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बंगाल से एक कहानी



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एक काला बाल और मुक्तिबोध

- विजय

अँधेरा कटी पतंग के साथ धरती पर भी फैल गया था. विक्टोरिया मेमोरियल का संगमरमर कुछ ज्यादा ही सफेद नज़र आने लगा था, गेट के पास टैरेस पर बनी पथरीली आकृतियाँ उड़ती हुई या तैरती हुई लग रही थीं, जुगनुओं ने जल-बुझ का खेल शुरू कर दिया था. मेमोरियल के नीचे फुसफुसी आवाज़ में आत्माएँ ‘लांग लिव अवर किंग... लांग लिव अवर क्वीन’ गा रही थीं और मेमोरियल के बंद गेट के बाहर कुछ खास किस्म के दबंग लोग टहल रहे थे, जिनका रोजगार शाम के डूबते ही शुरू हो जाता है. बाहर आइसक्रीम के ठेले और मूड़ीवाले नितांत मस्ती से अटल खड़े थे, वे जानते हैं कि इस एरिया का दूसरा दौर अब शुरू होने वाला है.

दाहिनी ओर मुड़ कर सुनसान फुटपाथ पर चल पड़ता हूँ जिस पर बेहिसाब गीले पत्तों का ढेर बिखरा हुआ था, जिन्हें चाट-कर लोगों ने लापरवाही से बिखरा दिया था और कुत्तों ने जिन्हें जी भर के टटोला था. उनका अस्तित्व उन मजदूरों की तरह था, जिन्हें जाने कहाँ-कहाँ से कारखाने में मेहनत करने के लिए लाया गया था, और अचानक ही एक तालाबंदी ने उनके अस्तित्व को टूटे शीशे की भांति निरर्थक कर दिया था. अंचिता के हृदय में दबे प्यार की भी तो यही हालत है – झूठे पत्तों जैसी.

इधर-उधर पेड़ और दीवार की ओट लिए चंद जिस्म कार की हेडलाइट बंद होते ही सड़क पर चील की तरह झपटते, एक सीटी बजती और इत्र से महकता हुआ एक जिस्म कार में दाखिल हो जाता, हेडलाइट्स फिर जल उठतीं, साये फिर नदारद हो जाते. सड़क पर फिर कर्फ्यू की वीरानियत फैल जाती है. काली रात, काला व्यापार रात भर जागते हैं, गोश्त के ताबूत इधर-से-उधर उमंगों के धक्के खाते हैं. शहर के अनगिनत चौराहों पर लगी मूर्तियाँ, जो मुक्त हस्त से दिन भर आदर्श और क्रांति के पोस्टर बांटती रहती हैं... चश्मदीद गवाह की तरह रात अपना बयान दोहराती रहती हैं, लेकिन सुबह होते ही सब कुछ भूल जाती हैं. अंधेरे की तिजारत का एक भी सत्य उनके मुँह से नहीं फूटता है, इसीलिए तो अनगिनत अंचिताओं को अनदेखा कर जाती है ये मूर्तियाँ.

वक्त चाहे ईस्ट इंडिया कंपनी का रहा हो या खालिस मार्क्सवादी सरकार का, जिसने मानव जाति से उत्पीड़न समाप्त करने का बीड़ा उठा रखा है... कलकत्ता की हर सड़क ने देह व्यापार को हर युग में भोगा है. भूख ने मुफलिस औरत को सदैव दिन में खोटा सिक्का बना कर रखा है, जिसे रात में आसानी से हाथों-हाथ चलाया जा सके. मूर्ति चाहे सुभाष की हो या विक्टोरिया की, सड़क का नाम चाहे कालिदास हो या मदर टेरेसा, बस्ती चाहे काली वाड़ी हो या फातिमागंज और लड़की चाहे फातिमा हो या अन्नपूर्णा, रात होते ही घर या बाजार में औरत की बोटी ही तलाशी जाती है. अंचिता भी एक फातिमा है... एक अन्नपूर्णा है... वक्त के कसाई की दुकान पर टंगी.

