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आत्मकथ्य : पति की मार खाने वाली वह स्त्री

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-सर्वेश मेरा बचपन कैसे गुजर गया इसका मुझे पता नहीं चला. मां-बाप ने कभी लाड़ प्यार नहीं दिया. बड़े भाई-बहनों से कभी प्यार मिला हो ऐसा मु...




-सर्वेश

मेरा बचपन कैसे गुजर गया इसका मुझे पता नहीं चला. मां-बाप ने कभी लाड़ प्यार नहीं दिया. बड़े भाई-बहनों से कभी प्यार मिला हो ऐसा मुझे याद नहीं. हाँ, बड़े भाई की मार-डांट से मैं बहुत डरती थी. बात-बात पर उनका चांटा पड़ता था.

सातवीं कक्षा का रिजल्ट आया तो पता चला कि फेल हो गई हूँ. मार के डर से मैंने नीला थोथा खा लिया. उल्टियों पर उल्टियाँ हुईं पर मैं मरी नहीं.

भय परीक्षा परिणाम का
ग्यारहवीं कक्षा का परिणाम आया तो भी मैं डर रही थी कि मैं फेल हो गई तो मेरा क्या होगा? डरते-डरते मैंने अपने सर से पूछा – “सर...” जैन सर ने बताया कि तुम सेकंड डिवीजन से पास हुई हो तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे. मैं सभी को बता रही थी कि अब मैं आगे पढूंगी और वकील बनूंगी. वकील बनने का मुझे बहुत शौक था.

कुछ ही दिनों के बाद मेरा भाई मेरी सगाई कर आया. मेरे अंदर पता नहीं कहाँ से हिम्मत आ गई कि मैंने कहा कि मैं शादी नहीं करूंगी और आगे पढ़ूंगी पर मुझे मार-पीटकर कमरे में बंद कर दिया गया, खाना नहीं दिया गया. कहा गया कि इसके पंख निकल आए हैं. कहती है कि शादी नहीं करूंगी. अरे लड़के वालों ने अपने आप इसका हाथ मांगा है. मेरे ना कहने पर भी मेरी शादी कर दी गई. वैसे में तब तक शादी का मतलब इतना ही समझती थी कि अच्छी-अच्छी साड़ियाँ पहनना, लिप्स्टिक लगाना इत्यादि. मेरी मां या भाभी या बड़ी बहन ने औरत-मर्द के संबंधों के बारे में कुछ नहीं बताया था. इस विषय पर बात करना या बताना तब शर्म की बात समझी जाती थी.

मैं तंग समाज के एक तंग परिवार से निकलकर और भी ज्यादा तंग परिवार में भेज दी गई थी. पति का रोज मारपीट करना और शराब पीना यह सब सहते-सहते मुझे दस साल हो चुके थे फिर एक दिन एक घटना ने मेरी पूरी जिंदगी बदल दी. पहले मेरी दिनचर्या पति के इर्द गिर्द सिमटी रहती थी. एक दिन मेरी गलती से एक व्यक्ति पर घर का कूड़ा गिर गया. मैंने कहा, “भाई साहब, मुझसे गलती हो गई, मुझे माफ कर दीजिए.” उस आदमी ने मेरी नहीं सुनी और कहने लगा कि तुझे तो उठाकर नीचे फेंक दूंगा. इस पर भी मेरे पति ने उस आदमी से कुछ नहीं कहा. मेरे अंदर न जाने कहाँ से हिम्मत आई और मैं गुस्से से बोली, “हाथ लगाकर तो देख.” वह तो यह सुनकर चला गया मगर मेरे पति ने हैरानी से मुझे देका और बाद में मुझे गालियाँ देने लगा.

अंततः भीतर का ज्वालामुखी फट गया...

उसकी गाली ने आग में घी का काम किया. मेरा भ्रम अब टूट चुका था कि पति परमेश्वर पत्नी का रक्षक होता है. मेरे दिमाग की नसें उस समय गुस्से से फट रही थीं. लग रहा था कि अपना सिर फोड़ लूं. और मैंने अपने आपको लहूलुहान भी कर लिया था. कमजोर इनसान अपने आप का ही नुकसान करता है. उस दिन मेरे भीतर का ज्वालामुखी लगातार फटता जा रहा था. मैं उसे गालियाँ दिए जा रही थी, “नहीं चाहिए मुझे तुम्हारे – जैसा पति. कल को मेरा बलात्कार भी हो जाएगा तो तुम मेरी रक्षा नहीं करोगे.”

