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हैदराबाद के अनवर सलीम की रेशमी ग़ज़ल


-ग़ज़ल

- अनवर सलीम

तुझसे मिलने के हैं आज पल रेशमी
क्या पता मेरा होगा भी फल रेशमी

ख़त बदन के तेरे सब नुमायां करूं
खींचूं तस्वीर ऐसी सजल रेशमी

तेरे रुख़्सार हैं दू-ब-दू मेरे जब
क्यूं न दिल में खिलें फिर कंवल रेशमी

ज़ेहनो-दिल पर है क़ब्ज़ा मुकम्मल तेरा
ख़्वाब आते भी हैं आजकल रेशमी

तेरा गुस्सा तेरा रुठना भी ग़ज़ब
तेरे माथे का हर एक बल रेशमी

तेरे आँचल में सारी थक दूर हो
छांव भी रेशमी तेरे फल रेशमी

ख़ैर लहजे की मेरे नहीं आज तो
चार सू इसके हैं दल के दल रेशमी

ये ‘सलीम’ एक चेहरे का एहसान है
वरना लिखी न मैंने ग़ज़ल रेशमी

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चित्र – वसीम अहमद की कलाकृति – बुरक़ा . 14 इंच x 10 इंच, काग़ज़ पर गोशे, 2001

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