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अन्तरा करवड़े की 53 लघुकथाएँ - 4

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लघुकथाएँ 31-40 :

फर्क

"अरे रमा! कितने दिनों बाद देख रही हूँ तुझे। आ¸ जरा बैठ और सुरेश कहाँ है? टिंकू बबलू भी आए है ना?" बिन्नी चाची बड़े हुलास से अपने देवर देवरानी और उनके परिवार की आवभगत कर रही थी। बच्चे डरे सहमें से थे। बिन्नी चाची का पोता जब भी घर में होता¸ उन्हें किसी भी खिलौने को हाथ नहीं लगाने देता। उनसे सीधे मुँह बात भी नहीं किया करता। लेकिन आज वो नहीं था। बहू मायके गई हुई थी।

बिन्नी चाची का उत्साह रोके नहीं रूक रहा था। चाय नाश्ते से लगाकर बरसों पहले की सी गप्पों भरी बैठकें। फिर उन्होने बनाया हुआ ढेर से पकवानों का खाना। रमा को हाथ तक नहीं हिलाने दिया था उन्होने। सब कुछ कैसे फुर्ती से बना परोस रही थी। आग्रह कर खिला रही थी। गरम पूरी¸ भजिये¸ तीन चार सब्जियाँ¸ पापड़¸ दाल¸ कढ़ी¸ मीठा¸ रायता¸ चटनी¸ सलाद¸ अचार... क्या नहीं था खाने में? उसपर भी नन्हा बबलू मचल गया तो उसे हाथोहाथ पनीर के पकौड़े तलकर दिये थे।

रमा और सुरेश को ये माजरा कुछ समझ नहीं आ रहा था। यूँ तो घर में पैर धरते ही आँखे चुराती हुई बिन्नी चाची¸ जबर्दस्ती मुस्काती और बहू का गुणगान उसके ही गुस्सैल मुख पर करती बिन्नी चाची¸ हमेशा खाने में सूखे से और नाममात्र के पदार्थ परोसती बिन्नी चाची को अचानक हो क्या गया था? वे दोनों अनमने भाव से इस अलभ्य आगत्य का सुख उठाते रहे।

दिन भर के लिये बुलाया था उन्हें। शायद कोई कारण होगा। कुछ कहना चाहती होगी। हो सकता है रूपयों की जरूरत हो। नाना प्रकार के विचार यहाँ आने से पहले दोनों के मन में घर कर गये थे।

खाना खाकर फिर लेटे लेटे गप्पों का दौर चल पड़ा। नई पुरानी¸ रिश्ते नातों की¸ दोपहर वाली रसीली बातें। बच्चे भी अब खुलकर खेलने लगे थे। धरे - धीरे सभी ऊँघने लगे।

अचानक चार बजे चाची उठ बैठी। बचे हुए खाने का सामान करीने से प्लास्टिक की थैलियों में भरकर सामने की चौकिदारिन को दे आई। यहाँ तक कि पूरियों का बचा आटा¸ भजिये का घोल तक बाँट आई। बड़े बड़े बर्तन अलमारी में धर दिये। रसोईघर ऐसा दिखाई दे रहा था जैसे दिन भर से यहाँ खाना ही न बना हो। फिर वे झटपट चाय बना लाई।

रमा कौतूहल से उनके ये सारे क्रिया कलाप देखती रही। वो चाय पीते हुए पूछ ही बैठी इसका कारण। "भाभी! ये सब कुछ बाई को क्यों दे दिया? सब कुछ तो खाने लायक था?"

चाची का चेहरा गंभीर हो उठा¸ "पाँच की ट्रेन से बहू आ रही है। उसे मालूम हुआ तो..."

और वे पुन: वैसी ही कठोर हो उठी। जाने क्या क्या¸ कहाँ कहाँ दरक गया था।

रमा फुर्ती से उठी। चाय के बर्तन साफ कर¸ पोंछकर जगह पर रखे। बच्चों को तैयार किया। ठीक पाँच बजे चारों दरवाजे पर पहुँचे।

"भाभी! अब चलते है।"

चाची बहुत चाहती थी उन्हें रोकना लेकिन उनके कटे हाथ आज रमा ने देख लिये थे। परंतु उनका एक मन आज सुखी था। अरसे बाद¸ कुछ मन का कर पाई थी वे। बस मुस्कुराकर रह गई।

दोनों ओर के नयन भीग गये थे...

स्त्री

"अब मैं ऐसा क्या करूँ जो तुम खुश रहोगी?"

