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अमृता प्रीतम: क्या दिया तुमने?


-विजय शर्मा

हम लोगों की आदत है, किसी ने कहा कौआ कान ले गया और बस हम दौड़ पड़ते हैं कौए के पीछे. थोड़ी देर बाद यह भी भूल जाते हैं कि क्यों दौड़ रहें हैं. बस आँख मूँद कर दौड़ते जाते हैं कान की याद भी नहीं रहती है. कुछ ऐसा ही हुआ जब 31 अक्टूबर 2005 को अमृता प्रीतम नहीं रहीं. उनकी मृत्यु पर खुशवंत सिंह ने टिप्पणी की और अधिकाँश अखबार ले उड़े उनकी टिप्पणी को. खुशवंत सिंह ने कहा, 'अमृता वॉज ए टेकर, नॉट ए गिवर. अमृता लेना-ही-लेना जानती थी उसने किसी को कभी कुछ दिया नहीं'. आगे उनकी टिप्पणी थी वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, पढ़ती भी नहीं थी यहाँ तक कि अखबार भी नहीं. खुशवत सिंह ने गिन-गिन कर अमृता की कमियाँ लिख मारी, मसलन उनकी कोई राजनैतिक विचारधारा नहीं थी, उनका साहित्य ऊँचे दर्जे का नहीं था, वे बड़ी सामान्य लेखिका थी आदि, आदि. भला खुशवंत सिंह कहें और किसकी मजाल है जो उनकी बात काटे, उनकी बात न माने.

और बात एक लेखिका के विषय में थी लेखिका वैसे भी दोयम दर्जे की मानी जाती है. मेरे एक मित्र हैं बहुत बड़े विद्वान, खूब पढ़ने वाले, गजब की याददाश्त वाले. जो पढ़ते हैं उसको ज्यों-का-त्यों दशकों बाद भी कोट कर सकते हैं. सारा विश्व साहित्य चाट रखा है पर किसी लेखिका को नहीं पढ़ते हैं. एक व्याट को छोड़ कर उन्होंने कभी कोई लेखिका नहीं पढ़ी और न ही भविष्य में पढ़ने का इरादा रखते हैं. उनका पक्का विश्वास है लेखिकाएँ भला क्या लिख सकती हैं. पता नहीं मेरे इन मित्र को लेखिकाओं से क्या अदावत है. पता नहीं खुशवंत सिंह को अमृता प्रीतम से क्या अदावत है. वैसे उन्होंने एक बड़ा लचर सा कारण दिया है जाहिर है यह मुख्य कारण नहीं है. उन्होंने कहा है कि मैंने उसके उपन्यास 'पिंजर' का इंग्लिश अनुवाद किया पर इसका वह कहीं जिक्र नहीं करती है. उसने साहिर से अपने प्रेम का बखान किया है पर इमरोज से प्रेम की बात नहीं कही. एक साथ इतने सारे आरोप और वह भी शोक सन्देश के नाम पर.

अमृता जब अमृतसर टेलीविजन के लिए काम करती थीं उन्होंने वहाँ के एक साहित्यकार मोहन सिंह का इंटरव्यू लिया पर उस आदमी ने जिस तरह से एवार्ड और सम्मानपत्र मिलने की बात की उससे लगा कि एवार्ड्स और सम्मान पत्रों के एवज में इंसान बहुत छोटा हो गया है. अमृता को सदैव यह एहसास था कि मोहन सिंह एक सरल साधारण-सा आदमी है, सिर्फ कमजोर, पर उस दिन उन्हें लगा कि वह बहुत छोटा है. और एक शायर के इस ओछेपन से उन्हें बेहद तकलीफ हुई उन्होंने अपनी डायरी में लिखा, 'यह साहित्यिक दुनिया का एक और उदास दिन था'. इसी इंटरव्यू का जिक्र करते हुए अपनी पत्रिका 'नागमणि' के अपने संपादकीय में उन्होंने कुछ सफे लिखे जिसकी खूब चर्चा हुई और लोग खुल कर मोहन सिंह की गैर जिम्मेदारियों की बात करने लगे. वे इसे लिख कर खुश नहीं थीं उन्होंने इसे उदासी और निराशा के साथ लिखा था. यह शायर जाती बैठकों में बराबर बड़े निम्न स्तर की बातें करता था, पर अब उसने लेखों में भी अपना निम्न रूप दिखाना शुरु कर दिया था. अमृता ने उसके खिलाफ एक बड़ा सख्त मैटर लिखा. मैटर कम्पोज हो गया था पर इसी बीच मोहन सिंह की मौत की खबर आ गई. अमृता ने अपना संपादकीय रोक लिया. उन्हें लगा अब उसकी मौत के बाद उससे मुखातिब हो कर यह बात कहने का वक्त नहीं. पर वह आसपास के लोगों को देख कर हैरान थी. कोई मोहन सिंह की कविता के विषय में लेख तैयार कर रहा था, कोई भाषण, कोई अपनी पत्रिका में उस पर विशेषांक निकाल रहा था. वैसे सब उसकी बुराई कर रहे थे. कोई मोहन सिंह की मौत पर रोया नहीं. यह शख्स 'मोहब्बत के पाक चश्मों की बात जो लोग गन्दी नालियों की तरह करते हैं उनमें से एक था'. पर उसके मरने पर अमृता ने अपना लिखा कटु आलेख छपने से रोक लिया. और एक खुशवंत सिह हैं ओबीचरी में लिखने के लिए उन्हें ऐसी बातें ही मिलीं. शराब और शबाब पर लिखना महान लेखन हो सकता है पर प्रेम और बँटवारे के दर्द पर लिखना कुछ नहीं यह बात गले नहीं उतरती है.

