समीक्षा लेख: रोज़ इस शहर में हुक्म नया होता है

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सुरेश पंडित दीवाने सराय02: सं : रविकान्त, संजय शर्मा, सराय-विकासशील समाज अध्ययन पीठ तथा वाणी प्रकाशन द पास्ट इज ए फॉरिन कंट्री में डेविड ...

सुरेश पंडित

दीवाने सराय02: सं : रविकान्त, संजय शर्मा, सराय-विकासशील समाज अध्ययन पीठ तथा वाणी प्रकाशन

द पास्ट इज ए फॉरिन कंट्री में डेविड लावेन्थल लिखते हैं 'जब हम एक बार यह जान जाते है कि पुरावशेष' इतिहास और स्मृतियां निरंतर बदलती रहती हैं तो हम अतीत की कैद से बाहर आ जाते हैं। हम किसी पवित्र मूल रूप की निरर्थक चाह में हताश नहीं होते हैं। इसलिए हमें ठीकरों को भी उतनी ही अहमियत देनी चाहिए जितनी हम अपनी विरासत की सचाई को देते हैं। अस्तित्व में आई कोई भी चीज अनछुई नहीं रहती और कोई भी ज्ञात तथ्य कभी अपरिवर्तनीय नहीं रहता। मगर इन तथ्यों से हमें दुखी नहीं होना चाहिए बल्कि मुक्ति की ओर बढ़ना चाहिए। इस बात को महसूस कर लेना बेहतर है कि हमारा अतीत सदा परिवर्तनशील रहा है बामुकाबले इसके कि हम उसे हमेशा, हर हाल में यकसां साबित करने की कोशिश करते रहे।' अतीत के बारे में यह वैज्ञानिक दृष्टि जहां एक ओर पुनरोत्थानवाद की संभावनाओं पर पर्दा डालती है वहीं उन धार्मिक कट्टपंथियों की सोच के खोखलेपन को भी उजागर करती हैं जो रामराज्य या सतयुग फिर से इस वसुंधरा पर लाने के झांसे देकर लोगों को मूर्ख बनाते हैं और अपने स्वार्थ साधते हैं। जिस तरह गया समय फिर लौट कर नहीं आता उसी तरह अतीत की पुनरावृत्ति भी कभी संभव नहीं होती। पहले हम प्रकृति की गोद में बसे गांवों में रहते थे। गांव कस्बों में बदले। कस्बे नगरों में। अब नगर महानगर और महानगर मेट्रो-कोस्मो बनने की राह पर हैं। प्रकृति और मनुष्य की तरह नगर भी बदल रहे हैं। गांवों से नगरों की ओर बढ़ी आ रही भीड़ बहुत कुछ अपने पीछे छोड़ती आ रही है लेकिन जो कुछ साथ ला रही है उसका भी बड़ा हिस्सा शहरों में अपने आपको समायोजित करने के लिए उसे त्यागना पड़ा रहा है। इस के बावजूद उसके पास कुछ ऐसा भी है जो शहरों की संस्कृति को, उनके भौतिक स्वरूप को बदल रहा है। गत सदी के आखिरी दशक की शुरूआत से इस परिवर्तन चक्र का घूमाव तेज से तेजतर होता गया है।