मैं बोले जा रही थी. कुछ देर बाद मैं शांत तो हो चुकी थी पर मेरा दिमाग चल रहा था. सर्वेश, तुझे अब अपने पैरों पर खड़ा होना है मगर इसके लिए क्या करना है? यह मुझे समझ में नहीं आ रहा था. बाहर निकलती तो समाज का डर था. उस समय मुझे सिर्फ अँधेरा-ही-अँधेरा नजर आ रहा था. पर मेरे मन में छटपटाहट भी थी.

पहली कमाई के पाँच रुपए

मैंने पति से छिपाकर आस-पास की औरतों की साड़ियों में फाल लगाना शुरू कर दिया ताकि कुछ कमाई हो सके. पहली बार मैंने साड़ी पर फाल लगाकर पाँच रुपए कमाए थे. उस पाँच रुपए के नोट ने मुझे इतनी खुशी दी कि मेरे अंदर नया विश्वास पैदा हो गया. घर के काम से निपटकर मैंने रोज बुनाई-कढ़ाई और फाल लगाना शुरू कर दिया. इस तरह मैंने एक हजार रुपए जमा कर लिए थे. मैं पैसों का महत्व समझती थी लेकिन रात को पति से मार खाना अभी भी जारी था. मरे पड़ोस में एक रिटायर्ड लेक्चरर रहती थी. मैं कभी-कभी उनसे अपने दिल की बात कर लिया करती थी. एक दिन उन्होंने मुझे ‘सहेली’ नामक सामाजिक संस्था का पता दिया. घर छोड़कर डरते-डरते मैं ‘सहेली’ संस्था पहुँची. पहली रात आश्रय गृह में मुझे नींद नहीं आई. मैंने सोचा कि शायद मुझे गलत काम करने के लिए कहेंगे, मगर जो कुछ मैं सोच रही थी वैसा कुछ नहीं हुआ तो मुझे विश्वास होने लगा कि यह गलत जगह नहीं है.

सिर छिपाने की जगह की चिंता से मैं अब मुक्त हो चुकी थी. हालांकि ‘सहेली’ संस्था का माहौल मुझे कुछ अलग सा लगा. मैंने देखा कि बहुत पढ़ी-लिखी महिलाएँ आपस में इंग्लिश में बातें कर रही हैं, कोई सिगरेट पी रही है. कई बार उनमें से ही कोई महिला कहती कि हिंदी में बोलो, सर्वेश को समझ में नहीं आ रहा है तो वे थोड़ी देर हिंदी में बातें करतीं फिर इंग्लिश में शुरू हो जातीं. मैंने उनसे कहा कि मैं ब्यूटीशियन का काम जानती हूं, मुझे कोई काम बताओ. उन्होंने मुझे एक महिला का फोन नंबर दिया. मुझे फोन करना नहीं आता था. उन्होंने फोन मिलाकर मुझे दिया. रविवार को मुझे बुलाया गया. मैंने उस महिला का फेशियल और वेक्सिंग किया. उसने मुझे इसके 100 रुपए दिए. उसने दूसरी महिला का पता दिया.

स्थायी आशियाने की तलाश

इस तरह मैं ब्यूटीशियन के काम से रुपए कमाने लगी. काम की कमी तो नहीं थी लेकिन ‘सहेली’ का वह ‘शॉर्ट स्टे होम’ था, इसलिए मुझे अपने लिए एक स्थायी आशियाना भी ढूंढना था जो कि बहुत कठिन काम था. इधर मैंने अपने पति पर तलाक व रखरखाव का केस भी डाल रखा था. कोर्ट ने 350 रुपए महीने बांधे थे मगर पति ने इसे भी देने से इनकार कर दिया था. हारकर डेढ़ साल बाद मैंने आपसी सहमति से उससे तलाक ले लिया क्योंकि कोर्ट से समय बरबाद करने के अलावा मुझे कुछ हाथ नहीं आया था. मानसिक तनाव के कारण मेरी तबीयत भी अकसर खराब रहने लगी थी. जिस दिन तलाक के कागज मेरे हाथ में आए तो लगा कि क्या रिश्ते इसी कागज पर आश्रित थे?

