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जितेन ठाकुर की कहानी : विक्रम और वेताल



विक्रमादित्य ने शव को पेड़ से उतारा और कांधे पर लाद कर चलने लगा. तभी शव के अंदर से वाचाल वेताल बोला-

‘तू बड़ा जिद्दी है राजा. सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहता. निश्चित जान तू एक दिन तिहाड़ जेल की मच्छरों वाली अंधेरी कोठरी में सड़ेगा. झूठ और कपट से दुनिया को लूटने वाले तेरे सामने माल पुए खाएंगे, नरसंहार करने और करवाने वाले प्रजावत्सल कहलाएंगे, मनुष्य का रक्त पीकर ऊर्जा का संचयन करने वाले जन प्रतिनिधि बन जाएंगे और सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार का गरल घोलने वाले अट्टालिकाओं पर खड़े होकर तेरे फटेहाल पर मुस्कुराएंगे.’

विक्रमादित्य मौन बना दृढ़ता से पग उठाता रहा. उस पर वेताल की बातों का कोई प्रभाव नहीं हुआ. यह देखकर भी वेताल हताश नहीं हुआ और फिर बोलने लगा.

‘अरे अभागे राजा! मुझे ले जाने की चेष्टा में तूने युग बिता दिए. संसार बदल गया पर तू नहीं बदला. तू अब मुझे कहां ले जाना चाहता है? सारी बस्तियाँ नर पिशाचों से भरी हुई हैं. जंगल की दहलीज लांघ कर तो देख. पिशाच तेरे सिर के टुकड़े कर के मुझे मुक्त करवा लेंगे. एक भी व्यक्ति तेरा पक्षधर नहीं होगा. इसीलिए कहता हूँ मुझे छोड़ दे और कंदमूल खाकर किसी सघन वन की कंदरा में जीवन यापन कर, अन्यथा मारा जाएगा.’

विक्रमादित्य फिर भी मौन रहा. पर वेताल हताश नहीं हुआ, उसने कहा –

‘न तू अपनी मृत्यु ही देख पाता है और ना मेरी चेतावनी पर कान धरता है. पर फिर भी जब तक मैं तेरे साथ हूँ इस निर्जन वन में तुझे एकाकीपन की अनुभूति नहीं होने दूंगा. तू किस बस्ती की ओर जा रहा है यह तुझे समझाता हूँ. चल! तुझे क कहानी सुनाता हूं.’

तराई की एक बस्ती में प्राचीन गुरूद्वारा है. कभी इस गुरूद्वारे के गुम्बद पर सोने का पतरा मढ़ा रहता था. भण्डार में सोने चाँदी के बर्तनों की भरमार थी और खजाने में अकूत धन रहा करता था. पर एक दिन इस गुरुद्वारे में सेंधमारी हो गई. रातोंरात सब कुछ जादुई ढंग से गुम हो गया. कब कुंडे टूटे, कब ताले खुले, कब सोने का पतरा गुम्बद से उतरा और कब भण्डार घर खाली हुआ – कोई नहीं जान पाया. बस्ती में हंगामा बरप गया. अगली सुबह सायरन बजाती हुई हाकिमों की इतनी गाड़ियाँ पहुँचीं कि दुध-मुंहे बच्चे कच्ची नींद से जाग-जाग कर रोने लगे. बेलदारों और चोबदारों का साम्राज्य स्थापित हो गया. बस्ती वालों को लगा कि इस बार तो चोर पकड़ा ही जाएगा. पर गाड़ियाँ जैसे धूल उड़ाती हुई आई थीं उसी तरह धुआँ छोड़ती हुई चली गईं. धीरे-धीरे सब कुछ धूल के गुबार की तरह बैठता चला गया. चोरी कागजों में बंद होकर पुलिस की जागीर हो गई. पर गुरुद्वारे के एक सेवादार को चैन नहीं था. वो हर दूसरे-तीसरे दिन थाने पहुँच जाता और थानेदार की खूब लानत – मलामत करता. थानेदार की सहनशक्ति चुक भी जाती तो भी वो आपा नहीं खोता. आखिर मामला धर्म का था. गुरुद्वारे का ग्रंथी बूढ़ा था. उसने दुनिया देखी थी. वक्त की नजाकत समझाने के लिए उसने सेवादार को बिठाकर एक किस्सा सुनाया.