शहर में नित्य प्रति हो रहे बदलाव की एक विशेषता यह है कि वह तेज होते हुए भी इतना सूक्ष्म होता है कि यकायक दिखाई नहीं देता। इसमें जहां सर्वत्र एकरूपता देखी जा सकती है वहीं इसकी अपनी पहचान भी धूमिल होती दिखाई नहीं देती। अर्थात् दिल्ली जिस तरह के विकास की ओर अग्रसर है उसी ओर बेंगलूर, हैदराबाद या चेन्नई भी बढ़ रहे हैं। इस पर भी वे अपनी पहचान को भी शहरी लोग देख नहीं पाते। यह अध्ययन इसलिए अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कई दशक तक हम गांव के प्रति इतने मोहासक्त थे और यह कहते गर्वस्फीत होते रहते थे कि भारत माता ग्रामवासिनी है और देश की 80 प्रतिशत जनता गांवों में बसती है। हमारी संस्कृति ग्राम प्रधान है। परंतु अब उस ग्राम-मोह से मुक्ति लेकर हमें स्वीकारना होगा कि शहर हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गया हैं। क्योंकि खेती से अब सकल घरेलू उत्पाद का केवल 25 प्रतिशत ही आता है जब कि 60 प्रतिशत लोग उस पर निर्भर बताये जाते हैं। गांवों की पूरी या आधी बेरोजगारी अपना पेट पालने के लिए शहरों का मुंह ताकती है। शहरी सीमाओं के लाल डोरे हम रोज आगे और आगे खिसकते जाते हैं।
हाल ही में प्रकाशित हिन्दी का मौखिक इतिहास के पन्ने पलटें तो पता लगता है कि हिन्दी के तमाम अड्डों, मिलन केंद्रों के विवरण शहरों से संबद्ध हैं। यह शहरनामा शहर के नज़रिये से समाज को देखने की एक कोशिश है। इसमें शहर का वह इतिहास है जिसने समाज को वर्तमान अवस्था तक पहुंचाया है।यह इतिहास यहां के स्थापत्य, किंवदंतियों और स्मृतियों के स्म्मिश्रण से निर्मित हुआ है। बानगी के बतौर जहां दिल्ली को अहम मिला है वहीं बनारस, पटना, इलाहाबाद, कोलकाता पर भी भरपूर डाली गई है। विश्व-ग्राम की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए नाइजीरिया के कानो और चीन के बेजिंग जैसे शहरों को भी शामिल कर लिया गया है। इन शहरों में होने वाले मेलों, तीज त्यौहारों, धार्मिक अनुष्ठानों, साप्ताहिक हाट-बाज़ारों, ऐतिहासिक सरायों, सेक्स के नव्यतर प्रयोगो, गालियों की उपयोगिताओं, गुप्त रोगों की बनावटी विभीषिकाओं जैसे गोपनीय/अगोपनीय परिप्रेक्ष्यों को काफी मेहनत व ईमानदारी से जांच कर सामने रखा गया है।