विचारों में बदलाव

मैंने अपनी आजादी छीन कर वापस ले ली थी पर अब अपना अस्तित्व बचाना था. कुछ करना था. मैंने अब अपनी पिछली जिंदगी के बारे में सोचना बंद कर दिया था. मैं अपने आपको आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में लग गई थी. इस बीच मेरी मुलाकात आलोक से हुई. उसने मुझे राहुल सांकृत्यायन की ‘वोल्गा से गंगा’, ‘अग्निदीक्षा’, ‘असली इनसान’ तथा ‘मां’ – जैसी पुस्तकें भेंट कीं. उन्हें पढ़कर मेरे विचारों में काफी बदलाव आया. आलोक से बातें करके मैंने बहुत कुछ सीखा. आलोक ने मेरे जीवन को एक नई दिशा दी. समय के साथ समझ में आया कि हर पुरूष गलत नहीं है मगर हर पुरुष पर विश्वास भी नहीं किया जा सकता है.

एक नई जिंदगी पाई

वह एक जिंदगी थी, जिसमें मैं दस साल तक घर में कैद रही, दस साल कैद कहने को दस सेकंड भी नहीं लगते लेकिन उन दस सालों की पीड़ा जो मैंने सही वह असहनीय थी और एक आज की जिंदही है कि मैं करीब सारा हिंदुस्तान घूम चुकी हूँ. मैं और मेरा बैग बाहर जाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. मैंने बाहर घूमकर लोगों से काफी कुछ सीखा है. लोगों से फालतू की बहस में न पड़ना पड़े, इसलिए मैं अपने बारे में कई बार सच नहीं बताती. गांव में अधिकतर लोग पूछते हैं कि तेरी शादी हुई या नहीं तो मैं कहती हूं, “हां हो गई लेकिन मेरा पति विदेश में रहता है. मेरी एक बेटी है और वह अभी होस्टल में रहकर पढ़ रही है.” इसके आगे वे पूछते हैं कि तेरी शादी हो गई तो तेरा सुहाग चिह्न क्यों नहीं है तो मैं कहती हूँ कि क्या मेरा पति कुछ ऐसा पहनता है जिससे लगे कि वह शादीशुदा है? अगर वह पहनता नहीं है तो मैं भी क्यों पहनूं? उन्हें यह अब सुनकर अजीब लगता है.

दुःख बताने से भी परेशानियाँ

एक बेटी होने की बात सुनकर कहते हैं कि तेरा एक बेटा भी होना चाहिए था. मैं कहती हूँ कि अगर बेटा होने से ही सुख मिलता तो क्या तुम्हें सुख मिला? बेटा तो नौकरी के लिए बाहर चला जाता है और खूंटे से बंध जाता है अपनी पत्नी के जो उसके बच्चे पालती रहती है. ये पति पहले औरतों को घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं देते फिर कहते हैं कि औरतों को बाहर का काम करना आता नहीं. वह पहले औरतों के पर कतर देते हैं फिर कहते हैं कि तुम्हें तो उड़ना ही आता नहीं. मैं जब घर में रहती थी तो पति मेरे साथ गुलामों की तरह व्यवहार करता था क्योंकि पैसा तो वही कमाकर लाता था फिर कहता था कि तुम करती क्या हो? सिर्फ घर का काम. आज मैंने साबित किया है कि मैं घर और बाहर दोनों का काम करने में सक्षम हूं लेकिन यहाँ तक पहुँचने के लिए मुझे कठोर संघर्ष करना पड़ा है.

कई रातें मैंने तकिए में मुँह छिपाकर रोते हुए गुजारी हैं क्योंकि कहीं तो अपने दुःख को हल्का करना था. मैंने पाया है कि दूसरों को अपने दुःख बताने से अपना मन हल्का नहीं होता बल्कि सच यह है कि इससे नई परेशानियां पैदा हो जाती हैं.

