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कहानी : पिनकोड 193123


- सोनाली सिंह

भूकम्प ने उड़ी को एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया. कुछ महीने पहले श्रीनगर-मुज़फ़फ़राबाद सड़क खुलने से यह स्थान चर्चित हुआ था.

आँखें मलते सूरज ने जम्हाई ली, फिर प्रखर होता हुआ आसमान के बीचोंबीच टंग गया, मानों फटी आँखों से तबाही का मंज़र देख रहा हो. हर तरफ़ गहरी ख़ामोशी थी. फ़ाख़्ताएँ राग अलापना, मुर्गियाँ दाना चुगना और कौवे मुंडेरों पर बैठकर बिछुड़े हुओं के संदेश देना भूल गए थे. गलियों के आर-पार की कच्ची-पक्की दीवारें एक दूसरे के गले लगकर मातम करना चाह रही थीं. उदासी की धूल झाड़कर असलम मीर डाकघर जाने को तैयार थे. पुरानी ऊनी सदरी को पहनते ही रुई के छोटे-छोटे फोहे सदरी के फटे कोने से झर पड़े, ‘लगता है इसका वक़्त भी पूरा हो गया!’ ठंडी आह भरकर वह चल पड़े, जहाँ ब्रिटिश ज़माने का डाकघर भूकम्प से पड़ी दरारों के साथ मुसकराता हुआ उनकी राह देख रहा था.

असलम मीर ने चिट्ठियाँ छांटनी शुरू कर दीं. एकाएक उनका ध्यान आलमी शोहरत-याफ़्ता जिन्नाह की तस्वीर वाले लिफ़ाफ़ों की ओर गया. वे सारे ख़त लाइन ऑफ कन्ट्रोल पार करके आए थे, जो वहां से महज़ पन्द्रह मिनट की दूरी पर थी. सियासत के नुमाइन्दों की वजह से बेजुबान जवानों को दिल्ली तक का सफ़र तय करना पड़ता था. उपमहाद्वीप के अब तक के सबसे ज़ोरदार ज़लज़ले से उपजे दर्द ने नियंत्रण रेखा के दोनों ओर के बाशिंदों को एक कर दिया था जिसकी गवाही डाकघर में लगा चिट्ठियों का अम्बार दे रहा था.

अपना ख़ाकी झोला अच्छी और बुरी ख़बरों से भरकर असलम मीर मंतव्य की ओर निकल पड़े. पैर उठने का नाम नहीं ले रहे थे, लेकिन जाना तो था. उड़ी के लोगों के लिए वह उम्मीद की एक मात्र किरण थे जो उनकी बुझी हुई ज़िन्दगियों में चन्द घड़ियों के लिए जीवन की ज्योत जला देते थे.

मुख्य पोस्ट-ऑफ़िस से उड़ी तक दस किलोमीटर का सफ़र था. वह आदतन बस स्टॉप पर खड़े हो गए. बस आई, कंडक्टर की सीटी की आवाज़ गूंजी, वहाँ खड़े इक्का-दुक्का लोगों को निगलकर बस ज़ोर से डकार भरती हुई चली गयी.

वह जस के तस खड़े रह गए. दिलोदिमाग़ में खींचतान जारी थी. दिल वात लगे घुटनों के बाबत सोचता. दिमाग़ महीने भर की ढाई हज़ार रुपए तनख़्वाह की पाई-पाई का हिसाब रखता और चेताता कि बस का ख़र्चा वहन करना उनके बूते के बाहर है.

वह थके क़दमों से परिचित सफ़र को निकल पड़े. सूरज की झुलसाती गर्मी, पथरीले इलाक़े की ऊँची-नीची पगडंडियों पर छह घंटे का ऊबाऊ सफ़र... पिछले चौंतीस बरस से सोचते आ रहे थे कि नौकरी छोड़ दें. इससे बेहतर है कि शहर जाकर मज़दूरी कर लें, लेकिन गांव पहुँचते ही लोगों के चेहरे की चमक, मासूम बातें, आदर और अपनापन रास्ते की सारी थकान भुला देता था. गिले-शिकवे भूलकर वह गांव वालों की दुनिया में मस्त हो जाते थे. किसी के भाई-बेटे की नौकरी लगने की ख़बर आई तो दावत हो गई. वहाँ उनका रुतबा लाट साहब से कम न था जैसे कि उनके पिताजी ने कल्पना की थी.

असलम मीर बीस बरस के थे जब पोस्टमैनी मिली. पिताजी की ग़रीबी के कारण मैट्रिक से आगे न पढ़ सके. पिताजी दर्जा दो पास थे. वह उन्हें लाट साहब से कमतर न आंकते थे. वही उम्मीदें असलम मीर को अपने बेटे अफ़ज़ल से थीं.

