेरे दिल में दहशत के काले साए समा गए थे. अम्मा बताया करती थी कि मैं कई महीनों तक नींद में बड़बड़ाता कहता था ''मेरे चाचा को मत मारो, छोड़ दो इन्हें...'' सपनों में सब कुछ सजीव हो जाता था. बिस्तर पर नींद में ही डर के साथ पेशाब निकल जाना भी शायद तभी से शुरू हुआ था.


सीलन भरी मटीली कुठरिया के भीतर जमीन पर चाचा का मृत शरीर रखा था. बाहर कुछ लोगों ने मूंज के मोटे-मोटे बान बटे, बांस की टिकटी बना दी थी. दिन निकलते ही कफन लाया गया और लाश को अर्थी पर लिटा दिया गया. हाथों के साथ आटे के दो गुल्ला जैसे छाती पर रखकर शरीर कस दिया गया. यह गहरे मातम का माहौल था. इन तीन-चार दिनों में हम सब बच्चों के जीवन का आधार टूट गया था. उन दिनों मेरे घर में कोई भी सदस्य साक्षर नहीं था. न बब्बा न ताऊ, न अम्मा और न बहन. परिवार के भरण-पोषण के लिए पौने दो बीघा ज़मीन थी. जिसमें ताऊ का आधा हिस्सा था, उसमें से एक बीघा कल्लर (बंजर) की चपेट में आ चुकी थी. जैसे हमारे घर का एक मात्रा कमाऊ व्यक्ति चला गया था, उसी तरह ज़मीन की उर्वरता भी जा चुकी थी. बाक़ी पुरुषों में बड़े बब्बा भागीरथ, छोटे बब्बा गंगी और ताऊ बाबूराम तीनों नेत्राहीन थे ही. चौथे सदस्य बचे विधाराम बब्बा चाचा के पिता सो 'फिरक' (वह बैल गाड़ी जो केवल दो-तीन सवारियों के लिए होती थी. ) दुर्घटना में उनकी एक टांग टूट चुकी थी. कुल मिला कर, घर असहायों और अपाहिजों से भरा था. अम्मा के पास शिक्षा या रोज़गार का कोई हुनर नहीं था. इस कारण वह किसी दूसरे पुरुष की मदद के बिना हमें पालने में असमर्थ थी. उस समय उसकी उम्र 25 वर्ष से भी कम थी.


मैं अब मूक-हताश हुआ चाचा की अर्थी को बार-बार देख रहा था. बत्तीसी उठा कर उनके मुंह में पैसे रखे गए थे. सवेरा हो रहा था, मातमी सवेरा. वह सवेरा मैं कभी भूल नहीं पाया हूं. इन वर्षों के अंतराल में मैंने कितनी सुबहें और कितनी शामें देखी होंगी और ऐसा नहीं है कि उसके बाद सब सुख की सुबह और शामें रही हों, पर वह सुबह तो मुझे आज भी, अभी की गुज़री सुबह लगती है. एक दर्द और विडम्बना भरी वह सुबह-शामें मेरी स्मृतियों में क्यों बसी हैं? क्यों घेरे हैं वे अंधेरे मुझे आज तक? मैं उन्हें पुरानी शैली में क्यों व्यक्त करुं, क्या मेरे पास अपना अतीत नहीं है? उसकी परछाइयां ही सही पर क्या वे मेरी अपनी नहीं हैं? क्या हुआ अव्यवस्थित या लुटे-पिटे खंडहर ही मेरी त्रासद स्मृतियों में बचे हैं.

सबेरे-सबेरे चाचा का शव लोगों के कंधों पर था. चार दिन पहले मैं जिनके कंधों पर बैठ कर आया था, वे अंतिम यात्रा दूसरों के कंधों पर पूरी कर रहे थे. 'राम नाम सत्य है ...' के साथ शवयात्रा आरम्भ हुई थी. वे परंपरागत कर्मकाण्डों के साथ गंगाघाट पहुंचाए जा रहे थे. कल इसी घर की एक बेटी दुल्हिन बन कर विदा हुई थी, आज वहां से भात देने आए एक नौजवान मेहमान की अर्थी उठी. शव के पांव गंगा की ओर होने चाहिए. उधार ही शमशान है. राधो के सिर पर सवार रहे भूत प्रेतों का प्रस्थान उधार ही होना चाहिए. ताकि हवा-डवा उसी के साथ चली जाए, वापस लौट कर नहीं आए. अरे यह क्या किया दुर्जन के भाई टुंडी ने तो राधो का पांव धुर्रा की ओर कर दिया. क्योंकि गंगा की दिशा में हमारा गांव नदरोली है. इस बात पर भी विवाद हुआ था, ताऊ बताते थे. सारे प्रेतात्माओं से बचना दोनों चाह रहे थे. गांव के किसी जाट-चौधारी से किराए पर बैलगाड़ी ली गई थी. उसमें शवदाह के लिए लकड़ी-कंडों का ईंधान भरा गया था. शव को गंगा घाट पर ले जाकर दाह संस्कार किया जाना था. गंगाघाट मेरे गांव और धुर्रा (प्रेमनगर) के लगभग मधय रास्ते में था. दूरी की दृष्टि से गंगाघाट उत्तार दिशा में 6 कोस नदरोली और दक्षिण दिशा में पांच कोस धुर्रा (प्रेमनगर). गाड़ी में मैं, अम्मा और उस की गोद में रामभरोसे चिता के लिए ले जाई जा रहीं लकड़ियों पर बैठे थे. कभी आगे, कभी पीछे, चार-चार व्यक्ति अदल-बदल कर अर्थी ले जा रहे थे. अर्थी के साथ हमारी वापसी यात्रा इतनी शोक भरी थी कि हम सभी सिवाय 'राम नाम सत्य है' के अलावा रोते-सुबकते खामोश चल रहे थे. मेरे लिए यह अवस्मिरणीय सदमा था जिसमें घर के बुजुर्ग भी बच्चों की तरह रोते-सिसकते चल रहे थे. ऐसा नहीं था कि मृत्यु किसी ने देखी नहीं थी या यह निराली मृत्यु थी, बल्कि आश्रितों का क्या होगा ? इस एहसास ने करुणा को घनीभूत कर दिया था. अम्मा का तो हँसना खिल-खिलाना तो उस सदमे के बाद से सदा के लिए ग़ायब ही हो गया था. वह अपने शेष जीवन में गम्भीर बनी कष्टों से जूझती रही. वह रोते-रोते विलाप करती जा रही थी_''अरे तुम तो चले गए इन चार बालकनुं कूं किन के मौं असरिया (मुंह ताकने वाले) बनाइ कें छोड़ चले हो रे, सौराज के चाचा, मैं अब कैसे जिऊंगी और कैसे मरउंगी रे!'' यूं तो वह महीनों तक उन्हें याद करके रोती तो लगता कि गा-गाकर रो रही है, तेरी बगिया कूं कौन संवारे गोरे माली रे...बिन रुत के तेरो बाग उजरि गओ फूल बिखरि गए माली रे!