किसी उद्योगपति ने अपनी सारी पूंजी लगाकर एक बहुत बड़ी फ़ैक्ट्री खोली. हवन पूजन के बाद फ़ैक्ट्री चालू हो गई. पर दूसरे ही दिन मालिक ने देखा कि फ़ैक्ट्री तक पहुँचने वाली सड़क खोदी जा रही है. पूछने पर पता चला कि पाइप लाइन बिछेगी इसलिए सड़क को करीब आधा मील तक पाँच-छः फिट गहरा खोद दिया गया. मालिक पाइप लाइन बिछने की प्रतीक्षा करने लगा. पर सड़क खोदने वाले सड़क खोद कर जा चुके थे और पाइप लाइन का कहीं दूर-दूर तक पता नहीं था. मालिक हैरान था कि यह कैसी पाइप लाइन है जो फ़ैक्ट्री तक आने वाली सड़क पर बिछाई जा रही है. ना इसका आगे कोई सम्पर्क ना पीछे. ऋतुएं बदलीं तो मालिक की बेचैनी बढ़ी. कच्चामाल ना पहुँचने के कारण फ़ैक्ट्री का काम ठप्प हो चुका था. मालिक ने भाग दौड़ करके उस विभाग का पता करने की चेष्टा की जिसने सड़क खुदवाई थी – पर कुछ पता न चला. उसने अपने खर्चे से सड़क भरवानी चाही तो फिर खोद दी गई और खबरदार किया गया कि सरकारी काम में बाधा न पहुंचाएँ वरना कानून की किसी भी धारा में धर लिया जाएगा. उद्योगपति अनुभवहीन था पर उसके शुभचिंतक सारा माजरा समझ रहे थे. उन्होंने उद्योगपति को समझाया.

‘भाई! तुमसे गलती हुई है. फ़ैक्ट्री में ना किसी नेता की पत्ती ना किसी माफ़िया डान की. फिर फ़ैक्ट्री कैसे चल सकती है.’

‘अब क्या किया जाए?’ मालिक बेचैन होकर बोला.

‘अब मंत्री-वंत्री से काम नहीं चलेगा. मुख्यमंत्री को बुलाओ और फ़ैक्ट्री का दोबारा उद्घाटन करवाओ. बस यही एक रास्ता बचा है.’

उद्योगपति कसमसाया पर इस सलाह को मानने के अलावा और कोई चारा था भी नहीं. लिहाजा अगले ही दिन उसने अपनी बड़ी गाड़ी निकलवाई और मुख्यमंत्री से मिलने चल दिया. आधार करोड़ से ज्यादा कीमत वाली इस गाड़ी का उपयोग वो खास-खास मौकों पर ही करता था. मुख्यमंत्री ने उद्घाटर का आमंत्रण स्वीकार करते हुए कहा.

‘आपने नाहक औपचारिकता की. हम तो आप लोगों के सेवक हैं. आप बुलाएँ तो हम पैदल ही दौड़े चले आएँ. पर आपके आग्रह और स्नेह को हम कैसे ठुकरा सकते हैं. आपकी यही इच्छा है तो यही सही. उद्घाटन करने आपकी दी हुई गाड़ी से ही आएंगे. धन्यवाद!’

उद्योगपति ठगा सा रह गया. पर क्या करता, गाड़ी की चाबी वहीं छोड़कर चुपचाप निकल आया. फ़ैक्ट्री पहुँचा तो और हैरान हुआ. खुदी हुई सड़क भरी जा रही थी.

‘पाइप लाइन बिछ गई थी क्या?’ सेवादार ने पूछा

‘ओ मूर्खा का दी पाइप लाइन (अरे मूर्ख! पाइप लाइन कैसी) बात को समझ. हमारे गुरुद्वारे में रात को सेंध लगी – चोर शर्मदार था जो मुंह नहीं दिखलाया. पर ये तो उजाले के डकैत हैं. अहलकर-टहलकर, हाकिम-पुलिस सारा अमला इनका है. फिर तू किससे न्याय की गुहार कर रहा है. जिद छोड़ और मन को भटकने से रोक. जो चला गया – जाने दे. उसके पीछे मत भाग. शबद-कीर्तन और सेवा कारज में मन लगा.’

