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कब लगा सर पे आसमान भी था?


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तरही शेर...

लफ़्ज के जून-अगस्त 06 अंक में ग़ज़ल लिखने के लिए तरह -

"तब लगा सर पे आसमान भी था"


समस्या-पूर्ति के रुप में दिया गया था.

इस दफ़ा पत्रिका ने उन तरही ग़ज़लों को प्रकाशित किया है. ग़ज़लें तो ख़ैर यहाँ प्रकाशित करना संभव नहीं है, हाँ, उन ग़ज़लों के खास ‘शेर' रचनाकार में प्रकाशित किए जा रहे हैं जिनमें इस ‘तरह' जैसे का तैसा इस्तेमाल किया गया है. आप देखेंगे कि इस ‘तरह' को शायरों ने किस बखूबी से, मनोरंजक तरीके से इस्तेमाल किया है.

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बिजलियाँ आ के जब गिरीं छत पर
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-अभय कुमार अभय

बाप का साया उठ गया सर से
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-पूरन अहसान

उठ गया जब ‘अनीस' का साया
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-अनीस अहमद खाँ ‘अनीस'

बेज़मीं कर दिए गए जब हम
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-डॉ. असलम इलाहाबादी

याद जब आया इम्तिहान भी था
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-सैयद मुहम्मद असलम

टूट कर जब गिरा अचानक वो
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-इब्राहीम अश्क

न रही जब जमीन पैरों में
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-अज़ीज़ अय्यूब जयपुरी

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मेरे हिस्से की उड़ गई जब छत
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-सतीश ‘बे-दाग़'

जब मेरे पाँव से जमीन खिसकी
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-मदन मोहन ‘दानिश'

जब उठा सर से बाप का साया
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-देवेन्द्र अत्रि

उठ गया वालदैन का साया
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-अब्दुस्सलाम ‘कौसर'

जब हुए तलघरों के क़ैदी हम
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-केशव शरण

जबकि पैरों तले जमीं न रही
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-फसीउल्लाह ‘नक़ीब'

जब भी पैरों तले जमीं निकली
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-अब्दुल अहद साज

सायबां जब गुबार बन के उड़ा
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-खुर्शीद तलब

जब मिरा बाप हो गया रुख़सत
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-गयास रहीम शकेब

और, पुरानी, मूल ग़ज़ल का शेर जिसमें से यह तरह उठाया गया था यह है-

सर पे जब आसमान टूट पडा
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

- जावेद अकरम

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