रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

साहित्यिक चुटकुले

चुटकुला # 010

_~_~_~_~_~_

दूध का मर्तबान

***********.

उत्तर भारत में सोने से पहले दूध पीने की आदत बहुत लोगों में है. पति देवता क्लब से देर से लौटते थे. इसलिए उनके हिस्से का दूध उनकी पत्नी गिलास में सुरक्षित रख अपने हिस्से का दूध पी लेती थी अन्यथा वे साथ साथ पीते थे.

एक दिन पति महोदय को बहुत विलंब हो गया तो पत्नी अपना दूध का गिलास लेने आई और उसे पीने जा रही थी कि उसने देखा कि उनके पति के दूध के गिलास में बिल्ली भोग लगा रही है. जब तक वह उसे भगाती, गिलास खाली हो चुका था.

पतिपरायणा पत्नी ने स्वयं दूध नहीं पिया और अपना गिलास अपने पति के लिए सुरक्षित रख दिया.

पतिदेव घर आए तो उन्होंने पत्नी से पीने के लिए दूध का गिलास मांगा. उनके बीच का संवाद नीचे दोहे में पढ़ें :-

तिय बोली पिय के कहत दूध कहाँ? दै देऊ।

तुम्हरौ तौ बिल्ली पियौ, पिय! हमरौ पी लेऊ।।

- पंडित अमृतलाल चतुर्वेदी

**-**

चुटकुला # 011

_~_~_~_~_~_

होइहैं सोइ

*******.

मथुरा के कलेक्टर रहे श्री ग्राउस पक्के रामायणी थे. एक बार उनकी अदालत में एक अपराधी लाया गया. जिरह के दौरान अपराधी ने यह सोचकर कि ग्राउस महोदय प्रसन्न होकर उन्हें मुक्त कर देंगे, यह चौपाई कहा

होइहैं सोइ जो राम रचि राखा।

को करि तर्क बढ़ावहि साखा।।

ग्राउस साहब ने उनकी चौपाई का जवाब कुछ यूं दिया

कर्म प्रधान विश्व करि राखा।

जो जस करसि सो तस फल चाखा।।

---**---

चुटकुला # 012

_~_~_~_~_~_

असंगत हास्य

--*--

आगरा के साहित्यकार अमृत लाल चतुर्वेदी के पड़ोस में एक अनपढ़ व्यक्ति रहता था जो गाहे-बगाहे अपने परिवार के पत्रों को पढ़वाने के लिए उनके पास आता रहता था. उस अनपढ़ के परिवार का एक सदस्य झांसी में रहता था और थोड़ा पढ़ा लिखा था. उसे तुकबंदी की भयंकर आदत थी. पत्र भी वह तुकबंदी में ही लिखता था.

एक बार उसी व्यक्ति का लिखा पोस्टकार्ड लेकर वह अनपढ़ व्यक्ति पत्र पढ़वाने चतुर्वेदी जी के पास पहुँचा. पत्र में दोहा लिखा था

सिद्धि श्री झांसी लिखी राम-राम प्रिय भ्रात।

अत्र कुशलं तत्रास्तु, भैया मरि गए रात।।

**-**

चुटकुला # 013

_~_~_~_~_~_

आदत से लाचार

---/---

श्री नारायण चतुर्वेदी के एक कांग्रेसी मित्र ट्रेन से लखनऊ होकर कहीं जा रहे थे. सौजन्यता वश चतुर्वेदी जी ने स्टेशन पर कांग्रेसी मित्र से ट्रेन पर ही मुलाकात की और उन्हें लखनऊ के स्वादिष्ट खरबूजे भेंट किए. पत्रों से हालचाल लिखने के वादों के साथ विदा हुए.

कुछ दिन बाद उन कांग्रेसी मित्र का पत्र चतुर्वेदी जी के पास आया. पत्र में दोहा लिखा था

खरबूजा तो खा गया, लिया न एक डकार।

कांग्रेसी हूँ, क्या करूं? आदत से लाचार।।

(समस्त चुटकुले, साहित्यिक चुटकुले, लेखक श्रीनारायण चतुर्वेदी, प्रभात प्रकाशन चावड़ी बाजार दिल्ली से साभार)

--*--

चुटकुला # 014

_~_~_~_~_~_

साहित्यिक एसएमएस

**-**

सवाल: पता है कि निसार भाई कैसे पैदा हुए?
सवाल: नहीं न?
(ठीक है, मैं बताती हूँ।)
जवाब: जवानी जानेमन, हसीन दिलरुबा
मिले दो दिल जवाँ
निसार हो गया।
(मूल शायर से क्षमा याचना सहित. यह एसएमएस रविकान्त ravikant at sarai dot net ने रचनाकार को अग्रेषित किया)

1 टिप्पणियाँ

  1. बेनामी4:06 pm

    ab samjhe sahab, saal ho gaya kisis ne aapki KRITI par ek shabd bhi nahin likha. ab saal poora hone se pehle main apna dharm nibha raha hun. isliye dhyan rakhen aage se auro ko padh kar pareshan na raha karen, kuchch udyam karen. nahin to doodh badam khayen, dimag mein taravat rahegi.
    yogender dutt

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.