उनका दस साल का होनहार बेटा अफ़ज़ल... घाटियों में रहने वालों के लिए मौत अनजानी नहीं होती. नियंत्रण रेखा पार से पाकिस्तानी तोपख़ाना जब तब गोलियाँ बरसाता रहता था, पर शनिवार की सुबह मौत जिस रूप में आई, कोई उसके लिए तैयार नहीं था. उस मनहूस सुबह रमज़ान की सहरी लेकर वह मस्जिद से लौट रहे थे, कुछ चरमराने की आवाज आई. कुछ सेकंड में धमाके होने लगे. पहाड़ अपनी जगह से खिसक गए. धूल के गुबारों के बीच कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. पहाड़ों से लुढ़कते पत्थरों की भयानक आवाज़ें आज भी इन्हें नींद से जगा देती थी. मोटरकार जितनी चट्टानें सड़कों पर आकर गिरी थीं. वह भागकर घर गए, तो देखा, दीवार से दबा अफ़ज़ल आखिरी सांसें गिन रहा था. उसकी मां सदमे से पागल हो गयी. उनका दूसरा अपाहिज बेटा जहांगीर बच गया जो हादसे की सुबह अपनी फूफी के घर गया हुआ था.

“काश अफ़ज़ल की जगह जहांगीर... तौबा-तौबा!” असलम मीर ने घबराकर विचारों का रूख दूसरी ओर मोड़ा.

उड़ी में क़दम रखते ही चारों तरफ़ का नज़ारा देखकर वह स्तब्ध रह गए. तबाही का इतना भयानक मंज़र वह जीवन में पहली मर्तबा देख रहे थे. एक भी घर साबुत नहीं बचा था. हर आशियाना क़ब्रगाह बन चुका था. परिवार के परिवार काल के गाल में समा गए थे.

‘मैं कितना ख़ुशनसीब हूं कि ज़िन्दा रहने के लिए परिवार का सहारा है या फिर बदनसीब कि परिवार के लिए ज़िन्दा रहना मजबूरी है.’ उनकी आँखों से आंसू टपकने लगे.

आज तक उन्होंने कभी पता नहीं देखा था. एक नज़र नाम पर डालते ही जान जाते थे कि अमुक शख़्स कहां रहता है? कल तक तो वह यहाँ दरवाज़ों को खटखटाया करते थे. अब वहाँ चारों ओर मलबे का ढेर फैला हुआ था. उनमें कोई ग़लीचे और दरीचे (दरवाज़े और खिड़कियाँ) नहीं थे. वर्षों पहले पढ़ी ये पंक्तियाँ केशव शरद जी ने ऐसे ही किसी हालत में लिखी होंगी :

बहुत पहले नदी कोई बही है,
यहाँ बालू पे थोड़ी-सी नमी है.
नगर तो मिट चुका नक़्शे से कब का,
याद अब भी उनकी हर गली है.

जाने वाले चले गए, उनके ख़्वाबों के घरौंदे बिखरे पड़े थे. केवल भुक्तभोगी रह गए थे, उस ख़ौफ़नाक मंज़र को बताने के लिए और मरहूमों की यादों का बोझ उठाने के लिए...

बचे-खुचे ग्रामीण असलम मीर और उनके ख़ाकी झोले की राह देख रहे थे. असलम मीर को देखकर वे उनके चारों ओर हुजूम बनाकर खड़े हो गए. लाइन ऑफ कन्ट्रोल से सटा, यह सुदूरवर्ती इलाक़ा टेलीफोन की पहुँच से बाहर था. पोस्टमैन उनके दुःख-सुख बंटाने वाला एकमात्र साथी होता था. नीले अंतर्देशीय में लफ़्ज़ों की जगह घाटीवालों के दिल धड़कते थे.

बीमा कम्पनी से वृद्ध हसन शाह का ख़त आया था. पढ़कर वह सुबक पड़े “या अल्लाह! क्या वाहियात मज़ाक़ किया है? मैं अपना पूरा परिवार खो चुका हूँ. अकेला चिराग़ मेरा पोता जिसकी दोनों आंखें कीले गड़ने से चली गईं, अस्पताल में जिन्दगी और मौत के बीच जूझ रहा है. मैं उसके लिए कुछ नहीं कर सकता. मेरा बीमा है और मैं ज़िन्दा हूँ.”

वहां मौजूद लगभग हर शख्स लगभग इन्हीं हालात का सामना कर रहा था. असलम मीर ने भी थोड़ी-बहुत रक़म अफ़ज़ल की पढ़ाई के लिए जोड़ रखी थी. अब वह जहाँगीर के लिए लकड़ी का कृत्रिम पाँव ख़रीद देंगे... अगर अफ़ज़ल ज़िन्दा होता तो उन्हें इस बात का कभी ख़याल तक नहीं आता. पता नहीं, अफ़ज़ल की क़िस्मत ख़राब थी या जहांगीर ख़ुशक़िस्मत था!