ऐसा क्यों होता है कि जहाँ पतित पावनी गंगा खुद हजारों मील का सफर तय कर पहुँचती है और सूरज जिधर से रोशनी की दस्तक देता है वहाँ एक वर्ग ऊंची इमारतों की बालकनी से बेहिचक नीचे बलगम थूकता है और दूसरा वर्ग अपनी अन्नपूर्णा और फातिमा की अस्मत, रोटी और छत के साए के लिए, दरिंदों के हाथ बेचता है? कौड़ियों के भाव नित्य कुरबान होती कमसिन लड़कियों की अस्मत किस तरह की बलि है? औरत का जिस्म एक घर होता है, जहाँ परिवार जन्मता है, फलता और फूलता है, फिर उसे छत पूरी होने से पहले ही गिराने की कोशिश कैसे बरदाश्त की जाती है?

बेलापुर, अलीपुर, बालीगंज, बहू बाजार, सर्कुलर रोड, धर्मतल्ला, बेहाला... ऊंची-ऊंची इमारतों में रवींद्र संगीत बज रहा होगा. कलकत्ता क्लब में नाट्यकला, शरत् साहित्य और राजनीति पर पुरजोश बहस छिड़ी होगी और दक्षिणेश्वर की सीढ़ियों पर लहलहाते दरिया को देख कोई वीतरागी मोक्ष का इंतजार कर रहा होगा. लेकिन जीने की जुस्तजू में सैकड़ों जिस्म अजनबी वहशी हाथों में नुचने के लिए फड़फड़ाते हुए अंधेरे के क्यू में लगे होंगे. जिस्म की बोटियों को जिन्दगी की प्लेट में सजाकर यह सब किसे पेश किया जा रहा है? कोई तथागत आज तक उनकी जिन्दगी में क्यों नहीं आया? खुद अंचिता का भाई, जिसे अंचिता की रक्षा करनी चाहिए थी, दलाली पर ऐश करता रहा, ऐसा क्यों होता है?

बिजली की तरह सामने आ कर कोई हाथ थाम लेता है. हाथ को झिटक आगे बढ़ता हूँ. गोरी नेपालिन वापस लौट जाती है. पेड़ के पीछे कोई खालिस कलकतिया हँसी-हँसा था... स्साला कंगला. भूखा बंगाली.

सच्चरित्रता चाहे आदमी की हो या औरत की, उसे मुर्गे की गरदन की तरह तोड़ने के लिए हर हाथ बेकरार रहता है. अपनी झूलती खाली जेबों पर हँसना चाहता हूँ. अगर कुछ वज़न होता, तो नेपालिन अभी तक गले से लिपट चुकी होती.

अचानक लगता है कि ठीक जैकिट के दाहिने कंधे पर खुशबू और एक काला घुंघराला बाल अजीब संपदा की तरह चिपका हुआ है. अंचिता की खुशबू और अंचिता का ही बाल!

एस्प्लेनेड पर सड़क सन्नाटे में डूबी हुई है, मानो सुबह से सहे भीड़ के पैरों की थकावट को सहला रही हो. यह रात का सड़किया आराम सोनागाछी की भरी दोपहर की मानिंद है, जहाँ सूरज निकलने के साथ औरतें अँगड़ाई तोड़ती हुई सोने की तैयारी करती हैं, जबकि रातभर उन्होंने जाग-जाग कर कई मरदों को अपना गोश्त नोचने दिया होगा. भद्र परिवार की लड़की जब अपनी आँखों में प्यार और प्यास का पहला सपना संजोती है, सोनागाछी की नाबालिग लड़की दहशत में नहायी अपना कौमार्य किसी अजनबी को सौंप देती है. वह अजनबी उसके सपने को निगल जाता है और जिस्म को रुई की तह धुन कर पैसे थमाकर बाहर निकल जाता है. मंदिर, मस्जिद और गिरजाघर से एक-दूसरे को गालियाँ बकते ‘पगड़ी’, ‘टोपी’ और ‘हैट’ यहाँ बिना हुज्जत कतार में खड़े हो, एक औरत के साथ सो कर सहिष्णुता का परिचय देते हैं. सांप्रदायिक सद् भाव अगर मुल्क के लिए कीमती हैं तो क्यों नहीं पवित्र स्थलों को चकलों में बदल दिया जाए जिससे मुल्क की सबसे भारी परेशानी खत्म हो जाए.