राजन, बूढ़े ग्रंथी के समझाने और अपने असफल प्रयासों से थककर जब सेवादार हार मानने ही वाला था कि ज्ञानी जी के तराई इलाके में आने की खबर आ गई. ज्ञानी जी ने जिन स्थानों का भ्रमण करना था, उनमें यह गुरूद्वारा भी शामिल था. दरअसल जब ज्ञानी जी इस मुल्क के राष्ट्रपति नहीं बने थे तब अपनी किसी यात्रा में उन्होंने इस गुरुद्वारे में सेवाकार्य किया था. वर्षों बाद अपनी जवानी के दिनों की तरह ही उन्हें यह गुरूद्वारा भी याद रह गया. सेवादार को तो मानों फिर पंख लग गए. इस बार वो कई दिन बाद फिर थाने गया. पर अब उसने थानेदार की लानत-मलामत नहीं की – उसे बाकायदा धमकाया. इतना धमकाया कि सारा थाना धमक उठा. गुरूद्वारे लौटकर सेवादार ने एक चिट्ठी लिखी. इस चिट्ठी में चोरी के साथ-साथ थानेदार की काहिली और नकारेपन की सीवन उधेड़ी गई थी. चिट्ठी पहले अंग्रेजी में लिखी गई, फिर हिन्दी में टाइप हुई और अंततः यह सोचकर कि ज्ञानी जी इस चिट्ठी को पढ़ेंगे, तभी चोर पकड़ा जाएगा – चिट्ठी को गुरमुखी के सुंदर सुलेख से पन्ने पर उतारा गया. एक-एक अक्षर इतना साफ कि कहीं कोई गफलत ही न रहे.

ज्ञानी जी के आने के दिन चारों ओर खाकी वर्दी का साम्राज्य स्थापित हो गया. लोगों की सांसें भी गिनी जाने लगीं. ग्रंथी और सेवादार की भी तलाशी हुई. तलाशी के समय सेवादार फिर बिफरा.

‘चोर पकड़े नहीं जाते और शरीफों के कपड़े भी उतरवा लेते हो. आने दो ज्ञानी जी को एक-एक की खाल में भूसा भरवाऊंगा.’

बूढ़े ग्रंथी ने ज्ञानी जी को चोरी वाली चिट्ठी सौंपी. ज्ञानी जी ने चिट्ठी तो नहीं पढ़ी पर मजमून समझ कर उनके माथे पर बल पड़ गए. आँखें तरेर कर सितारों वाले अमले को देखा. फिर चिट्ठी अपने सचिव को देकर हिदायत की.

‘इस पर कार्रवाई करके मुझे खबर की जाए.’

इस बीच सेवादार ग्रंथी के पीछे से कई बार उचका पर ज्ञानी जी की दृष्टि की सीमा नहीं तोड़ पाया. ज्ञानी जी आधा घंटा रुक कर लौट गए. टहलकारों के सारे अमले ने ऐसे निश्वास छोड़ा मानो कोई बड़ी दुर्घटना टल गई हो.

राजन, दिन-दिन करते साढ़े तीन महीने बीत गए पर ज्ञानी जी को सौंपी गई चिट्ठी का कुछ अता-पता नहीं लगा. सेवादार निराश हो गया और पुलिस बेफ़िक्र. पर साढ़े तीन महीने के बाद एक दिन अचानक ढेर सारी सख़्त हिदायतों के साथ वो चिट्ठी जिलाधिकारी के दफ़्तर पहुँच गई. जिलाधिकारी वैसे ही परेशान हुआ जैसे ज्ञानी जी के सचिवालय से त्वरित कार्रवाई के निर्देश के साथ भेजी गई इस चिट्ठी को पाकर प्रधानमंत्री कार्यालय परेशान हुआ था. चूंकि चिट्ठी गुरमुखी में थी इसलिए पंजाब के मामलात देखने वाले सचिव को भेज दी गई. वहाँ से पता चला कि मामला उत्तर प्रदेख की तराई का है. लिहाजा चिट्ठी राज्य के गृह मंत्रालय को भेज दी गई.