यों तो इस दीवान का आरंभ कोलकाता से होता है पर दिल्ली से संबोधित सामग्री की बहुतायत है। दिल्ली की एक सुव्यवस्थित शहर के रूप में तलाश गालिब की शेरो-शायरी से होती है। गालिब को भी अपने ज़माने के शहर से कुछ उसी तरह के शिकवे-शिकायतें थी जिस तरह की अक्सर आज भी लोग करते सुनाई देते हैं। उनकी अपनी औकात इस शहर में क्या है, गालिब कुछ इस तरह बयान करते हैं: 'हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता वगरना शहर में गालिब की आबरू क्या हैं। बादशाह की तारीफ ही उसे थोड़ा बहुत रुतबा बख्शती है, अगर वह न करे तो शहर उसे दो कौड़ी की इज्जत भी अता करने को तैयार नहीं होता। शहर रोज अपना रंगरूप बदलता है। गालिब हैरान हैं आखिर ऐसा क्यों होता है-'रोज इस शहर में हुक्म नया होता है। कुछ समझ में नहीं आता कि क्यो होता है। वह दिल्ली के साथ कोलकात, लखनऊ, रामपुर तथा हैदराबाद के बारे में इसी तरह के अपने विचार रखते हैं, लेकिन दिल्ली की बेमुरव्वती को वह भुला नहीं पाते: 'बादशाही का जहां ये हाल हो गालिब, तो फिर। क्यों न दिल्ली कर हर इक नाचीज नव्वाबी करें' आखिर उनकी इल्तिजा पर भी गौर कीजिये: 'दिल्ली के रहने वालो असद को सताओ मत। बेचारा चंद रोज का यां मेहमान है।
रेमंड विलियम्स किसी किताब के हवाले से उस ग्राम के क्षरण की ओर जो पहले विश्व युद्ध तक मौजूद थी, उस शहरी तहजीब के उसकी जगह आने की बात करते हैं जो उनकी पकड़ में नहीं आ रही है। लेकिन यह दर्द उनका ही नहीं है उनसे पहले के भी बहुत से लेखक, कवि उस पुरानी व्यवस्था के बहुत से लेखक, कवि उस पुरानी व्यवस्था के ध्वस्त होते जाने का सियापा करते सुनाई देते है जो वास्तव में गांव-देहात से जुड़ी हुई थी। पर बाद के लोग पुराने शहर के उजड़ने और नए के बसने से भी बेचैन होते दिखाई देते हैं। ऐसा लगता है कि हर शहर अपने भूगोल में ही नहीं बदल रहा है बल्कि उच्च कोटि के औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप मन और वचन से भी बदल रह है। रेमंड विलियम्स शहर के इस विशालकाय एवं बहुआयामी होते जाने से विस्मित भी हैं तो पर्यावरण के विनाश, यातायात की सघनता, आवास की किल्लत और विकराल होती व्यवस्ता आदि से भी परेशान होते हैं। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में प्रकाशित महेश्वर दयाल की क्लासिक कृति दिल्ली जो एक शहर है उस तरह का विलाप सुनाई नहीं देता 1914-15 के आसपास लिखू गई ख्वाजा हसन नियामी की किताब बेगमात के आंसू और दाग देहलवी का कलाम भी दिल्ली को बढ़ाई करते नजर आते हैं। दाग तो यहां तक कहते हैं: 'मेरे दिल से दाग पूछे कोई दिल्ली के मजे, लुत्फ था दोनों जहां का इक जहां आबाद में। 'थोड़ा आगे बढ़े तो दिल्ली एक नये रूप में सामने आती है। इसमें अपराध है, सनसनीखोज कारनामें हैं और पनपता भ्रष्टाचार है। देहली का ठग (नदीम सहबाई 1933), दिल्ली का दलाल (पांडेय बेचन शर्मा' उग्र' 1928), दिल्ली की गुण्डाशाही (शंकरलाल गोयल 1930), दिल्ली का व्यभिचार (ऋषभचरण जैन 1929) जैसी किताबों के शीर्षक ही दिल्ली के आधुनिक बनने के लक्षणों को बता देते हैं। देश का बंटवारा यहां की जनसंख्या में एक आतंककारी फैलाव पैदा कर देता है और फिर दो सभ्यताओं के बीच टकरहाट शुरू हो जाती है दिल्ली एक ऐसी भीड़ के शहर में तब्दील हो जाती है जहां सब कुछ मिल जाता है पर अपनापन नहीं मिलता। क्षण-क्षण परिवर्तनशील दिल्ली ने अपने लोगों के बाह्मा परिवेश को तो बदला ही है उनकी निजी जिंदगी में भी जबर्दस्त भूचाल ला दिया है।

उस पर गौर करने से पहले मंटो की उस कहानी को ज़रा याद कर लें जिसमें बंबई की खोली में रहने वाला एक व्यक्ति अपने युवा होते भाई को रोजगार दिलाने के लिए अपने साथ ले आता है। रात को उसे अपनी बगल में झीने से पर्दे की ओट में सोते हुए भाई-भाभी की रतिक्रियांए सोने नहीं देती। आगे चलकर जब उसकी भी शादी हो जाती है तो वह अपनी पत्नी के साथ पर्दे के इस ओर वही सब करना चाहता है जो उसके भाई-भाभी करते हैं। पर कर नहीं पाता। यह संकोच जनित असमर्थता पति-पत्नी में भयानक मानसिक तनाव पैदा करती है।

