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दिल्ली के मरते हुए सिनेमा घर...

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- नंदिता रमण दिल्ली और आसपास के सिनेमा हॉल की सूची  बनाने  पर  कुल  ११४  सिनेमा घरों का आंकड़ा सामने आया । इसमें से करीब १५ मल्टीपलेक्स है। ...



- नंदिता रमण

दिल्ली और आसपास के सिनेमा हॉल की सूची  बनाने  पर  कुल  ११४  सिनेमा घरों का आंकड़ा सामने आया । इसमें से करीब १५ मल्टीपलेक्स है। मैं यह विचार कर ही  रही  थी कि अनुसंधान कहाँ से शुरु करुँ कि मुझे याद आया अरे! पी. वी. आर. प्रीया तो मेरे घर के बगल में ही है। सोचा कि क्यूँ ना यहीं से शुरुआत की जाय । एक साधारणं से झोले में  कैमरा रखा, कुछ फिल्म ली और चल पड़ी । अभी एक-आध ही तस्वीर ली होगी कि सिनेमा हॉल के एक कार्यकर्ता ने आकर कहा कि बिना अनुमति के मैं तसवीरे नहीं ले सकती हूँ । असल में तो मैं  पी. वी. आर की जमीन पर थी ही नहीं, मैं बसन्त लोक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स से पी. वी. आर का चित्र ले रही थी । एक बार तो मन हुआ कि बोलूँ, पर बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहती थी और हॉल के अन्दर की तसवीरें भी तो लेनी थी जिसके लिये अनुमति भी चाहिए थी, सो चुप चाप कैमरा झोले में डाल मैं घर वापस आ गयी । आते ही पी. वी. आर. के मालिक अजय बिजली को मेल लिखा, कल ही उनका जवाब आया जिसमें उन्होने छाया चित्रण की अनुमति दी है । इस बीच मैं गुड़गांव के सिनेमा घरों को देखने गयी । मल्टीप्लेक्सों के बजाय छोटे हॉलो को पहले देखना निश्चित किया और हाथ आया एक खजाना! जय नाम का एक सिनेमा हॉल । एक छोटा और साधारण हॉल जो इसी फरवरी की सतरह तारीख को बन्द हुआ अब तोड़ा जा रहा है, मल्टीपलेक्स बनाने के लिये । हथौड़े की ठक-ठक के बीच जब हॉल मे कदम रखा तो अचम्भित रह गई ।  टूटी हुई छत से आती सूरज की किरणें दीवार पर अनेक आकृतियाँ प्रतिबिम्बित कर रहीं थीं । परदे और कुर्सियों को निकाला जा चुका था और रोड़ी व पत्थरों के बीच बिखरे थे अनेक टिकट । एक्ज़िट का टूटा साइन मानो इन छोटे सिनेमा हॉलो के विलोप की ओर संकेत कर रहा था । बाकी के हॉलों का भी बुरा हाल था । शकुन्तला बन्द पड़ा था, अजय और राज में टॉपलेस जैसी अश्लील फिल्में लगी थीं और पायल जिसमे चिंगारी लगी थी सुनसान पड़ा था ।


पुरानी दिल्ली के सिनेमा हॉल – हाल बदहाल

गुडगाँव के सिनेमा हॉलों का भ्रमण किये अभी करीब एक महीना ही हुआ है पर लगता ऐसा है कि एक अरसा बीत गया हो । इस एक महीने में मैं करीब दस सिनेमा हॉलों में गयी हूँ । इस बार मैंने पुरानी दिल्ली और कनौट प्लैस के सिनेमा घरों को चुना ।

शुरुआत की पी.वी.आर. रिवोली से जो सी.पी. में है । पुराने हॉल को रिस्टोर कर के बनाया गया ये हॉल मानो नये पुराने के बीच खो गया हो । ना इधर का न उधर का । एक तरफ़ तो लकड़ी के पॉलिश्ड दरवाजे आपका स्वागत करते हैं और दूसरी तरफ़ फ़र्श पर आधुनिक पैटर्न हैं । फ़ूड स्टाल पर सभी प्रकार की मशीनें हैं और लाऊंज में कुछ पुराने फ़िल्म पोस्टर के प्रिन्टों से दीवार को सजाया गया है । साथ ही है फ़्लैट स्क्रीन टी.वी. जो आने वाली फ़िल्मों के ट्रेलर दिखाता है । अन्दर की साज सज्जा को देख कर ये आभास ही नहीं होता कि यहाँ कभी एक पुराना सिनेमा घर हुआ करता था ।  प्रोजेक्टर रूम दूसरे पुराने सिनेमा हॉलों से कुछ अलग है । दो के बजाय एक प्रोजेक्टर और बगल में फ़िल्म लोड करने के लिये होरीज़ौंटल डिस्क । ये आधुनिक प्रणाली का डिज़िटल प्रोजेक्टर है । स्पूल में फ़िल्म बार-बार लोड कर के एक के बाद दूसरे प्रोजेक्टर में लगाने के बजाय यहाँ एक ही बार में पूरी फ़िल्म लोड हो जाती है और आपरेटर का काम केवल वहाँ उपस्थित रहना होता है । कुछ ही समय पहले ये आपरेटर पुराने प्रोजेक्टर चालाया करते थे । जब मैंने रिवोली के एक प्रोजेक्टर आपरेटर से पूछा कि उन्हें ये बदलाव कैसा लगता है तो उन्होंने बोला कि इसमें कोइ दो राय नहीं कि इन नये प्रोजेक्टरों की क्वालिटी पुराने कारबन लैम्प प्रोजेक्टरों से बेहतर है पर इन नयी मशीनों को चलाने में वो कॉन्फ़िडेंस नहीं है जो पुरनी मशीनों के साथ था । पुराने प्रोजेक्टर अगर फ़िल्म के बीच में खराब हो जाते तो हम उन्हें किसी न किसी तरह ठीक कर लेते थे, शो नहीं रुकता था, पर इन प्रोजेक्टर के खराब हो जाने पर हम असहाय हो जाते हैं । इनका इलाज इनजीनियर ही कर सकता है । इस बात से मन में अनेक विचार प्रतिबिम्बित हुए । समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है और जरूरी भी । पर क्या ये बदलाव रोबोटीकरण की ओर संकेत कर रहा है ? ओर इस ऑटोमेशन के दौर में भावनाओं का क्या स्थान है?  इन्हीं विचारों में खोयी मैं निकल पडी अपने अगले पडाव की ओर - रीगल ।