इस तरह हफ़्ता-दर-हफ़्ता बिताती और त्वरित कार्रवाई के निर्देशों का बढ़ा हुआ बोझ ढोती हुई चिट्ठी आयुक्त से जिलाधिकारी, जिलाधिकारी से पुलिस अधीक्षक और पुलिस अधीक्षक से उसी थाने में जा पहुँची जिस थाने के थानेदार की काहिली और नकारे पन का इसमें जिक्र था.

साढ़े तीन महीने बीत जाने के बाद थानेदार ने मामला रफा-दफा मान लिया था. पर त्वरित कार्रवाई के भार को ढोती इस चिट्ठी का बोझ किसी भी थानेदार की कुर्सी पलट देने के लिए काफी था. थानेदार को ठंडे पसीने छूटने लगे. राजन, यह देश की पारदर्शी कार्यशैली का ही कमाल था कि सेवादार द्वारा की गई थानेदार की शिकायत आज फिर उसी के हाथ तक पहुँच गई थी.

आनन फानन में कार्य योजना बनाई गई. कई जगह छापे मारे गए और अंततः चोर पकड़ ही लिया गया. इतने निर्देशों के बाद भी चोर न पकड़ा जा सके – देश की व्यवस्था इतनी नकारी भी नहीं थी. सिर्फ चोर ही नहीं पकड़ा गया चोरी का माल भी बरामद कर लिया गया.

दांतों से अंगुलि काटते हुए हैरान लोगों ने देखा कि सेवादार के साथ ही उसके दूर पास के सारे रिश्तेदार थाने में बंधे हुए खड़े थे.

कहानी सुनाकर वेताल बोला –

‘राजा! मेरा बस एक ही छोटा सा प्रश्न है जिसका उत्तर तुम्हें देना ही होगा. यदि उत्तर नहीं दोगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएंगे. क्या सचमुच सेवादार चोर था? यदि नहीं तो फिर उसकी यह दुर्गति क्यों हुई?’

‘नहीं! सेवादार चोर नहीं, मूर्ख था. वो युग-सत्य को नहीं पहचानता था और न्याय की आशा में व्यवस्था से लड़ रहा था. इसीलिए उसकी यह दुर्गति हुई थी.’ विक्रमादित्य ने मौन तोड़ दिया.

‘हा...हा...हा... राजा युग सत्य को तो तुम भी नहीं पहचानते. तुम भी सेवादार की ही तरह मारे जाओगे. तुमने मौन तोड़ दिया लो मैं चला.’ शव सहित वेताल राजा की पकड़ से छूटकर उड़ चला. हैरान राजा ने देखा कि वेताल इस बार पेड़ की ओर नहीं बस्ती की ओर जा रहा है. राजा हाथ में तलवार लहराता हुआ बस्ती की तरफ भागा. नंगी तलवार के साथ बस्ती में घुसे राजा के साथ वही हुआ जिसकी भविष्यवाणी वेताल ने आरम्भ में कर दी थी. पर धुन के पक्के राजा ने तिहाड़ से मुक्त होते ही फिर बस्ती में वेताल की खोज आरम्भ कर दी पर आश्चर्य! उसने देखा कि बस्ती में कई विक्रमादित्य अपने-अपने वेताल खोज रहे हैं. बिखरे हुए बाल, खिचड़ी दाढ़ी, फटे हुए पायजामे में नंगे बदन के साथ बच्चों के पत्थरों से बचते हुए ये विक्रमादित्य आश्वस्त है कि फिर एक दिन शव सहित वेताल को पकड़ कर श्मशान तक ले ही जाएंगे और तब सब कुछ बीते युग जैसा ठीक-ठाक हो जाएगा.

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रचनाकार – डॉ. जितेन ठाकुर के कई कहानी संग्रह, कविता संग्रह तथा एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. अलग किस्म के तेवर लिए आपकी कई रचनाओं का जर्मन, अंग्रेजी, उर्दू, उड़िया, बांग्ला, मराठी, पंजाबी इत्यादि भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है.

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चित्र – रेखा की कलाकृति. पेंसिल से रेखांकन

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