अगर डिग्री बटोरना ही पढ़ने-लिखने, ज्ञान की निशानी है तब हम नानक, दादू, कबीर को कहाँ रखें? हाँ अमृता किसी पब्लिक स्कूल में नहीं पढ़ीं थीं पर वे अनपढ़ थीं यह कहना अक्ल का दिवालियापन है. हो सकता है वे अखबार न पढ़ती हों. क्या छपता है अखबारों में वही लूटमार, कत्ल, बलात्कार, घूसखोरी. अभी किसी ने पूछा भी है भला हम मीडिया को चौथा स्तम्भ क्यों माने? पर वे बेखबर नहीं थीं, रेडियो सुनतीं थीं, टेलीविजन बराबर देखतीं थीं, यह उनकी डायरी में दर्ज है. रही पढ़ने की बात तो उसका हवाला भी उन्हीं की डायरी के माध्यम से. अमृता की 1977 से 1984 तक की डायरी इमरोज ने प्रकाशित करवाई है और यह राजपाल से छपी है. वे न केवल किताबें पढ़तीं थीं बल्कि उस पर चिंतन-मनन भी करतीं थीं और जब-तब इमरोज से उन किताबों में पढ़े हुए पर चर्चा भी करतीं थीं. एक बार जब वे एंथनी क्विन की आत्मकथा 'द ओरिजिनल सिन' पढ़ रहीं थीं, इमरोज और उनमें मूल गुनाह और गुनाह पर काफी बातें हुईं वे अपने विषय में कहती हैं कि उन्होंने एक गुनाह किया था 'सिन ऑफ इग्नोरेंस' का. इस एक गुनाह, अज्ञान के गुनाह की उन्होंने खूब सजा भुगती और खूब दर्द भुगते. और जब उन्होंने कॉलिन विल्सन की एक किताब पढ़ी तो उसमें भी लिखा था, 'द चर्च मीन्स बाई ओरिजनल सिन: वी यू एंड आई आर इंफिनिटली स्ट्रॉगर दैन वी एवर रियलाइज'.

हनाह अरैंदत ने बर्तोल ब्रेख्त के बारे में लिखा कि एक शायर के साथ सबसे बड़ा दु:खांत यह होता है कि वह जीते जी शायर न रहे यही ब्रेख्त के साथ हुआ. वह अपने आखिरी बरसों में कुछ अच्छा न लिख सका. अमृता कहतीं हैं शायरों के बहुत गुनाह माफ होते हैं पर सब नहीं. और ब्रेख्त का गुनाह था कि उसने स्तालिन की स्तुति गीत गाए थे, और व्यक्ति पूजा को कला की रूह कभी माफ नहीं करती है. अमृता के अनुसार मोहन सिंह भी कभी चढती सबेर का शायर था पर जब उसने इनामों के लिए शायरी करनी शुरु कर दी तो शायरी उससे दूर छिटक गई. अमृता अंत तक बेहतर शायरी करतीं रहीं.

अमृता प्रीतम को सपने खूब आते थे करीब-करीब रोज और उन्होंने शायरों तथा लेखकों के सपनों को इकट्ठा करके एक किताब भी तैयार की. वे सपनों के विश्लेषण करने में रूचि लेती थीं इसीलिए फ्रायड और युंग को भी उन्होंने काफी पढ़ा था. फ्रायड और युंग के सिद्धांतों के बुनियादी फर्क उन्हें पता थे. उन्हें पता था फ्रायड सपनों को एक निश्चित थ्योरी में बाँधता है पर युंग नहीं. युंग कहता है जो ख्याल उसके चेतन मन के साथ धीरे धीरे सपनों के आसपास जुड जाते हैं उनमें से ही वह सपनों के अर्थ पहचानता है. यह अमृता ने युंग की किताबें 'मैमॉयर्ज' तथा 'ड्रीम्ज एंड रिफलेक्शन' पढ़कर जाना था.

एक समय ऐसा था जब ऐन रेन्ड के उपन्यासों की धूम थी. पाठक पागल थे उसके पीछे. वह नौजवानों की मसीहा बनी हुई थी, लोग उससे प्रेरणा पाते थे. आर्किटेक्ट और मैनेजमेंट के छात्र आज भी उसे पूजते हैं. यही ऐन रैंड अमृता की पसन्दीदा लेखिका हैं. पढ़ने-लिखने वाले लोगों को जिन्हें पुस्तकों से प्यार होता है, उन्हें लगता है, वे चाहते हैं कि जब वे कोई अच्छी चीजें पढ़ते हैं यह औरों को भी पढ़ना चाहिए. इसका आनन्द उनके परिचितों को भी मिलना चाहिए. ऐन रैंड के 'एटलस श्रग्ड' और 'फाउन्टेन हेड' को अमृता इतना पसन्द करती थीं उनसे इतनी प्रभावित थीं कि बहुत बार इन्हें खरीदा और दोस्तों को बाँटा. जिन्दगी की कई मुश्किल घड़ियों में उन्हें ऐन रेन्ड से ताकत मिली. इंसान-इंसान में जो फर्क होता है, जो फर्क हो सकता है वह उन्होंने इस लेखिका से ही सीखा. वे तहे दिल से उसका शुक्रिया अदा करना चाहतीं हैं पर जिसे कभी देखा न हो, जिससे आप कभी मिले न हों, उसे भला आप कैसे शुक्रिया अदा करेंगे? लेकिन बिना मिले, बिना देखे भी यदि आप के मन आभार है तो आप कोई न कोई तरीका अख्तियार कर लेते हैं यही वे करतीं हैं और वे ऐन रेन्ड के एक किरदार को दूसरे किरदार के कहे हुए शब्दों को मन-ही-मन दोहरातीं हैं, 'आई थैंक यू फॉर ह्वाट यू आर' और अपने ढंग से अपनी प्रिय लेखिका को धन्यवाद देतीं हैं.

