नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

''आज की होली''


--अमित कुमार सिंह

कहीं खेल रहे हैं

खून से होली,

कहीं पर खेली जा रही है

इंसानियत से होली।

कहीं जल रही है

ईमान की होलिका,

न्याय का दहन

हो रहा है,

दे रहे हैं लोग

सद्भावनाओं की आहुति।

कहकहों की गूँज है

स्वार्थ का चटक है रंग,

पहन जिसे

हो रहा है

गरीबों का दहन।

बोल रे होली!

क्या इसके लिए

ही तू आयी?

ये सब देखकर

इसपर खुश होऊँ,

या हो जाऊँ दु:खी?

किस रंग में रंग जाऊँ?

क्या करुँ, समझ

नहीं आ रहा दोस्तों!

मेरी बेबसी देखकर,

मेरी ऑंखें भी

खेलने लगीं हैं,

खुद ही के ऑंसुओं

की होली।

***-***

रचनाकार अमित कुमार सिंह की अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें-

http://rachanakar.blogspot.com/2006/01/blog-post_02.html

http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post.html

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.