आलोक ने मेरे एक जन्मदिन पर पेंटेक्स-1000 कैमरा लाकर दिया. उसका कहना था कि मुझमें सफल फोटोग्राफर बनने के गुण हैं. मैंने आश्चर्य से कहा, “मैं और सफल फोटोग्राफर? मुझे तो कैमरा पकड़ना भी नहीं आता.” फोटोग्राफी का खर्च वहन करने के लिए मैं ब्यूटीशियन के काम से पैसा कमाती.

अपनी गुरु खुद बनी

कई बार इसके लिए मैंने रात का खाना तक छोड़ा है. कई बार मैंने लंगर में खाना खाया है. एक-एक पैसा बचाकर मैंने बढ़िया कैमरा खरीदा. भगवान का दिया आज सब कुछ है लेकिन जब भूख थी तब पैसा नहीं था. आज पैसा है तो भूख नहीं है. आज डिजिटर कैमरे ने फोटोग्राफी का खर्च तो कम कर दिया है पर बढ़िया डिजिटल कैमरा अभी भी बहुत महँगा है. मैंने किसी से फोटोग्राफी की ट्रेनिंग नहीं ली है. पूछ-पूछकर ही कैमरा आपरेट करना सीखा है. अभी भी फोटोग्राफी से संबंधित नई-नई चीजें सीखती रहती हूँ पर मुझे अपने पर गर्व है क्योंकि मैं अपनी गुरु खुद हूँ.

शुरू-शुरू में जब मैं घर से बाहर निकलती थी तो कई पुरुष घूर-घूरकर मुझे देखते थे और ताने कसते थे तब मैं भी उनके सामने सीना तानकर खड़ी हो जाती और उन्हें घूर कर देखती थी और जता देती थी कि मैं वह नहीं जो तुम्हारे व्यंग्य-बाणों से डरकर घर में जाकर दुबक जाऊँगी.

बहुत लोगों का प्यार मिला
मैंने एक अपना घर छोड़ा तो क्या, मुझे बहुत सारे घर-परिवारों का प्यार मिला. मैं कई बार यही सोचती रह जाती हूं कि इनमें से किसके यहाँ रहूँ. हालाकि मुझे कभी-कभी अकेले होटल में भी रुकना पड़ जाता है. किसी शहर में एक बार मैं एक सस्ते होटल में रुकी. रात को किसी ने दरवाजा खटखटाया. मैंने दरवाजा खोला तो देखा बाहर कोई नहीं है. ऐसा दो बार हुआ. मैंने बाहर निकलकर कड़क आवाज में कहा, “मैनेजर कहाँ है?” मेरी कड़कड़ाती आवाज सुनकर डरता हुआ मैनेजर आया. मैंने कहा, “कोई बार-बार मेरा दरवाजा खटखटा रहा है. खबरदार, अगर अब किसी ने दरवाजा खटखटाया तो मैं पुलिस को बुला लूंगी.” उसके बाद कुछ नहीं हुआ.

मेरे बाहर अकेले घूमने पर आज भी लोग बड़ी हैरानी से मुझे देखते हैं. कई लोग ‘लिबर्टी’ लेने की कोशिश भी करते हैं तो मैं कड़क आवाज में उन्हें डपट देती हूं फिर बताती हूँ कि मुझे कराटे आता है और पिस्टल शूटिंग में भी मुझे गोल्ड मैडल मिला है फिर वे कुछ नहीं कहते. महिलाएँ पता नहीं क्यों इतना डरती हैं? वास्तव में तो पुरुष बहुत डरपोक किस्म का प्राणी होता है. अगर महिला गरजकर बोले तो वह डर जाता है. ऐसा भी कई बार होता है कि ढीठ पुरुष कड़क ढंग से बोलने के बावजूद बदतमीजी करते हैं लेकिन फिर भी मैं उनसे डरती नहीं. कभी-कभी हाथापाई की नौबत भी आई है. ऐसा करने पर एक बार तो डर लगता है, झिझक भी होती है लड़ते हुए फिर भी मैं मानती हूँ कि डरना नहीं चाहिए.