आखिर एक दिन वे दोनों किसी पार्क के एक निर्जन कोने में मिलने का उद्यम करते हैं कि पुलिस का एक सिपाही सार्वजनिक स्थान पर व्यभिचार करने के अपराध में उन्हें पकड़ लेता है। किसी भी मेट्रो सिटी के लिए अनजानी नहीं है। ऐसे शहरों में अब तेजी से सेक्स क्रांति का बिगुल बजने लगा है। प्राइवेसी अब पार्कों को लांघती हुई सड़कों पर चली आई है, क्योंकि घरों में भीड़ बढ़ गई है। सेक्स को लेकर पहले उभरने वाली वर्जनाएं अब तेजी से ध्वस्त होती जा रही हैं। फुटपाथी साहित्य की बजाय छोटे और बड़े पर्दे पर दिखाई जाने वाली सामग्री यौन-शिक्षा की जिम्मेदारी तो निभा ही रही है लोगों से सवाल भी पूछ रही है जो कभी मिशेल फूको ने पूछा था,'एक रोज शायद... लोग यह सवाल पूछेंगे कि अपनी सबसे पुरजोर कारस्तानियों पर छायी चुप्पी को बनाये रखने पर हम इस कदर आमादा क्यों है?' जो काम एक प्राकृतिक नियम के तहत होता है उसे हम प्राकृतिक ढंग से क्यों नहीं करते। क्यों उसके लिए पर्देदारी ज़रूरी हो जाती है और तभी एक और वाकया याद आ जाता है। उन दिनों पहले से रिजर्वेशन कराके ट्रेन में सवार होने का चलन आम लोगों की सोच के लिए बहुत दूर की बात थी। बरौनी जंक्शन से दिल्ली के लिए पंजाब मेल में बैठना था। सारी गाड़ी में कहीं बैठने की गुंजाइश दिखाई नहीं दे रही थी। आखिर सेना के लिए आरिक्षित एक डिब्बे में घुस जाता हूं थोड़ी- सी नोक-झोंक के बाद उसमें बैठे फौजी मुझे जगह दे देते हैं वे सब छुट्टियों में अपने-अपने घर जा रहे हैं। काफी लंबे अरसे बाद घर जाने की खुशी उनके चेहरों पर थिरक रही है। गाड़ी चल दी है और अचानक एक और यात्री पायदान पर लटक जाता है। बड़ी जद्दोजहद के बाद इस शर्त पर उसे अंदर आने दिया जाता है कि वह अगले स्टेशन पर उतर जायेगा। सामान के नाम पर उसके पास एक थैला है, बस। थोड़ी देर वह चुपचाप खड़ा रहता है। फौजी अपने कामों में लगे रहते हैं। और फिर वह मजमेबाजों की तरह बोलना शुरू करता है और बताता है कि उसके पास हिमालय का दुर्लभ जड़ी-बूटियों से बनाई गई तक ऐसी दवा है जिसके सेवन से कमज़ोर से कमज़ोर आदमी भी कई औरतों को संतुष्ट कर सकता है। वह प्रभावी अंदाज में दवा की विशेषताएं बताये जा रहा है और मैं सोच रहा हूं यह गलत लोगों के सामने अपना हुनर दिखा रहा है। ये सब इतने हृष्ट-पुष्ट लोग हैं। भला इन्हें इस तरह की दवा की क्या ज़रूरत है। पर तब मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता जब मैं देखता हूं कि पहले एक फौजी झिझकते हुए वह दवा लेता है फिर दूसरा-तीसरा और आखिर में लगभग सभी दवा खरीद लेते हैं। मुझे लगता है कि शारीरिक स्वस्थता भी आदमी को आश्वस्त नहीं करती कि वह औरत को संतुष्ट करने में समर्थ है और वह स्वाभाविक रतिक्रिया से जो आनंद सुलभ होता है उससे ही तृप्त नहीं होता तथा उसे अधिकाधिक पाने की कोशिश में लगा रहता है। ये दोनों ही कामनाएं, कमजोरियां ऐसी हैं जो ताकत को एक जिंस बनाकर बाजार में बेचने/खरीदने के लायक बनाती हैं। कभी कविराज हरनामदास बी ए ईर हकीम बीरूमल अर्यप्रेमी के बड़े-बड़े विज्ञापन सभी अखबारों में फौलादी ताकत बेचने के लिए छपते थे। अब उनके खानदानी शफाखाने तो नहीं रहे लेकिन सेक्स स्पेशलिस्टों व गुप्त रोग विशेषज्ञों की भीड़ ज़रूर दिल्ली में पैदा हो गई है। उनके पैंपलेट हर सार्वजनिक पेशाबघर की दीवारों पर चस्पां दिखाई दे सकते हैं। पिछले दिनों 'वियाग्रा' ने सेक्स की दुनिया में कितना बड़ा तहलका मचाया था इससे शायद ही कोई अपरिचित रहा हो।