सुधीर हड़बड़ाकर उठ बैठा। माथे पर पसीने की बूँदें। तेजी से चलती हुई साँसें। ड़रा हुआ सा अंतर्मन। मस्तिष्क में असंख्य प्रश्न लहरों का उतार चढ़ाव। उसने घड़ी देखी¸ रात के दो बज रहे थे।

"ये रीमी के खयालात! नींद भी जकड़े बैठे है।" और उसके समक्ष¸ चम्पई आभा की मलिका¸ साधारण नैन नक्श वाली ठिगने कद की युवती सजीव हो उठी। यही है रीमी। उसकी नई क्लायंट।

अपने वकालत के पेशे में सुधीर रोजाना कितने ही अजीबोगरीब व्यक्तित्व से मिला करता था। विचित्र परिस्थितियों से दो - चार हुआ करता। स्वयं संयुक्त परिवार से होने के कारण पारिवारिक मामलों की जटिलता से वह सहज परिचित था। कई त्रासद परिस्थितियों में जीती हुई महिलाओं को उसने धीरज बँधाया था। उनके परिवारजनों को समझाईश देकर बदलाव लाने में भी सफल रहा था। बेटी के घर आ जाने से दुखी माँ - बाप उसके दरवाजे आते और माथे की सलवटों के स्थान पर चेहरे की आसभरी मुस्कान ले लौटते। टूटन की कगार पर खड़े कितने ही घरौंदे आज उसके प्रयासों के कारण मजबूती से तने खड़े थे। कई बार उसे अपनी इन उपलब्धियों को देखकर¸ लोगों का उसके प्रति कायम विश्वास देखकर आनंद होता। आखिर जिस उद्‌देश को सामने रखकर वह वकालत जैसे जटिल पेशे से जुड़ा था¸ वह कुछ हद तक पूरा होता दिखाई पड़ता था।

इसी संतुष्ट जीवन में दो साल पहले कमल चरणों से आई पत्नी रेणु ने एक नवीन उजास¸ उल्लास और पूर्णता भर दी थी। वैचारिक स्तर पर उसे भी कई बार रेणु की आकलन शक्ति का लोहा मानना पड़ा था। ऐसे अवसरों पर वह उससे यही कहा करता कि रेणू को ही उसकी जगह पर वकालत के लिये आना चाहिये था।

रेणु हँसकर रह जाती। उसे तो शौक था केवल विद्या दान करने का। कितने ही गरीब विद्यार्थी उससे अपनी शैक्षणिक समस्याओं का समाधान पाते। धन के लालच में न पड़ते हुए सुधीर और रेणु¸ एक दूसरे के पूरक बने हुए कितने अच्छे से जी रहे थे।

और उन्हीं दिनों¸ आज से लगभग साल भर पहले¸ रीनी¸ एक कंकड़ के जैसी सुधीर के चित्त में आ गिरी थी। शून्य में तकती आँखें¸ अपने आप में ही गुम¸ दुनिया से त्रस्त सी रीनी। पच्चीस साल की थी। पोस्ट ग्रॅज्युएट। घर में सबसे छोटी। स्वाभाविक ही उसके माता पिता उसका विवाह कर बरी जिम्मे होना चाह रहे थे। अब इसमें उनकी तो कोई गलती नहीं थी। लेकिन रीनी को उनके इन विवाह संबंधी प्रयासों में अपने खिलाफ किसी किस्म की साजिश नजर आती थी।

कभी - कभी वह अपने ऑफिस के सहकर्मियों से नाराज रहती। यदा कदा वह अपने नैराश्यपूर्ण विचारों से सुधीर के मन में भी अवसाद भर देती थी¸ जो धीरे से रेणु तक पहुँचते हुए माथे पर प्रश्नार्थक सलवटें छोड़ जाता था।

असल में रीनी आई थी सुधीर के पास एक सलाह माँगने। क्या वह अपने माता - पिता के खिलाफ ऐसा कोई कदम उठा सकती है जिससे वे उसे शादी के लिये बाध्य न कर सके?

सुधीर पहली बार में तो ये सुनकर ही सन्न रह गया था। फिर धीरे - धीरे रीनी का सुधीर के कार्यालय में आना - जाना बढ़ने लगा था। वक्त बेवक्त उसके लंबे लंबे फोन आने लगे। बिना किसी ठोस कारण के वह सुबकने लगती। इस पूरे संसार के प्रति¸ समाज के प्रति अपने मन की कड़वाहट उगलने लगती। उसे लगता जैसे सब कुछ उसके खिलाफ ही हो रहा है। कई बार उसने बीच रास्ते से फोन कर सुधीर को अपने महत्वपूर्ण कार्यों के बीच से उठाकर नाममात्र के कारणों के लिये परेशान किया था। सुधीर को भी खीज तो आती लेकिन व्यस्तता के चलते वह इसपर सोचने के लिये समय नहीं दे पाता था।

