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क्रिकेट का हाल कहीं हॉकी वाला न बन जाए

- मनोज सिंह


विगत दस वर्षों से मैंने क्रिकेट मैच देखना पूरी तरह छोड़ रखा है। उसके पहले भी याद नहीं पड़ता जो पूरा गेम मैंने कभी देखा हो। कुछ देर का खेल देखकर फिर कुछ और करते हुए तो ऐसा बचपन में कई बार किया है, लेकिन टेलीविजन के सामने चिपककर बैठे रहने का कभी मन ही नहीं हुआ। चंडीगढ़ में पदस्थ होने के बाद, इस दौरान मोहाली में कई अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच हुए, मुफ्त में टिकट भी मिली मगर भीड़ के कारण लंबी लाइन में धक्का-मुक्की की खबर के बारे में सुन-सुन कर वहां जाने की कभी इच्छा नहीं हुई। सुरक्षा और व्यवस्था के नाम पर, कि.मी. दूर पार्किंग, फिर बिना किसी खाने-पीने का सामान साथ ले जाने की जानकरी के बाद तो पूरे दिन दोपहर में खेल देखने जाना निहायत बेवकूफी लगी। और फिर इतना तो मालूम ही है कि मैदान से अधिक साफ टेलीविजन कैमरों के माध्यम से दिखाई देता है। वीआईपी पास जिसमें कुछ विशेष सुविधाएं और जरूरी सामान ले जाने की छूट होती है, इसके भी मिलने के बावजूद मेरा मैच देखने न जाना सुनकर कइयों को आश्चर्य हुआ और इसे कोरी गप्प माना गया। जबकि हकीकत में अपनी इस आदत के माध्यम से मैं अपने आप को न तो कोई विशेष दिखाना चाहता हूं, न ही दुनिया से अलग हटकर दिखने व महान कहलवाने की चाहत है। असल में मुझ जैसे कई होंगे, मैं कोई अनोखा नहीं, और मेरे साथ खड़े होने वालों की संख्या दिन पर दिन बढ़ रही है, दावे से कह सकता हूं। तभी पांच दिन के उबाऊ टेस्ट मैच से तो दर्शक गायब हो ही चुके थे अब एक-दिवसीय मैच में भी मैदान खाली रहने लगे हैं और कई बार टिकट ब्लैक होने की अफवाह फैलाई जाती है। मगर फिर दूसरी ओर दिन पर दिन बढ़ती हुई मैचों की संख्या देखकर कहा जा सकता है कि भारत की जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है और ऐसे बहुत से लोग हैं जो पूरा दिन इसके लिए बर्बाद कर सकते हैं।

उपरोक्त परस्पर विरोधी बातों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि आज के बाजारवाद में कार्पोरेट जगत विज्ञापन के द्वारा अधिक से अधिक व्यवसाय करना चाहता है। खरीदे हुए खिलाड़ियों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना चाहता है। उनकी सोच होती है कि जितनी बार खिलाड़ी टीवी स्क्रीन पर दिखेंगे उतना ही विज्ञापन होगा और फिर उतने ही दर्शक देखेंगे। और यह एकमात्र ऐसा खेल है जहां हर ओवर, चौके-छक्के यहां तक कि किसी खिलाड़ी के आउट होने के बाद भी तुरंत एक विज्ञापन का मौका मिल जाता है। और फिर मेरे मत को प्रमाणिकता मिल जाती है कि यह अत्यधिक सुस्त, लंबा और कम रोमांच व न के बराबर जोश पैदा करने वाला खेल है। यह हमारा राष्ट्रीय खेल भी नहीं है। फिर भी हिंदुस्तान में इसे विशेष दर्जा प्राप्त है और क्रिकेट के खिलाड़ी पूजनीय हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि देश में हजार आईएएस, आईपीएस व अन्य अधिकारी प्रतिवर्ष चुने जाते हैं और इतने ही तकरीबन संसद सदस्यों का चुनाव होता है, मुख्यमंत्री भी हर राज्य का एक अर्थात देश में कुल दो दर्जन से अधिक होते हैं परंतु देश के लिए खेलने वाली क्रिकेट की टीम के ग्यारह में से एक का होना ज्यादा मुश्किल और महत्वपूर्ण है। ठीक तो है, जितनी तीव्र गति से यहां पैसा और नाम कमाया जा सकता है ऐसा किसी भी क्षेत्र में संभव नहीं। इसके बावजूद यह मुझे कभी भी पागलपन की हद तक आकर्षित नहीं कर पाया जबकि मैं भी कई बार गली-मोहल्लों से लेकर अपने स्कूल-कॉलेज और फिर नौकरी में आने पर विभाग के लिए क्रिकेट खेलता रहा हूं। मगर जहां बात दर्शक बनने की होती है तो फिर वही खेल देखना अधिक पसंद करता हूं, जिसमें कम समय में अधिक ऊर्जा, उष्णता, प्रतिस्पर्धा और कांटे की टक्कर दिखाई पड़ती है। फिर चाहे वो गरीबों का खेल फुटबाल हो या अमीरों का टेनिस।