आजकल दिल्ली मे पोर्न (अश्लील/कामोउत्तेजक) साहित्य व ब्लू फिल्मों का मिलना उतना मुश्किल नहीं रहा जितना पहले कभी हुआ करता था। ब्यूटी/मसाज पार्लरों में सेक्स तृप्ति के सभी साधन अब आसानी से मिल जाते हैं। जी. बी रोड़ जैसे पारंपारिक चकलाघर अब पुराने हो गए हैं। इंटरनेट ने सेक्स व्यापार को हाईटेक आयाम दे दिए है। 'गे पार्टनरों'(सैमलैंगिक साथी) तथा 'डेटिंग' (मिलन) के लिए साथियोँ की आवश्यकता के विज्ञान अब सर्वत्र देखे जा सकते हैं। इस तरह दिल्ली में सेक्स जीवन का परिदृश्य निरंतर गतिशील है। यहां साप्ताहिक बाज़ार अभी तक जारी है। अनुमान है कि सप्ताह के प्रत्येक दिन विभिन्न इलाकों में 400 बाजार लगे होते हैं। इनमेँ हर महीनें 70 करोड़ का क्रय-विक्रय होता है और दिल्ली नगर निगम को इनसे 70 लाख रुपये की आमदनी।

इन घुमंतु बाजारों में दुकान लगाने वाले अधिकतर लोग उत्तरप्रेदश से आए हैं। ये हिंदु-मुसलमानों की दलित, पिछड़ी जातियों से संबंध रखते हैं। इनमें लगभग 50 प्रतिशत के पास अपने निजी मकान हैं। उनकी औसत आय तीन से चार हजार रुपये है। इन बाजारों की अपनी श्रेणियां हैं, जो कॉलोनियों में रहने वालों की आय के अनुसार निर्धारित हुई हैं। इनमें बिकने वाले प्रसाधन, सिले हुए वस्त्र और जूते आदि ऐसी वस्तुएं होती हैं जिन्हें अधिकतर गृह उद्योग के बतौर दिल्ली में ही बनाया जाता है। ये बड़ी व विख्यात कंपनियों के उत्पादों की प्राय: नकल होती हैं जैसे-मार्गों की तरह फेयर एंड केयर सौंदर्यवर्धक क्रीम या पेप्सोडेंट की तरह प्योरडेंट टूथपेस्ट। उनकी विशेषता यह रहती है कि ये असली की तरह दिखाई देने पर भी कीमत में सस्ती होती हैं। यह तब होता है जब हर विक्रेता को प्रतिदिन दिल्ली नगर निगम व पुलिस के सिपाही की जेब गरम करनी होती है। ये बाजार उन कोलोनियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं, जिनके निवासी, खासकर महिलाएं अल्प आय में गृहस्थी चलाती हैं लेकिन जिनकी आंखों में बड़े व हसीन सपने पलते रहते हैं।

दिल्ली में अब ऐसे लोग बहुत ढूंढने के बाद ही मिलेंगे जिन्हें यहां का मूल निवासी कहा जा सकता है। विभाजन से पहले भी लोग यहां व्यापार-मजदूरी करने आते थे पर उनकी संख्या बहुत कम रहती थी। विभाजन ने जिस भीड़ को दिल्ली में धकेल दिया था, वैसी भीड़ अब हर साल इस नगर में स्वेच्छा से चली आती है और यहीं की होकर रह जाती है। यह भीड़ आसपास के राज्यों की ही नहीं केरल, तमिलनाडू, कर्नाटक व आंध्र के निवासियों की भी होती है।