आजकल रीनी बेवजह ऑफिस में आने लगी है। "बस! तुमसे मिलने को जी किया।" या फिर¸ "मुझे ऐसा लगता है कि जिस दोस्ती को मैं बरसों से तरस रही थी¸ वो मुझे तुम्हारे रूप में मिल गई है।" ऐसे कुछ जुमले कहती और फिर एक अंतहीन¸ तथ्यहीन बातों का सिलसिला शुरू हो जाता। सुधीर जब इन बातों का ओर - छोर तलाशने जाता तो फिर वही खालीपन हाथ लगता। और फिर वह समय बर्बाद होने और काम समय पर न होने के कारण झुँझला उठता। लेकिन तब तक रीनी¸ विषय को बदलकर समय की कमी का बहाना बनाकर¸ सुधीर पर ही वक्त का ध्यान न रखने का जुमला फेंकते हुए रवाना होने लगती थी।

वह किसी भी तरीके से यह दिखाना चाह रही थी कि सुधीर को ही उससे मिलने¸ बतियाने में रस आता है। वह एक एक कर अपनी समस्याओं का पुलिंदा सुधीर के समक्ष खोलकर बैठ जाती। सुधीर एक के बाद एक उनके समाधान सुझाया करता। हर एक समाधान में कोई न कोई मीन मेख निकालती हुई वह¸ उसे बढ़ाते हुए¸ असंभव से नासूर में बदल देती और लाख कोशिशों के बावजूद हमेशा स्वयं को उपेक्षित¸ हालात की मारी हुई¸ निराशा से भरी हुई¸ इस दुनिया की अनचाही मेहमान के रूप में प्रस्तुत करती रहती।

उसकी ऐसी हरकतों से परेशान सुधीर उस रात को सोते से जाग पड़ा था। बगल में लेटी रेणु शांत भाव चेहरे पर लिये पड़ी थी। पानी पीने क लिये लैंप जलाने पर सुधीर आश्चर्यचकित रह गया। रेणु जाग रही थी। मंद - मंद मुस्काती हुई¸ जो कि उसकी हमेशा की आदत है¸ उसे एकटक देख रही थी। सुधीर पानी पीना भूल अपराधी सा माथे पर हाथ धरे बैठ गया। वह बखूबी जानता था कि रेणु की यह परिपक्व दृष्टि ही काफी है स्थिती को सम्हालने के लिये।

सुधीर मुखर हो उठा। रीनी और उसकी बातें¸ उसके विचार¸ अजीब सी अभिव्यक्ति। कभी भी और किसी भी तरीके से खुश न हो पाने वाली रीनी को सुधीर ने एक पहेली की भाँति रेणु से पूछ ही तो लिया था।

अपने आश्वस्त मुखमण्डल और अनुभवी विचारों से रेणु ने सुधीर को समझाया और एक छोटी सी तरकीब सुझाई। रेणु इस उम्र और पड़ाव की लड़कियों के फितूर बड़े अच्छे से जानती थी। वह समझ गई थी कि रीनी को शादी करनी तो है लेकिन अपने ठिगने कद और साधारण रूप रंग के कारण वह अवसादग्रस्त है। उसकी बड़ी बहनें और सहेलियाँ गोरे रंग¸ सुंदर नैन नक्शों की स्वामिनी और अपने समय में "हॉट प्रॉपर्टी" मानी जाती थी। उनके समक्ष रीनी लगभग शून्य ही थी।

तरकीब के अनुसार सुधीर ने रीनी से दूसरे ही दिन बात की।

"देखो रीनी! मैं तुम्हारी प्रतिभा की¸ तुम्हारे विचारों की कद्र करता हूँ । यदि तुम मेरे जीवन में रेणु से पहले आ जाती तो में तुम्हारे साथ भी उतना ही सुखी रह पाता जितना आज रेणु के साथ हूँ।"

रीनी चुपचाप सुनती रही। जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई हो। सुधीर कहता चला।

"मुझे ऐसा लगता है कि तुम अपना कीमती समय और शक्ति यहाँ व्यर्थ कर रही हो। जहाँ पहले से ही देर हो चुकी हो वहाँ कितनी भी सफाई देने के बाद भी बात तो बन नहीं सकती ना? तुम्हें अब यह देखना चाहिये कि जहाँ बात बन सकती हे वहाँ तुम बेवजह देर न कर दो!"