कैसी अजीब बात है. किसी का दिन किसी की रात की तरह है... रोज सड़क पर समाजवाद खड़ा किया जाता है. गरीबी दूर भगायी जाती है और भाई-भाई के नारे बुलन्द होते हैं. सामाजिक असमानता मिटाने की शपथ लिए लोग हाथ में सोने की जंजीर लगी घड़ी पहन विधानसभाओं और संसद में पहुँच, आदमी की गरीबी, बेकारी और औरत की लाचारी को भूल जाते हैं.

दौलत लूटते-बटोरते हाथ मजदूरों को बेकार, सतवंतियों को रंडी और आदमी को कूड़ेदान में रोटी तलाशने वाला कुत्ता बना देते हैं. बैंक या तिजौरियों में छुपा बेहिसाब रुपया वे अपने किस जन्म के सुख बोध के लिए छुपाए हैं.

ऐसा क्यों होता है कि अंचिता सरकार जवान होने के पहले वेश्या बन जाती है. जबकि उसके पड़ोस में रहने वाला हर परिवार नित्य दान-पुण्य करता है. एक-दूसरे की बहन-बेटी को अपनी बहन-बेटी मानने का दावा करता है. फिर यह हम बिस्तर का सम्बन्ध कहाँ से उभर आता है! कहाँ डूब जाती हैं संहिताएँ!

पर यह अंचिता सरकार का किस्सा मारवाड़ियों की गद्दी कलकत्ता का कापीराइट नहीं है, जहाँ धर्म, साहित्य, संस्कृति और क्रांति के मसीहाओं ने जन्म लिया है. यह कहानी न्यूयॉर्क की भी है, जहाँ दौलत ठीकरों की तरह बिखरी पड़ी है और जिससे शहर और हर मुल्क भीख मांगता है. यह किस्सा मुंबई का भी है, जिसे अंग्रेजों ने संवारा था और अब अरब देशवाले निहार रहे हैं. यह किस्सा हांगकांग का भी है, जहाँ दूर-दूर से लोग आ कर व्यापार करते हैं और गैरमुल्की औरतों के स्वाद नोट करते हैं. जितना पैसा देह की तिजारत पर रोज खर्च होता है, अगर उसका आधा भी अच्छे कामों पर लगा दिया जाए तो हर मुल्क में गांधी का सपना साकार हो जाए और मार्क्स की भटकती आत्मा संतोष से तरबतर हो जाए. लेकिन ऐसा कहाँ होता है? लेनिन की क्रांति घुटने टेक जाती है और गांधी का सपना अर्थियों में बाँध निर्यात कर दिया जाता है. हर मुल्क, हर बस्ती और इनसान कमीशन एजेंटों की मुट्ठी में तड़पता रहता है.

अहिंसक कौम के कमीशन एजेंट चर्बी का व्यापार करते हैं. मुल्क के प्रतिनिधि, उद्योगपतियों और तस्करों के कमीशन पर अपने फर्ज की गरदन दबाते हैं. दौलत और औरत की रिश्वत परमिट आसानी से दिलाती है. वक्त अपने इलजामों को नकारता हुआ बेकारी, भूख और बदअमनी की परचियाँ बांटता हुआ नए वैज्ञानिक उपकरणों की बात करता है. गांव-गांव, शहर-शहर आदमी से महानगर की तरफ कूच करने का फरमान बांटती रहती हैं. नसीम जालिम सिंह के साथ, मरियम हसन के साथ और दुर्गावती चार्ली के साथ लेटने के लिए मजबूर हो जाती है. क्यों नहीं फिरकापरस्त लोग उनकी रक्षा के लिए दौड़ते हैं?