कई बार वह पागलों जैसी बड़बड़ाने लगती और कई बार रामभरोसे को गोद में लिटा कर छाती पीटने लगती. बब्बा विद्याराम भी प्रथा की वजह से बैलगाड़ी के कोने में पीछे को मुंह किए बैठे, नि:शब्द रोए जा रहे थे. बीच-बीच में कमीज से आंसू पोछते ) बाप के सामने मेरे बेटा की लाश दिखाइ दई. मैंने कौन से पाप करे? जो बेटा की अर्थी बाप के कंधा पै आइ गई? हर इतवार कूं गंगा न्हाइ रओ हूं, 20 साल तें सब देवी-देवता पूजतु आइ रओ हूं कन्नबास बेलोनवारी देविन्द्र की जात दै रओ हूं तौऊ मेरो घरु उजारि दओ निर्मोई राम ने. अरे बाप के सामने बेटा की मौत को दुख मैं किन्हें बताऊं, कैसें सहूं?''

हालांकि यह भी रंगइया चमार का कौम से छिका हुआ घर था. फिर अर्थी के पीछे-पीछे थोड़ी दूर तक प्रेमनगर के युवकों-बुजुर्गो और महिलाओं की भीड़ संग-संग आई थी. राधो जवानी में मरौ है, प्रेतात्मा जरूर बनेगो_फूफा ऐसा भय वर्षो बाद तक बनाए रहे. मुर्दा मवेशी उठाने, खालें शुद्ध करने और किसानों के रोज़मर्रा इस्तेमाल चर्म वस्तुएं बनाने का काम करने के कारण धुर्रा में फूफा बंधुओं का घर वैसे तो हमारे घर की तरह छिका हुआ (बहिष्कृत) था, परंतु गैरचर्मकारी में लगे बाक़ी जाटव बने चमारों के साथ उनका हुक्का पानी नहीं था. इस कारण सवर्ण जातियों की तरह इन चमारों में भी आपसी दूरियां काफ़ी थीं, पर सवर्णों की दृष्टि में ये सब थे अछूत ही. उसी तरह मेरे गांव नदरोली से भी पांच-छह लोग आ गए थे. हालांकि उन्होंने भी गांव में हमें छेक रखा था, परन्तु मौत जैसी संकट की घड़ी में वे साथ दे रहे थे.


रामघाट छोटा-सा क़स्बा था. गंगा के किनारे पर स्थित होने के कारण उस मधय रास्ते से प्राय: अनेक लोग शवों को लेकर गुज़रते थे. शव के साथ आने वाले लोगों को दाह संस्कार करने और स्नान से निवृत होने के बाद गुड़ चना खाने को दिए जाते थे. इसलिए रास्ते के किनारे गुड़ चना घी-सामग्री ईंधन और शव क्रिया में डालने वाली अन्य वस्तुएं बिका करती थीं. यहीं से ये सब चीजें फूफा और ताऊ ने ख़रीदी थीं. गंगा की धार के किनारे लकड़ी कंडों (उपलों) से चाचा की चिता बनाई गई थी. टिकटी (अर्थी) के बंधान कर समूह में आ बैठी थी. तो फिर किसी ने ज़िद भी नहीं की कि मुखी यहां से हट ही जाए.


मृतक का एक हाथ बाहर निकाल कर उस पर मुझ से अंगारा रखवाया गया और एक फूंस का जलता पलीता मेरे हाथ में पकड़ा कर मुझे गोद में थाम कर ताऊ ने कहा दै दै बेटा, अपने बाप की चिता कूं 'दाग'. रोइ कें बिदा मति करिए बेटा, नांय तो तेरो बाप नरक में जाइ गिरैगो.'' बेटा के हाथ बाप का क्रियाकर्म होने, मुखाग्नि देने से स्वर्ग में बाप की आत्मा को शान्ति मिलती है- ऐसी प्रचलित धारणा थी. उनके लिए स्वर्ग निश्चित करना था. मैंने असीम शोक से भरे हृदय के साथ चाचा यानी अपने दिवंगत पिता के सिर की ओर से चिता में पलीता लगा दिया और थोड़ी दूरी पर सभी के साथ भयाक्रांत बैठ कर मैं उस हृदय विदारक वेदनापूर्ण, दृश्य को खामोश बैठा एकटक देखता रहा. उन के जीवन का अंत यानी देह को स्वाहा होते अपनी आंखों से मैंने देखा था, पर मेरी आंख से एक भी आंसू नहीं गिर रहा था. मैं केवल सहमा सा खड़ा था. पर उस दृश्य को मैं वर्षों नहीं भूल पाया था. बचपन की सब से स्पष्ट स्मृति यदि कोई है तो वही दृश्य है. मनुष्य मर जाता है, उसका अमूल्य शरीर अपनों के हाथों जला देना पड़ता है. यह मेरा पहला और आत्मीय अनुभव था. गंगा की रेती में अम्मा की गोद के अलावा कोई अन्य आड़ वहां नहीं थी. यह सब करते हुए मैं कितना डरा हुआ था और इस घटना ने मुझे कितनी विचित्र मनोदशा में पहुंचाया था, इसका कुछ अंदाज़ा इस बात से लग सकता है कि उस दिन को मैं आज तक विस्मृत नहीं कर सका हूं. अक्सर अकेले क्षणों की स्मृतियों में वे दुर्दिन, वे दृश्य आज भी मेरे आगे आकर जस के तस खड़े हो जाते हैं. ऐसा लगता है, मानो कल ही मैंने अपने पिता का दाह-संस्कार किया है. ऐसा कितनी ही बार महसूस हुआ है कि मैं किसी और के दाह-संस्कार में गया, मुझे अचानक अपने पिता का दाह-संस्कार याद आया और मेरा मन बेचैन हो उठा. उस समय अम्मा रो-रो कर कहती थी, ''अरे मोइऊ जा चिता में जराई देउ रे. मैं जी कें का करउंगी.'' ''अब बहू धीरज धार, जे बालक अब तोइ ही पालने हैं, तू इनके तांई जिएगी,'' बब्बा समझाते. कभी ताऊ सुबकते-सुबकते कहते- ''मुखी बेटा, अब तोइ सीना पै पत्थर धारि कें जे बालक पालने हैं. मेरे भैया (स्नेह में बेटा को भैया बोलते थे) ने तीन राधो छोड़े हैं. राधो की अमानत की देखभाल तोइ करनी है. अब रोवन कूं तो तेरी पूरी पहाड़ सी जिंदगी परी है. तू बालकन्नु का सोच बेटा.'' वे बेटों को गिन रहे थे, पर सब से बड़ी तो मेरी बहन माया थी.

