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असग़र वजाहत का ईरान व आज़रबाईजान यात्रा संस्मरण 2

(असग़र वजाहत - इस्फ़हान के सड़क पर शाहरूख़ खान के पोस्टर के साथ)


अनुक्रम यहाँ देखें

अध्याय 1

मिट्टी का प्याला

दोनों तरफ़ सूखे, निर्जीव, ग़ैर आबाद पहाड़ थे जिन पर लगी घास तक जल चुकी थी। सड़क इन्हीं पहाड़ों के बीच से बल खाती गुज़र रही थी, रास्ता वही था जिससे मैं इस्फहान से होता शीराज़ पहुंचा था और अब शीराज़ से साठ किलोमीटर दूर 'परसीपोलस' यानी 'तख्ते जमशेद' देखने जा रहा था। शीराज़ में पता लगा था कि 'तख्ते जमशैद' तक 'सवारी' टैक्सियां चलती हैं। इरान में 'सवारी' का मतलब वे टैक्सियां होती हैं जिन पर मुसाफिर अपना-अपना किराया देकर सफ़र करते हैं। ये सस्ती होती हैं। 'तख्ते जमशैद' तक जाने के लिए मैं शीराज़ के बस अड्डे पर 'सवारी' की तलाश में आया था लेकिन टैक्सी वाले ने मेरी मर्ज़ी के खिलाफ़ मुझे एक टैक्सी में ठूंसा और टैक्सी चल दी। मैं 'सवारी' कहता रह गया लेकिन मेरी किसी ने एक न सुनी। भाषा न आने की सज़ा मिलती है। मुझे इस यात्रा के दौरान इस तरह की छोटी-बड़ी सजायें मिलती रही हैं। मेरे ख्याल से मुझे पांच हज़ार रियाल देने थे और इस टैक्सी में मेरे अलावा चार और लोगों को भी होना चाहिए था लेकिन मैं अकेला था और ज़ाहिर था कि चार दूसरे लोगों का किराया भी मुझसे ही वसूल किया जाना था। बहरहाल वीरान पहाड़ों पर करीब सवा घण्टे चलने के बाद टैक्सी ड्राइवर ने 'तख्ते जमशैद' की पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर दी। सामने दूर तक फैले खण्डहरों में ऊंचे-ऊंचे खंभे ही नुमाया थे।

(इस्फ़हान के सड़क पर एक और पोस्टर)

ईसा से सात सौ साल पहले ईरान के एक जनसमूह ने जो अपने को आर्य कहता था, एक बहुत बड़ा साम्राज्य बनाया था। यह पूर्व में सिंध नदी से लेकर पश्चिम में डनदुब नदी और उत्तर में अरल झील से लेकर ईरान की खाड़ी तक फैला हुआ था। इतिहास में इस साम्राज्य को 'हख़ामनश साम्राज्य' के नाम से याद किया जाता है। अंग्रेजी में इसे 'अकामीडियन' साम्राज्य कहते हैं। बड़े आश्चर्य की बात है कि यह अपने समय में तो महत्वपूर्ण था ही हमारे समय में भी इसका महत्व बना हुआ है। इस साम्राज्य के एक महान शासक दारुस प्रथम ( 486 ई.पू.) ने विश्व का पहला मानव अधिकार दस्तावेज़ जारी किया था जो आज भी इस दस्तावेज़ का महत्वपूर्ण है। 1971 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने अनुवाद विश्व की लगभग सभी भाषाओं में कराया था ओर यह बांटा गया था। दस्तावेज़ मिट्टी के बेलन जैसे आकार के पात्र पर खोदा गया था और उसे पकाया गया था ताकि सुरक्षित रहे।

(हफ़ीज शीराज़ी का मज़ार)

