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माँ की अर्चना...

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अर्चना

- कुसुम लता त्यागी

वाणी का वरदान दो माँ ,

विश्व का कल्याण हो माँ

कर दूं मैं सब कुछ समर्पित ,

आपके चरणों मैं हे माँ


शब्दों का भंडार दो माँ ,

अर्थों का विज्ञान दो माँ

रच दूं मैं कुछ ऐसी कविता,

सृष्टि का उपकार हो माँ


लेखनी को दे दो वो बल ,

कर सके सत्कार्य हरपल

ज्ञान का प्रकाश दो माँ ,

चन्द्रमा की शीत दो माँ


करती है विनती कुसुम अब,

हाथ जोङ समक्ष खङी है

भाषा को संस्कार दो माँ ,

लिखने का आशीष दो माँ


आतंक का उत्तर हैं देवें ,

प्यार के दो बोलों से माँ

हो कृपा माँ, आपकी तो,

दुष्ट बन जाएँ सुजन माँ


क्या पता कब जन्म लेले,

इस युग में भी कोई गौतम ,

औ,बदल दे अपने बल से ,

डाकुओं की सोच हे माँ


आपकी कृपा जो होवे ,

असंभव भी संभव होवे

तलवार ने जो कर सकी ,

लेखनी वो कर देवे हे माँ


शील का उपहार दो माँ ,

लिख सकूं कुछ ऐसा सुन्दर ,

हो सके उद्धार जन का


(चित्र - श्रीमती शीला गर्ग की कैनवस पर तैलरंगों से बनी कलाकृति)


1 टिप्पणियाँ

  1. खुदा के लिए ये रुलाने वाली कवीताएं ना छापें
    हम परदेसीयों को कोई याद आए तो सबसे पहले वो मां है

    जवाब देंहटाएं

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