बिहार, उत्तरप्रेदश, हरियाण और पंजाब के लिए तो दिल्ली अब दूसरा घर बनती जा रही है। हर राज्य का निवासी अपनी पहचान बनाने के लिए अपने हमवतनों से जुड़ा रहता है और अपने शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार उनके साथ मिलकर ही मनाता है। राजनेता अपने अपने वार्डों, विधानसभा, संसदीय क्षेत्रों में रह रहे इन विभिन्न राज्यों के बाशिंदों को वोट बैंक के रूप में देखते हुए इनकी आवश्यकताओं/सुविधाओं पर विशेष ध्यान देने लगे हैं। यह इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का ही कमाल है कि छठ पूजा, दुर्गापूजा, गणेश जयंती, ओणम और लोहड़ी जैसे पर्व जो दिल्ली के मूल निवासियों के लिए कभी अनजाने थे अब प्रतिवर्ष अधिकाधिक धूमधाम से मनाये जाने लगे हैं। दिल्ली का रहन-सहन, रीति-रिवाज, या यातायात ही नहीं बदल रहा है, खानपान में भी तेजी सी परिवर्तन आ रहा है। व्यस्तता भरी जिंदगी और समयाभाव के चलते दिल्ली के अधिकतर लोग खानपान के लिए बाजार पर निर्भर हैं। पहले कभी परांठे, पूरी सब्जियों से पेट भरने वाले लोग समोसा, कचोरी, फिर छोले भटूरे व कुलचे भटूरे और सांभर बड़ा/डोसा से अब पेटीज, पिज्जा व हैमबर्गर तक आ पहुंचे हैं। इसी तरह शिकंजी, सोडा, चाय, काफी, गन्ने का रस के बाद अब कोक, पेप्सी का आचमन होने लगा है। ढाबों, होटलों, रेस्ट्राओं के बाद फास्ट फूड चेन्स का, पिज्जा हटों का व हैम्कॉर्नरों का जमाना आ गया है। रंगीन दीवारों से सजे और अंग्रेजी म्यूजिक से बजे ये फूड कॉर्नर रंग-बिरंगे लिबास पहने एक अलग तरह के उच्चारण व अंदाज बोलते लोगों की क्षुधा तृप्ति केंद्र बन गए हैं।

आधुनिक से उत्तर आधुनिक बनते हुए दिल्ली के लोग जहां चरम बौद्धिकता, तार्किकता, समझदारी की ओर बढ़ने का दावा करते सुनाई पड़ते हैं वहीं बढ़ते कावड़ियों के स्वागत सत्कार, दुर्गा, गणेश और पष्ठी पूजन में उमड़ती भीड़, आसाराम, मोरारी बापू, सुधांशु महाराज के प्रवचनों को सुनने की दीवानगी और पहले गणेशजी के दुग्धपान और बाद में मंकी मैन के अवतार पर अंधी श्रद्धा, ज्ञापित करते हैं कि उस बौद्धिकता की नींव बहुत खोखली हैं। प्रतिदिन शहर में कहीं न कहीं होती हिंसक वारदातों, सिनेमाघरों से संसद भवन तक होते आतंकवादी आक्रमण, पुलिस द्वारा किए जाते अकारण और अचानक हमले, दिल्लीवासियों के लिए इतने अंतरंग हो गए हैं कि वे सही सलामत रात को घर लौट आयें, यही उनके लिए गनीमत होती है। टी.वी धारावाहिकों के स्पाइडरमैन – शक्तिमान, बी ग्रेड फिल्मों के खौफनाक दृश्य कॉमिक्स और लोकसंस्कृतिक से पाले-पोसे गए अतिमानवीय चरित्र, एक ऐसी दुनिया रचते हैं जिनमें एक साथ किंवदंतियों मिथकों और विज्ञान कथाओं के तत्व घुलते-मिलते रहते हैं।