दारुस ने बाबुल की विजय के बाद इसे जारी किया था। कहा जाता है कि यह मानव अधिकारों संबंधी दस्तावेज़ फ्रांस की क्रांति (1789-1799 ई.) में जारी किए गये मानव अधिकार मैनेफ़ैस्टो से भी ज्यादा प्रगतिशील है। घोषणापत्र के अंश इस प्रकार हैं_ . . . अब मैं अहुर मज्द ; अग्निपूजकों के सबसे बड़े देवता की मदद से ईरान, बाबुल और चारों दिशाओं में फैले राज्यों का मुकुट अपने सिर पर रखते हुए यह घोषणा करता हूं कि मैं अपने साम्राज्य के सभी धर्मों, परम्पराओं और आचार-व्यवहारों का आदर करूंगा और जब तक मैं जीवित हूं तब तक मेरे गवर्नर और उनके मातहत अधिकारी भी ऐसा ही करते रहेंगे। मैं अपनी बादशाहत किसी देश ; राज्य पर लादूंगा ; आरोपित नहीं करूंगा। इसे स्वीकार करने के लिए सभी स्वतंत्र हैं और अगर कोई इसे अस्वीकार करता है तो मैं उससे कभी युद्ध नहीं करूंगा। जब तक मैं ईरान, बाबुल और चारों दिशाओं में फैले राज्यों का सम्राट हूं तब तक मैं किसी को किसी का 'शोषण' नहीं करने दूंगा और अगर यह होता है तो 'शोषित' का पक्ष लूंगा और अपराधी को दण्डित करूंगा। जब तक मैं सम्राट हूं तब तक बिना पैसे लिए-दिए या उचित भुगतान किए बिना कोई किसी की चल-अचल सम्पत्ति पर अधिकार न कर सकेगा। जब तक मैं जीवित हूं तक बेगार, बलात काम लिए जाने का विरोध करता रहूंगा। आज मैं यह घोषणा करता हूं कि हर आदमी अपना धर्म चुनने के लिए आज़ाद है। लोग कहीं भी रहने के लिए स्वतंत्र हैं और वे कोई भी काम कर सकते हैं जब तक कि उससे दूसरों के अधिकार खण्डित न होते हो. . .किसी को उसके रिश्तेदारों के किए की सज़ा न दी जायेगी। मैं गुलामी; दासप्रथा को प्रतिबंधित करता हूं और मेरे साम्राज्य के गर्वनरों तथा उनके अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि आदमी और औरतों को गुलाम की तरह बेचने खरीदने को अपने क्षेत्रों को समाप्त करें. . .गुलामी को पूरे संसार से समाप्त हो जाना चाहिए . . .मैं असुर मज्द से कामना करता हूं कि साम्राज्य के प्रति मुझे अपने आश्वासनों को पूरा करने में सफ़लता दें।

(हफ़ीज शीराज़ी का मज़ार - एक और दृश्य)

ईसा से पांच सौ साल पहले दारुस महान ने अपने साम्राज्य का आधार फ़ेडरल सिस्टम ऑफ़ गवरर्नेन्स ; गणतांत्रिक राज्य व्यवस्था बनाया था। राज्यों को काफ़ी अधिकार किए गये और केन्द्र की नीतियां उदार तथा जनहित में थी। साम्राज्य की आय का सबसे बड़ा स्रोत व्यापार कर था जिसे बढ़ाने तथा व्यापारियों की सुरक्षा पर साम्राज्य ध्यान देता था। दारुस ने अपने साम्राज्य के दो कोने को जोड़ने वाले एक ढाई हज़ार मील लंबे राजमार्ग का निर्माण भी कराया था। इतिहासकार कहते हैं कि पूरे साम्राज्य में डाक की व्यवस्था इतनी उत्तम थी कि डाक साम्राज्य के एक कोने से दूसरे कोने तक पन्द्रह दिनों में पहुंच जाती थी।

शताब्दियों तक दारुस महान की राजधानी 'तख्ते जमशैद' पहाड़, पत्थरों, मिट्टी, धूल और उपेक्षा के पहाड़ों के नीचे दबी पड़ी रही। यह इलाक़ा 'कोहे रहमत' के नाम से जाना जाता है। रहमत का मतलब ईश्वरीय कृपा है। 1931-1934 के बीच यहां अमेरिकी विश्वविद्यालयों के पुरातत्व विभागों ने खुदाई का एक व्यापक अभियान चलाया था ओर दारुस की राजधानी के अवशेष सामने आये थे।

ईरानी सरकार जो प्राय: पर्यटन के प्रति उदासीन है 'तख्ते जमशैद' की उपेक्षा नहीं कर पायी है। यहां पर्यटन विभाग के कार्यालय और पयर्टकों के लिए अन्य सुविधाएँ मौजूद हैं। यह अब ईरान का ही नहीं बल्कि विश्व का एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल बन गया है।