हर चौराहे पर परिवार नियोजन के शिविर लगते हैं और नाजायज सम्बन्धों की तरह देश की जनसंख्या बढ़ जाती है. लोग राजघाट पर बंधुत्व की शपथ लेकर सांप्रदायिक दंगे करते हैं. राजनीतिज्ञ नीति को उगालदान में फेंक उद्योगपतियों को कमीशनानुसार शोषण के अख्तियार बांटते हैं और बुद्धिजीवी मार्क्सवाद और सार्त्र पर बहस करते हुए वातानुकूलित रेस्तरां में कॉफ़ी के प्याले निरंतर पीते रहते हैं. योजनाएँ कम्प्यूटर पर गश्त लगाती रहती हैं. विरोधी दल तेज धूप और बाढ़ के तर्क संभाले सरकार को कोसते रहते हैं. केसरिया कपड़े पहने भीख मांगता हुआ फकीर लोगों की भीड़ और तकलीफ को नकार निष्काम हो जाने का नुस्खा वितरित करता रहता है, लेकिन अंचिता की रक्षा के लिए कोई नहीं पहुँचता है.

धर्मतल्ला से मुड़कर आगे बढ़ता हूँ. सड़क पर रात में कितने आराम से चला जा सकता है, जबकि दिन में सड़क पार करना भी पहाड़ लांधने से ज्यादा भारी हो जाता है. पुल से हुगली एक निरंतर बढ़ती हुई श्वेत चादर लगती है. रोशनी से नहाते-जगमगाते स्टीमर उस चादर पर कढ़े बेल-बूटे से नजर आते हैं. हावड़ा स्टेशन इस समय भी पूरी तरह से जगमगा रहा था. जैसे आदमी की ईमानदारी और नारी की अस्मिता जीत कर जश्न मना रहा हो. बिजली के इंजिन एक के बाद एक धड़ाधड़ करते चल और रुक रहे थे.

अचानक खयाल आता है कि दाहिने कंधे पर अंचिता की खुशबू और काला केश अब भी विराजमान है. हावड़ा ब्रिज से उतर हुगली के साथ चलते हुए एक बड़े-से पत्थर पर बैठ जाता हूँ. आहिस्ता से बाल को अपने हाथ में ले लेता हूँ. जानता हूँ कि अगर इसे एक डिबिया में बन्द कर वातानुकूलित कमरे में रख दूं तो मुद्दतों तक यह बाल काला बना रहेगा जबकि इसके रंग की मियाद अंचिता के सिर पर हद-से-हद सात-आठ साल होती, लेकिन तब यह बाल जैकिट के कंधे पर नहीं आता और एक दास्तान अधूरी रह जाती.

पास ही पड़े एक कागज़ को उठा उसकी एक तह में बाल को रख होम्योपैथी की दवाओं जैसी पुड़िया बनाते हुए अन्दर की जेब में रख लेता हूँ. महसूस होता है कि बाल एक सनसनीखेज खबर की तरह मेरी बगल गुदगुदा रहा है, जिसे कहानी की सतहों में समा कर अचानक ही अमर हो सकता हूँ. उस कहानी का फिर दुनियाभर की भाषाओं में अनुवाद छपेगा और लोग मुझे गोर्की, मोपासां, क्यूरिन या सार्त्र बना डालेंगे.

लेकिन मेरी उन्मादित कल्पना को कंधे से चिपकी अंचिता की गंध अचानक ही ताली बजा कर तोड़ देती है. कोई कहता है कि यह गंध, अंचिता और यह दुनिया फ़ानी है. हुगली की तेज धारा को नकारता कोई मांझी ऊंचे स्वर से गा रहा था. हुगली पर अनगिनत स्टीमर जगमगा रहे थे और सैकड़ों पाल लगी नौकाएँ टिमटिमा रही थीं. जानता हूँ कि इन सब में किराए की लड़कियों को आगोश में दबाए लोग अपनी अहिंसक भूख शांत कर रहे होंगे. मोटे-तगड़े रूहानी और रोमानी डायलॉग अवतरित हो रहे होंगे और चुइंगम की तरह चूसी जा रही नाबालिग या खायी-खेली औरतें हर करवट में पापड़ की तरह चटख कर टूट रही होंगी. एक भी नाव में कोई दाऊद नहीं होगा, जो औरत को कुरान की तरह पढ़ सके और न ही कोई स्वामी रामकृष्ण होगा जो औरत को देवी की तरह पूज सके.