दाह के बाद सभी लोगों ने गंगा स्नान किया. अम्मा को दूर बैलगाड़ी के नीचे बिठा दिया गया था. उसने भी मुंह हाथ धोए, क़स्बे में आकर सभी ने दो-चार मुट्ठी गुड़-चने खाए, कुछ नहाए, कुछ ने अपने-अपने शरीर पर गंगा जल के छींटे मारे और अपने-अपने घर लौट गए. बैलगाड़ी भी वापस हो गई. समाज की जिम्मेदारियां पूरी हो गईं. हम तो अब धुर्रा में नहीं थे, किन्तु 'मानो' बुआ ने देखा था कि चाचा के शरीर से उतारे गए कपड़ों को सूप में रख कर कुड़ैनी वाली नदी के किनारे सिराया गया था. धारणा थी कि यदि कपड़े किसी को दिए गए तो राधो के शरीर में रहे भूत-प्रेत पहनने वाले पर चले जाएंगे और कपड़े यदि जला दिए गए तो कुध्द प्रेतात्माएं धुर्रा (प्रेमनगर) की ओर लौट आएंगी. तब वे किसी का भी नाश कर देंगी.


अम्मा, ताऊ, बब्बा और बस्ती के डोरीलाल, खचेरी, मक्खनी और मैं, नदरोली वाले लोग घाट पर ही रह गए, बाक़ी प्रेमनगर के लोग वापस लौट गए. हम सब ने नाव में बैठ कर गंगा पार की. धीरे-धीरे चलते-बैठते रात होने तक अंधेरे के साथ-साथ घटित हुए एक अप्रत्याशित व अवांछित प्रकरण में स्वयं असमर्थ व विवश पाते हुए हम उस माली को गंवा कर अपने गांव नदरोली वापस लौट आए थे जिसने अपनी बगिया में अभी-अभी कुछ नए बूटे लगाए थे, जिन्हें अभी ताजा हवा-पानी और देखभाल की सख्त ज़रूरत थी.


बाद के चंद दिनों के अंतराल से मैं और मेरी मां क़रीब बीस कि. मी. पैदल चल कर रास्ते में बैठ-बैठ कर गंगा के किनारे राजघाट (नरौरा) तक गए थे. अम्मा रास्ते में कभी रोती, कभी सुबकती और कभी हम बच्चों के भविष्य के प्रति चिंतित होती. निस्तेज चेहरा लिए वह बीमारों जैसे मायूस क़दमों से चल रही थी. वह रोती हुई ऐसे लगती जैसे सारी कहानी बयान कर रही है. दिन बीत गया था, मौसम खराब था. अंधेरा फिर घिर-घिर आ रहा था. मुझे याद है वह रस्म जिसे 'दीया देना' कहते हैं_मेरे ही हाथों से निभाई गई थी वह. एक चिराग जला कर गंगा जल में छोड़ दिया गया था. देखने भर को तो यह एक चिराग भर ही चमक रहा था पर दीया की लौ दूर तक चमकती जाएगी भविष्य में वंश भी वैसा ही चमकेगा. 'फूलेगा-फलेगा'. ऐसी धारणा प्रचलित थी. घर लौट कर अम्मा मुझे हर तारों वाली रात में आसमान की ओर उंगली उठा कर कहती थी कि ''देखि लल्ला, आसमान में देखि जो चमकती तरैया तेरे चाचा की जान/आत्मा है. देखि धयान से देखि कैसी चमकति जाइ रई है भगवान के घर. तू मान लै कै इनमें चमकतो तारो ही तेरो चाचा है.'' इस प्रकार मेरे पिता का श्राध्द भी कर दिया गया था और मन समझाने के कितने ही क़िस्से मेरे कानों में उतरने लगे थे. अब रिश्ते-नाते के लोगों को जैसे-जैसे ख़बर मिलनी शुरू हुई, उनके आने-जाने का सिलसिलेवार तांता लगने लगा.


मेरी नानी, पड़ोस की मामी, चार-पांच मौसियां और तीनों बुआएं अपने-अपने बच्चों सहित शोक व्यक्त करने आ गईं थीं. कई तो सप्ताह भर वहीं रुकी रहीं. अम्मा कहती है कि घर में एकाध महीने का गुज़ारे लायक जौ, मटरा, साटी-चावल, दाल, आटा जो भी जमा था, वह सब खत्म कर रस्मअदाई पूरी करके मेहमान अपने-अपने घर चले गए. इन संकटों के दिन में कोई सहारा देने वाला नहीं था. इतना ही नहीं अभाव में भी बस्ती के लोगों ने मृत्यु-भोज के रुप में (तेरहवीं) कराई थी. उसमें मुर्दा मवेशियों का काम करने के कारण जिन चमारों ने हमें छेक रखा था, उन्होंने भी हम से लकड़ी, दाल, चावल और बूरा आदि लिया था और अलग अपने हाथों से खाना बना कर खाया था. ऐसा वे आज भी करते हैं. मेरे भाई की शादी की दावत हुई या भाई द्वारा कराई गई कथा, ताऊ और गंगी बब्बा की तेरहवीं इन सब में वे कच्ची सामग्री लेकर खुद बना कर खाते रहे हैं. इसमें उनकी श्रेष्ठता की भावना तुष्ट होती है. मैं मृत्युभोज और शादी विवाह के अवसरों पर क़र्ज़ लेकर की जाने वाली फिजूल ख़र्ची का विरोध करता आया हूं, इस कारण मैं ही अलग-थलग पड़ता रहा हूं. पर भाई कहता है, हमें तो इसी समाज में रहना है सो क़र्ज़ लेकर भी करना पड़ता है. हम पढ़े-लिखे तो हैं नहीं जो अलग समाज बना लें. चाचा की मृत्यु के समय भी मृत्यु भोज के कारण हमारे कमज़ोर कंधों पर क़र्ज़ का भार चढ़ गया था. ननिहालिया तक इस बात की परवाह किए बगैर चले आए थे कि ये बच्चे अब कैसे पलेंगे, कहां जाएंगे और क्या खाएंगे? किसी के पास कोई समाधान था भी नहीं. अज्ञानता मिश्रित प्राकृतिक क्षति की
मानवीय भरपाई आसान नहीं थी. मौखिक सहानुभूति के अलावा किसी से कोई मदद नहीं मिली थी.