'तख्ते जमशैद' आने से पहले कहीं पढ़ा था और लोगों ने बताया भी था कि खण्डहरों को देखकर यह कल्पना करनी चाहिए कि यह इमारत कितनी विशाल रही होगी। विस्तार का अंदाजा तो दूर से हो जाता है। कोहे रहमत के नीचे ऊंचे खंभों का लंबा सिलसिला और सामने के पहाड़ों को काट कर तराशी गयी मूर्तियां तथा गुफ़ाएं कई किलोमीटर में फैले नज़र आने लगते हैं।

मुख्य इमारत का जाने के लिए सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आया तो ऊंचे-ऊंचे पत्थर के खंभे नज़र आये। यह दारुस का दरबार हाल था। इन खंभों पर खड़ी इमारत की कल्पना करते हुए मैंने इसकी तुलना लाल किले के दीवाने आम से की तो दीवाने आम बच्चों का खेल लगा। दारुस के दीवाने आम के खंभों की ऊंचाई लाल किले वाले खंभों से कम से कम तीन गुनी है। लंबाई और चौड़ाई में भी दारुस का दीवाने आम शाहजहां के दीवाने आम से छ: सात गुना बड़ा होगा। आश्चर्य यह होता हे कि इतने बड़े दीवाने आम में हज़ारों लोगों तक सम्राट या अन्य अधिकारियों की आवाजें क़ैसे पहुंचती होगीं और व्यवस्था कैसे बनायी जाती होगी।

दारुस ने 'परसीपोलिस' यानी 'तख्ते जमशैद' निर्माण (518 ई.पू.) के आसपास शुरू किया था और सौ साल बाद यह निर्माण कार्य पूरा हुआ था। दारुस ने 'तख्ते जमशैद' की परिकल्पना केवल एक महल या क़िले के रूप में नहीं थी। वह राजसी इमारतों के ऐसे विशाल समूह का निर्माण करना चाहता था जिसकी कोई दूसरी मिसाल न हो। वह चाहता था कि साम्राज्य की शक्ति, वैभव, सम्पन्नता, बुद्धिमत्ता और सौंदर्य प्रियता को दर्शाने वाली इमारतों की एक बेमिसाल प्रस्तुति की जाये जो अद्वितीय हो। दारुस के पुत्र ज़ेरज़ेस ( 519-465 ई.पू.) की शपथ_ मैं उस काम को पूरा करूंगा जो मेरे पिता ने शुरू किया था। दीवार पर अंकित है।

(इस्फ़हान का एक भवन)

ऊपर तेज़ सूरज चमक रहा था जिसकी रौशनी में कई किलोमीटर फैले खण्डहर अतीत की रहस्यमयी कहानियां सुना रहे थे। पर्यटक यहां काफ़ी थे लेकिन क्षेत्र इतना बड़ा था कि वे बस खेत में कुछ दानों की तरह छिटके हुए दिखाई पड़ रहे थे। कुछ पर्यटक बहुत दूर 'कोहे रहमत' में बनायी गयी गुफ़ाओं के मुख पर बनी देवताओं की मूर्तियां देख रहे थे और इतने छोटे लग रहे थे कि उन पर नज़र जमाना भी मुश्किल था। दीवाने आम के पीछे दूसरी इमारतों के खण्डहर थे जो दूर तक फैले चले गये थे और 'कोहे रहमत' में बनी गुफ़ाओं से मिल गये थे। एक दिन यह सब देखने के लिए नाकाफ़ी था। दरवाज़ों पर पत्थर में काटी गयी देवताओं की मूर्तियां, कहीं सिपाहियों की आकृतियां और पहाड़ों पर युद्ध के उकेरे दृश्य साम्राज्य और सम्राटों की जिंदगी के जीवित दस्तावेज़ लगते थे।

