आलेख: बस्तर का भविष्य...

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-शुभ्रांशु चौधरी आज से तीन साल पहले बस्तर में नक्सलियों के साथ कुछ दिन बिताने का मौका मिला था । तब मैं बीबीसी के लिये एक फिल्म बना रहा था ...


-शुभ्रांशु चौधरी

आज से तीन साल पहले बस्तर में नक्सलियों के साथ कुछ दिन बिताने का मौका मिला था । तब मैं बीबीसी के लिये एक फिल्म बना रहा था । उन 7 दिनों के अनुभव पर मैंने कुछ लेख लिखे थे । हिन्दू के रविवारीय अंक में मैंने लिखा था " यदि एक 10 हजार की रैली के बारे में पुलिस को कानोंकान खबर नहीं मिलती है तो नक्सलियों के काम की उपेक्षा करना तो मूर्खता होगी पर उनका भविष्य तब तक ही है जब तक भारत सरकार सेना भेजने का फैसला नहीं करती है" ।

बीबीसी में मेरे एक वरिष्ठ साथी जो फौज़ के अफसर भी रह चुके हैं उन्होंने कहा था" तुम कश्मीर में कुछ समय बिताकर भारतीय फौज़ से काफी ज़्यादा प्रभावित हो । तुम भारतीय फौज़ की कमियां नहीं जानते और तुम्हारा आकलन गलत है" ।

मेरे कुछ कम्युनिस्ट मित्रों ने टिप्पणी की थी " हम तुम्हारे आकलन से सहमत हैं । भारत नेपाल नहीं है" ।

मैंने दैनिक भास्कर में एक और लेख लिखा । उसमें लिखा "पिछले 50 सालों में हमारी प्रजातांत्रिक सरकारों ने बस्तर के आदिवासियों को लूटने के सिवा कुछ नहीं किया । अब नक्सलियों के कारण वे वहां कुछ करना चाहते हैं पर नक्सलियों का लाल किले में लाल झंडा फहराने का दिवास्वप्न उनके अगले कुछ साल भी बरबाद करेगा" ।

कुछ दिन बाद मेरे पास एक फोन आया । आवाज़ पहचानी हुई नहीं थी । दूसरी ओर से आवाज़ ने कहा " आपने लिखा है हम दिवास्वप्न देखते हैं" ? मैं समझ गया कि दूसरी ओर कौन है । मैंने कहा " जी हां मैंने वैसा ही समझा है मुझे लगता है कि यदि आप आदिवासियों के लिये लड़ रहे हैं तो आपको अब बातचीत करके उनके लिये कुछ हासिल करना चाहिये"। दूसरी ओर से आवाज़ ने कहा " आपके हिन्दू के लेख को आंध्रप्रदेश की सरकार ट्रांसलेट करवाकर फोटोकापी गांवों में बंटवा रही है कि बीबीसी कहता है कि हमारा कोई भविष्य नहीं है" । मैंने कहा " क्या आप मुझे धमकी दे रहे हैं ? " आवाज़ ने तुरत अपना सुर बदला " नहीं हम समझते हैं कि आपको हमारा पक्ष समझाने की जरूरत है आपका ब्रेन वाश किया जा रहा है" । मैंने कहा "सभी का पक्ष समझना ही हमारा पेशा है इसलिये मैं आपकी बात भी सुनना चाहूंगा" । पर उसके बाद कोई फोन नहीं आया ।


पिछले महीने एक बार फिर बीबीसी रेडियो ने मुझसे नक्सलियों पर कार्यक्रम बनाने का आग्रह किया । मैंने सूत्रों के माध्यम से खबर भिजवाने की कोशिश की कि फलां दिनों में मैं छत्तीसगढ में रहूंगा और उनसे मिलने की मेरी इच्छा रहेगी ।

इसी कार्यक्रम के सिलसिले में मैं पहले समाजशास्त्री योगेन्द्र यादव से मिला । उन्होंने कहा " नक्सलियों की माइंडलेस हिंसा को देखकर मुझे कभी कभी लगता है कि किसी भी कीमत पर पहले इनको खत्म करना चाहिये । पर छत्तीसगढ में हिंसा को खत्म करने के नाम पर जो भी हो रहा है वह गलत है" ।

मेरे एक मित्र जो बस्तर की सीमा पर रहते हैं । उनके सामाजिक सरोकारों के कारण मैं उनकी बडी इज़्ज़त करता हूं और बस्तर जाने के रास्ते जब उनसे मिला उन्होंने कहा " मैं ऐसे किसी भी काम का समर्थक नहीं हूं जिससे नक्सलियों को किसी भी तरह से मदद मिलती हो । इसलिये मैं सलवा जुडुम पर भेजे जा रहे जांच दलों के भी खिलाफ हूं" । हमारी खबर "अन्दर तक" पहुंच गयी थी और हमें गुप्त तरीके से एक बार फिर "अन्दर" ले जाया गया।


