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हद तो है कि गुस्से में प्यार भी आए...




तरह – लफ़्ज 1 जून से 31 अगस्त 2006

लफ़्ज – हास्य-व्यंग्य और ग़ज़लों की त्रैमासिक पत्रिका ने अपने 1 जून – 31 अगस्त के अंक में ‘समस्यापूर्ति कविता’ की तरह ग़ज़लों के रुप में समस्यापूर्ति ‘तरह’ पेश किया है.

इसमें किसी शायर के शेर की एक पंक्ति को आधार बनाकर उसमें शेर कहना होता है. ये ग़ज़ल कहने की पुरानी परंपरा है.

इस दफ़ा कानपुर के शायर जावेद अकरम की ग़ज़लों में से निम्न तीन मिसरे दिए गए हैं :-

1 बीमार से मिलने कोई बीमार भी आए

2 तब लगा सर पे आसमान भी था

3 हिल गई तनहाई की बुनियाद क्या


इनको ही आधार बनाकर आपको तीन ग़ज़लें लिखनी हैं. आपकी लिखी ग़ज़लें 31 जुलाई 2006 तक निम्न पते पर पहुँच जानी चाहिएँ-

संपादक लफ़्ज,
तरह – 1 जून-31अगस्त
फ्लैट नं 25, मानवस्थली एपार्टमेंट
वसुन्धरा एन्क्लेव, दिल्ली - 110096

इन्हीं तीन पंक्तियों को आधार बनाकर रवि द्वारा लिखी गई ग़ज़लें :-
ग़ज़ल 1


बीमार से मिलने कोई बीमार भी आये
हद तो है कि गुस्से में प्यार भी आये

सदियों से यही तो गिला करते रहे हैं
गुलाबों के साथ क्यों खार भी आये

सोचा तो था सिर्फ दरवाजे खिड़कियाँ
घर के साथ जरूरी में दीवार भी आये

मेरे शहर की प्रगति का कुछ हाल है
हवाओं के साथ धूल के हार भी आये

अपने अंदर तो झांका नहीं मूर्ख रवि
और वेटिकन-काबे में पुकार भी आये

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ग़ज़ल 2


बारिश की बूंदें थीं किसान भी था
तब लगा सर पे आसमान भी था

दीवाने के हुलिए से ही हासिल है
कभी उसका कुछ अरमान भी था

एकलव्यों ने हाथ कटवा लिए हैं
होगा क्या जो तीर कमान भी था

मेरे देश का क़ानून है कहीं फ़रार
इसका पहले से अनुमान भी था

रवि तो हो गया है बाइज़्ज़त बरी
यद्यपि गवाह था बयान भी था

ग़ज़ल 3


हिल गई तनहाई की बुनियाद क्या
सोंधी मकई का आया स्वाद क्या

एस्केलेटर से चढ़ते हुए कभी आई
बबूल के कांटे की चुभन याद क्या

गिले तो हजारों हजार हैं तुम्हारे
किया तुमने कभी कोई नाद क्या

दिए जला के रख दिए हैं चहुँओर
सुनी है आँधियों की फ़रियाद क्या

राजनीति में पनप पाया भ्रष्ट रवि
फिर इसमें वाद और विवाद क्या

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