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रमेशचन्द्र श्रीवास्तव की कुछ ताज़ी ग़ज़लें


रमेशचन्द्र श्रीवास्तव की कुछ ताज़ी ग़ज़लें

ग़ज़ल 1

शब्दों की गूंज फिर मुझे दीवाना कर गई
सन्नाटा चीरती हुई दिल में उतर गई

दीवार पर लगी हुई तस्वीर बोल उठी
कमरे में एक अजीब सी खुशबू बिखर गई

बैरंग मौसमों का जमाना है आज कल
महके थे जिसमें जख़्म वह रूत भी गुजर गई

दो दिन की जिन्दगी में न बेदाग़ रह सके
ये जिन्दगी भी जीने का इल्जाम धर गई

मायूसियों ने घेर लिया फिर से रचश्री
उम्मीद की किरन भी न जाने किधर गई

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ग़ज़ल 2

लालच की जिन्दगी तो कोई जिन्दगी नहीं
दरियाओं से भी प्यास ये बुझती कभी नहीं

हैं अपनी ख्वाहिशों के गुलाम अहले मयकदा
पीने की आरजू है मगर तिश्नगी नहीं

तुमको नहीं है होश मगर हमको होश है
जी भर के तुमने पी है मगर हमने पी नहीं

दौलत है जिनके पास वही बेसकून हैं
सब कुछ उन्हें मिला है पर आसूदगी नहीं

पतवार अपने हाथ में रखते जो रचश्री
कश्ती भँवर में फंस के कभी डूबती नहीं

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ग़ज़ल 3

भूल जाना तो एक बहाना है
इस बहाने भी याद आना है

और तो कुछ नहीं है अपने पास
चंद यादों का एक खजाना है

जिन्दगी खूब है और कुछ भी नहीं
सिर्फ एक सांस का फसाना है

कौन रहता है इस सराय में
सब मुसाफिर हैं, सबको जाना है

आदमी आदमी का है दुश्मन
"रचश्री" यह अजब जमाना है

****

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ग़ज़ल 4

मुझे आंखों में कोई और बसाया न गया
चैन खोकर भी तुझे दिल से भुलाया न गया

वादा यूँ टूटा कि विश्वास भी बिखरा मेरा
टूटे वादे से नया वादा बनाया न गया

अबके दीवाली की रात आई मगर तेरे बगैर
मुझसे आँगन में कोई दीप जलाया न गया

तेरा अहसान उठाया तो उठाया ऐसा
फिर किसी और का अहसान उठाया न गया

क्या ख़बर किसने चुराया है मेरा सब्रो करार
एक तेरे सिवा दिल में कोई आया न गया

"रचश्री" देख ही घर था मेरी महबूबा का
जिसकी दीवार का सिर से मेरे साया न गया

****


ग़ज़ल 5

दूर मंजिल नहीं, हौसला चाहिए
अब रुकावट है क्या देखना चाहिए

हम हवा की तरह हैं, ठहरते नहीं
पर्वतों में भी एक रास्ता चाहिए

देश ही में जिएँ देश पर ही मिटें
जिन्दगी में हमें और क्या चाहिए

अग्निबाणों का प्रयोग करना है अब
अब हमें शत्रु का सामना चाहिए

"रचश्री" यहाँ हो कोई भी जंग
वीरों की हमें वीरता चाहिए

****

ग़ज़ल 6

क्या खबर थी ऐसी आँधी आएगी
धूल मन दर्पन के ऊपर छाएगी

आएंगे घर में हवाओं के कदम
प्रेम के दीपक की लौ थर्राएगी

जिन्दगी में कर्म तुम करते रहो
यह न सोचो कर्म की ऋतु आएगी

बात है सिद्धांत की लेकिन उसे
अपनी दुनिया कब अमल में लाएगी

दिल दुखाकर चैन मिल सकता नहीं
दुःख की बदली सिर्फ दुःख बरसाएगी

कर्म अच्छे हैं तो अच्छा अंत भी
खूंट-कांटा है सदा तड़पाएगी

हम तो कांटों पर भी सो जाएँगे यार
और शोलों पर भी नींद आ जाएगी

अपने वायदे से मुकर जाएंगे दोस्त
क्या वह दिन भी दोस्ती दिखलाएगी

"रचश्री" सांसों के धागों में हमें
जाने कब तक जिन्दगी उलझाएगी

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चित्र - रेखा की कलाकृति - स्याही से बनी - गांव

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