जुनाबई की पेंठ-बाज़ार से आनें वालों में एक चेहरा चाचा का भी हुआ करता था, वह आज भी होगा. मैं रास्ते पर बैठा अगले दिन से इंतजार करता रहता हूं. आने वाले सब आ चुके हैं. दिन कब का ढूंबन की तरकीब सोच जहां जो काम मिलै करि, रुखी सूखी जहां मिलै तहां खा, फटो-पुरानों जैसो जो लत्ता-गूदड़ा मिले सो पहन, पर काउ तें कबउ हाथ फैलाइ कें कछु मांगिए मत. याद रखिए तोइ बिना मतलब के कोई कछु नांय देगो.'' अम्मा हिदायतें देती है और मैं सुना-अनसुना कर देता हूं. हार कर अम्मा मेरे गाल पर एक चांटा मारती है और हाथ पकड़ कर खींचती-रोती घर ले जाती हे. वह रोने में फिर गीत जैसा गाती है और सारी ब्यथा कह जाती है. ''का तूनें चिता कूं आगि नांय दई?'' ''हां दई.'' तो तेरो बाप आगि में जरि गओ, अब कहां तें आवैगो?''


चाचा ने दो-चार वर्तन/अपनी शादी के समय बनाए अम्मा के खडुवा-बराह, कौंधानी पाजेब नांकफूल आदि चार-छह चीजें /मवेशी उठाने वाले दो-तीन काले पड़ गए चिकने संगैंटे (बांस)/ मुर्दा मवेशिओं के पांव बांधाने वाली जेबड़ीं पगहियां जो उनके गले से निकाल कर उन्हीं के पांव-सींग बांधाने के काम आया करतीं थीं. उनके मैले-कुचैले टुकड़े /और खाल काढ़नेवाले लम्बे और बौने दो तीन रांपे, चार-पांच छुरियां / जूतियां बनाने वाले कलाबूत /फरहे/रांपी /सुतारी बग़ैरह औजार और जंगल में चमड़ा पकाने वाली वह छोटी-सी कच्ची कुठरिया थी, जो उनके ना रहने पर हम वारिसों का पेट भरने में मदद करतीं? भूमि के नाम पर पौने दो बीघा बंजर भूमि भी थी, जिसमें आधा हिस्सा ताऊ का भी था. साधनों के नाम पर हाथ कस्सी सिंचाई के लिए
तो मानो वे कह गए हों - 'उठा सको तो उठाओ बेटा /गांव भर की मुर्दा मवेशियां तुम्हारे नाजुक कंधों का वेताबी से इंतज़ार कर रही हैं./भूखे हो तो खाओ मुर्दा मवेशियों का मांस /और चाहिए चार आना / आठ आना तो, लम्बरदार की जाकर करो बेगार हांको रहट-दांय उठाओ गोबर और डालो भूसा. जो भुसेरे से ज्यादा तो भरा है लम्बरदार की खुपड़िया ही में. ''
नहीं कर सकते इतना यह सब ? / तो क्या रखा है तुम्हारे लिए तुम्हारे इस गांव में क्या रक्खा है तुम्हारा ?/ सिवाय इसके कि गड़ा है तुम्हारा नाड़ इसी गांव के चमरियाने के पुश्तैनी घर में./ पर घर से नहीं बचेंगे प्राण /भागना ही पडेग़ा अस्तित्व के लिए.पुरखों का क्या कुसूर /उन पर जो था / संकट रूपी सरमाया सो सब छोड़ गए. जिसे होना था चर्मशोधान के कारख़ाने के रूप में विकसित वह कुठरिया भी पिता की देह के साथ ही ऐसी गिरी कि वे जैसे राख हुए यह हो गई मलवे में तब्दील.''