पिछली बार हमें 4 दिन पैदल चलना पडा था । इस बार जीप से उतरते ही हरी वर्दी वाले दिखने लगे । मुझे लगा " क्या इनका साहस बढ रहा है ? " सब कुछ पिछ्ली बार की ही तरह था । वही लाल सलाम कहता हुआ स्वागत । पेड के नीचे का प्लास्टिक की शीट वाला कैम्प । तीन पत्थर लगाकर चूल्हा । दाल और चावल का खाना । सुबह की ड्रिल । बन्दूकें अभी भी .303, कम से कम हमें जो दिख रहा है । कमाण्डर के पास ए के मशीनगन । वही आदिवासी महिलाओं की बहुतायत और आंध्र का लीडरशिप । इस बार भी लोगों की बैठक बुलाई गई ।

बैठक छोटी थी पर पता लगाना मुश्किल कि लोग अपनी मर्ज़ी से आए या बन्दूक के डर से । पर इतना समझ में आया कि जनता के साथ नक्सली चेतना नाट्य मंच का जबरदस्त तालमेल है । वे जनता को हंसाते हैं । प्रत्येक नृत्य और गीत के पहले और बाद में उनको समझाते हैं, कि वे क्या गाने जा रहे हैं और नृत्य खत्म होने के बाद जनता से सवाल पूछते हैं । जनता जवाब देती है। नक्सल सेना में शामिल कई युवा आदिवासियों ने मुझे बताया " चेतना नाट्य मंच का कर्यक्रम देखकर हम इतने आकर्षित थे कि हमें बस इंतजार था कि कब हम बडे हो जाएं और पार्टी में शामिल हो जाएं" ।

उनमें से कई ने कहा " हम अन्याय के खिलाफ लडने के लिये आए हैं" । पर मुझे यह समझ में नहीं आया कि इन्हें कितनी समझ है और क्या सचमुच इन्हें मालूम है कि ये क्या कर रहे हैं ?

रात में कमाण्डर साहब से चर्चा हुई । मैंने उनसे पूछा "तेलंगाना, नक्सलबाडी, श्रीकाकुलम सब असफल रहे इस बार कहानी कुछ अलग क्यों होगी ? उन्होंने कहा " हमने अपनी भूलों से सीख ली है । तेलंगाना, नक्सलबाडी,श्रीकाकुलम इसलिये असफल रहे क्योंकि वे एक ही क्षेत्र में सीमित थे । इस बार शुरु से ही हम अलग अलग इलाकों में फैल गये । हम लोग 80 के दशक में दण्डकारण्य में 45 लोग आए थे, उसमें से 10 ही बचे हैं पर आज हमारे साथ 1500 हथियारबंद साथी हैं और लाखों करोडो आदिवासी जनता" । मेरा दूसरा प्रश्न था " कुछ आदिवासी आपके साथ है पर गैर आदिवासी आपको आतंकवादी और समाजविरोधी मानते हैं और किसी भी कीमत पर आपका खात्मा चाहते हैं । ऐसी सूरत पर आपका लाल किले में लाल झंडा फहराने का सपना दिवास्वप्न ही लगता है" । "जी हां, हमारे कैडरों में 95% आदिवासी हैं और गैर आदिवासियों के बीच काम न करना हमारी भूल रही है । हमारी पिछली पार्टी कांग्रेस ने इस भूल को समझा है और अब हम शहरी क्षेत्रों में भी काम कर रहे हैं" ।

मैंने पूछा " आप लोगों ने दूसरी ओर से बढी हिंसा के बदले जो माइंडलेस हत्या की शुरुआत की है उसकी इज़ाज़त आपको कौन देता है " ? "हत्याओं का सारा फैसला जन अदालत करती है । और हमसे कुछ भूलें हुई हैं । और हम पीडित परिवारों के साथ काम करने की कोशिश कर रहे हैं । सरकार की तरह हम उन्हें लाखों रूपए तो नहीं दे सकते पर हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हमारी भूल से अनाथ हुये परिवार की रोज़ी रोटी चलती रहे" ।

अब जन अदालत मैंने तो देखी नहीं पर लौटने के बाद जनसत्ता के पत्रकार पुष्पराज का एक लेख पढने को मिला । पुष्पराज ने लिखा है " हमारे सामने हुये जन अदालत में सारा फैसला बंदूकधारियों ने ही किया"। पिछले हफ्ते पुलिस ने दंतेवाडा में नक्सलियों की एक बैठक में हमला कर 10 नक्सलियों को मार डाला । यह बताता है कि पुलिस को अब स्थानीय नाराज़ लोगों से खबरें मिलने लगी हैं ।

मामला जटिल है और इस तरह की पैराशूट पत्रकारिता से सारा सच जान लेने की आशा करना गलत होगा पर यह तो सत्य है कि आगे आने वाले कुछ साल बस्तर की जनता के लिये भयावह होंगे ।

(छत्तीसगढ़ नेट से साभार)

रचनाकार – सुभ्रांशु चौधरी. स्वतंत्र पत्रकार तथा जाने माने स्तम्भ लेखक हैं आपके लिखे अन्य आलेख आपके निम्न जाल स्थलों पर पढ़ सकते हैं-
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