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वंदेमातरम्

(सत्तर के दशक में लिखा गया यह करारा व्यंग्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है. वंदेमातरम् गीत को लेकर तमाम विरोधाभास और विरोध चल उठे हैं - आपके लिए रचनाकार की विशेष की प्रस्तुति.)

व्यंग्य : वंदे मातरम्
- अमृत राय

अहा हा मां, तू कैसी सुजला है! जिधर देखो, पानी ही पानी. आज घाघरा में बाढ़ आई है तो कल सोन में. कभी गंगा हरहराती है तो कभी यमुना, कभी गोमती तो कभी सरयू- और फिर उत्तर-दक्षिण की भावात्मक एकता से परिचालित कृष्णा और गोदावरी भी क्योँ किसी से पीछे रहें. और ब्रह्मपुत्र तो जैसे ब्रह्मपुत्र ही है, उसमें क्या किसी से कम आवेग है! फलतः प्रलय का ऐसा सुंदर दृश्य उपस्थित होता है जिसके बारे में शायद किसी उर्दू शायर ने कहा है- ये देखने की चीज है, इसे बार-बार देख.

और मां, तू ऐसी कल्याणी है, अशेष वरदान-मयी, कि हर वर्ष और अकसर तो वर्ष में दो-दो तीन-तीन बार हमारे लिए इसका आयोजन कर देती है. बरसात का तो कहना ही क्या, तुझे जाड़े-गरमी की भी चिंता नहीं रहती. तेरा बस चले तो बारहों महीने देश में बाढ़ आई रहे! मगर तू भी क्या करे, बादल ही चुक जाते हैं बरस-बरसकर, और तब चारों ओर, जहाँ तक नजर जाती है और उसके भी आगे, सूखा ही सूखा - नदी सूखी, नाले सूखे, खेत और बावलियाँ सूखीं, ढोर सूखे, डंगर सूखे और उनके चरवाहे सूखे, कि जैसे आग ने सब को जलाकर राख कर दिया हो. धन्य है मां, तू धन्य है, और आन की आन में बदलती तेरी दृश्यावली धन्य है- अभी जहाँ सब कुछ बाढ़ में डूब-उतर रहा था वहाँ देखते-देखते लंबा-चौड़ा एक रेगिस्तान निकल आया. हमारे कवि ने ‘पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश' की बात यों ही थोड़े ही कही है. दुनिया के पर्दे पर दूसरा ऐसा देश नहीं जहाँ सूखे-बूड़े में ऐसा चोली दामन का साथ हो.

मैंने जब-तब लोगों को कहते सुना है कि इस आधुनिक विज्ञान के युग में सूखे-बूड़े दोनों को ही बचाया जा सकता है. बचाया तो सब जा सकता है मगर सवाल ये है कि हम क्यों बचाएँ. भूलिए मत, ये ऋषियों का देश है जहाँ हम सभी प्रकृति के पुजारी हैं. प्रकृति जो भी करती है हमारे भले के लिए करती है, उसके किसी काम में अड़ंगा डालना ठीक नहीं. जिस बाढ़ को या सूखे को हम अपनी छोटी और सीमित बुद्धि से अपने लिए बुरा समझते हैं, उसमें पता नहीं कौन सा वरदान छुपा हो जो हमारी समझ में नहीं आ रहा है. वैसे, इतना तो सभी जानते हैं कि बाढ़ के उतरने पर जो मिट्टी पीछे छूट जाती है उससे धरती और उपजाऊ हो जाती है. उसी तरह सूखे से धरती के सब कीड़े मकोड़े मर जाते हैं. तपते सूरज से बढ़कर कीटाणुनाशक सारी सृष्टि में दूसरा नहीं. अलावा इसके, मैं तो यह तक कहने को तैयार हूँ कि बहुत खुशहाली भी अच्छी नहीं होती. आबादी का हाल आप देख ही रहे हैं, बावजूद इतने सब सूखे-बूड़े के साठ करोड़ पर पहुँच गई और जो कहीं इनका भी सहारा जाता रहा तो सत्तर-अस्सी पर पहुँचते कितनी देर लगती है. और तब हम-आप एक दूसरे को खाते नजर आएंगे. कुछ-कुछ तो अब भी खाने ही लगे हैं, तब तो उठाकर कच्चा ही चबा जाएंगे. इसलिए जनाब, प्रकृति के कारखाने में हाथ न डालना ही ठीक है. करने दीजिए उसको जो कुछ करती है. अपने को ऐसा अफ़लातून नहीं समझना चाहिए. इन सूखे-बूड़ों में सालाना दस-पाँच करोड़ टन गल्ले का नुकसान कोई नुकसान नहीं और न पचीस-पचास हजार लोगों की जान चली जाने से देश का कुछ बिगड़ता है. ये साठ करोड़ आदमी तूने कुछ सोच-समझकर ही तो पैदा किए होंगे...