एक बार रांची में पुलिस ने मेरी पिटाई कर दी. मैंने भी पुलिस का पूरा मुकाबला किया. किसी तरह अपने को और अपने कैमरे को बचाया. मैं रो भी रही थी, डर भी रही थी पर फिर भी झुकी नहीं. मुकाबला किया. करगिल में फ्री-लांस फोटोग्राफर होकर जाना मेरे लिए जीवन का बहुत बड़ा अनुभव था. उसके बाद मेरे द्वारा खींचे गए चित्र को भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत भी किया गया जिसने मेरा मनोबल और बढ़ाया और हार्दिक प्रसन्नता भी दी. इसके अलावा कई राज्यों में समय-समय पर फोटो प्रदर्शनियाँ लगा चुकी हूँ जिन्हें लोगों ने बहुत सराहा है.

खतरे उठाना जरूरी है

मैं मानती हूँ कि जिंदगी में कुछ बनना है तो खतरे तो उठाने ही पड़ेंगे वरना अपनी अलग पहचान नहीं बनेगी और मरने से भी क्या डरना? एक दिन मरना तो सभी को है, पर मौत कैसी हो, यह सोचने वाली बात है. अब मैं महीने में पंद्रह दिन घूमने जाती हूँ और बाकी पंद्रह दिन कड़ी मेहनत से दिल्ली में रहकर काम करती हूँ. मैं फालतू का खर्च नहीं करती. पैसे बचाकर रखती हूँ – संसार घूमने के लिए.
मैं क्यों डरूँ?

कभी कभी मैं सोचती हूँ कि क्या मैं वही सर्वेश हूँ जो अपने पति की मार खाया करती थी? आज शायद मुझे किसी चीज की कमी महसूस नहीं होती क्योंकि मैंने अपने घर की एक-एक चीज अपने हाथों से बनाई-बसाई है. साथ में मैं बाहर का भी सारा काम करती हूँ. पुरुषों से कहा जाए बाहर के साथ-साथ घर भी संभालो तो वे नहीं कर पाएंगे यह काम अच्छी तरह.

एक बार एक लड़के ने रात के बारह बजे शराब पीकर मेरा दरवाजा खटखटाया. मैंने खोला और कहा, “बोलो, क्या बात है?” कहने लगा, “मुझे तुझसे बात करनी है.” मैंने जोर से कहा, “तू है कौन ? ठहर अभी पुलिस को बुलाती हूँ.” उसे उम्मीद नहीं थी कि मैं ऐसा जवाब दूंगी. फिर वह माफी मांगने लगा. आसपास के लोग इकट्ठे हो गए. सभी कहने लगे, “छोड़ दो इसे, यह माफी मांग रहा है.” अगर मैं उस रात डर जाती तो वह मुझे बार-बार तंग करता. महिला का अकेले रहना पुरुष वर्ग को पसंद नहीं. लोग तरह-तरह के नाटक करते हैं और औरत का जीना मुश्किल कर देते हैं लेकिन उन लोगों की परवाह क्या करना जो वक्त पर सहारा नहीं बन सकते और आज भी लोग तो रोटी नहीं दे रहे हैं? मेरी मेहनत ही मुझे पाल रही है तो मैं इस समाज के लोगों से क्यों डरूँ?

कभी आसान रास्ता नहीं चुना

मेरा मानना है कि अपना काम सच्ची लगन व ईमानदारी से करो तो भगवान भी साथ देता है. अभी समाज में अच्छे लोगों की कमी नहीं हुई है. जो लोग आपको परेशान करते हैं उनसे भी सीखने को बहुत कुछ मिलता है. परेशानियों से मुक्ति के लिए इनसान नए रास्ते तलाशता है. दूर तक जाना है तो कठिन रास्ते भी चुनने पड़ेंगे. वैसे यह कहना आसान है मगर इसे अमल में लाना बहुत मुश्किल है. एक-दो बार मेरे मन में भी आया कि मैं भी आसान रास्ता चुनूं पर मेरी आत्मा ने इसे गवारा नहीं किया.

अमिताभ से भी सीखा

पहले मुझे साइकिल भी चलानी नहीं आती थी. मैंने यह सीखी. दो-तीन बार गिरी भी पर मुस्कराते हुए आगे बढ़ती रही. आज मैं कार और स्कूटर भी चलाती हूं. मैंने इस बीच बी.ए. भी पास किया है. एक साल फेल हो गई तो क्या हुआ? मुझे इसमें कोई शर्म नहीं महसूस होती क्योंकि मैंने काम करने के साथ-साथ पढ़ाई की थी.