बहुत से भारतीय पाठकों की तरह सबसे पहले उनके हृदय में शरत चंद्र ने जगह बनाई. अमृता ने दुनिया भर के लेखक पढ़े. जब वे अन्य लोगों की कृतियाँ पढ़ती तो लगता वे लेखक और उनकी रचनाएँ अमृता से बात कर रहीं हों. रोम्या रोलाँ, इवंग स्टोन, खलील जिब्रान, चेखव, डी. एच. लारेंस, कामू, काफ्का, समरसेट मॉम की किताबें, उनके अक्षर सब अमृता से दोस्तों की तरह बातें करते थे. इसके बाद अगर कोई कहे कि वे पढ़तीं नहीं थीं तो क्या कहा जाए. हावर्ड फास्ट का 'स्पार्टेकस' पढ़ कर उनके रगों का लहू गर्म हो गया था, माथे में यथार्थ के लिए एक तडफ पैदा हो गई थी.

टॉल्सटॉय का 'वार एंड पीस', 'अन्ना केरेनीना' अमृता की रग-रग में समाए हुए थे. उनके मन में टॉल्सटॉय के प्रति बहुत इज्जत थी, बहुत प्यार था और यही इज्जत और प्यार उन्हें 1966 में उसके घर खींच ले गया. वे इतनी संवेदनशील थीं कि जब वे टॉल्सटॉय के कमरे में गई तो उन्हें एहसास हुआ कि उसकी कमीज ने उन्हें छुआ और स्वयं लेखक उनके सामने खड़ा है. कितना रोमांचक क्षण और अनुभव रहा होगा. वे उसकी कब्र से एक पत्ता उठा लाई जो उन्होंने अपनी डायरी में रखा हुआ था. मात्र साहित्य में ही उनकी रूचि न थी वे अन्य कलाओं में भी दिलचस्पी लेतीं थीं, अन्य कलाओं के बारे में भी बराबर पढ़ती थीं. इमरोज के साथ ने उन्हें अवश्य ही चित्रकला तथा अन्य कलाओं की ओर आकर्षित किया होगा. वे चित्रकला के विषय में बराबर पढ़ती थीं. उन्होंने के. सी. आर्यन की किताब 'पंजाब: चित्रकला के सौ साल' पढ़ी थी और उसमें वर्णित हुनर में मजहब की दखल अन्दाजी के भयानक हवालों से मर्माहत थीं, इसका जिक्र उन्होंने अपनी डायरी में किया है.

वे जो किताब पढ़ती उसकी पंक्तियाँ, उसके भाव विचार उन्हें काफी दिन तक हॉन्ट करते, कोई-कोई पंक्ति मन को छू जाती, जेहन में बस जाती और वे इन सबको अपनी डायरी में उतार लेतीं. जब उन्होंने यूनानी कवि और उपन्यासकार निकस कजनजाकिस की एक किताब पढ़ी तो उसकी एक सतर उनके मन मं अंकित हो गई और उसे उन्होंने अपनी डायरी में लिख लिया ‘Create an idealised image of yourself and try to resemble it’ अपनी एक आदर्श मूत बनाओ और उसके समान होने की कोशिश करो, उसे अमल में उतार लो. और यह सतर उनकी जिन्दगी का मकसद बन गया. इसको वे अपने गुरु मंत्र के रूप में मानती थीं. इसी तरह अनन्तमूत की किताब 'संस्कार' और बिमल मित्र की कहानी 'घरन्ती' पढ़ी और इनसे भी काफी कुछ सीखा. वे खूब पढ़ती और एक बार उनके मन में विचार आया क्यों न उन कहानियों की एक फाइल बनाई जाए जिन कहानियों ने उन्हें छू लिया और बाद में उसे वे एक किताब का रूप देना चाहती थीं. काम शुरु भी किया कुछ कहानियाँ थीं होटल का कमरा (लिविस निकोस), गदल (रांगेय राघव), आखिरी फैसला (कारेल चापेक), सीढियाँ (खरिस्तो समरनैस्की), प्रेतनी (प्रबोध कुमार सान्याल), खोल दो (सादत हसन मंटो), इतने अच्छे दिन (कमलेश्वर) आदि पर न तो फाइल पूरी बन सकी न ही किताब. इतना पढ़ने वाला भला दूसरों का लिखा कितना लिख-लिख कर रखेगा, जबकि पास में अपना भी इतना सारा लिखने को हो, उसे अपना भी इतना कुछ लिखना हो.

एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था, ''जन्मों की बात मैं नहीं जानती, लेकिन कोई दूसरा जन्म हो तो... इस जन्म में कई बार लगा कि औरत होना गुनाह है... लेकिन यही गुनाह मैं फिर से करना चाहूँगी, एक शर्त के साथ, कि खुदा को अगले जन्म में भी, मेरे हाथ में कलम देनी होगी... ऐसे व्यक्ति के विषय में कैसे कहा जा सकता है कि उसने जीवन भर सिर्फ लिया-ही-लिया किसी को कुछ दिया नहीं''.