जहां तक दिल्ली की माहिलाओं के घर की परिधि को लांघने और राजनैतिक, सामजिक क्षेत्र में सक्रिय होने का सवाल है गांधी द्वारा शराब की दुकानों पर पिकेटिंग करने के लिये महिलाओं से की गई अपील के बारे में जून 1931 के किसी एक दिन के अंग्रेजी दैनिक गर्जियन में छापी मेरी कैम्पवेल की रिपोर्ट का यह अंश दृष्टव्य है: 'मुझे लगता था इस बार गांधी ने गलती कर दी है। क्योंकि दिल्ली की महिलाएं जिनमें इतनी सारी तो पर्दें में रहती हैं, इस काम को कभी अंजाम नहीं दे पायेगी। परंतु उस समय मेरी हैरत का ठिकाना न रहा जब मैंने देखा कि वेन केवल सड़कों पर निकल आई हैं बल्कि उन्होंने दिल्ली की तमाम शराब की दुकानों पर धरना भी दिया है।'

हिन्दुस्तान टाइम्स के उन दिनों के समाचार बताते हैं कि वे उन धरनों के अलावा बाकायदा जलूसों, सभाओं में शामिल रहती थीं। 16 मार्च, 1930 को न्यालयों का घेराव करने पर तो उन्हें पुलिस की लाठियां भी खानी पड़ी थीं पर घरों की बुजुर्ग महिलाएं इस तरह घर से बाहर निकलने और राजनैतिक गतिविधियों में उनके भाग लेने के ख़िलाफ थीं। दूसरी ओर कुछ समाज सुधारिकों का यह भी मानना था कि राजनैतिक कार्यकर्ताओं के जेल जाने या भूमिगत होने पर घर-गृहस्थी को चलाते रहने का दायित्व वहन करना भी महिलाओं का स्वधीनता संग्राम मेंएक प्रकार से योग देना ही था।

1947 में हुए देश के विभाजन के साथ मिली आजादी ने जिस विस्थापन और जबरिया पलायन को अंजाम दिया उससे करोड़ों औरतें अपने घर-परिवार और साजो-सामान से महरूम हो गई और उन्हें फिर से अपनी घर-गृहस्थी बसाने व स्वयं को सुरक्षित तौर पर स्थापित करने के लिए भारी जद्दोजहद करनी पड़ी। एक ही झटके में उनका पर्दा उतर गया और इज्जत-आबरू के मायने बदले गए। एक अनुमान के अनुसार दिल्ली से 3.3 लाख मुसलमान चले गये और उनके बदले में कोई पांच लाख हिंदू यहां आए। शरणार्थियों के इतनी बड़ी संख्या में दिल्ली में आगमन ने यहां की शक्ल-सूरत ही नहीं मूल निवासियों की जिंदगी के हर पहलू को बदल डाला। लुट-पिटकर आई इन रिफ्यूजिनों ने जहां जो धंधा मिला उसी के सहारे जिस तरह अपना पुनर्निर्माण और अग्रेसरण शुरू किया और कामयाबियां हासिल की वह स्थानीय औरतों के लिए पहले घृणा व अवहेलना का सबब बना लेकिन अंतत: रोल मॉडल बन गया। बाद में शिक्षा के प्रसार, मीडिया की व्यापकता और पश्चिमी आधुनिकता के आगमन ने न केवल घरेलू बंधनों, सेक्स की वर्जनाओं और सामाजिक मर्यादाओं की विखंडित कर इन्हें आजाद किया बल्कि अपनी आजादी के काले-उजले पक्षों को समझने और मानावोचित अधिकारों को पाकर सुरक्षित रखने के लिए इन्हें सतत सतर्क/सावधान भी बना दिया। इस तरह यह शहरनामा दिल्ली में पिछली सदी के उत्तरार्ध में आए बहुआयामी परिवर्तनों का एक पुख्ता चेहरा सामने रखकर कुछ अन्य शहरों के सूरते हाल पर भी रोशनी डालता है। यह कोलकाता को खौफ, दहशत, अंधरे और उत्तेजना के शहर के रूप में चित्रित करता है। इसे यह उद्योग व व्यापार के एतबार में हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा केंद्र मानता है। इसके मुताबिक यह शहर इंद्रियों से ज्यादा दिमाग पर हमलावर होता है। इसी कारण कहा जाता है: 'आज कलकत्ता जो कुछ सोचता है कल वही कुछ हिन्दुस्तान सोचने को मजबूर हो जाता है।' इस शहर में गरीबी ओर गुरूर दोनों साथ-साथ दिखाई देते हैं। तभी तो कुर्रतुल एन हैदर इसके बारे में कहती हैं: 'अनगिनत रौशन, रूह पर बोझ बने सवालात का शहर? कुछ लोग कहते हैं: 'कलकत्ता ही उनका जवाब भी है।'और पटना को वक्त के खूंटे में टंगा शहर कहा गया है। इस वक्त में जब हलचल होती है तब पटना भी चलायमान होता है अन्यथा यह अपने ही अंदाज में जिए चला जाता है। फर्क पड़ा है तो बस इतना ही कि पहले जब लड़कियां कहीं जाती थीं तो छोटे/बड़े भाईयों को उनका 'एस्कोर्ट' बन कर जाना होता था। अब वे बिना किसी का संरक्षण पाए भी आने जाने लगी हैं। पर इसका मतलब यह नहीं है कि उनका आवागमन निरापद हो गया है या यहां की कानून -व्यवस्था बहुत सुधर गई है। बल्कि सच यह है कि लड़कियों ने फबतियों अभद्र इशारों और छेड़छाड़ आदि को अनिवार्य मान उनके साथ जीना सीख लिया है। कभी-कभी वे इन सबका मुकाबला भी करने लगी हैं।