शायद किसी एक नाव में अंचिता भी हो, जो अस्मिता के दर्द को भूल पुरूष को लूटने के फेर में माहिर हो चुकी है. लूट-दर-लूट... सिलसिला रोज मांझी के गीतों के साथ हुगली पर बहता रहता है. एक तरफ दक्षिणेश्वर और दूसरी तरफ बेलूर, मंत्रों के मध्य अपने ब्रह्मचर्य को जिस्मानी अजीर्ण से बचाने के लिए बंद किए रहते हैं. मां...मां... ! एक आवाज साहिल पर विकलता से गूंजती मंडराती है. लोग सुन कर कहते हैं... यह कौन पागल है?

एक अंग्रेज़ी कहावत याद आती है- पैसे से बिस्तर खरीद सकते हो, नींद नहीं. दवा खरीद सकते हो, स्वास्थ्य नहीं. कृत्रिमता खरीद सकते हो, नैसर्गिकता नहीं. और धर्म खरीद सकते हो, मोक्ष नहीं. किन्तु पैसे की अपाहिज शक्ति प्राप्त करने में सिर से पाँव तक डूबा आदमी कुछ देख ही नहीं पा रहा है.

पर इस अंचिता की गंध को लेकर क्या करूं? सम्बन्ध की हर संधि के टूट जाने के बाद भी अवशेष अलग नहीं होते हैं. मृत शिशुओं को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है. मरे ही क्यों, नाजायज और बेजरूरत औलादों को जिन्दा भी फेंक दिया जाता है. मछुआरे वहीं जाल डालते हैं. कचरे की तरह निकल आए शिशु और उसके अंगों को किनारे पर उछाल देते हैं – चील, कौओं के लिए ये अवशेष मिटते नहीं हैं. हटते हैं तो दूसरे उभर आते हैं. ठीक अंचिता की याद की तरह, उसकी गंध और केश की तरह पूरा कलकत्ता ही इन अवशेषों का ठाकुरद्वारा लगता है.

अंचिता की गंध से जुड़ा मेरा अतीत भी तो वैसा ही एक भग्न कलकत्ता है... यथार्थवादी फिल्म बनाने का भूत सवार था. लोग कहते, बनर्जी का माथा बिगड़ गया है, चौबीस साल का लौंडा क्या फिल्म बनाएगा? पर मैं दृढ़ था, कलकत्ता के दर्द को घृणा की सेल्युलाइड पर उतार कर एक बारगी ही अमर जो हो जाना चाहता था. नरक की मुजस्सिम तस्वीर को दिखाकर आदमी की ईंट-दर-ईंट जमी पुश्तैनी विश्वास की दीवार को हिला देना चाहता था. दुनिया को दिखाना चाहता था कि सत्यजित रे की फिल्म तो बंगाल की औरत का एक टुकड़ा इतिहास भर पेश करती है. दर्द वह है जिसकी शहतीर हर दिल में छत से टूट कर लटकी रहती है... जिगर पर चुभती रहती है.

अंचिता की वेश्या में एक अलग नारी सुलभ सौंदर्य भी था. निर्देशक होकर भी उसके साथ दो क्षण का एकांत जुटाने की कोशिश करता. एक दिन सकुचाते हुए उसने अपना पता बता दिया था, पर कहा था, ‘दिन में ही आना बनर्जी मोशाय.’