नाना की नज़र में हमारे जीवन निर्वाह का एक विकल्प था. वह यह कि कोई ज़रूरतमंद ऐसा विधुर खोज, कर, जो चार बच्चों की मां को कबूल कर ले, ठिकाने बैठा देंगे. उनका भारी भीमकाय शरीर, नशे में रहतीं डरावनी आंखें, भारी आवाज़ और कुल मिला कर उनका व्यक्तित्व बेहद असरदार और बिरादरी में मान्य था. इसलिए उनकी यह कमज़ोरी भी थी. जिस विवाद में वादी या प्रतिवादी की ओर से गोश्त, शराब या स्प्रिट नहीं मिलती वे उसके पक्ष में फ़ैसला तब तक नहीं देते थे जब तक वह अपना भोज्य हासिल नहीं कर लेते थे. उन्हें गोश्त और शराब मिले तो सब ठीक. वे उन दिनों चन्दौसी के चुन्नी मोहल्ला की लड़कियों के ससुराल संबंधाी विवादों का निबटारा एक सरपंच 'जज' की भांति किया करते थे. वे शराब, स्प्रिट और गोश्त का नियमित सेवन किया करते थे. अपने व्यक्तित्व के प्रभाव के दिनों में नाना ने दर्जनों विवाहित जोड़ों के विवाद निबटाए होंगे. बेटी की मार-पीट की शिकायत सुनी या आपस में ताल-मेल नहीं बन रहा तो बिना एक दिन का भी वक्त बर्बाद किए लड़की को वापस बुलाया, दामाद से अलग किया और कौम के दस लोग बुलाए, लड़की से मर्जी पूछी और दूसरे घर बिठा दी. कहावत बन चुकी थी कि नर्रे-मौंटे तो चुटकी बजाते ही जोड़ी मिला देते हैं. पति को छोड़ कर कौम की एक भी जवान लड़की घर बैठी रहे यह उन्हें गवारा नहीं था. यूं वे आंख मूंद कर हर फैसला अपनी बस्ती की लड़की के पक्ष में ही लेते थे. अजीब तरह के नारीवादी थे वे. उनका न्याय भी अजीब था. गोया पति-पत्नी के बीच पत्नी कभी दोषी होती ही नहीं थी. बस्ती के दामादों से वे स्कूल टीचर की तरह उठक-बैठक करवाते थे. इसके अलावा चमड़े के ठेके में मामूली दलाली खाना उनकी आय का स्रोत था. अपनी निजी पूंजी तो उनके पास थी नहीं. ऊपर से बड़े भारी खर्राच थे वे. हाथ में पैसे आए और गोश्त मंगा लिया. हांडी पकी और दो-चार स्प्रिटियों को बुलाया और बैठ गए पीने. लम्बा-चौड़ा विशालकाय रूप था उनका. वे अपनी व अपनी बस्ती की किसी भी लड़की को स्कूल भेजने के सख्त ख़िलाफ़ थे. शहर में ग़ैर-कौम के बदमाश छोकरे हमारी बेटियों पर बुरी नज़र डालेंगे. पढ़ाने की कोई ज़रूरत नहीं. पहली नानी से एक बेटी और एक बेटा और दूसरी से 6 बेटियां और एक बेटा था, जिनमें मेरी मां तीसरे नम्बर पर थी. सबसे छोटी बेटी से बड़े बेटे अमरसिंह को उन्होंने स्कूल के दर्शन कराए थे. लेकिन वह टीचर की डांट सुनने को तैयार नहीं था. नाना के पीने-खाने की छाप तो मामा पर सवाई पड़ी थी पर उसका रौब-दौब वैसा नहीं बना था. हां, ''वह बस्ती से बाहर दादागिरी करने लगा था. शरीर से वह भी सुन्दर व काफ़ी बलिष्ठ था. शायद यही अहंकार और अशिक्षा उसे बर्बादी के रास्ते पर ले गई थी. वह अपना व्यवस्थित परिवार कभी नहीं बसा सका. नाना ने अपने बेटे-बेटियों में से किसी को भी अक्षर ज्ञान नहीं कराया था. ऐसे में पूरी तरह असहाय वैधव्य की दुखद स्थिति में हम तीन बच्चों को साथ लेकर अम्मा अपने मायके चंदौसी पहुंची थी. मेरे अंधे, लंगड़े दो बब्बा और तीसरे अंधे ताऊ की मदद भी चार-छह महीने से ज्यादा नहीं चल पाई. जैसा कि बता चुका हूं, ज़मीन कम होने के साथ ही वह बंजर भी थी. उसमें कोई उत्पादन नहीं होता था. वह केवल नाम के लिए थी. वैसे भी हमारा हिस्सा ताऊ के साथ बीधा राम बब्बा की पौने दो बीघा ज़मीन में आधा बनता था. उस पर भी यह जमीन मौक़े पर सवा एक बीघा ही बची थी. लावारिश पाकर मेड़ें काट ली गई थीं, आजकल की तरह खाद बीज का उपयोग नहीं था. जुताई किराए पर, रहट का पानी किराए पर भी दिया था.


यह जानते हुए भी कि ऐसा हो नहीं सकता, हमें इंतजार रहता था कि पिता कहीं से कुछ लेकर आ रहे होंगे. मेरे सभी साथियों के पिता शाम होते गांव में घुस रहे होते. वे मेरी हमउम्र बच्चे दौड़-दौड़ कर उनकी ओर जाते थे. उन्हें देख कर हम भाई-बहन पिता को याद कर उदास हो लौट आते और कभी इस घर की चौखट से तो कभी उस घर के दरवाजे से सट कर खड़े हो जाते. कोई हमारे हाथ पर खाने की चीज़ रखता, तो अम्मा कभी मारती-डांटती कभी निराश देखकर अपने गले से लगा लेती. वह हमारा मनोविज्ञान समझती थी. ऐसा कब तक चलता? मुझे कौली में भर कर रोने लगती. पिता से जुड़े किसी भी प्रसंग का स्मरण कर कभी बब्बा तो कभी अम्मा रोते-बिलखते. इन्हें देख कर ताऊ भी अधीर हो जाते. वे यथासंभव मदद करते, पर उनकी हालत भी अत्यंत खराब थी. चाचा जब जिंदा थे तब उनकी मदद से वे चमड़ा काढ़ते-पकाते (शुद्ध करते) थे. नेत्रहीन होकर भी पशु की खाल बिना किसी कट के काढ़ (उतार) लेते थे. चाचा की मौत के बाद उनका मनोबल गिरता चला गया था और उनके शरीर पर पड़ा प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट दीखने लगा था. हमारे भविष्य को सोच कर सभी दुखी और चिंतित थे, पर किसी के वश में कुछ नहीं था. पुरुष अपाहिज, महिलाएं और बच्चे ऐसे असहाय कि कुछ कहा नहीं जा सके. हमारे उस परिवार में आंख से, दिमाग़ से और हाथ-पांवों आदि सभी से पूर्ण स्वस्थ पुरुषों में केवल एक व्यक्ति था और वे थे मेरे पिता, जो अब नहीं रहे थे. ग्यारह-बारह वर्ष की उम्र में उनका बाल-विवाह हुआ था और लगभग 24-25 वर्ष की उम्र में ही वे चल बसे थे. उनके बाद के दिनों में हमारे घर में साग-सब्जी से भरपेट खाना मिलना तो दूर, दोनों वक्त नमक-चटनी से भी रोटी मिलनी मुश्किल हो गई थी. हारी-बीमारी में दवा-दारू के लिए अब घर में फूटी कौड़ी नहीं थी. ऐसे संकट काल में मुझसे छोटा भाई नेकसिंह बीमार पड़ा और उसका कोई उपचार नहीं हो सका. इलाज-दवा तो दूर, दो वक्त की भरपेट दाल-रोटी के लाले पड़े हुए थे. अम्मा के शरीर पर चाचा के मरने के बाद से कोई नया कपड़ा नहीं आया था. ननिहालिया ग़रीब, स्प्रिटिया और दिवालिया थे. सहानुभूति प्रकट करने आए नाते-रिश्तेदार, घर का एक-एक दाना खत्म करने के बाद शाब्दिक सहानुभूति दिखा कर वापस चले ही गए थे, और ऊपर से तेरवीं में ख़र्च पैसे का कर्ज सिर पर सवार हो गया था. अम्मा मेरे छोटे भाई नेकसिंह को गोद में उठा कर सयाने और वैद्य वगैरह के पास भागी-दौड़ी थी, पर कोई लाभ नहीं हुआ था. अन्तत: हमारी आंखों के सामने तिल-तिल कर नेकसिंह ने भी दम तोड़ दिया था.


