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पर्यावरण की नौटंकी




-संजय पटेल

५ जून को फ़िर आ रहा है विश्व-पर्यावरण दिवस.चलो एक दिन के लिये फ़िर साबित कर ही दें कि हमसे बड़ा प्रकृति प्रेमी और कौन है.कुछ पेड़ लगा लें...कुछ नारे लगा दें पानी बचाने के...और कुछ वक्तव्य दे दें बढ़ रहे प्रदूषण के बारे में ..ग्लोबल वार्मिंग के बारे मे...बस मन गया विश्व पर्यावरण दिवस.दूसरे ही दिन से फ़िर दुनिया अपने निज़ाम पर चल ही पडे़गी.

बेचारे पेड़ तो गूंगे ठहरे आपको ताकीद तो नहीं कर सकते कि भैया बीते कल लग रहे नारों का क्या हुआ ..क्या हुआ उन संकल्पों का जो आपने नेताजी के सामने किये थे एक सामुहिक प्रार्थना के रूप में कि जान चली जाए लेकिन शहर की बीच से हरियाली घटने नहीं देंगे...इस देश की हालत यह है कि हम रस्म अदायगी के मामले में तो मैगसाय अवार्ड से नवाज़े जा सकते हैं.आपको जानकर हैरत नहीं होनी चाहिये कि पिछ्ले बरस पर्यावरण दिवस पर किसी संस्था ने एक अनूठे अभियान को आहूत किया था..उसके अंतर्गत शहर के गणमान्य व्यक्तियों को बुलवाकर कहा गया कि आप इस बूढे़ बरगद के गले लगिये.अब बताईये गले लगने कौन सी हरियाली की रक्षा होने वाली है...पर मैने कहा न कि हम किसी भी काम की नौटंकी करने में माहिर जो ठहरे..चाहे पर्यावरण ही क्यों न हो.

पेड़,तालाब,पंछी,खेत सब हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा हुआ करते थे.पीपल को जल चढ़ाने के पीछे भी यही नेक भावना रहती होगी कि हम अपने घर-आंगन,मोहल्ले के दरख़्तों के दोस्त बनें.अब हालत ये है कि घर के बुज़ुर्गों को ही मान नही मिल रहा है तो पेड़ तो बहुत दूर के रिश्तेदार ठेहरे.प्रकृति हमारी ज़िन्दगी , हमारी तहज़ीब का हिस्सा हुआ करती थी..उसे अलग से रेखांकित करने की ज़रूरत नहीं होती थी..लेकिन क्या करें ..जिस तरह से हम हंसने के लिये अब लाफ़्टर या हास्य क्लबों में जाने लगे है वैसे ही पर्यावरण दिवस भी मनाने लग गये हैं.

हमारे सोच और चिंतन का आलम यह है कि भय के बिना हम सही रस्ते पर आते नहीं है.कितने ही अनुपम मिश्र , राजेन्द्रसिंह, बाबा बहुगुणा अलख जगाते रहें...आवाज़ उठाते रहें ...नहीं सुधरेंगे...हम ज़माने की रफ़्तार में इस तरह शामिल हो गये हैं कि हम बेसुध,बेहोश से हो गये हैं. दौड़ रहे हैं बिना जाने कि पहुंचना कहां चाहते है.करना क्या चाहते हैं..हमारे क्या सरोकार है....हमारी प्रकृति को बचाने में हमारी क्या सार्थक भूमिका हो सकती है.हम अपने अगली पीढी़ को कैसा परिवेश देकर जाना चाहते है.क्या रूपयों - पैसों, बैंक बैलेंस, सेंसैक्स, बंगले, मोबाईल, और क्लब कल्चर में ही महदूद रह जाएंगे हम.

क्या सूरज की रोशनी को भी इंटरनेट पर देखेंगे हम.हवा का अहसास भूल कर एयर-कंडीशनर के गु़लाम बने रहेंगे हम. नदी-तालाब क्या हमारे ड्राइंगरूम की महंगी पेंटिग में ही नज़र आएंगे हम...अगर यह सब सच होता है तो जान लीजिये की हम एक बीमार पीढी़ को अपनी पर्यावरण विहीन विरासत सौंपने के दोषी कहलाएंगे. हालांकि इसकी कोई क़ानूनन सज़ा तो नहीं मिलेगी हमको लेकिन जान लीजिये की हम अपनी अगली पीढी को एक प्रदूषित माहौल सौंपने के अपराधी तो कहलाएंगे...हो सकता है हमारे बच्चे जीवन भर हमें कोसते रहें कि हमारे अभिभावकों ने हमें किस हाल में ये शहर ..ये आक्सीजनविहीन जीवन दिया है.