'तख्ते जमशैद' से कुछ किलोमीटर दूर 'नक्शे रुस्तम' है। रुस्तम एक पौराणिक चरित्र है जिसने फिरदौसी के 'शाहनामे' में अमर कर दिया है। रुस्तम ने कला और मार्मिकता की ऊंचाइयों को छू लिया है। बुनियादी तौर पर योद्धा होने के साथ-साथ वह प्रेमी भी है। संवेदनशील पिता भी है और एक त्रासदी का नायक भी है। 'नक्शे रुस्तम' पहाड़ पर एक ऐसी जगह हे जो समतल है। कहा जाता है रुस्तम यहां नाचा था इस कारण पहाड़ क़ा यह हिस्सा समतल हो गया है। 'नक्शे रुस्तम' पहाड़ी को सम्राटों की गैलरी कहा जाये तो ग़लत न होगा। यहां 'हख़ामनश' साम्राज्य ही नहीं बल्कि पूर्व और परवर्ती साम्राज्यों जैसे सासानी साम्राज्य के सम्राटों ने भी अपनी विजयों से संबंधित चित्र पत्थर पर अंकित कराये हैं। इस स्थान पर सम्राटों के मकबरे बनाने तथा उन पर इतिहास अंकित करने की भी परंपरा रही है। यही पत्थर पर तराश कर बनाये गये चित्रों में सासानी सम्राट शापुर प्रथम (241-272 ई.पू. )का वह प्रसिद्ध चित्र भी है जिसमें ईरानियों द्वारा पराजित रोम का सम्राट वैलेरियन घुटने टेके शापुर प्रथम के सामने बैठा है और शापुर घोड़े पर सवार हैं। कुछ इतिहासकार तो कहते हैं कि ईरान के सम्राट शापुर प्रथम ने पराजित रोम में सम्राट को अपने दरबार में चारों हाथों पैरों पर चलकर (260 ई.पू.) आने के लिए बाध्य किया था। इस घटना का आतंक शताब्दियों कायम रहा था।

(इस्फ़हान का प्राचीनकालीन पुल)

कोई गाइड किसी पर्यटन ग्रुप को एक दीवार दिखाकर बता रहा था कि कभी यह दीवार इतनी चमकीली हुआ करती थी कि लोग इसमें अपनी शकल देख लिया करते थे। इस तरह की न जाने कितनी गाथाएं यहां से जुड़ी हैं। कहते हैं कि किसी पौराणिक सम्राट जमशैद की भी यही राजधानी होती थी और उसके पास एक दैवी प्याला था जो 'जामे जमशैद' के नाम से मशहूर था। जमशेद का ज़िक्र भी फिरदौसी ने 'शाहनामा' में भी किया है। प्याले में वह पूरे संसार की छबियां तथा भविष्य ओर भूत को देख सकता था।

'तख्ते जमशैद' बनने के केवल दो सौ साल बाद हख़ामनश साम्राज्य (550-530 ई.पू.) का पतन सिकन्दर महान के हाथों (331-323 ई.पू.) हुआ। उसने साम्राज्य की राजधानी को जलाकर राख कर दिया था और लूट को बीस हज़ार ख़च्चरों और पांच हज़ार ऊंटों पर लाद कर ले गया था। इतने बड़े साम्राज्य के इस दर्दनाक पतन से प्रेरित होकर ही शायद मिर्ज़ा ग़ालिब ने लिखा होगा_

और ले आयेंगे बाज़ार से गर टूट गया

जामे-जम से मेरा जामे सिफ़ाल अच्छा है

यानी जमशैद के जाम-जम से तो अच्छा मेरा मिट्टी का प्याला है। और ले आयेंगे बाज़ार से अगर टूट गया।

(क्रमशः अगले अंक में जारी)

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4 टिप्पणियाँ

  1. रवि जी,

    बहुत सुन्दर संस्मरण है। कई नई बातें मालुम हुईं। वर्तनी की गलतियाँ कुछ अधिक हैं। "राजधानी" को हर जगह "राजधनी" लिखा गया है। वाक्य-विन्यास की भी गलतियाँ हैं। इतने सुन्दर लेख में ये अशुद्धियाँ खलती हैं।

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  2. लक्ष्मी जी,
    गलतियों की ओर ध्यान इंगित करने हेतु धन्यवाद. दरअसल फ़ॉन्ट रूपांतरण में ऐसी गलतियाँ घुस आती हैं उन्हें दूर करने का पूरा उपाय भविष्य में किया जाएगा. रहा सवाल वाक्य विन्यास का, तो इसमें फेरबदल संभव अकसर नहीं हो पाता.

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  3. बेनामी1:49 pm

    लक्ष्मी जी,
    इतनी सुन्दर टिप्पणी और यात्रावृत्त तो अब स्वप्न सा लगने लगा है । शायद भविष्य में आप मेरे ऐसे सपने को पूरा करने की और कोशिश करें ।

    जवाब देंहटाएं
  4. बेनामी5:44 pm

    BAHO BAHO DHANVAD ACHHA LAGA READ KAR

    जवाब देंहटाएं

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