सुधीर धीरे से मुस्काया। रीनी पर मानों घड़ों पानी गिर गया हो। वह वहाँ से चलती बनी। छ: महीनों तक उसका कोई पता नहीं था।

फिर एक दिन डाक से एक कार्ड आया। रीनी और संजय शादी कर रहे थे। संजय उसके ऑफिस का सहकर्मी था। सुधीर हँसे बिना न रह सका। आखिर रीनी सही समय पर सही जगह पर मेहनत करके अपना उद्‌देश पा चुकी थी।

एकांत वास

उस धनाढ्‌य युवा व्यापारी की सफलता और आधुनिकता से लकदक जीवन शैली के किस्से मशहूर थे। उसकी बातचीत का तरीका¸ व्यापारिक समझ बूझ¸ एप्रोच आदी महत्वाकांक्षी युवाओं की फॉलो करने की चीजों में हिट लिस्ट पर थे।

देश विदेश में फैले व्यपार¸ लंबे लंबे सेमिनार्स¸ काँफ्रेंस और मैंनेजमेंट कमेटी की मीटींग्स में उलझे रहने के बावजूद कभी भी किसी ने उसे अपने व्यवहार को असंतुलित करते नहीं देखा। उसमें काम करने के लिये आवश्यक ऊर्जा और उत्साह हमेशा मौजूद रहता।

उसके बारे में मालूम करने वालों को जाने कहाँ से यह मालूम पड़ा कि वह हर दो महीने में एक हफ्ता भर एकांतवास में रहता है। और उसकी इसी तरीके से स्वयं को तरोताजा व एकाग्र रख पाता है। इसके अनुसार कई वे¸ जो उसके जैसा होना चाहते थे¸ उन्होने अपने गाँव के रिश्तेदारों¸ फार्म हाऊस आदि पर शरण ली। लेकिन उन्हें आशातीत सफलता नहीं मिली।

आखिर इसका एकांतवास है क्या?

एक उत्साहीलाल तो सीधा पूर्व निर्धारित समय लेकर उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने जा पहुँचा। उनकी कार्यशैली¸ निर्णयक्षमता आदी की तारीफें करने के बाद वह मन की बात पूछ ही बैठा।

"सर! हम सभी आपकी सतत्‌ ऊर्जा और काम करते ही रहने के उत्साह के कायल है। आप हमारे आदर्श है और हमें मालूम हुआ है कि आपकी ऊर्जा का रहस्य है दो माह में एक सप्ताह का एकांतवास। सर प्लीज बताईये आप किस रिसोर्ट¸ गाँव या फार्म हाऊस में जाते है जहाँ सही एकांतवास मिल सके?"

उसकी बात सुनकर वह युवा उद्योगपति हँस पड़ा।

"एकांतवास के लिये ये जरूरी नहीं कि किसी एकांत स्थान पर ही जाया जाए। तुम सच ही जानना चाहते हो तो सुनो। शहर की सबसे घनी बस्ती के एक बहुमंजिला भवन की छठी मंजिल पर बने एक फ्लैट में मैं इस एकांतवास का सुख भोगता हूँ । सभी अपने आप में ही इतने व्यस्त होते है वहाँ कि आपको किसी का साथ या दखल चाहकर भी नहीं मिलता। बोलो! बड़े शहर का सा एकांत कहीं और है क्या?"

युवक निरूत्तर था।

मानसिक व्यभिचार

अपने अकाउंट से लॉग आउट होते हुए रीटा पसीना पसीना होने लगी। कौन हो सकता है ये परफेक्ट गाय? उसकी कुछ बातों पर ही¸ आवाज के अंदाज पर ही उसे अपना मान बैठा है। कुछ क्षणों के लिये उसके मस्तिष्क में नीली सपनीली आँखों वाला एक गोरा चिट्‌टा¸ गठीला युवक अलग - अलग कोणों से आता - जाता रहा। अनजाने ही रीटा के चेहरे पर मुस्कान आती रही।

और फिर अचानक वो परफेक्ट गाय¸ अभिषेक में बदल गया। अभिषेक¸ उसका मंगेतर!

अपने मन में विचारों का तूफान लिये वह घर पहुँची। अपने कमरे की शरण ली। अभिषेक¸ उसका मंगेतर¸ दूसरे शहर में नौकरी करता है। ऑफिस में काम करते वक्त ऑनलाईन रहता है। रीटा उसी से वॉईस चैट करने के लिये कैफे गई थी। उसके लिये अभिषेक ने मैंसेज छोड़ रखा था। वह एक घण्टे के लिये मीटींग में व्यस्त था और ऑनलाईन होते हुए भी उससे संपर्क नहीं कर सकता था।

तभी रीटा के मैंसेंजर पर एक अनजान संदेश उभरा।

"हैलो स्वीटी!"