अमृता की दृष्टि सदैव विश्व साहित्य खासकर विश्व में रची जा रही कविताओं पर रहती थी. वे पंजाबी की कवयित्री, लेखिका थीं पर अन्य भाषाओं, अन्य मुल्कों में क्या रचा जा रहा है इसकी खबर रखती थीं. बल्गारिया जाने का उन्हें मौका मिला बल्गारियन भाषा में उनके साहित्य का अनुवाद हुआ. वे स्वयं बल्गारियन साहित्य की जानकारी रखतीं थीं, तभी 2 मई 1983 को भारतीय भाषा परिषद, कलकत्ता में दिए अपने भाषण में वे बल्गारिया की एक शायरा ऐलिसावेता बागरियाना के अल्फाज कोट करतीं हैं. इसी भाषण में उन्होंने एक पाकिस्तानी शायरा शगुफ्ता, डोगरी की शायरा पद्मा सचदेव, उर्दू की इस्मत चुगताई, इटली की शायरा ऐनेतोलिया पोजी, स्वीडिश शायरा कारिन बोये, पॉलिश शायरा कादिया मोलोतोवस्की जिसे फासिस्टों के खिलाफ लिखने के कारण देश से निकाल दिया गया था का जिक्र किया है. क्या बिना पढ़े रूसी, जर्मन और फ्रांसिसी लेखकों कवियों की बात की जा सकती है. उन्हें मालूम था कि जापान का मशहूर उपन्यास 'गेंजी की कहानी' एक औरत ने लिखा था जिसका असली नाम आज भी कोई नहीं जानता. वे हब्बा खातून, लल्ल आरिफा, सैफो, जॉर्ज सैंड, एमिली डिकंसन और न मालूम कितनी रचनाकारों की जिंदगी के दु:खों-कष्टों से वाकिफ थीं. अमृता पंजाब की लोक संस्कृति, लोक गीतों, लोक कथाओं से बड़े गहरे जुडी थीं वे वारिस शाह बुल्ले शाह, सुल्तान बाहू में रची-बसीं थीं. साथ ही उन्हें वेद पुराण, महाभारत, रामायण का भी खासा ज्ञान था. उन्होंने न केवल पढ़ा बल्कि चिंतन-मनन किया. उनकी अपनी स्थापना थी कि अर्ध नारीश्वर का फलसफा इस बात की तक्सीद है कि दुनिया का पहला शायर सिर्फ मर्द नहीं था, औरत भी थी. अपने 'कड़ी धूप के सफर' में उन्होंने भारतीय प्राचीन साहित्य से रचनाकारों की एक लम्बी फेरहिस्त दी है.

किताबों से अमृता को कितना प्यार था यह जानना हो तो 24 फरवरी 1983 में नेशनल बुक ट्रस्ट की ओर से चंडीगढ मे लगे बुक फेयर के मौके पर दिए उनके उद्-घाटन भाषण को पढ़ना होगा. वे हंगरी का हवाला देते हुए कहतीं हैं कि वहाँ की एक कहावत है कि जब कोई दुश्मन दूर धरती के किसी टुकड़े पर कदम रखता है, तो सबसे पहले किताबों की अलमारियाँ काँपतीं हैं. लेकिन जब कोई दोस्त शायर या अदीब, दूर धरती के किसी टुकड़े पर कदम रखता है तो सबसे पहले किताबों की अलमारियाँ बड़ी हो जातीं हैं. इसी भाषण में वे किताबों का पूरा इतिहास भी प्रस्तुत करतीं हैं. और अमृता ने किताबों की अलमारियों में जम कर इजाफा किया. कौन कहेगा अमृता प्रीतम ने केवल लिया-ही-लिया किसी को कभी कुछ दिया नहीं. एक शायरा से, एक अदीब से, एक लेखिका से क्या देने की उम्मीद करनी चाहिए. 'कादम्बरी' और 'पिंजर' जैसी फिल्में अमृता प्रीतम की कथाओं पर आधारित फिल्में हैं. उन्होंने पंजाबी साहित्य को तकरीबन 75 पुस्तकें दीं जिससे पंजाबी के साथ-साथ भारतीय और विश्व साहित्य समृद्ध हुआ क्योंकि साहित्य किसी एक जाति, किसी एक कौम की बपौती नहीं होता है, वह सम्पूर्ण मनुष्यता की थाती होता है.

'1947 में देश का विभाजन हुआ, सामाजिक राजनीतिक और धामक मूल्य काँच के बरतनों की तरह टूट गए और उनकी किरचें लोगों के पैरों में बिछी हुई थीं. यूरोप में महायुद्धों और महाविनाश पर काफी कुछ लिखा गया और अब भी लिखा जा रहा है, उसकी तुलना में हिन्दी में विभाजन पर कुछ खास नहीं लिखा गया. भला क्यों? शायद इसका कारण हमारा भाग्यवाद के दर्शन पर विश्वास है जो हमें बड़े-से-बड़े दारुण कष्ट को सह कर भी चुप रहना सिखाता है. या शायद यह विनाश इतना भयंकर था कि हमारा मन इसे याद नहीं करना चाहता, 'सलेक्टिव एम्नेशिया' के कारण निजी और सामूहिक स्मृति से हम इसे मिटा डालना चाहते हैं. मनोविज्ञान का एक नियम है आदमी अपनी तीव्रतम, कष्टदायी, दु:खद अनुभूतियों को भुला देना चाहता है, जिजीविषा के लिए यह आवश्यक भी है. यशपाल ने भी तुरंत नहीं बल्कि आजादी के करीब दस वर्ष बाद झूठा-सच लिखा.

हिन्दी में जो लिखा भी गया वह पश्चिमी पाकिस्तान से ही सम्बंधित रहा. हम अक्सर भूल जाते हैं कि बंटवारा पूर्व में भी हुआ था. हाँ, बंगला में काफी कुछ उपलब्ध है. अभी हाल में जशोधरा बाग्ची एंव शुभोरंजन दासगुप्ता की एक पुस्तक इंग्लिश में आई है, द ट्रॉमा एंड द ट्रायम्फ: जेंडर एंड पार्टीशन इन ईस्टर्न इंडिया. इसमें ॠत्विक घटक की फिल्म मेघे ढाका तारा, सेलिना होसैन केकांटा तारे प्रजापति आदि के माध्यम से पूर्वी पाकिस्तानी की उन शरणार्थी औरतों की सच्ची कहानियों को सामने लाने का प्रयास किया है जो संघर्षपूर्वक गरीबी और भूख से अपने परिवार की रक्षा करती हैं. तसलीमा नसरीन ने जब विभाजन के त्रासद स्वर को शब्दों में बांधा तो उसे जलावतन होना पड़ा.