सोचा था कि फिल्म रिलीज होते ही अंचिता से मिलूंगा, पर फिल्म को सेंसर बोर्ड ने पास ही नहीं किया – ‘यह क्या है बनर्जी! क्या कलकत्ता में सिर्फ रंडियाँ हैं और... ?’ बहुत कोशिश की, पर फिल्म पास नहीं हुई. होती भी कैसे? सरकारी कुर्सी पर पहुँचते ही साहित्यकार, कलाकार या अभिनेता ब्यूरोक्रेट की आत्मा को भी अपने अंदर धारण कर लेता है. तब उसके मूल्यांकन के नजरिए बदल जाते हैं. वह मंत्री जी के साथ अपनी हंसी और आक्रोश को सिंक्रोनाइज़ करने में खुद को खत्म कर लेता है. लोग हंसते – अब कौन बनाएगा भोगे हुए यथार्थ पर फ़िल्म! टीन का बक्सा सलीब की तरह पीठ पर लाद कर घूमों बनर्जी मोशाय और बेचो बंगाली मिठाई. क्रांति खत्म! अब जीओ भ्रांति में.

मकान गया... पैसा गया. किराए के सीलन भरे कमरे में कहानियाँ लिखीं, पर उससे होता क्या! तब नंदी ने फटकारा – अच्छा साहित्य क्या है बनर्जी! अमर होने की श्लाधा भर ही तो है. नाम... नाम! पर क्या होगा नाम का, अगर लेखक अपनी उम्र भी न जी पाए. ईसू की कुरबानी, हसन का धर्मयुद्ध, हिन्दुओं के अवतार और मानव क्रांतियाँ आदमी को कहाँ पहुँचा गयी हैं? हर बहस, हर परिवर्तन एक अहंकार का प्रतीक ही तो बनकर रह गया है. तुम जिन्दा रहने की कोशिश के मध्य अमर होने की कोशिश भी जारी रख सकते हो, वैसे रवींद्र हो या प्रेमचंद, उनका साहित्य भी निर्यात होकर ही स्थापित हुआ है.

नंदी ने ही घोषाल प्रकाशन से बात करायी थी और छद्म नामों से छपने लगे उपन्यास. सांवला नमकीन जिस्म, तरसते सपने, लरजते होंठ...! एक किताब का मिलता पूरा एक हजार! एक माह जीने का अवसर... इस बीच एक यथार्थवादी कहानी रचता, पैसा खत्म होते ही लिखता जिस्म का तेजाब. उस किताब में स्फटिक की एक औरत मढ़ कर हथौड़े से खील-खील कर देता, पर लोग औरत को निगल जाते और उसके दर्द को थूक देते.

अनजाने ही एक साम अंचिता के घर पहुँच गया. चौंक गई थी अंचिता. मैं भी चौंका था, घर की सजावट देख कर. खूब गहरा मेकअप था अंचिता का. एक कमरे-रसोई की चाल का मकान. पर डबल बेड आरामदेह था. अपनी स्थिति पर रो पड़ी थी अंचिता. छोटी-सी थी उसकी कहानी.

जिस दिन बाप को फांसी हुई थी, उस दिन पूरे चौदह साल पूरे किए थे उसने. अब बाब की बरसी और उसका जन्मदिन निरन्तर एक ही दिन पड़ता है. मुंशी थे उसके पिता. एक नाबालिग लड़की को सेठ के बलात्कार से बचाने के प्रयत्न में हत्या कर बैठे. पर वह नाबालिग लड़की अदालत में गवाही भी देने नहीं पहुँची. कैसे पहुँचती? भद्र लोगों के लिए इज्जत ही तो सबसे बड़ी चीज है. जिस वक्त फांसी का वक्त हुआ, मां उसे और भाई राखाल को लेकर ऊपर छत पर जा खड़ी हुई थी – ‘इधर से ही गुजरेगी आत्मा!’ लाश लेने के लिए भी कोई नहीं गया. कफ़न और संस्कार का खर्चा कहाँ से आता? मां हर रोज पिता की आत्मा से बात करती और नीचे उतर घर का एक सामान बाजार में बेच, चावल का जुगाड़ करती. घर का अंतिम बरतन भी बेच छतपर चढ़ी तो उतरी नहीं. सीधे सड़क पर गिरी. उतरकर बेचने के लिए बचा ही क्या था? तब अंचिता पंद्रह वर्ष की थी. घर में फर्श और चार खाली बोतलें बची थीं. राखाल तब खाली बोतलें ले कर बाजार गया. पूरा एक साल छोटा था राखाल. लौटा तो हाथ में भात और झोल की दो प्लेटें थी. झपट पड़ी थी अंचिता, भूल गई थी मां का दुःख. तब राखाल बोला था, ‘कबाड़िया आएगा रात को, सब इंतजाम कर देगा.’