यही था परफेक्ट गाय! रीटा का लॉगिन नेम था स्वीट सॅन्योरीटा।और फिर थोड़ी बहुत पूछ ताछ के बाद उसने रीटा को वॉईस चैट के लिये राजी कर लिया। उसकी बातचीत¸ आवाज¸ लहजे की तारीफें करता हुआ वह दस मिनट में ही दिल¸ ईश्क¸ प्यार¸ मुहब्बत तक पहुँचते हुए उसे प्रेम प्रस्ताव देने पर उतर आया।

बिना देखे सोचे उत्पन्न हुए इस प्रेमी के लिये रीटा तैयार नहीं थी। कई बार उसने लॉगआऊट होने का सोचा लेकिन सहेली मोना क वाक्य याद आने लगे। "यदि कोई पीछे पड़ा ही है तो थोड़े बहुत मजे ले लेने में क्या हर्ज है?" और रीटा बह चली थी। उस वक्त उसके मन से अभिषेक जाने कहाँ गायब हो गया था। लेकिन जब यह परफेक्ट गाय उसका शहर¸ नाम¸ पता¸ फोन नंबर पूछकर घर आने की जिद पर अड़ गया तब रीटा को होश आया। ये क्या कर रही थी वो?

किसी तरीके से बहाने बाजी करते हुए उससे छुटकारा पाया और अब अपने कमरे में बुत सी बनी बैठी थी।

उसी समय घर के सामने से जय जयकार की आवाजों के साथ ही एक स्वामीजी की पालकी निकालने लगी। रीटा ने ध्यान से देखा। ये वही स्वामीजी थे जो कहने को तो ब्रम्हचारी थे लेकिन सदा औरतों की ओर ही ध्यान लगाए रखते। कॉलेज के दिनों में इनके कितने ही किस्से मशहूर थे।

इन्हीं किस्सों को सुनते सुनाते एक दिन रीटा की माँ के मुँह से निकाला था¸ "सब कुछ मन¸ वचन¸ कर्म से हो तो ठीक है। फिर चाहे ब्रम्हचर्य हो या गृहस्थी।"

रीटा का मन उसे अपराधी की भाँति कटघरे में खड़ा कर रहा था। वो स्वयं क्या कर रही थी?

भले ही अभिषेक को कभी कुछ मालूम नहीं होगा... लेकिन मन में बात तो आई ना?

दूसरे ही दिन उसने अभिषेक को मेल किया। "मैंने अपना लॉगिन नेम "स्वीटसैन्योरीटा" से बदलकर "रीटाअभिषेक" कर लिया है।"

अब वे दोनों खुश थे।

एहसान

"भूले बिसरे कभी हमारे घर भी आ जाया करो बेटी!"

आकांक्षा के पैर ठिठक गये। वैसे भी शहर के इस नये रहवासी इलको में अभी अभी रहने आई आकांक्षा को कोई इस तरह से पुकारेगा इसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। उसे इस तरह से असमंजस में पड़े देख आवाज लगाने वाली महिला बोली¸ "बेटी मैं! प्रमिला अग्रवाल। श्यामली की मम्मी।"

"अ...अच्छा आँटी! आप यहाँ?"

कितना कुछ सोचते और याद करते हुए कहा था आकांक्षा ने यह। बचपन की सहेली की माँ और वह भी इतने सालों के बाद मिली थी। बातचीत का लंबा चौड़ा दौर निकल पड़ा। बात बात पर प्रमिला जी आकांक्षा की एहसानमंद होती जा रही थी। असल में आकांक्षा ने श्यामली को उसके परिवारवालों के विरोध के बावजूद कॉलेज की पढ़ाई के लिये प्रेरित किया था जो आज शादी के बाद उसके बड़े काम आ रही थी।

"श्यामली तो दिन रात तुम्हारा नाम जपती है!"

और बातचीत¸ आतिथ्य के बाद चलते चलते उन्होने उदार मन से आकांक्षा की कई समस्याएँ हल कर दी जो नई जगह आने पर सामान्यत: हर किसी को पेश आती है। कामवाली बाई¸ धोबी¸ सब्जीवाला¸ बिल भरनेवाला व्यक्ति इन सभी सुविधाओं से लैस वह अपने नये घर में पहुँची तब वहाँ का अकेलापन खाने को दौड़ता था।

उसे स्वयं के संयुक्त परिवार से अलग होते समय अपने पति से हुई बहस के दौरान के अपने तर्क याद आए।

"उन्होने तुम्हें पाल पोसकर बड़ा किया¸ इंजीनियर बनाया तो क्या एहसान किया? ये तो उनका कर्तव्य था। और यदि एहसान किया भी तो क्या उसके बदले में तुम जिंदगी भर उनका नाम जपोगे?"

श्यामली यदि कुछ दिनों के साथ और एहसान को ताउम्र याद रख सकती है तब : जीवन देने और जीने लायक बनाने के एहसान के बदले में माँ बाप को...