... और कैसे साठ करोड़? काले-गोरे, भूरे-पीले, सबके रंग अलग, ढंग अलग, जहाँ कोई किसी की बोली तक नहीं समझता और अपनी बात दूसरे तक पहुँचाने के लिए सबको सात समंदर पार की एक विदेशी बोली का सहारा लेना पड़ता है. मगर इससे आप कहीं यह न समझ बैठिएगा कि हमारे अंदर एकता की कमी है. बिलकुल नहीं. हमारे अंदर जबर्दस्त एकता है. हम लोग सदा एक दूसरे से गुँथे रहते हैं. एक दूसरे की टाँग खींचना हमारा सबसे चहेता खेल है. हम हिंदी देश वाले बंगालियों को सड़ी मछली और पिलपिला भात कहकर पुकारते हैं. बंगाली हमको सत्तूखोर कहता है. महाराष्ट्रवालों को हम कढ़ीचट कहते हैं और वो हमको रांगड़े कहते हैं. उधर सरदारों के बारे में तो इतने लतीफे चालू हैं कि उन्हें बाजार से हटा लो तो लोगों के पास पार्टियों में बात करने को ही कुछ न रहे. अपना यह खेल बहुत ही मजे का है, कहाँ तक बताऊँ आपको. शेखसादी के हवाले से कश्मीरी एक नंबर का बदजात मशहूर है ही, गुजरातियों के बारे में प्रसिद्ध है कि अगर तुम्हें रास्ते में एक सांप मिले और एक गुजराती और इनमें से किसी एक को मारना हो तो गुजराती को मार दो. यही किस्सा हस्ब जरूरत कभी सिंधियों-मारवाड़ियों पर भी फिट कर दिया जाता है. बंगाली मारवाड़ी की नौकरी भले करे मगर जब उसे याद करेगा तब बड़ी मीठी घृणा के साथ ‘मेड़ो' कहकर. उसी तरह उड़िया उसके लिए ‘उड़े' है जो अपनी मूर्खता के लिए प्रसिद्ध है. ऐसी ही और भी न जाने कितनी बातें है, कहाँ तक गिनाएँ- और सच तो यह है कि यह पंचवार्षिक शोध का एक अलग ही विषय है जिस पर भावात्मक एकता समिति को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए.

हमारी यही एकता जब और बढ़ जाती है तब उत्तर प्रदेश और बिहार में, बिहार और बंगाल में, बंगाल और उड़ीसा में, उड़ीसा और आंध्र में, आंध्र और तमिलनाडु और केरल में, केरल और कर्नाटक में, कर्नाटक और महाराष्ट्र में और इसमें और उसमें कभी जमीन और कभी पानी के बंटवारे को लेकर ‘सूच्यग्रं नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव!' वाली स्थिति पैदा हो जाती है. दोनों तरफ से मोर्चे जमने लगते हैं, रणभेरी बज उठती है. पहले ‘युद्धं देहि' वाले जुलूस निकालते हैं जिसमें अपर पक्ष के नेताओं के पुतले जलाना कार्यक्रम का आवश्यक अंग है. फिर दुकानों में आग लगाने का सिलसिला शुरू होता है. फिर यहाँ-वहाँ बिजली-तार के खंभे और रेल की पटरियाँ उखाड़ी जाने लगती हैं. फिर सीमा के इधर-उधर दोनों तरफ के लोगों में पथराव शुरू होता है- और सबके अंत में भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस की गोलियाँ हवा में सनसनाने लगती हैं.