रीवोली के पास, अगले मोड़ पर ही स्थित है रीगल। १९२० में वॉल्टर जॉर्ज द्वारा  डिज़ाइन किया गया रीगल, ऑडीटोरियम की तरह इस्तमाल किया जाता  था। यहा अंग्रेज़ों के मनोरंजन के लिये नाटक, रंगारंग कार्यक्रम तथा फिल्म शो  किये जाते थे। स्वतंत्रता के बाद यहाँ नेहरु जी जैसे नेता और उद्योगपति जिनका  कला की तरफ रुझान था, फिल्में देखने आया करते थे । प्रृथ्वीराज कपूर, राज कपूर  जैसे विख्यात अभिनेता यहाँ नाटक तो प्रस्तुत करते ही थे, अपनी फिल्मों  का प्रीमियर भी यहाँ करना बहुत पसन्द करते थे ।

धीरे धीरे, सिनेमा की लोकप्रियता के साथ नाटक की जगह फिल्मों ने ले ली और रीगल सिनेमा हॉल के तौर पर जाना जाने लगा। ७० और ८० के दशक में रीगल अपनी चरमसीमा पर था। ९० में जब केबल टी.वी. और वी.सी.आर. पर फिल्में देखने का चलन  बढ़ा तो सिनेमा घरों की लोकप्रियता कम हो गयी। रीगल भी इसकी चपेट में आ गया और  अभी तक उभर नहीं पाया है। पर यह अपने उत्कर्ष के समय में कैसा लगता होगा इसका  अनुमान आज भी यहाँ जाकर लगाया जा सकता है। ऊँची छत, मेहराब, लकड़ी का बाक्स ऑफिस और स्नैक्स काउन्टर। पूरे हॉल में लकड़ी की पैनलिंग है और करीब चार बॉक्स है,  प्राइवेट व्यूइंग के लिये। बॉक्स में घुसने पर ऐसा लगता है कि किसी ऑपेरा हाउस में आ गये हों। दीवार पे टंगे पुराने फिल्म स्टारों के चित्र रीगल के माहौल का एक घुलामिला हिस्सा हैं। नये सिनेमा घरों की चमक धमक और शोर शराबे से अलग रीगल बहुत शांत और कुछ-कुछ बुझा हुआ सा प्रतीत होता है। यह निश्चित ही पुराने सिनेमा हॉलो का बहुत अच्छा प्रतीक है और मेरे छाया चित्रण का बहुत अहम हिस्सा।

रीगल के बाद मैं पी.वी.आर प्लाज़ा गयी। ये रिवोली जैसा ही है, फर्क सिर्फ इतना है कि इसकी बिल्डिंग में कई तरह की दुकानें व रेस्तराँ हैं जो स्वतंत्र रूप से व्यापार करते हैं। रीवोली से कुछ ही दूर पर, कनॉट प्लेस में स्थित है ओडियन। अभी तक का यह पहला सिनेमा हॉल था जहाँ हाथ से पेन्टेड पोस्टर लगा हुआ था। मैनेजर के छुट्टी पर होने के कारण मैं इसके अन्दर नहीं जा पायी। बाहर से देखने पर यह रोचक लग रहा था। अन्दर से अवश्य देखना चाहूंगी।

पर, बाहर से ऐसा तो लग ही रहा था कि यह सिनेमाघर भी कोई हसीन जिंदगी नहीं जी रहा है....
**-**

रचनाकार – नंदिता रमण, सराय सीएसडीएस की स्वतंत्र शोध फ़ैलों हैं तथा दिल्ली के सिनेमा हॉलों के हाल पर शोध कर रही हैं. प्रस्तुत चुनिंदा अंश उनके शोध पत्र से प्रकाशित.
अधिक विवरण के लिए देखें लेखिका का चिट्ठा स्थल-

http://ramannandita.blogspot.com/

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रचनाकार: दिल्ली के मरते हुए सिनेमा घर...
दिल्ली के मरते हुए सिनेमा घर...
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