अम्मा ने अपनी ममता का वास्ता देकर कहा था, ''बेटा, मोइ माफ करि दइये, तू जी कें हू दु:खी रओ. तोइ अगले जनम में सुख मिले. भगवान तेरी आत्मा को संतोष देइ. यहां हम जिन्दे और मरे बराबर हैं.'' वह रो-रो कर कह रही थी, ''बेटा, तू भगवान से कहिये, वे हम सब कूं एक संग बुलाइ लेइ.''


इन्हीं दिनों हम दब छिप कर 'दांयें' चलाने वाले बैलों के गोबर से गेहूं निकाल कर लाते थे और उन्हें धोकर अनाज छांट लेते थे. उस अनाज का रंग पीला पड़ जाता था. रोटी में स्वाद नहीं होता था. उसे खाने के अलावा पेट की भूख शांत करने का हमारे पास और कोई विकल्प नहीं था. मैं किसी की भी दांय हांकने जाता था. बैल चलते-चलते गोबर करते तो मैं लपक कर दोनों हाथ पसार गोबर लेकर दांय के घेरे से बाहर फेंकने के लिए निकल पड़ता था कि कहीं गेंहुओं पर न गिर पड़े. एक साथ यदि दो या तीन बैल गोबर करने लगते तो सभी को एक साथ संभालना मुश्किल हो जाता था.


वर्षों बाद मैं पाली से लौट आया था. उम्र 7-8 वर्ष थी. अम्मा भी मेरे पास लौट आईं थी. एक दिन गंगासाय ताऊ 'बंगरिया' (वह स्थान जहां मुर्दा पशुओं की खाल उतारी जाती थी और चमार-भंगियों के शव दफनाए जाते थे.) में बछिया (गाय के बच्चे) की खाल उतार रहे थे. जंगल से ईंधन बीन कर लौटते वक्त अम्मा उन्हें देख आई थी, हालांकि उसे दूर से आभास नहीं हुआ था कि पशू बैल है या भेंस. उसने आते ही मुझ से कहा, ''लल्ला, तू एक लत्ता लैजा बड्डे तें कह कें थोड़ो कलिया (मांस) लिकरि वाइ कें ले आ.'' जब मैं वहां गया तो वे समझ गए. उनका इशारा पा कर मैं दूर झबरा कुत्ता के पास गिद्ध की तरह प्रतीक्षा में बैठा गया. कब वे खाल काढ़ें और कब मैं उनके पास जाऊं, क्योंकि आदमी पास रहने से कोई देख न ले, ऐसा डर था. जैसे ही वे खाल निकाल चुके, मैं लपक कर उनके पास गया और वहां धीरे से बोला, ''ताऊ थोड़ो सो कालिया छांट कें दै.


''देऊं.'' एक बार तो वे चौंक कर बोले, ''तेरो डिमागु खराब है का? बछिया को कलिया लेगो. हम हिन्दू का गैया को कलिया खात हैं? सौराज तू तौ सूधो नरक में जाइगो ही हमें हू पाप को भागी बनावैगो, चल हटि भागि खबरदार.'' उन्होंने इन्कार कर दिया. तब मैंने पुन: नम्र याचना की, ''दै देऊ ताऊ, हम सब कल तें भूखे बैठे हैं. घर में खाने कूं एक दानों नांय है. ताऊ का तुम हमें भूख तें मरवावौगे? हम भूखे मरि गए तो भगवान तुम्हें नरक में डारि देगो. अब जो बछियाउ मरी भयी है, खाल तुमने काढ़ि लई, मांस तो गिद्ध-कुत्ता खाइंगे ही तो हम हूं...हम कौन-सी जिन्दी गइया मारि रए हैं, माटी ही तो खाइ लिंगे?''


मेरे गिड़गिड़ाने पर उन्होंने क़रीब एक डेढ़ सेर गाय का मांस काट कर दे दिया. जैसे ही मैं बहां से दो कदम हटा, हमारे कुत्तों और गिद्धों का दल उस पर टूट पड़ा.

माया और अम्मा ने पकाया. बैल, भैंस और कटरा आदि के मांस की अपेक्षा इस वे स्वाद मांस में चिकनाहट अधिक थी. अम्मा ने कहा था-''चिकनों भौतु है, का जो बध्दा को नांय है?'' ''सब खाउ, पेट भरो. बध्दा को नांय जो बछिया को कलिया है.'' मेरे इतना कहते ही अम्मा की भावना को धक्का लगा. वह दुखी होकर बोली, ''हमारो धरम चलो गओ बेटा, तूने हमें कहूं को नांय छोड़े, जो जन्म तो खराब है ही गओ और अगलो जनम हू गओ.''


मुसीबतों के कहर हमारे ऊपर बरपा थे. अब घर में आय का कोई स्रोत नहीं था इस कारण हमारी जीविका और कष्टमय हो गई थी. चाचा रूपी सूरज डूबने के बाद से तो इस घर के बाक़ी सदस्य रूपी तारों को भी ग्रहण लगने लगा था. यह अभावों के ही कारण था कि उसी वर्ष गांव में घूम-घूम कर अंधे बब्बा ने कुट्टी काटने की मशीन खींचने, यादवों के घर यादवियों की चाकी पीसने और चारपाई बुनने जैसे तुच्छ मेहनताने यानी एक लोटा मट्ठा और दो रोटी के चून पर और अधिक समय काम किए. उन दिनों केवल डोरी ताऊ के घर मुर्दा मवेशी उठाने और चमड़ा पकाने का काम होता था. उन्हें पशु उठाने के लिए अक्सर एक दो आदमी की आवश्यकता पड़ा करती थी, जिनमें वे गंगी बब्बा को ले जाना जरूरी समझते थे. कारण यह था कि वे मजूरी कमतर लेते थे और मुर्दा मवेशी का वजन ज्यादा उठाते थे. बांस का संगेटा जिस उठइया के कंधे की ओर ज्यादा होता उसके हिस्से मवेशी का उतना ही कम वजन आता था और संगेटा जिधर कम होता उधार वजन ज्यादा पड़ता था. बब्बा अंधे थे. इसलिए उनकी ओर संगेटा कम कर दिया जाता था. गधों की पीठ की तरह अभ्यस्त कंधों से वे यह वजन हांफते-हांफते किसी तरह साथ ले जाना नहीं भूलते थे क्योंकि मैं उनकी लाठी पकड़ कर रास्ता बताता था. साथ ही, खाल उतारने के बाद पशु का मांस भी निकाला जाता था. हमारे अलावा डोरी ताऊ का लम्बा परिवार मुर्दा मवेशियों का मांस खा-खा कर ही पल रहा था. अपनी पसंद का मांस चुन लेने के बाद ही वे हमें सेर दो सेर मांस देते थे. बब्बा को पशु उठाई का काम मिलने का दूसरा कारण था, बाक़ी से कम पैसे लेना और तब तक न मांगना जब तक खाल पक न जाए या 'गुन्नौर' ले जाकर बिक न जाए. कई बार घर पर पकने पर डोरी की पत्नी सेमनिया (भूरी) जिसे हम मौसी कहते थे, बेला भर कर रंधा हुआ कलिया दे देती थी. तीसरे, हम दो घरों के अलावा बाक़ी चमार मुर्दा मवेशी उठाने का काम छोड़ चुके थे. उन्होंने चमार के बजाय अपने आपको जाटव घोषित कर दिया था और हमारा घर छेक दिया गया था. शादी-विवाह तीज-त्यौहार के भोज हमें कोई शामिल नहीं करता था. जाति के भीतर हमारा बहिष्कार था, हालांकि गैर-चमारों के लिए चमार-जाटव दोनों का मतलब एक ही था. गैर-कौम सभी को चमार ही कहती थी. मुझे ऐसा नहीं लगता कि मात्रा चमड़े का काम करने के कारण चमार नाम रखा गया होगा. चमार कहलाने वाली अनुसूचित जाति की इतनी बड़ी संख्या में शायद दस फीसदी लोग भी चर्मकार्य नहीं करते होंगे.


