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हम फिर मिलेंगे - हितेश व्यास


हितेश व्यास की कुछ नई ग़ज़लें
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ग़ज़ल 1

देगा समय गर साथ तो हम फिर मिलेंगे
होगी कभी बरसात तो हम फिर मिलेंगे ।

हमने उजालों के लिए ओढ़ा अँधेरा
ढल जाएगी रात तो हम फिर मिलेंगे ।

हमको प्रयोजन ही नहीं है उत्तरों से
होगी सवाली जात तो हम फिर मिलेंगे ।

दुःख दर्द का अभ्यस्त वैसे तो बदन है
गर हुआ आघात तो हम फिर मिलेंगे ।

जीतेंगे दोनों गर अभी बाजी उठालें
देने लगेंगे मात तो हम फिर मिलेंगे।

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ग़ज़ल 2


चप्पलों के अनुसार पाँव हो गए
शहर के भीतर गांव हो गए।

न माझी का पता न कोई हम सफर
हम तो उलटी हुई नाव हो गए।

बाजी लगाकर पछताना पड़े
सब इस तरह के दांव हो गए।

पेड़ों पर पड़ गया आदमी का असर
अब तो किराए के छांव हो गए।

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ग़ज़ल 3

मेरी जरूरियात को आप अन्यथा न लें
इस दोस्ती के हाथ को आप अन्यथा न लें।

आदत ये बोलने की है, बचपन से ही मेरी,
मेरी किसी भी बात को आप अन्यथा न लें

पूछा मकाम आपने, मैंने बता दिया,
अब इस तनिक से साथ को आप अन्यथा न लें।

नानी की वो कहानियाँ अब मैं सुनाता हूँ
ऐसे में मेरी जात को आप अन्यथा न लें।

कहती है मां ‘हितेश’ तू आँखें झुका के चल
अब मेरे झुकते माथे को आप अन्यथा न लें।

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