उस रात पाँच रुपए की दो राइस प्लेटों की एवज में अंचिता का कौमार्य कबाड़ी के हाथ बिक गया था और राखाल अब बहन की अस्मत को रोटी की सीढ़ी बना ऐश के आकाश छूना चाहता है.

कहानी खत्म होने को ही थी कि राखाल आ गया. साथ में एक खूसट-सा आदमी था. बत्ती जला काली के चित्र को थोड़ी देर पहले ही अंचिता ने प्रणाम किया था. अंचिता ने उस दिन टालना चाहा था, इसलिए कहा था, ‘आज मेरी देह ठीक नहीं है. आज नहीं होगा कुछ.’

फिल्मी विलेन की तरह हँसा था राखाल, ‘सब गया अंचिता दी! बनर्जी मोशाय की फिलिम इलिम ठप्प? बनर्जी मोशाय अब खोखला है, तू धंधा कर. अंचिता तन गई थी तो उसने सीधे हाथ से गाल पर वाल किया था. उठ कर मैं बाहर आ गया, लगा था कि भोगा हुआ यथार्थ और लिखा जाने वाला यथार्थ दो अलग चीजें हैं. खुद को सिर से पाँव तक नपुंसक महसूस किया था.’

एक अरसे के बाद अंचिता विक्टोरिया पर अचानक ही मिली थी. सुरमई कार से उतरी थी. खूब सजी-संवरी, मुक्त हास्य से भरी. आकर बगल में बैठ गई थी. उस दिन की अपनी असमर्थता कराह उठी थी मुझमें, पूछा था – ‘कैसी हो?’

वह हँसी थी, फिर हाथ अपनी हथेली में ले बोली, ‘मुक्त! एकदम आजाद!’ मुझे लगा कि मुक्ति का अहसास एक रहस्त है, पूछा था, ‘समझा नहीं?’

हाथ को अजीब अंदाज में गरदन के पास ला कर बोली थी, ‘खिस्स! खत्म! किस्सा खत्म बनर्जी मोशाय!’ उसके अंदाज में बंबइया फिल्मी विलेन बोल रहा था. फिर खिलखिला कर फुसफुसाई थी, ‘कत्ल करा दिया उसका... अरे उसी दलाल राखाल का. मजीद ने उसे चाकू मार हुगली पहुँचाने की व्यवस्था की थी. तभी बूढ़े कबाड़ी को इशारा कर पुलिस बुलवा दी. दलाल भी गया और उसका कातिल भी.’

मैं सिहर उठा, ‘भाई का कत्ल करा दिया तुमने!’ फिर सोचता गया – कैसा भाई! जो अपनी बहन का कौमार्य बूढ़े कबाड़ी को बेच पेट भरे और ऐश करने उसे पेशा करने के लिए मजबूर करे. वह भाई कहाँ? अपनी बहन की बोटियाँ, जो कसाई को पेश करे, वह भाई कहां?

एक उन्मुक्त कल्पना में मेरे कंधे पर सिर टिका विभोर हो आकाश निरख रही थी अंचिता. आकाश में सूरज पूरी तरह नहीं डूबा था. फव्वारे चल रहे थे और हवा के साथ उड़ते हुए पानी के छींटे अंचिता को गुदगुदा रहे थे. बहुत देर तक सोचता रहा अंचिता की मानसिकता पर... रोटी के लिए जिस्मफरोशी... वहाँ भी शोषण... उस शोषण से मुक्ति के लिए कत्ल! कितना कुछ गुजर गया है बाईस साल की अंचिता के जीवन से! औरत का खुशबू और कुरबानी से लबरेज कौमार्य टूट कर कैसा नागफनी बन जाता है.