नारी आन्दोलन, दलित विमर्श आदि ने पुन: इस विषय को उभारा है. और शायद दु:खद स्मृतियों से निपटने का यही सबसे अच्छा तरीका भी है. अभी भी जो कडुआहट है उससे छूटने का शायद एक अच्छा उपाय होगा इस पर ज्यादा-से-ज्यादा कलम चलाना. जापान में जिन स्त्रियों का उपयोग युद्ध के दौरान किया गया था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, खुलापन तथा नारी स्वातंत्र्य के तहत उन स्त्रियों के अनुभव सुने और एकत्र किए जा रहे हैं. योरोप के महाविनाश से बचे हुए लोगों से उनकी आपबीती जानकर उसे लिपिबद्ध (राइटिंग एंड रिराइटिंग द हॉलोकास्ट नैरेटिव एंड द कांसिक्वैसेंस ऑफ इंटप्रटेशन: जेम्स इयंग) किया जा रहा है. उर्वशी बुटालिया ने भी पहले बी.बी.सी के चेनल 4 के लिए, फिर अपने लिए इसी तरह के साक्षात्कार इकट्ठे कर उन्हें द अदर साइड ऑफ साइलेंस: व्यॉयजेज फ्रॉम द पार्टीशन ऑफ इंडिया, लिखी जिसका हिन्दी अनुवाद राजीव कुमार श्रीवास्तव ने किया है जो खामोशी के उस पार नाम से वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है.

लास्ट ट्रेन टू पाकिस्तान खुशवंत सिंह ने इंग्लिश में लिखी जिस पर इसी नाम से फिल्म बनी. पंजाब की मस्ती की पृष्ठभूमि और बंटवारे का दर्द के साथ इस पर बनी फिल्म तत्कालीन प्रशासनिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन का सुन्दर चित्रण करती है. मुटियार और गबरू जवान का प्रेम धीरे-धीरे विभाजन की त्रासदी के दृश्य दिखाता है. गबरू जवान और उसके साथी ट्रेन उड़ाने का प्रयास कर रहे हैं पर जब पता चलता है कि मुटियार इसी ट्रेन से पाकिस्तान जा रही है तो जवान अपनी जान पर खेल कर सवारी गाड़ी को बचाता है. अंत में फिल्म गम्भीरता की ओर मुड़ जाती है.

ज्योतिर्मयी देवी ने द रिवर चनंग: अ पाटशन नॉवेल और सरोज कासवानी ने ऑर्फनस ऑफ द स्टोर्म लिखा. 1973 में एम. एस. सथ्यु एवं बलराज साहनी ने गरम हवा फिल्म बनाई. और भीष्म साहनी ने 1974 में तमस रचा, पर उसे प्रसिद्धि मिली जब वह टी.वी. सीरियल बना और कठमुल्लाओं ने उसे लेकर उत्पात प्रारम्भ किया. हालाँकि गुरुदत्त ने विभाजन पर उपन्यास लिखे, पर उन्हें साहित्य की श्रेणी में रखने को लेकर मतभेद है. आचार्य चतुर्सेन शास्त्री के धर्मपुत्र पर फिल्म बनी. कुछ लेखकों ने साम्प्रदायिकता की पृष्ठभूमि पर लिखा, पर विस्तार या गहराई में न गए. भगवती चरण वर्मा, भैरव प्रसाद गुप्त, फणीश्वर नाथ 'रेणु' ने इस विषय को लिया मगर ऊपर-ऊपर. उर्दू और इंग्लिश में इस दर्दनाक हादसे पर काफी कुछ रचा गया, खासकर स्वतंत्रता की पचासवीं वर्षगांठ पर. बाप्सी सिद्धवा विभाजन काल में मात्र सात-आठ साल की बच्ची थी. ईसाई, बौद्धों, जैनियों की तरह ही पारसी भी विभाजन से सीधे प्रभावित नहीं थे. परंतु इस पारसी लड़की ने अपने आस-पास के वातावरण और लोगों के जीवन में होते परिवर्तन को बड़ी शिद्दत से अनुभव किया और आगे चलकर इन्हीं अनुभवों ने उसे साहित्य सृजन की सामग्री प्रदान की. द क्रो ईटर्स और क्रैकिंग इंडिया उसी का परिणाम है, क्रैकिंग इंडिया के एक हिस्से आइस कैंडी मैन पर दीपा मेहता ने अर्थ-1947 बनाई. जे. पी. दत्ता रिफ्यूजी को विभाजन और उसकी त्रासदी से जुडी एक यादगार फिल्म बना सकते थे पर वो एक सतही बॉलीवुड फिल्म बन कर रह गई. विभाजन पर कई फिल्में बनी. धर्मपुत्र, गर्म हवा, गदर एक प्रेम कथा, रिफ्यूजी, ट्रेन टू पाकिस्तान, और अभी हाल में बनी है पिंजर. जिसका मूल विषय इस थीम पर बनी बाकी की फिल्मों से काफी हट कर है, गम्भीर है. इसकी पृष्ठभूमि भी विभाजन है पर ट्रीटमेंट अलग है. यह अमृता प्रीतम के उपन्यास से कुछ छूट लेती है अलग माध्यम होने के कारण, पर निर्माता निर्देशक ने उपन्यास की आत्मा सुरक्षित रखी है.