अब बब्बा ताऊ और मैं हमेशा घर के सामने बिकाऊ माल की तरह बैठे रहते थे. कोई आए, दिन भर के लिए ख़रीद ले जाए, चाहे तो अपने खेत में काम कराने के लिए ले जाए या बोझा
मेरे कच्चे कंधे संगेटा तो नहीं संभाल पाते थे लेकिन मुर्दा पशु के सींग, पैर या पूंछ पकड़ने का काम मैं डोरी ताऊ, प्यारे चच्चा, टुंडी व गंगी बब्बा के साथ करता रहता था. मांस निकाल लाने के लालच से भी मैं पशु-उठाई के काम में रुचि लेता था. सींग पूंछ पकड़ते-पकड़ते आना-दो-आना के लालच में लंबे संगेटे के नीचे कब मेरे खुद के कंधे आ गए पता ही नहीं चला था. यह मेरी अनौपचारिक ट्रेनिंग हुई.


पशु को मालिक के घर से दूर जंगल तक ले जाने की प्रक्रिया बड़ी कठिन होती थी, क्योंकि पशु के शव को घसीट कर नहीं ले जा सकते थे. घसीटने से खाल के बाल उखड़ जाते थे और खाल दागी होते ही आधी क़ीमत की रह जाती थी, ऐसा ख़तरा पशु के उठाने से लेकर उसकी खाल उतारने तक बना रहता था. पशु के शरीर से उतारते वक्त ख़ाल में कोई खोंत (कट ) न लगे इस बात की पूरी सावधानी बरती जाती थी. यह बहुत ही कुशलता का कार्य होता था. खाल काढ़ना एक कला थी, तो उसे पकाने की प्रक्रिया पूरी इंजीनियरिंग थी. क्योंकि बिना कटे सफाई से खाल उतार देना या प्रयोगशाला में उसे पका कर शुद्ध करना कोई कम हुनरमंदी का काम नहीं था. यहां किसी की किताबी मेरिट नहीं चलती थी, हालांकि पोथी मेरिट वाला होना समाज की नज़र में सम्मानजनक था और मवेशी उठाना अपमानजनक. इस परीक्षा में कोई भी ब्राह्मण फेल हो सकता था. एक ज़रूरी सेवा होने पर भी इसे करने से चमारों को जितनी घृणा और तिरस्कार मिले हैं, वे गिनाए नहीं जा सकते. डॉक्टर मनुष्य की लाश का पोस्टमार्टम करता है तो इज्ज़तदार होता है. भंगिन सफाई करती है तो दुत्कारी जाती है. चमार पशु की खाल उतारता है, तो वह बहिष्कृत और अछूत बना रहता है. मैं यह सब सहता रहा हूं, इसलिए जानता हूं कि आख़िर भोगी हुई हिकारत का असर और भूख में अभोज्य का स्वाद कैसा होता है.

देश के करोड़ों दलित बच्चों की तरह कभी मेरा भी जन्म दिन नहीं मना, जन्म तिथि मेरी मां को भी ज्ञात नहीं थी, क्योंकि उन्हें कभी अक्षर ज्ञान प्राप्त करने का मौक़ा नहीं मिला था. वैसे मैं भी उन बच्चों की तरह ही था जिन्हें अपने जन्म दिन उत्सव से लगते हैं. अम्मा बताती थी कि मेरा नामकरण गांव के पंडित द्वारा नहीं हुआ था. ब्राह्मण द्वारा रखे गए नाम दुर्जना, खचेरा, खूबा इत्यादि उन्हें पसंद नहीं थे, बल्कि मेरी 'छोटी' बुआ ने मेरा नाम 'सौराज' रखा था जिसे घर में सभी सदस्यों ने मान लिया था. मेरी जाति या मेरे गांव का कोई लिखित इतिहास मेरी जानकारी में नहीं है. मैं यह भी नहीं जानता कि गांव का कोई इतिहास है भी या नहीं, तब मेरे परिवार का अतीत क्या रहा होगा? वैसे तो हमारी चमार-चूहड़ों की पूरी क़ौमें मृतप्राय बना दी गई थीं. उनके, साधन, सुविधाएं, सम्मान रूपी प्राण तो वर्णधर्म वाली व्यवस्था ने कब के खींच लिए थे. उसका इतिहास कहां है?


अपने अस्तित्व संघर्ष करने के क्रम में उसका इतिहास भी रच गया होगा. लुप्त हुई पहचान खोज कर लानी पड़ेगी. फ़िलहाल आवश्यकता से अधिक जिज्ञासा होना स्वाभाविक है. इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसी जानकारी मेरे गांव-प्रेम के कारण होती. वैसे, अभावों के सिवाय गांव में मेरा है ही क्या? यहां मैं विस्तार में नहीं जा रहा. कारण यह है कि गांव का इतिहास लिखना फ़िलहाल मेरा विषय नहीं है, बल्कि मैं अपनी आत्मकथा लिख रहा हूं. जिसकी विषय-वस्तु मेरे जीवन के इर्द-गिर्द है, और केन्द्र में बनता-बिगड़ता मैं स्वयं हूं.