“ऐ ख़ुदा! अफ़ज़ल की जगह मुझे उठा लेता. मैं तो अपनी जिन्दगी जी चुका. वह मासूम तो अभी..” रह-रह कर अफ़ज़ल की यादें असलम मीर के दिल को कचोट रही थीं.

सरहद पार से आए ख़तों ने इंसानी जज़बात को पिघला दिया था. विद्यालय में शिक्षक यासीनख़ां पाकिस्तान से आई अपने रिश्तेदार की चिट्ठी पढ़कर सुनाते हैं, “मुज़फ़्फ़राबाद में तक़रीबन दो सौ बच्चे अनाथ होकर सड़कों पर घूम रहे हैं. मुई सरकार अंदरूनी मामले ही नहीं सुलझा पाती. सभी पीड़ित ख़ुदा के रहमो-करम पर हैं.”

“आम दिनों की बात होती तो मौसम ख़ुशगवार होता. सफ़ेद बर्फ़ से ढंकी पीरपंजाल पर्वत श्रृंखला को देखकर कभी कविता करने का दिल करता था, अब देखकर रूह कांप उठती है. सफ़ेद सूनामी के आने का भी समय हो रहा है. ऐसे में बिना घर के मासूमों का अल्लाह ही मालिक है.” रईस बेग ने अपनी गीली आंखों को पोंछा.

“अगर मेरी दुआ क़बूल हो जाती और ख़ुदा अफ़ज़ल की जगह मुझे उठा लेता तो मेरे दोनों बेटे सड़क पर आ जाते. यहाँ सभी एक समान आर्थिक स्थिति वाले ग़रीब किसान हैं. उनका ख़ुद का ठिकाना नहीं रहा... भूखे-बिलखते बच्चों को देखकर मेरी रूह कितना तड़पती? सच्ची ख़ुदा की इनायत है जिसने मुझे मौत से बदतर तड़प से बचा लिया. अब रूखी-सूखी ही सही, जहांगीर को ज़िन्दा रखने लायक रोटी तो दे सकता हूँ.” अचानक असलम मीर को महसूस हुया कि लोगों के बड़े-बड़े दुःख के आगे उनका दुःख बहुत मामूली है.

“पता है, इस्लामाबाद के एक पब्लिक स्कूल के मलबे में तीन सौ बच्चे ज़िन्दा दफ़्न हो गए. फ़ौजी अस्पताल में डॉक्टर बातचीत कर रहे थे.” अस्पताल से अपने ज़ख़्मों की मरहम-पट्टी कराकर लौटे मीर जबन ने बतलाया.

“इन्ना लिल्लाहे वा इन्नाएलेहे राजऔन!” सभी ने एक साथ शान्ति की दुआ की.

“अब जीने की इच्छा नहीं बची. अगर जहांगीर न होता, तो मैं भी कबका...” असलममीर के होंठ बुदबुदा रहे थे.

“क्या यह सही होता – ऐसे में तुम्हें अपनी पागल पत्नी का पलभर को भी खयाल न आता. ऐसी बीवी तो नसीब वालों को मिलती है जिसने अपनी सारी इच्छाएँ भुलाकर हर दुःख में तुम्हारा साथ निभाया. तुम जीवन-भर उसकी सेवा करो तो भी उसके अहसान नहीं उतार सकते. यह तो ख़ुदा ने तुम्हें एक मौक़ा दिया है अपनी बीवी के प्रति सच्चे शौहर का फ़र्ज़ अदा करने का.”

उनकी अंतरात्मा उन्हें धिक्कार रही थी. कभी-कभी कुदरत ख़ामोश रहकर भी सारे सवालों का जवाब दे जाती है. भयानक चीत्कारें, कफ़न की राह देखते मृतक शरीर, मलबा बनी बस्तियाँ, भूख से बिलखते बच्चे और ठिठुरते लोगों को देखकर सूरज भी घबरा गया. रोती हुई लाल आँखों को लेकर वह अस्त हो चला. सूरज के साथ-साथ असलम मीर ख़ाकी झोला कंधों पर लटकाए बोझिल क़दमों से लौट पड़े. लोग भी सरहद पार के ग़मों के दायरे से निकलकर अपने दर्द फिर से महसूस करते हुए अस्थाई तंबुओं की ओर मुड़ने लगे.

दूसरे दिन सुबह हुई – चिड़ियाँ चहचहाईं, कौवे बिछुड़े हुओं के संदेश लेकर मुंडेरों पर बैठे. गुलबासी पर फूल खिले हुए थे. झेलम कल-कल करती बह रही थी. सब कुछ वैसा का वैसा था, सिवाय उड़ी के, जो मृतकों के गांव में बदल चुका था. जैसे क़ैदी और फ़ौजी को मौत के बाद नम्बरों से पहचाना जाता है, वैसे ही भूकम्प के बाद उड़ी पिन कोड 193123 से जाना जाने लगा.
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