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ये सब झगड़ा-टंटा देखकर कभी-कभी विदेशी पत्रकारों और पर्यटकों को और सच पूछिए तो कभी-कभी अपने को भी - यह धोखा हो जाता है कि जैसे दो स्वतंत्र और बिलकुल अलग देशों के बीच लड़ाई हो रही है. मगर फिर जल्दी ही अपनी और सबकी समझ में आ जाता है कि यह तो अपनी छोटी-मोटी पारिवारिक खटपट है जो सभी भाइयों के बीच हुआ करती है और जो एक तरह से आपस की मुहब्बत और मेल-मिलाप का ही दूसरा नाम है. उसे एक तरह का गरबा नाच भी कह सकते हैं, डंडियों का आपस में टकराना ही जिसका छंद है. और दुनियावाले हैं कि इतनी सी बात का अफसाना बना दिया. हिंदुस्तानी कभी आपस में नहीं लड़ते.

लड़ ही नहीं सकते, क्योंकि शांतिप्रियता हमें अपनी घुट्टी के साथ मिली है, जैसी और कहीँ भी मुश्किल से ही देखने को मिलेगी. बीच सड़क दस लोग मिलकर एक किसी आदमी को मारते-मारते चाहे मार भी डालें, हम मुँह फेरकर शांति से अपने रास्ते चले जाते हैं. हमारी आँखों के सामने चार लोग किसी औरत का झोंटा पकड़कर उसे कुतिया की तरह घसीटते लिए जाते हों मगर हमारी शांति के कान पर जूं भी नहीं रेंग सकती. मुहल्ले का परचूनी चाहे एक के तीन दाम लगाता हो, और डांडी मारता हो सो अलग, लेकिन हम भुनभुनाएँ चाहे जितना, अपनी शांति को कभी हाथ से नहीं जाने दे सकते. हमें मालूम है और सारा जिला जानता है कि अमुक सरकारी अफसर नंबरी घूस-खोर है, सबकी नाक में दम आ गया है, दौड़ाते-दौड़ाते उसने सबकी हालत खराब कर रखी है और किसी का घेले भर काम नहीं करता जब तक कि अर्जी के साथ कुछ नामा न लगा हो (जभी तो उसे अर्जीनामा कहते हैं!) दिल ही दिल में सब चाहते हैं कि हरामजादे का जनाजा निकले, मगर हम ऐसे विकट शांति-प्रेमी हैं कि अपने घर लौटकर एक लोटा पानी पीकर उस मरदूद को कोसते हैं और शांति से सो जाते हैं.

और कर भी क्या सकते हैं जहाँ भगवान की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं डोलता. जब जो होना होगा हो जाएगा, हम कुछ भी क्यों करें क्या फायदा...