मीडिया के हिसाब से विगत कुछ मास से भारत में क्रिकेट का बुखार उफान पर था। मुझे तो यह याद नहीं पड़ता कि यह कभी कम भी रहा हो। कुछ न कुछ चलता ही रहता है। असल में हद तो इस बात की हो गयी थी कि कई महीनों से लगातार भारतीय टीम के हारते हुए भी विज्ञापनों में ऐसा प्रदर्शित किया गया कि बस अब विश्वकप को हमारे खिलाड़ी दूसरों से छीनकर आसानी से उठा लाएंगे। मोहल्लों के कई बच्चों के साथ, जिनमें अभी जोश और राष्ट्रीय भावना क्रिकेट के माध्यम से कूट-कूट कर भरी है, मेरी शर्त भी लगी थी। और भारतीय टीम के हारते ही मैं इसे आसानी से जीत गया। यकीनन मुझे इस जीत के कारण देशद्रोही नहीं कहा जा सकता। मगर मैंने अपनी बहुमूल्य भावना को पहले झूठी आशा में अति उत्साहित करने और फिर निराशा में क्रिकेट के कागजी हीरो के पोस्टर फाड़ने से बचा लिया। कुछ दिनों पूर्व तक पूजे जाने वाले हमारे क्रिकेट के नायक रातों-रात खलनायक बन गये। और तो और लोगों में एक बहस छिड़ गयी कि किसे टीम के अंदर होना चाहिए और किसे बाहर। मगर यकीन मानिये कुछ अधिक नहीं होने वाला। यह गिरावट का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। इसके बावजूद क्रिकेट को व्यावसायिक विज्ञापन मिलते रहेंगे, मगर कुछ दिन। वो भी तब तक जब तक कंपनियों को अपने सामान बेचने की संभावना इनके माध्यम से थोड़ी-बहुत भी दिखाई देगी। जनता में जबरन बुखार भी पैदा किया जाता रहेगा। बूढ़े और बेकार हो चुके खिलाड़ियों को भी इन विज्ञापनदाताओं द्वारा साठगांठ कर टीम में खिलाने की कोशिश जारी रहेगी। इस विश्वकप में भी इतना करोड़ों इसलिए फूंका गया था कि अधिक से अधिक समय तक सामान की बिक्री का सिलसिला चलाया जा सके। मगर इतनी बुरी हाल से बौखलाए मालिक अब थोड़ा सतर्क हो गए हैं। इसी तरह की एक-दो बार और असफलता हाथ लगने पर क्रिकेट से मुंह मोड़ लिया जाएगा और फिर हमारे ये क्रिकेट सितारे भी जमीन पर औंधे मुंह गिरे हुए मिलेंगे।

याद कीजिए, एक ज़माना था हॉकी देश की धड़कन और पहचान थी। इसके खिलाड़ी हमारे आदर्श और हीरो हुआ करते थे। खिलाड़ियों को कोई विशेष सुख-सुविधा भी प्राप्त नहीं थी फिर भी हम विश्व चैंपियन होते थे। अति उत्साही मीडिया की अनुपस्थिति में भी ध्यानचंद का नाम घर-घर में लिया जाता था। मगर पिछले कुछ सालों में इस खेल में हमारी दुर्दशा पर अब कोई रोने वाला भी नहीं मिलता। हालत इतनी खराब है कि विश्व में हमारा नंबर कहा है, कहना मुश्किल है। राजनीति, ईष्या, जलन, एक-दूसरे की टांग खींचना, प्रतिभावान को असफल व हतोत्साहित करने में ऊर्जा लगाना हमारी राष्ट्रीय आदत है। और इसी का शिकार हुई है हॉकी। पूरी बर्बादी के बाद भी हॉकी संघ और देश जागा हो, दिखाई नहीं देता। अगर हम अपनी आदत से बाज नहीं आए तो चिंता न करें यही हाल क्रिकेट का भी हो सकता है। जिसके आसार कुछ-कुछ दिखाई भी देने लग पड़े हैं। एक औद्योगिक घराने द्वारा नयी क्रिकेट लीग की घोषणा कर दी गयी है तो एकदिवसीय खेल की जगह 20-20 ओवरों के मैच का प्रचलन प्रारंभ हो चुका है। कुछ दो-चार यूरोप की टीम को और खेलने दीजिए फिर देखिएगा हमारे क्रिकेट के बहादुर कहां मुंह चुराते फिरेंगे, हमारे हीरो मिनटों में जीरो कैसे होंगे। मुझे तो कष्ट कम होगा मगर क्रिकेट के दीवाने प्रेमी अपना नया प्रेम ढूंढ़ लें, नहीं तो उन्हें अधिक मानसिक तकलीफ होगी।

रचनाकार संपर्क - 425/3, सेक्टर 30-ए, चंडीगढ़।


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2 टिप्पणियाँ

  1. बेनामी8:14 pm

    अभी भी आप कह रहे हैं कही होना ना जाये???? अरे जनाब वो तो हो गया है।

    जवाब देंहटाएं

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