मेरी जानकारी में मेरे गांव के दो व्यक्ति विशेष थे, जो गांव के अतीत के बारे में मुझे बताते रहे हैं. पहले थे गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी रघुनाथ शास्त्री. इन्होंने गांव के बारे में (नंदनंदनी नदरोली) शीर्षक से एक लंबी कविता लिख कर मुझे भेंट की थी. पूरी कविता गांव की भौगोलिक बनावट की प्रशंसा में थी. छन्द की दृष्टि से रचना उत्तम थी, पर इसमें लगभग वैसी ही आत्मश्लाघा थी जैसी राजाओं के दरबारों में दरबारी चारण-भाट किया करते थे. पर वे आश्रित होने के कारण करते थे, जबकि शास्त्री जी ने आत्ममुग्ध होकर इसकी रचना की. गांव में व्याप्त अशिक्षा जनित लड़ाई-झगड़े, स्त्री-दलितों की दुर्दशा, छुआ-छूत का महाकोप इत्यादि की इस कविता में एक झलक भी नहीं मिलती. शास्त्री यहां डामिनेंट जाति यादवों में से थे, इसलिए अस्पृश्यता से उनका कोई पाला नहीं पड़ा था. शब्दों का चमत्कार और कल्पना का स्वर्ग इस कविता में ऐसे उतरता है जैसे गांव में सब सम्पन्न और समृद्ध लोग ही रहते हों. मेरी टिप्पणी पाकर उन्होंने वायदा किया था कि वे गांव की वास्तविकता भी लिखेंगे, पर वे भी. दलितों का सच नहीं लिख पाए. उनके पास भी शायद सवर्णों द्वारा अछूतों के मानवाधिकारों के हनन के प्रति प्रायश्चित करने वाली आत्मस्वीकृतियां नहीं थीं. गांधीवादी भूतदयावादी दृष्टि मात्र थी. इनकी अधिकार चेतना से उन्हें भी वास्ता नहीं था. ऐसी और भी कुछ रचनाएं हैं, पर इनसे गांव की सामाजिक स्थिति, विशेषकर अस्पृश्य जातियों की दशा का कोई पता नहीं चलता. जबकि गांव इन्हीं भेदभावों में नाक तक डूबा है. हां शास्त्री जी नहीं रहे. यह दुखद समाचार उनकी शिक्षिका बेटी वेदवती ने मेरे महाविद्यालय की एक छात्रा के हाथों मुझे भेजा है.


गांव के ये गांधीवादी सुधारक आम यादवों की अपेक्षा काफ़ी उदार थे. इनका व्यवहार मधुर था और छुआछूत कम मानते थे. आज भी वे होली के दिन चमार-भंगियों के गले लग जाते हैं और उन्हें भी अपने गले लगा लेते हैं. चरण-स्पर्श भी करा लेते हैं. पर कोई भी यह चिंता नहीं करता कि क्यों गांव की अछूत जातियों के लोग गांव छोड़-छोड़ कर बम्बई-दिल्ली चले जाते हैं. वे गांव में रहें तो केवल इसलिए कि उन्हें खेती क्यारी सफाई आदि के लिए सस्ते मज़दूर मिलते रहें_यह चिंता गांव वालों की है. पर भूमि सुधार द्वारा इन्हें भी थोड़ी ज़मीन मिल जाए, इसकी कल्पना भी किसी को नहीं है. अछूतों को मिलने वाली सरकारी ज़मीन के पट्टे तक यही लोग फर्जी नामों से कब्जा लेते हैं. पट्टे में नाम चमार-भंगी का और खेत में हल ग़ैर-दलित का चलता है. गांधीवादी केवल उपदेशात्मक शैली में 'छूत-छात मत मानो' इतना भर कहते हैं और वैयक्तिक प्रयास भर करते हैं. यथार्थ में कोई प्रभावी क़दम नहीं उठा पाते. पर उन्होंने कुछ कहावतों को लिख कर इतना किया तो सही. मुझे तो अपने मोहल्ला के चाचा- ताऊओं का इतिहास तक पता नहीं.
खैर, वक्त अपनी तरह से गुज़र रहा था. चाचा के गुज़रने के बाद अपने इस घर में हमारा पालनहार कोई और नहीं था. अत: हम बाल श्रम करने के लिए मजबूर थे. पर गांव में हर दिन काम भी नहीं मिलता था. अशिक्षित मां, भूमिहीन घर, नाबालिग बच्चे, आय का कोई स्रोत नहीं. घरवाला गया तो घर ही उजड़ गया. अब गांव में क्या बचा था? गंगी बब्बा रात को खटोला पर लेट कर एक अव्यवस्थित गीत गाया करते थे. वे उसे तोड़ते-जोड़ते अपनी तरह से बनाते- बिगाड़ते रहते थे. गीत विरह का बताया जाता था अम्मा के कंठ में यह करुणा और विलाप का गीत था पर उसमें मुझे अपने घर के उजड़ते हालात का ही चित्र मिलता था. अपनी सुविधा के अनुसार गीत में मैंने खुद कितने फेर-बदल कर लिए इसका हिसाब नहीं, पर उसकी पूर्ति में मेरा कवि हृदय समर्थ है. अन्योक्ति में वह गीत कुछ इस प्रकार की शक्ल अख्तयार करता थाµ-


टूटी डाल झरीं सब पत्तियाँ,
डाल भई लाचार,
बिधाता ने कैसी विपदा डारी रे!
मांगत फूल हवा और पानी,
रितु निरमोहिन ने का ठानी?
कातें कहें कौन दुख बांटे,
कौन करे रखवारी रे!
बेवक्त ग़ुज़र गया माली....माली रे!


किल्ला नए वक्त क़े मारे,
आंधी लू ने निबल करि डारे,
का खाएं का पिएं बेचारे,
ऐसे कैसे जिएं बेचारे
नंगे सिर पै बरसी ज्वाला
घर आयी कंगाली रे...
बेवक्त ग़ुज़र गया माली रे...


खुद अपने, दुख दर्द मिटाना
खुद करना रखवाली
बेवक्त ग़ुज़र गया माली रे.
**---***

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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,244,लघुकथा,1256,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,327,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2009,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,711,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,798,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,89,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,209,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: श्यौराजसिंह बेचैन का बेचैन कर देने वाला आत्मकथांश
श्यौराजसिंह बेचैन का बेचैन कर देने वाला आत्मकथांश
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