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अनूप भार्गव की कुछ कविताएँ


अनूप भार्गव की कुछ कविताएँ

कविता 1
एक ज्यामितीय कविता
मैं और तुम
एक ही दिशा में
न जाने कब से चलती हुई
दो समान्तर रेखाएं हैं ।

आओ क्यों न इन
रेखाओं पर
प्यार का एक लम्ब डाल दें ?

मैं इसी लम्ब के
घुटनें पकड़ पकड़
शायद तुम तक
पहुँच सकूँ !

***-***
कविता 2

अगले खम्भे तक का सफ़र

याद है,
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार,सड़क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब चलते चलते
थक जाता था,
तुम आंखें बन्द कर के,
उँगलियों पर
कुछ गिननें का बहाना कर के
कहती थीं ,
बस उस अगले खम्भे तक और ।

आज बरसों के बाद
मैं अकेला ही
उस सड़क पर निकल आया हूँ ,
खम्भे मुझे अजीब निगाह से देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता पूछ रहे हैं ,
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के ,
अगले खम्भे तक पहुँचना है

सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा इन्तजार कर रही होगी !


**-**

.


.


कविता 3

आशंका

मैं हर रोज़
बचपन से पले विश्वासों को
क्षण भर में
काँच के गिलास की तरह
टूट कर बिखरते देखता हूँ ।

सुना है जीने के लिये
कुछ मूल्यों और विश्वासों
का होना ज़रूरी है,
इसलिये मैं
एक बार फ़िर से लग जाता हूँ
नये मूल्यों और विश्वासों
को जन्म देनें में
ये जानते हुए भी
कि इन्हें कल फ़िर टूटना है ।

ये सब तब तक तो ठीक है
जब तक मेरा स्वयं
अपनें आप में विश्वास कायम है,
लेकिन डरता हूँ
उस दिन की कल्पना मात्र से
जब टूटते मूल्यों और विश्वासों
की श्रंखला में
एक दिन
मैं अपनें आप में
विश्वास खो बैठूँगा ।
***.***

ग़ज़ल 1
हथेली पे सूरज उगाया है मैंने ...

ख्वाबों को ऐसे सजाया है मैंने
हथेली पे सूरज उगाया है मैंने ।

आओ न तुम , तो मर्जी तुम्हारी
बड़े प्यार से पर बुलाया है मैंनें ।

लिखा ओस से जो तेरा नाम ले के
वही गीत तुम को सुनाया है मैंने ।

जीवन की सरगम तुम्ही से बनी है
तुझे नींद में गुनगुनाया है मैंने ।

मेरे आँसुओं का सबब पूछते हो
कतरा था यूँ ही बहाया है मेंने ।

**-**
रचनाकार - अनूप भार्गव को हाल ही में उत्तरप्रदेश के प्रतिष्ठित हिन्दी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.
**-**
कलाकृति - रेखा की स्याही से बनी कलाकृति - निर्मल-प्रेम

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