शाम तक उसका वापसी का सामान पैक हो चुका था।

बार कोडिंग

"इस क्रीम पर ये रेखाएँ किस चीज की खिंची है बेटा?" शर्माजी ने आश्चर्य और कौतूहल से उस क्रीम की महँगी बोतल को टटोलते हुए पूछा। बालों को रंगने का विदेशी प्रसाधन बेटा खास उन्हीं के लिये जो लाया था।

"इसे बार कोडिंग कहते है पापा। नये जमाने की उत्पादन की जानकारी देने वाली तकनीक। कोडवर्ड्‌स में उत्पादन संबंधी जानकारी होती है इसमें।"

फिर कुछ दिनों के बाद¸ घर में बढ़ते तनाव के चलते एक दिन बेटा उनसे जरूरी बातें करने के नाम पर अलग होने की तैयारी दिखा गया। अगले महीने से वे दूसरे बेटे के घर पर रहने वाले थे।

रात को न चाहते हुए भी बहू बेटे की बातचीत कानों पर पड़ी। बेटा कह रहा था¸

"तीन चार बार मैं भी उन्हें घर के बिगड़ते बजट का हवाला दे चुका था। उनके दवाईयों के बिल्स भी बताए थे उन्हें। और तो और उनके लिये रखे नौकर का हिसाब किताब बी बताया था। तब भी वे समझ नहीं पाए और यहीं डटे रहे। खैर! आज उन्हें सारी बात साफ कर दी है। बस इस महीने की ही बात है।"

शर्माजी वहीं जड़वत रह गये। घर का बिगड़ता बजट¸ दवाईयों के बिल¸ नौकर का हिसाब किताब ये सभी एक एक कर लंबी रेखाओं में बदलते गये और शर्माजी उस बारकोड में बेटे का मंतव्य ढूँढ़ते रहे।

निर्गुण फ्यूजन

"बहू! राजीव आजकल दिखता ही नहीं। परीक्षाएँ नजदीक है क्या?"

"नहीं माँजी! वो उसके ग्रुप को एक फ्यूजन कंसर्ट का प्रोजेक्ट मिला है। उसी पर काम चल रहा है। आज शाम को ग्रुप का रिहर्सल है वर्माजी के घर पर। आप चलेंगी?"

"हाँ हाँ जरूर! राजीव को भी गाते हुए सुनूंगी।"

शाम को ग्रुप का प्रदर्शन सचमुच शानदार रहा। सारे लड़के लड़कियाँ सुरीले थे और ताल पक्ष भी उम्दा था। लेकिन सब कुछ अच्छा होने के बावजूद सुनने वालों में से अधिकांश को समझ नहीं आया कि वो था क्या। घर आने पर दादी अपने आप को रोक नहीं पाई और राजीव से पूछ ही बैठी।

राजीव ने समझाते हुए कहा¸ "दादी! सुनने में अच्छा लगा ना? एक रिलेक्सेशन फीलींग¸ फेंटेसी¸ सूदिंग इफेक्ट सब कुछ देने का प्रयास किया था हमने । एक्चुअली दादी! ये नय जमाने का फ्यूजन म्यूजिक है जिसमें बंधनमुक्त टाईप का एक्सप्रेशन होता है। किसी राग¸ ताल या समय की बंदिश नहीं होती। बिना किसी भाव के बस संगीत के स्वरों में¸ अपने में उतरकर एक तरीके की उपासना की जाती है। ये है नया इनवेन्शन¸ फ्यूजन म्यूजिक...ता...रा...रा...।"

राजीव ने फ्यूजन की फेंटेसी में गुम होते हुए अपने कमरे की राह ली। दादी इन निर्बन्ध¸ निस्सीम परिभाषाओं¸ नये कहे जाने वाले आविष्कार को कबीर की सदियों पुरानी निर्गुण भक्ति साधना से तौलती रही। आदी शंकराचार्य के अद्‌वैत और विशिष्टाद्‌वैत को तौलती रही।

उनके चेहरे पर संतोष के भाव उभर आए। आज भी हमारी जड़ें मजबूत है। वे निश्चिंत थी।

बेटा बिगड़ रहा है!

स्कूल में उन दिनों मुख्य आश्रम से आए हुए स्वामीजी प्रतिदिन बच्चों को जविनोपयोगी शिक्षाएँ देते थे।

घर लौटकर रोहित मम्मी से कहने लगा¸ "मम्मी आज सुबह मैंने आप के साथ अच्छा बिहेव नहीं किया। आई एम सॉरी। मुझे आज भी टिफिन में केक चाहिये था। लेकिन आपने ठीक ही कहा था कि रोज केक खाना भी तो ठीक नहीं है। मैं आगे से ऐसा नहीं करूँगा।"

मम्मी आश्चर्यमिश्रित कौतूहल से उसे टटोलती हुई कहने लगी¸ "तुझे अचानक क्या हो गया है? किसने सिखाई ये सारी बातें?"