गुलजार, मंटो, कृष्णा सोबती और अमृता प्रीतम ने भी विभाजन पर लिखा. अमृता प्रीतम ने पंजाबी में विभाजन पर खूब लिखा जो अनुवादित हो कर हिन्दी तथा अन्य भाषाओं में उपलब्ध है. उन्होंने यह सब बहुत पहले लिखा. उनकी रचनाओं, कहानियों, उपन्यास में विभाजन और उस समय हुई हिंसा खासकर स्त्रियों के साथ हुए जघन्य हादसे उभर कर आए हैं. देश विभाजन का दर्द अमृता की कहानियों उपन्यासों और कविताओं में बड़ी शिद्दत के साथ आया है. उन्होंने अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में लिखा है, 'मैं औरत थी, चाहे बच्ची सी, और यह खौफ सा विरासत में पाया था कि दुनिया के भयानक जंगल में से मैं अकेली नहीं गुजर सकती'. उनके उपन्यास पिंजर का कथ्य औरत के इसी खौफ की कथा है, औरत के इसी अकेलेपन की कहानी है. यह उन हजारों-लाखों स्त्रियों के दु:ख की कहानी है जो देश के बँटवारे, और सांप्रादयिकता की आग में बिना अपनी किसी खता के अपनों से कट गईं, जिनका जिस्म और रूह लहुलुहान हुआ.

यह उस पूरो की कहानी है जो बिना अपनी किसी खता के रशीद द्वारा उठा ली गई. उठा ली गई क्योंकि पूरो और रशीद के खानदानों में पीढियों से अवादत चली आती थी. पूरो के ताऊ ने रशीद की बुआ को उठा कर तीन दिन अपने घर रख लिया था. और न चाहते हुए भी चाचा-ताया के दवाब में आकर रशीद पूरो को, जिसकी सगाई रामचन्दर से हो चुकी है, उठा लाता है. और इसी बीच देश का बँटवारा हो जाता है. पूरो जो अब हमीदा है रशीद के बच्चे की माँ बन चुकी है. स्त्री का मन पिघलते देर नहीं लगती है, वह धीरे-धीरे अपने नए घर की दीवारों से परच जाती है. रशीद की बीमारी पूरो को उसके करीब ले आती है. वह दिन रात लग कर उसकी देखभाल करती है आखिरकार अब वह उसका पति और उसके बच्चे का पिता है. रशीद जिसने कभी उसके संग जोर जबरदस्ती न की थी.

पूरो के कहे पर रशीद पूरो की भाभी और रामचन्दर की बहन लाजो को विजातियों के घर से निकाल कर अपने घर में रखता है. वह रामचन्दर से भी मिलता है और सिपाही जब अपहृत औरतों की अदला-बदली कर रहें हैं पूरो और रशीद लाजो को पूरो के भाई और रामचन्दर को सौंप देते हैं. मौका अच्छा था पूरो सोचती है, 'जो मैं इस समय कह दूँ मैं एक हिन्दू स्त्री हूँ तो मुझे अवश्य ही इन सबके साथ लारी में बिठा कर ले जाएँगे. मैं भी लौट सकती हूँ लाजो की भाँति... देश की हजारों लड़कियों की भाँति... ' पर वह रशीद के पास जा खड़ी होती है और भाई से कहती है, 'लाजो अपने घर लौट रही है, समझ लेना कि इसी में पूरो भी गई. मेरे लिए तो अब यही जगह रह गई है'.

उपन्यास के अंत में पूरो एक व्यक्ति से समष्टि में परिवर्तित हो जाती है. वह मन ही मन सोचती है, 'चाहे कोई लड़की हिन्दू हो या मुसलमान, जो भी लड़की लौट कर अपने ठिकाने पहुँचती है, समझो कि उसी के साथ पूरो की आत्मा भी ठिकाने पहुँच गई'. पूरो एक ऐसा स्त्री चरित्र है जो उदात्त है जिसमें स्त्रियोचित गुण कूट-कूट कर भरे हुए हैं. वह कम्मो की अपनी बेटी की तरह देखभाल करती है. एक पगली औरत, जिसे न मालूम किसने खराब किया था, के नवजात बच्चे को अपना दूध पिला कर अपने बच्चे के समान पालती है. मुसलमान हिन्दुओं की लड़कियों और हिन्दू मुसलमान की लड़कियों को उठा कर ले जा रहे थे. वह देखती है, दस बारह मनचले नवयुवकों ने एक नंगी जवान लड़की को अपने आगे करके, दोनों हाथों से ढोल ढमाके बजाते हुए ले जा रहें हैं. वह औरत है और औरत का दरद समझती है. इसी बीच उसे गन्ने के खेत में छिपी हुई एक लड़की मिलती है जिसे फौज की कैम्प में रहते हुए नौ रातें अलग-अलग घरों में बितानी पड़ी हैं. पूरो न केवल उसे अपने घर में छिपा कर रखती है वरन रामचन्दर के साथ विनती करके उसे हिन्दुस्तान भी भिजवाती है.

पूरो में एक मासूम लड़की, एक संवेदनशील औरत, एक ममतामयी माँ और सबसे बढ़कर एक मनुष्य के दया धरम, सहानुभूति जैसे गुण हैं, और वह 'एक विचारक की भाँति गम्भीर है'. अमृता ने एक इंटरव्यू के समय कहा कि उनके लिखने का विषय है बेहतर इंसान की कल्पना, इंसान की थिंकिंग की इवॉल्यूशन यही उनकी राइटिंग में परसिस्ट करता है. यही इंसान की सोच का विकास, बेहतर इंसान की कल्पना उनके उपन्यास पिंजर में भी दृष्टिगोचर होता है. इसमें चरित्रों का निरंतर विकास होता जाता है. पूरो की आयु बीस वर्ष से अधिक नहीं थी. उसे जीवन के कुठाराघातों ने बहुत कुछ सिखा दिया था. रशीद, रामचन्दर, यहाँ तक कि पूरो के भाई का भी उत्तरोत्तर चारित्रिक विकास होता है. अमृता स्वयं एक ममतामयी माँ हैं केवल अपने बच्चों की नहीं और उन सारी लड़कियों की भी जो उन्हें सास के रूप में पाने को भी लालायित थीं. हाँ देश-विदेश की कई लड़कियाँ उनके बेटे की बहु बन कर आना चाहती थी ताकि अमृता जैसी सास पा सकें. जब रशीद की रचना हो रही होगी अमृता के तसव्वुर में जरूर कहीं सज्जाद हैदर और साहिर रहे होंगे. साहिर जिनसे अमृता का केवल रुहानी रिश्ता था पर वे चाहती थीं कि उनका बेटा उनके प्रेमी जैसा हो पति जैसा नहीं. इमरोज तो शायद तब तक उनके जीवन में आए नहीं थे. पिंजर के रूप में एक अनमोल कृति दी है अमृता ने साहित्य को.

