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व्यंग्य : फूल खिले हैं बेशरम...

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व्यंग्य :

फूल खिले हैं बेशरम-बेशरम

- रघुनंदन चिले

बेशरम का पौधा कितना सुहावना होता है. हमेशा हरा. हरित-क्रान्ति का प्रतीक. इसी तरह यदि हरित-क्रान्ति बारहों मास फूलती-फलती रहे तो दस साल में गरीबी दूर! चारों ओर अभिजात्य-वर्ग का साम्राज्य. कितना सुन्दर होगा यह देश! कोई गरीब नहीं होगा. सबके बंगले होंगे. सबकी कारें होंगी. भिखारी भी कार में बैठकर भीख मांगेगा. तब न कोई राजा भोज होगा, न कोई गंगू तेली.

बेशरम पर हल्के बैंजनी फूल उगे हैं. ये फूल मन मोहने में माहिर होते हैं. लोग कहते हैं कि ये केवल बेशर्म लोगों का ही मन मोहते हैं. पर मेरा निजी अनुभव है कि कथित शर्मदार भी इसकी ओर आकृष्ट होते हैं. आकृष्ट होने का सबसे बड़ा कारण है इसकी जीवटता. यह पौधा इतना जीवट होता है कि पानी है तो ठीक, नहीं है तो ठीक. खाद है तो ठीक, नहीं तो ठीक. सुरक्षा है तो ठीक, नहीं है तो ठीक. यह गुण आदमी ग्रहण कर ले, तो नेता की श्रेणी में आ जाता है. यह स्थिति कहलाती है स्थित-प्रज्ञ की. लात मारो तो जमे हैं, जूता मारो तो ठंसे हैं, और गाली दो तो लगे हैं. यश अपयश की रत्ती भर परवाह नहीं. सही मायने में आज का नेता किसी भी प्राचीन या अर्वाचीन ऋषि मुनि से कम नहीं है. मंत्रिमंडल से भगाओ तो गम नहीं. वापस बुलाओ तो रंज नहीं. इसी राजनीति को अति उच्च राजनीति का रूतबा दिया जा सकता है. कुछ नेता इसमें कच्चे हैं. वे जब सत्ता में रहते हैं तो पार्टी के गुण गाते हैं. जब नहीं रहते हैं तो पार्टी को और पार्टी-अध्यक्ष को गरियाते हैं. पार्टी से निष्कासन के बाद तो वे ज्यादा फ़्यूरियस हो जाते हैं. यह उन्माद की स्थिति है. उनके प्रलाप से हालांकि कुछ होता-जाता नहीं परन्तु फिर भी यदि कोई लगातार भौंकता रहे तो कानों के परदे पर आखिर प्रभाव तो पड़ता ही है. ध्वनि प्रदूषण होता है.

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मेरी राय है कि ऐसों को बेशरम का पौधा दिखाना चाहिए. उसके गुण-धर्म से उन्हें वाकिफ़ कराना चाहिए. वे समझदार हैं. इस पौधे से साक्षात्कार होते ही वे शान्त हो जाएंगे. उन पर सत्य उद्घाटित हो जाएगा, और वे मोक्ष को प्राप्त हो जाएंगे. बेशरम शरणं गच्छामि! जिसने इस परम सत्य को पा लिया वह परम मुक्ति को पा गया समझो. फिर उसे न सरकार बरखास्त होने का भय रहेगा और न मध्यावधि चुनाव होने का. इस आनन्द या सत्य या ब्रह्म की प्राप्ति करने वाले कितने ही जन फूल-फल रहे हैं.

‘फल-फूल रहे हैं' मुहावरा है. वैसे बेशरम में प्रत्यक्ष रूप से फल नहीं लगते. और यही बात उन लोगों पर सटीक बैठती है. इस तरह फूल-फल रहे, बेशरम-प्रेरित बेशर्मों का आभिजात्य-वर्ग मानसिक शान्ति रूपी फल कतई प्राप्त नहीं करता. जिस गलत-सलत खाद-कूड़े से वह पुष्ट होता है, वही वह स्वयं बन जाता है. कोई भी अनुकरणीय कार्य या उपलब्धि उसे जीवन में नसीब नहीं होती.

आज हमारे देश में जगह-जगह बेशरम फैला है. उसकी सुन्दर, सुकुमार और सुदृश्य डालों पर नयनाभिराम फूल खिले हैं. रस-लोलुप भंवरे उसके इर्द-गिर्द मंडरा रहे हैं. कुछ रस चूस रहे हैं, कुछ प्रेरणा ले रहे हैं.

ये फूल अब बंगलों की शोभा बढ़ाएंगे. गुलदस्तों में सजाए जाएंगे. जब नागफणी जो कभी जंगलों में हुआ करती थी, बंगलों में होने लगी है, तब निहायत प्यारे रंग के फूल देने वाला बेशरम क्यों नहीं बंगलों की शोभा बढ़ाए? नागफनी ‘कैक्टस' कहलाती है? इसका भी बाटनिकल नाम प्रचलित हो जाएगा तब मजे रहेंगे.

कवि शिवकुमार ‘अर्चन' की कुछ पंक्तियाँ मुझे याद आ रही हैं-

बंगले की नागफनी हँसती

आँगन की तुलसी रोती है.

अब सुकवि इसे इस तरह पढ़ा करेंगे-

बंगले का बेशरम हँसता है

आँगन का गुलाब रोता है.

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साभार: व्यंग्य संकलन - कदम ताल (प्रकाशक : जगत राम एंड संज़, IX/221, मेन बाजार, गांधीनगर दिल्ली 110032)

(चित्र: विनीता मेहरोत्रा की कलाकृति, कैनवस पर तैलरंग)

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