"वो स्कूल में स्वामीजी रोज प्रेयर के बाद पहला पीरियड लेते है। हमें बड़ा अच्छा लगता है उनकी बातें सुनना। हमेशा सच बोलना¸ मम्मी पापा का रिस्पेक्ट करना और किसी से नहीं झगड़ना। अब मैं कोशिश करूँगा ये सब करने की।"

रात को मम्मी¸ पापा के सामने चिंता जाहिर करते हुए कह रही थी¸ "रोहित के स्कूल के बारे में फिर से सोचना पड़ेगा। जाने कौन से बाबाजी आकर पुरानी सी बातें कहते रहते है। सच बोलो¸ झगड़ो मत वगैरह। पढ़ाई वढ़ाई छोड़ बिगाड़ रहे है अभी से।"

पापा ने भी सहमतिसूचक सिर हिलाया। हाई सोसाईटी गेट टुगेदर्स में सभी रटी रटाई पोयम्स सुनाते बच्चों के बीच उन्हें स्वामीजी बातें दोहराता रोहित सचमुच खटक रहा था।

मन की शांति

"जब तक मन में भिन्न - भिन्न विचारों का प्रसार होता रहता है¸ मन शांत नहीं रहता। विचारों से¸ सत्य - असत्य से परे की स्थिती ही सच्ची साधना का पथ है।"

स्वामीजी का प्रवचन सुन रही मिसेस सोनी¸ धीरे से मिसेस अग्रवाल की ओर रूख करती हुई फुसफुसाई¸ "जानती है आप? जोशीजी की बहू की घर में किसी से जरा नहीं जमती। जरा सासूजी ने कमरे की सफाई को कहा तो दूसरे ही दिन रानीजी चली मायके।"

"हाँ! मैंने तो ये भी सुना है कि माँ-बाप ने दहेज के साथ दो नौकरानियाँ भी दी है¸ जिनके तेवर सहते-सहते¸ मिसेस जोशी बीमार पड़ गई है।"

दोनों चुपचाप मुस्कुराई। फिर मिसेस सोनी ने कहा¸ "स्वामीजी कितनी सच्ची बातें कहते है! कब से ढूँढ़ रही थी आपको ये सब कुछ बताने के लिए। अब आपसे मन की बात कह दी है तो कितना शांत और प्रसन्न लग रहा है।"

और दोनों ने एक दूसरे पर एक अर्थपूर्ण मुस्कान बिखेरी और पुन: दत्तचित्त हो प्रवचन सुनने में लग गई।

ओपन लाईफ स्टाईल

"रीना! कल तुम शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में गई थी?"

"हाँ मम्मी! मैं और अभि थे वहाँ। आप भी थी क्या वहाँ? तो हमें जॉईन क्यों नहीं किया?"

"मेरे साथ पड़ोस की सिंघल आंटी भी थी। और ये अभि कौन है? सिंघल आंटी ने ही पॉईंट आऊट किया तुम्हें। मुझे तो ये भी मालूम नहीं था कि तुम किसके साथ हो! कम से कम घर से निकलने से पहले बता तो सकती हो ना? कितना इंबरेसिंग फील हुआ मुझे।"

"आप भी न मम्मी! आऊट डेटेड पीस के जैसी बातें करती हो। सुनो मम्मी! घर से बाहर निकलने के बाद मालूम होता है क्या कि कि कौन मिलेगा¸ कहाँ जाना होगा¸ किसके साथ रहेंगे? और फिर मैंने कुछ छुपाया तो नहींी ना? मम्मी ये ओपन लाईफ स्टाईल है। प्लीज इसमें अपना पुरातनपंथी विचारों वाला लेक्चर मत दे देना। आजकल के लड़के लड़कियों की इमेज इतनी फ्री है कि कोई किसी भी चीज को माईंड़ नहीं करता। एण्ड़ डोन्ट वरी¸ सिंघल आंटी कोई तोप तो नहीं हे ना!"

मम्मी उसे ये कहती कि सिंघल आंटी नहीं भी होती साथ तब भी उन्हें खुद अच्छा नहीं लगा था रीना का ऐसे घूमना लेकिन तब तक तो वो गार्डन पार्टी के लिये निकल चुकी थी।

रात गये लौटी रीना खिन्न मन से बैठी रही। "मम्मी आप कॉफी हाऊस में बैठी थी आज ?""

"हाँ! दिलीप के साथ। मेरे कॉलेज टाईम का फ्रेंड़ है। श्रद्‌धा का वेट कर रहे थे। उसकी वाईफ! उसका ऑफिस पास ही में है। क्यों?"

"मैं और रानी वहाँ से पास हो रहे थे। मैंने तो किसी दिलीप अंकल को कभी नहीं देखा। मैं रानी को क्या एक्सप्लेन करती। कितना इन्सल्टिंग फील किया मैंने।"

"सच! मतलब सारी औपन लाईफ स्टाईल तुम अपने लिये ही रखना चाहती हो। इसमें से कुछ मम्मी पापा के लिये भी तो होना चाहिये ना!"