बिना कुछ दिये ही अमृता प्रीतम को साहित्य अकादमी, पद्मश्री, भारतीय ज्ञानपीठ, वाप्तसारोव बुल्गारिया, फ्रांस सरकार आदि से ढेरों पुरस्कार और सम्मान यूँ ही नहीं प्राप्त हुए. बिना किसी कारण के दिल्ली, पंजाब तथा जबलपुर के विश्वविद्यालयों ने उन्हें डी.लिट. की उपाधियाँ नहीं प्रदान कर दीं. रॉबर्ट फ्रॉस्ट भी विद्यालयी शिक्षा से वंचित था पर उसकी रचनात्मक देन के लिए उसे विभिन्न शिक्षा संस्थानों से इतनी उपाधियाँ प्राप्त हुई कि इन अवसरों पर मिली टोपियों को जोड कर उसने एक रजाई बना ली थी. अमृता ने संसार को अवश्य ही कुछ ऐसा दिया है कि वे सदैव याद की जाएँगी. उनके साहित्य का संसार की 34 भाषाओं में अनूदित हो चुका है और सिलसिला अभी रुका नहीं है. उनके न मालूम कितने पाठक भविष्य में पैदा होने हैं. और उनके चाहने वाले, उनके पाठक, यदि उन्हें प्यार-प्रेम, आदर-सम्मान देते हैं तो यह अमृता का हक बनता है.

उन्होंने दुनियाँ को दिये हैं अपने विचार, अपने शब्द, अपनी भावनाएँ, अपनी संवेदनाएँ. इसके लिए की है साधना. एक साहित्यकार शब्द साधना से बढ़कर और क्या कर सकता है, और अमृता ने यह भरपूर क्या है. अगर उन्होंने किसी को कुछ दिया नहीं तो भला टेलीविजन सेंटर के हरजीत को क्या पड़ी थी कि वह फोन करके कहता, ''मैं एक लड़की के साथ ब्याह करना चाहता हूँ, ब्याह वहीं आपके पास आकर करना है''. उन्हें आश्चर्य होता है कि मेरा प्यार किसी के लिए ब्याह की रस्म भी बन सकता है. जब भी कोई समाज की मान्यताओं के खिलाफ जा कर संबंध बनाना चाहता है, उससे उसके रिश्तेदार तो आँख फेर ही लेते हैं अक्सर उससे उसके यार दोस्त भी मुँह फेर लेते हैं. पर ऐसे कठिन समय में ही अपने-परायों की सच्ची पहचान होती है. अमृता ने हरजीत की शादी अपने घर में करवाई समाज की परवाह न करते हुए. उन्होंने और इमरोज ने पंजाबी की एक और चचत रचनाकार दलीप टिवाडा की शादी भी अपने घर में कराई. उन्होंने अवश्य ही कुछ अनमोल दिया है तभी एक पाठक ने उनके जन्मदिन पर तार भेजा, ''वी विश यू ऐज मच प्लेजर ऑन युअर बर्थडे ऐज वी डिराइव फ्रॉम युअर वर्क्स''.

यह सही है कि उन्होंने धामक तुकबन्दियों से अपनी रचना यात्रा प्रारम्भ हुई, पर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वे अपनी इस लम्बी रचनात्मक यात्रा में कहाँ पहुँची, कितनी मंजिलें प्राप्त की, कितने मुकाम तय किए. क्या स्थिति थी पंजाबी भाषा की अमृता से पहले? पंजाबी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाने में उनका दाय अप्रतिम है. और इस तरह उन्होंने भारतीय साहित्य को विश्व में प्रसारित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है. क्या यह किसी लेखक की मानवता को दी गई सौगात नहीं है?

माँ का साया कच्ची उम्र में मात्र ग्यारह बरस की उम्र में सिर से उठ गया. पिता करतार सिंह मार्गदर्शक बने पर विद्रोह भी उन्हीं से किया. पिता से इतना ज्यादा लगाव था कि बाद में भी उन्हें सपने में अक्सर देखा करतीं.

अमृता प्रीतम जीयीं और खूब जम कर जीयीं अपनी शर्तों पर जीयीं. यदि विभाजन की किरचें उनके पैरों और माथे में चुभीं तो प्रेम भी उन्हें भरपूर मिला. सज्जाद हैदर और उनके खत अमृता के अकेलेपन के साथी थे.

उन्हें साहिर का प्रेम मिला जो साहिर की माँ के चलते परवान न चढ सका. एक औरत ही दूसरी औरत को न समझ सकी दोनों के नजरिए में इतना फासला था कि किसी तरह की समझ की कोई गुंजाइश नहीं थी और साहिर को अमृता के साथ-साथ अपनी माँ से बहुत लगाव था मदर फिक्सेसन की हद तक. वे हद पार ना कर सके. पर इमरोज हर हद पार कर गए. दोनों में बेपनाह मुहब्बत हुई. इमरोज-अमृता की प्रीत की जैसी एक और मिसाल साहित्य जगत में पहले से कायम है सिमोन और सार्त्र. अमृता को अपने पाठकों का भरपूर प्यार और आदर मिला.