मैं स्कूटर से दस हजार फुट की ऊँचाई तक गई हूँ. 17,400 फुट तक मैं ट्रैकिंग करके हिमालय पर भी चढ़ी हूँ. करगिल युद्ध कवर करने भी मैं गई हूँ. मैंने मौत को अपने सामने देखा है लेकिन अपने सामने मौत को देखकर कैसा लगता है, मैं चंद शब्दों में बयान नहीं कर सकती. मैंने अमिताभ बच्चन से सीखा है कि जीरो बनने के बाद फिर से हीरो कैसे बना जा सकता है? मुझे अमिताभ बच्चन के अलावा सानिया मिर्जा, सद्दाम हुसैन, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, मेधा पाटकर, आन सांग सू और किरन बेदी जैसे व्यक्तित्वों ने प्रभावित किया है लेकिन मैं यह बता दूं कि मैं हर किसी से प्रभावित नहीं होती. मैंने कभी कोई लक्ष्य सामने रखकर काम नहीं किया है. लक्ष्य अपने आप सामने आता जाता है. इसके लिए बाहर निकलते समय कान-आँख खुले रखकर चलने की जरूरत होती है.

**-**

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 5
  1. बेनामी3:33 pm

    अबला से सबला बनने का एक बेहतरीन उदाहरण ईश्वर करे यह सबला रहे बला ना बनें।

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी6:11 pm

    शक्ति हर इंसान में होती है चाहे वो नर हो या नारी, कहीं नारी पर अत्याचार होता है तो कहीं नारी पर, परन्तु मुख्यतया गरीब पर अत्याचार होता है। तथा सर्वेश कि तरह हर कोई आतताई का मुकाबला नहीं कर पाता।
    यहां पर जरुरत मन में मौजुद शक्ति को पहचानने की है, जो इस शक्ति को पहचान जाता है वो सर्वेश की तरह बन जाता है।

    जवाब देंहटाएं
  3. बेनामी6:29 pm

    सर्वेश, से मेरी मुलाकात हुई थी , यूं ही अचानक, बस हम दोनों अजनबी थे एक दूजे के लिए, मगर आल इंड़िया रेड़ियो में मेरे एक कार्यक्रम के दौरान, सर्वेश का ज़िक्र आया, उन्हीं दिनों कादम्बिनी मैगज़ीन में भी सर्वेश के बारे में पढा था और उसकी तस्वीर भी देखी थी, ये समझो इत्तेफ़ाक ही था कि प्रेस कल्ब के पास से गुज़रते हुए सामने से सर्वेश दिखी, मैने बिना किसी हिचक उससे कहा "हैलो सर्वेश" कहा, और बस बातों का सिलसिला शुरु हो गया, हमें बातें करते करते एक घंटा कब बीत गया , पता ही नहीं चला..... जाते जाते सर्वेश नें मेरी एक कविता सुनी और उसके चेहरे पर एक स्मित सा खिल गया और उसने सीधा ही कहा 'वाह'!
    वो पंक्तियां कुछ ऐसे थी:

    झेल के जीवन के तीखे तीर,
    रहती सदा शांत गंभीर,
    मुख पर कैसा हंसमुखपन,
    भीतर गहरा अंतरमन,
    समाधान होकर भी,
    एक अनबूझ पहेली हो,
    हे नारी तुम कैसी हो....!!!

    और ऐसे ये मुलाकात तो खत्म हुई,...हां, मगर दूसरी मुलाकात का इंतज़ार रहेगा सर्वेश से !
    -रेणु आहूजा.

    जवाब देंहटाएं
  4. बेनामी6:42 am

    बहुत अच्छा

    जवाब देंहटाएं
  5. बेनामी6:53 am

    अच्छा लगा पढ कर. पहली बार पढा सर्वेश जी को.

    जवाब देंहटाएं
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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: आत्मकथ्य : पति की मार खाने वाली वह स्त्री
आत्मकथ्य : पति की मार खाने वाली वह स्त्री
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