किसी भी अच्छे काम को करने के लिये मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती ख़ासकर नेकी का काम करने के लिये...पर्यावरण का काम भी पुण्य का काम है जनाब....पेड़ों को कटते हुए बचाने से सवाब (पुण्य) मिलता है.इस बात को प्रचारित कीजिये...घर में उपयोग होने वाले पानी को बचाने से जीवन में सुख आता है....वृक्षारोपण से हमारे बाप-दादाओं की आत्माओं को मुक्ति मिलती है..इस तरह की बातों को प्रचारित कीजिये..देखिये हमारे बच्चे इस नसीहत मे अवश्य रूचि लेगे.

कर्मकांडियों ने अपनी दुकानें बहुत चला ली..आइये इस पर्यावरण दिवस से हम खुद नेकी की ये दुकान खोलें..और एक नई शुरूआत का ज़िम्मा लें.ध्यान रहे क्रांति छोटे-छोटे इरादों से ही होती है बड़े-बडे़ वादों से नही...उपहार में पौधा दीजिये....विश्व पर्यावरण दिवस पर ग्रीटिंग कार्ड भेजिये(शुरूआत पोस्ट-कार्ड से ही कीजिये..हाथ से लिखे संदेश से ही सही) अपने संस्थान में प्लास्टिक का उपयोग बंद कीजिये,अपनी स्टेशनरी में पुर्नचक्रित काग़ज़ का इस्तेमाल कीजिये,घर-दफ़्तर में आने वाले लिफ़ाफ़ों को सम्हालकर रखिये और कोशिश कीजिये कि ऐसी स्थानीय डाक जो आपके संस्थान का कर्मचारी स्वयं जाकर डिलीवर करने वाला है की चिट्ठीयों के लिये प्राप्त हुए इन लिफ़ाफ़ों में दोबारा इस्तेमाल करिये..मै खुद ऐसा कर रहा हूं बरसों से. पुर्न-उपयोग में आनेवाले लिफ़ाफ़े पर मै एक छोटा सा स्टीकर भी लगा देता हूं जिस पर छाप रखा है "आप भी लिफ़ाफ़े को दोबारा वापरिये --- हो सकता है एक पेड़ कम कटे"मुझे आज तक मेरे इस कार्य के लिये किसी की शाबासी नहीं मिली लेकिन जब भी किसी बूढे़ बरगद,आम,नीम या पलाश के दरख़्त को देखता हूं तो लगता है कि वो अपना मौन आशीर्वाद मुझ पर लुटा रहे हैं.

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रचनाकार संपर्क:
संजय पटेल - 98268-26881 a d r a a g 3/1ओल्ड पलासिया (नवनीत टॉवर के पीछे) बीमा नगर, इंदौर -452018 भारत Tel:0731-2560282 & 2605265 Fax:0731-2565264

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5 टिप्पणियाँ

  1. article is truely written by heart. and this is the fact. It should be made a movement,because the discussions or presentations will not work now, like chipko movement to save trees and thus environment otherwise our children will suffer drastically
    dr g s narang
    drgmeet@gmail.com

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  2. Dhanyavad....aapki prerna ke liye...Prakrati ki sundarta ko to hum sabhi mehsus karna chahte hain kintu us sundarta ko banaye rakhne ka jo sankulp aapne uthaya hai wah hum yuvaon ke liye Prerak hai....

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  3. बहुत अच्छा व सटीक लेख लिखा है आपने । मैं तो प्रकृति की गोद में ही रहती हूँ । वृक्ष व पौधे भी लगाती रहती हूँ । जब शहर में रहना पड़ेगा उस समय के बारे में सोचकर ही घबराहट होती है । यदि हर व्यक्ति भी थोड़ा थोड़ा पर्यावरण का ध्यान रखे तो बहुत हो जायेगा ।
    घुघूती बासूती

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  4. Hats off to such an nspirational article!! Its really embarrasing to know the ongoing commercialization in the name of environment. We must seriously stop it and better use our energy, time and other resources in saving environment rather than just cribbing about it. And like he is saying imbibing certain little and small things in our daily life, will definitely yield good results, if not a drastic change. Once again a great article to read and work upon and not just to ponder over!!

    Abhishek Agrawal
    Dainik Bhaskar Writers and Publishers Ltd., Mumbai

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  5. मानव ने ही पर्यावरण को उजाड़कर सबके लिए महाविनाश को आमन्त्रित किया है, मानव ही पर्यावरण का विकास कर सकता है। पर्यावरण का संरक्षण और विकास आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

    ऐसे लेख लिखनेवाले इस दृष्टि से 'किसी अवतार' से कम नहीं।

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