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मिराक़ मिर्जा की ग़ज़ल












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कि दश्ते-ग़म में कहीं गुलिस्तां भी होगा
ज़मीन होगी जहाँ, आसमान भी होगा

तलाश करते रहो पत्थरों में मोम का दिल
सितमगरों में कोई मेहरबान भी होगा

ज़बान काट ली जाएगी सच जो बोलोगे
कि हक़ की राह में ये इम्तिहान भी होगा

जहाँ में जुल्म के चेहरे कभी नहीं छुपते
अगर बहेगा लहू तो निशान भी होगा

बढ़ेगी चाहने वालों की भीड़भाड़ अगर
तो आसपास कोई बदगुमान भी होगा

ये जो जली हुई लाशें हैं इनके पास ‘मिराक़’
किसी ग़रीब का ख़ाली मकान भी होगा.

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रचनाकार – मिराक़ मिर्जा बॉलीवुड के जाने माने मूवी स्क्रिप्ट लेखक हैं

1 टिप्पणियाँ

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