"सॉरी मम्मी।"

"देखो रीना! जो तुम कह रही थी¸ वो स्वतंत्रता है लेकिन जो कर रही हो¸ उसे उच्छृंखलता कहेंगे। ओपन लाईफ स्टाईल में विचारों को स्वतंत्र करो लेकिन अपने व्यवहार को सीमा में रखना सीखो। यदि तुम्हारी मम्मी पापा से कुछ अपेक्षाएँ है तो क्या ऐसा उन्हें नहीं लग सकता?"

"ठीक है बाबा! अब और ज्यादा लंबा मत बोलना। सुनो! मैंने स्टड़ीज के लिये टीना को घर पर बुलाया है और हाँ! अभि¸ आई मीन अभिषेक का फोन आए तो कहना मैं नहीं हूँ।"

अंतरयामी

मेरी दादी¸ पूजा पाठ¸ जप तप में दिन रात लगी रहती है। हमारे घर ठाकुरजी के स्नान प्रसादी के बगैर कोई भी अन्न मुँह में नहीं डालता। दादी फिर ठाकुरजी का श्रृंगार करती है¸ उनकी बलाएँ लेती है¸ लड्‌डू गोपाल को मनुहार से प्रसाद खिलाती है। उनके एक प्रभुजी महाराज है। बड़े तपस्वी¸ ज्ञानी संत है। ठाकुरजी के परम्‌ भक्त । ठाकुरजी उनसे स्वप्न में आकर बातें करते है। ऐसा दादी हमें बताती है। कभी - कभी हमें भी अपने साथ मंदिर में ले जाकर उनसे आशीष दिलवाती है। वहाँ बड़े अच्छे - अच्छे पकवान मिलते है खाने को। लेकिन वो कितना ही जिद करो¸ रोज ले ही नहीं जाती।

दादी कहती है¸ प्रभुजी महाराज अंतरयामी है। मेरे पूछने पर उन्होंने हँसते हुए यह बताया भी था कि जो सामने वाले के मन की बातें जान ले¸ उसे अंतरयामी कहते है। बड़ी कठिन तपस्या से ये बल मिलता है। मैं आँखें फाड़े सुनती रही थी उनकी ये बातें।

फिर कुछ दिनों के बाद दादी ने बड़ा ही कठिन व्रत रखना शुरू किया। दिन भर बस फल और दूध और रात में नमक का फरियाल। ऐसा वे लगातार दो महीने तक करने वाली थी। उनकी तबीयत खराब होती¸ उपवास सहन नहीं होते लेकिन डॉक्टर के स्पष्ट मना करने के बावजूद वे किसी का भी कहा नहीं माना करती।

मैंने उनसे काफी पहले यह पूछा था कि कठिन व्रत उपवास आखिर क्यों किये जाते है? तब उन्होंने मुझे बताया था कि किसी मनोकामना की पूर्ति के लिये ही ऐसा किया जाता है। मुझे समझ में नहीं आया कि इस उम्र में उनकी ऐसी क्या मनोकामना हो सकती है जो वे इतना कठिन व्रत कर रही है।

मैंने माँ से पूछा। मां ने मुस्कुराकर जवाब दिया¸ "तेरी दादी को इस घर में एक कुलदीपक चाहिये है। तेरा छोटा भाई! तभी तो ये सब कर रही है वे।" मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ। फिर व्रत की पूर्णाहूति पर मैंने उन्हें भोग लगाते समय ठाकुरजी से कहते सुना¸ "एक कुलदीपक की कृपा करो प्रभु। तुम्हारे लिये सोन की बंसरी बनवा दूँगी।"

यानी माँ की बात सही थी। लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई। यही कि प्रभुजी महाराज के जैसे माँ ने भी तो दादी के मन की बात जान ली थी। फिर दादी उसे अंतरयामी क्यों नहीं कहती?

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टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 3
  1. अच्छी कहानियाँ है। क्या ये कहानियाँ मराठी से अनूदित हैं?

    जवाब देंहटाएं
  2. अतुल,
    ये मुझे नहीं पता. अंतरा जी से पूछना पड़ेगा. शायद वे यह आपकी टिप्पणी पढ़ रही हों और यहाँ टिप्पणी के माध्यम से जवाब दें.

    जवाब देंहटाएं
  3. बेनामी7:09 pm

    ye kahaniya Hindi me hi likhi gayi hai. aapne padhkar pratikriya di, iske liye dhanyavaad.

    जवाब देंहटाएं
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रचनाकार: अन्तरा करवड़े की 53 लघुकथाएँ - 4
अन्तरा करवड़े की 53 लघुकथाएँ - 4
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