काशी की गालियां, बनारस का फक्कड़पन, इलाहाबाद का कॉफी हाउस, नाजीरिया के एक शहर कानो में उभरती सिनेमाघरों की भौतिक सांस्कृतिक और चीन के बेजिंग नगर में फैली सार्स की महामारी के चित्रांकन जहां इनकी निजी पहचान से पाठकों के वाबस्ता करते हैं वहीं इनकी सामाजिक राजनैतिक व्यवस्थागत खामियों से भी अवगत करवाते हैं। इस तरह यह शहरनामा दिल्ली के क्षण -क्षण रूपांतरण की एक जीवंत झांकी दिखाने की कोशिश करता है। दूसरे शहरों की टिमटिमाती रोशनियां इसकी चमक को और अधिक चकाचकता प्रदान करती है। पर बावजूद पूरी कोशिश के अभी भी बहुत कुछ छूट गया है। मसलन संस्कृति, भाषा,साहित्य, राजनीति और श्रमिक/कर्मचारी आंदोलनों पर भी कुछ गहराई से सोचा जाता तो अच्छा होता। रामलीलाओं, रंगकलाओं का निरंतर बदलता स्वरूप, विभिन्न राज्यों से आए लोगों के समाहार से बोलचाल की भाषा की बनती- बिगड़ती छवियां, प्रयाग, काशी, मुंबई, भोपाल से उखड़कर साहित्यिक प्रकाशनों का दिल्ली में केंद्रित हो जाना, संसदीय जीवन का अतीत और वर्तमान तथा सत्याग्रह, जलसे-जलूस आदि का अर्थ खोते जाना, जैसी बातों पर भी यदि और सामग्री होती तो यह अध्ययन अधिक सर्वांग व संपूर्ण बन सकता था। पर जो कुछ है, वह भी कम मूल्यवान नहीं है। आखिर 422 पृष्ठों में इससे अधिक और कुछ देने की गुंजाइश भी कहां थी। हां, आशा जरूर की जा सकती है कि आगे जब कभी इस दीवान-ए-सराय का तीसरा अंक निकलेगा तो उसमें इन पहलुओं पर भी सामग्री शामिल होगी।
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आलेख – दीवान ए सराय से साभार. अन्य रुचिकर सामग्रियाँ आप सराय (विकासशील समाज अध्ययन पीठ) के जालस्थल

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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: समीक्षा लेख: रोज़ इस शहर में हुक्म नया होता है
समीक्षा लेख: रोज़ इस शहर में हुक्म नया होता है
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