मुल्ला, पादरी, पुजारी समझते हैं धर्म का ठेका केवल उन्होंने ले रखा है. इसीलिए जब कोई लेखक धर्म पर कुछ लिखता है तो इन लोगों को बड़ी परेशानी होती है और ये तुरंत फतवा जारी करने में लग जाते हैं फिर वो चाहे सल्मान रुश्दी हो या तस्लीमा नसरीन या अमृता प्रीतम. 'रसीदी टिकट' की पंक्तियों से भी कुछ लोगों को सिख धर्म की तौहीन होती लगी. कुछ लोगों ने इसे जब्त करने के लिए एक फाइल तैयार कर ली. पर इसी पुस्तक के उन्हीं आपत्तिजनक हिस्सों को बुल्गेरिया के साहित्यकारों ने पसन्द किया और उसका अपनी भाषा में अनुवाद किया और अमृता को पुरस्कृत भी किया.

उनके एक पाठक ने उनकी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' पढ़ने के बाद कहा कि 'यदि कभी संयोग से अमृता जी का दीदार हो जाए तो मेरा आधा हज यहीं हो जाए'. अमृता ने अपनी आत्मकथा का नाम रसीदी टिकट रखा, इसमें खुशवंत सिह का हाथ था. एक दिन खुशवंत सिंह ने बातों-बातों में कहा, ''तेरी जीवनी का क्या है, बस एक आध हादसा. लिखने लगो तो रसीदी टिकट की पीठ पर लिखी जाए''. अमृता कहती हैं, ''खुशवंत सिंह ने रसीदी टिकट शायद इसलिए कहा कि बाकी टिकटों का साइज बदलता रहता है पर रसीदी टिकट का वही छोटा-सा रहता है.” आगे वे कहती हैं ठीक ही कहा था, जो कुछ घटा, मन की तहों में घटा, और वह सब नज्मों और नॉवलों के हवाले हो गया. फिर बाकी क्या रहा? अमृता ने जो पाया सब कलम की मार्फत दे दिया कुछ बचा कर न रखा. नज्मों और नॉविलों के लेखेजोखे की कच्ची रसीद को पक्की रसीद करने के लिए उन्होंने 'रसीदी टिकट' लिखी. जिसे लेकर तूफान खडा हो गया. उनके समकालीनों ने उसे प्रतिबंधित कराने की हरचन्द कोशिशें कीं. रसीदी टिकट में से अर्थों के अनर्थ निकाले गए. परंतु विरोधियों के साथ ऐसे लोग भी थे जिन्हें लगा कि यदि रसीदी टिकट का कत्ल हो गया तो इससे अमृता का तो खैर क्या बिगड़ जाएगा, पर पंजाब के ही नहीं, सारी दुनिया भर के बुद्धिजीवियों और कलाकारों के लिए मरने जैसी बात होगी. और इस तरह के लोगों ने अपनी कलम अमृता के लिए समर्पित कर दी थी. खुशवंत सिंह ने भी इस कठिन दौर में उनका संग दिया था. उन्होंने कहा था, ''मैं तुम्हें अकेली किसी कचहरी की पेशी में नहीं जाने दूँगा. तुम्हारे साथ रहूँगा. अगर तुम्हें किसे ने गोली मारनी है तो साथ में मुझे भी मार दें...” जरूर खुशवंत सिंह के मन में अमृता के लिए प्यार और सम्मान होगा तभी वे उनके संग गोली खाने के लिए तैयार हुए.

उन्होंने दिया और भरपूर दिया अपने समकालीन रचनाकारों को सम्मान और आदर. मूर्तिकार सोभासिंह, लेखक प्रभाकर माचवे और जैनेंद्र, डा. लाल, फिल्मकार बासु भट्टाचार्य, लोक नाटकों की संरक्षिता नोरा रिचर्ड, दिल्ली के डिप्टी कमिश्नर, जिन्हें साहित्य, कला और लोक संस्कृति तथा गाँव, मिट्टी और किसानों से बेहद लगाव था, महिन्दर सिह रंधावा, राष्ट्रकवि दिनकर, पंजाबी कवि शिव कुमार, पाकिस्तानी शायरा सारा शगुफ्ता, बंगला साहित्यकार और घुमक्कड़ प्रबोध कुमार सान्याल और ना मालूम कितने और कलाकार साहित्यकार उनकी श्रद्धा, आदर और प्रेम के पात्र थे. क्या दूसरों को इज्जत, प्रेम-प्यार, आदर-सम्मान देना, देने की श्रेणी में नहीं आता है? कितने लोग अपने समकालीनों को यह सब दे पाते हैं?

उन्होंने अपना सारा व्यक्तित्व अपनी रचनाओं और अपने प्रेम में पिरो दिया, उंडेल दिया, शायद ही कुछ बचा कर रखा. उनके अनुसार साधना लेखक भी करता है, तपस्वी भी, पर, साधना साधना में अंतर होता है. वे अपने विषय में कहतीं हैं कि मेरी साधना जीवन के किसी रस से इंकार करने के लिए नहीं, सहज मन होने में है. ऐसे सहज मन को मेरा भी आदर और प्रेम भरा नमन.

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(चित्र - साभार द ट्रिब्यून )

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रचनाकार संपर्क –

विजय शर्मा,

151, बाराद्वारी, जमशेद्पुर 831001. फोन: 0657-2436251.

ई-मेल: vijshain@yahoo.com

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2 टिप्पणियाँ

  1. अमृता जी पर जितना कहा जाए कम है ..जितना लिखा जाए वो भी कम है ...कई बार यह सब उनके बारे में पढ़ा है ..पर आज आपका लिखा एक साँस में पढ़ा ...क्यूँकी यह अमृता के लिए लिखा गया था ..शुक्रिया :)

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  2. बेनामी9:16 pm

    well said vijay ji. aap jaise logon ke karan hee ek lekhak kabhi nahin marta-......

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