कैसे-कैसे रसायन तूने हमारी घुट्टी में घोलकर पिलाए हैं मां, हम कभी उबर थोड़े ही सकते हैं. बहुत बड़ा मातृऋण है तेरा क्योंकि वही तो चीज है जिसके चलते हम सब कुछ जो हम पर पड़ती है इतने मजे से हँसते-हँसते झेल जाते हैं और चूं भी नहीं करते. ओम् शांतिः शांतिः शांतिः. सब तेरी ही करामात है जो इस देश का कारखाना इतने आराम से चल रहा है, कहीं कोई रगड़ा नहीं झगड़ा नहीं. जो बंगले मोटर का आदी है वह अपने बंगले-मोटर में खुश है, जो झुग्गी में रहता है वह अपनी झुग्गी में खुश है. सेठ भी खुश, भिखमंगा भी खुश. पुलिस भी खुश और ब्लैकमार्केटियर-स्मगलर भी खुश- और उनसे सोना और घड़ी और दुनिया-भर के नायाब इम्पोर्टेड सामान खरीदने वाले हम-आप भी खुश! और जिस घूसखोरी को लेकर देश में बेकार इतनी हाय-तोबा मची है, उसकी तो खास बात यही है, लेने वाला भी खुश, देने वाला भी खुश. बल्कि मैं तो कहूँगा कि देनेवाले की खुशी लेने वाले की खुशी से बढ़कर होती है. जरा-सी आँख खोलकर चलने की बात है, जब चाहे आजमाकर देख लीजिए. लेने वाले का चेहरा अकसर आपको बहुत गंभीर मिलेगा जब कि देने वाले का चेहरा हमेशा मुस्कराता हुआ नजर आएगा और वह मुसकराहट ऐसी दीन-हीन, गिड़गिड़ाती हुई कि पत्थर भी पानी हो जाए, बेचारा लेने वाला किस गिनती में है. कैसे वह किसी गरीब का दिल तोड़ दे. आखिर उसके सीने में भी तो इन्सान का दिल है, कैसे न पसीजे! अपना ईमान गया भट्ठे में, वह देनेवाले की खुशी का खयाल करके घूस लेने पर मजबूर हो जाता है! और हमारी सरकार उसकी इस मजबूरी को समझती है, जभी तो उसने जगह-जगह अपनी जो तख्तियाँ टाँग रखी हैं उनमें घूस लेने और देने को एक ही पलड़े में रखकर समान रूप से पाप ठहराया है. लेकिन अगर इतने पर भी घूसखोरी नहीं बंद हुई तो यही समझना चाहिए की आदमी को पाप करना अच्छा लगता ही है. वरना तो इस देश की मिट्टी ही कुछ ऐसी है कि यहाँ जो भी कुछ करता है, दूसरे की खुशी के लिए. स्वार्थ की तो कहीं गंध तक नहीं. ये सब तेरा ही प्रसाद है मां. लीडर जो विधानसभाओं में और मंत्री की कुर्सी पर बैठता है, वह हरदम जनता की भलाई की चिंता से पीड़ित रहता है- और अगर वह पहले अपनी भलाई की बात सोचता है तो इसीलिए कि वह भी जनता का ही एक आदमी है, और आदमी को मंदिर से पहले अपने घर में दिया जलाना चाहिए. उसी तरह सरकारी अफसर जितने हैं, सब हर समय जनता को सुंदर प्रशासन देने की चिंता में डूबे रहते हैं. उनका काम ही यही है चिंता में डूबे रहना. और कौन नहीं जानता कि सबसे सुंदर प्रशासन वह होता है जो कहीं है भी या नहीं इसका लोगों को बोध तक न हो - वैसे ही जैसे कि आदमी को अपने सांस लेने का बोध नहीं होता और बोध होता है तभी जबकि शरीर के लिए कोई संकट उपस्थित होता है! रहा व्यापारी, उसका तो कुछ कहना ही नहीं - यहां तक कि उसका नंबर दो का पैसा भी आखिरकार जनता के हित में और उन्हीं के बीच तो घूमता रहता है, वरना सरकार के हाथ में पड़ जाए तो वह उसे भी अपने अनाप-शनाप खर्चों में फूंक-ताप बराबर करे!

और सबसे अलग और सबके ऊपर, लोकनिर्माण विभाग के इंजीनियर की लोकहितैषिता का तो जवाब ही नहीं - क्लब में बैठकर भी उसका मन अपने ब्रिज में ही रमा रहता है!

तू धन्य है मां, और हम तेरे बेटे धन्य हैं!

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साभार - मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ - लेखक :- अमृत राय, 1977 प्रकाशक - ज्ञान भारती, दिल्ली -7

2 टिप्पणियाँ

  1. रवि भाई, आजकल समय ऋषि बंकिम के वन्दे मातरम का चल रहा है। क्यों न उनका आनन्दमठ रचनाकार पर छपे?

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  2. रवि जी,

    बहुत सुन्दर व्यंग है। बाँटने के लिये धन्यवाद। ये अमृतराय क्या प्रेमचन्द के पुत्र अमृतराय हैँ?

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