जाग उठी थी अंचिता, गंध और केश जैकिट पर जड़े रह गए थे. उठते हुए पूछा था अंचिता ने, ‘आओगे बनर्जी मोशाय.’ मानों कहना चाहती हो कि अब कोई रुकावट नहीं है.

देखता रहता हूं... मासूम वेश्या का कत्ल से गुजरा चेहरा.

‘जानती हूँ, नहीं आओगे, पर मेरी कहानी जरूर लिखना.’ फिर एक भाषण दे डाला था, ‘अंचिता एक औरत नहीं है बनर्जी मोशाय! एक इतिहास है वक्त का!’

अंचिता चली गई और मैं सोचता रहा... औरत. अंचिता जैसी औरत वाकई एक इतिहास है. एक देश, जिसको अपने ही देशवाले तस्करी, लूट, मिलावट और झगड़ों का अड्डा बनाते हैं. बाहर वाले जिस पर हमला कर नेस्तनाबूद कर देना चाहते हैं.

मुझे लगा कि सआदत हसन मंटो और क्यूपरिन ने कितनी व्यथा झेल कर उस औरत का इतिहास लिखा होगा अपनी कलम से, ‘काली शलवार’ हो या ‘यामा दी हैल होल’ .. शब्द-शब्द दर्द के करीब हैं. पर इस इतिहास को लिख कर न तो किसी ने पहले बदला और अब भी कोई क्या बदलेगा? आदमी राक्षस, जानवर और जोंक बन चुका है. उस पर दूसरों के दर्द का असर नहीं होता है. दूसरे के खून के छींटे और पान की पीक अप दो अलग तहजीबें नहीं हैं उसके लिए. लगता है कि आध्यात्म, समाजवाद या सामंजस्यवाद सब धोखा हैं... किसी की लुटती अस्मत बचाने अब कृष्ण क्यों नहीं आते? सतवंती के श्राप पर मुर्दाखोर आदमी पत्थर क्यों नहीं बन जाते? क्रांति की नदियाँ केवल भ्रांति के सिंधु में क्यों आदमी को छोड़ देती हैं कि जुलूस, नारे लगाते हुए निकल जाते हैं और भिखारी का कटोरा भी खो जाता है.

तंद्रा टूटती है. स्टीमर ने सायरन दिया था या दक्षिणेश्वर के तट पर कोई चिल्लाया था माँ...माँ... तू कहाँ है... ? स्टेशन के बाहर कोलाहल उठा था. कोई किसी मुसाफिर की पोटली ले कर भाग गया था.

बाल को कागज से निकाल चुटकी में पकड़ नाक की सीध में लगाता हूं. बाल पेंडुलम की डोरी की तरह हिलता है. उसमें से काजल की अनेक देह निकल-निकल कर फूटने लगती हैं... हर देह नाबदान, पीकदान, कूड़ेदान और मन्दिर से गुजरते नाले की शक्ल अख्तियार कर लेती हैं, जिनमें सैकड़ों गले हुए अंग तैरते रहते हैं.

घबरा कर बाल को उछाल देता हूँ. हवा में उड़ता हुआ बाल हुगली के वक्ष पर गिर कर अदृश्य हो जाता है. पीठ को पीछे से थपथपाता अँधेरा कहता है – भूल जा बाल को! अंचिता के मुक्तिबोध से भी खुद को मुक्त कर ले.

तभी अचानक कोई जगमगाता स्टीमर चीख उठता है और हुगली के किनारों पर कोई चिल्लाता हुआ दौड़ता है... माँ...माँ... कहाँ हो तुम! पूरा शहर मुझे दलाल और कमीशन एजेंटों की मुट्ठी में फड़फड़ाता लगता है, जिससे भयभीत हो सूरज, चाँद और तारे दूर चले गए थे. अन्यथा वे उनका भी पेटेंट हासिल कर किरण-किरण का मूल्य मांगते.

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रचनाकार – विजय की अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें –
http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_22.html


कलाकृति - रेखा

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